हिंदुत्व का दर्शन - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindutva Ka Darshan Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
II
कहा जाता है कि पुराने अनीश्वरवादी ने अपने दर्शन को निम्नांकित शब्दों में व्यक्त किया है : केवल एक बात जो मैं जानता हूं, वह यह है कि मैं कुछ नहीं जानता; और मुझे विश्वास नहीं कि मैं उसे जानता हूं ।
सर डेंजल एबट्सन ने पंजाब में जातिप्रथा के बारे में लिखते हुए कहा था कि इस अनीश्वरवादी ने जो कुछ उसके दर्शन के बारे में कहा है, वह जातिप्रथा के बारे में उसकी भावनाओं को सही रूप में दर्शाता है। निस्संदेह यह सत्य है कि स्थानीय परिस्थितियों के कारण जातिगत मामलों में कुछ भिन्नता पाई जाती है और इन जातियों के बारे में कोई विवरण देना बहुत ही कठिन होता है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जो बात एक स्थान पर लागू होती है, वही दूसरे स्थान पर इसके विपरीत है।
ठीक है कि जातिप्रथा की आवश्यक और मूलभूत विशेषताओं को उसकी अनावश्यक तथा फालतू विशेषताओं से अलग करना कठिन नहीं है। परंतु इसके निश्चित करने का तरीका यह है कि यह पूछा जाए कि वे कौन-कौन से मामले हैं, जिनके अंतर्गत एक व्यक्ति जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता है। श्री भट्टाचार्य ने जाति से निष्कासन के निम्नांकित कारण बताएं हैं: (1) ईसाईयत या इस्लाम स्वीकार करना ? (2) यूरो या अमरीका जाना, ( 3 ) विधवा से शादी करना, (4) यज्ञोपवीत को सबके सामने फेंकना, (5) सबके सामने गौ मांस, सुअर का मांस या मुर्गे का मांस खाना, (6) किसी मुसलमान, ईसाई या निम्न हिंदू जाति द्वारा बनाया गया कच्चा खाना सबके सामने खाना, (7) किसी निम्न जाति के शूद्र के घर पुरोहितीय कर्म करना, (8) किसी महिला द्वारा अनैतिक कार्यों के लिए घर से बाहर जाना, तथा (9) किसी विधवा का गर्भवती होना। यह विस्तृत सूची नहीं है और इसमें वे तीन मुख्य अति-महत्वूपर्ण कारण छूट जाते हैं, जिनके कारण जाति से बहिष्कार किया जाता हैं। वे हैं (10) जाति से बाहर अंतर्जातीय विवाह, ( 11 ) अन्य जाति के लोगों के साथ बैठकर खाना खाना, तथा ( 12 ) व्यवसाय बदलना । श्री भट्टाचार्य के कथन का दूसरा दोष यह है कि इससे आवश्यक तथा अनावश्यक तत्वों के बीच कोई अंतर प्रतीत नहीं होता।
निस्संदेह जब कोई व्यक्ति अपनी जाति से निष्कासित किया जाता है, तो यह दंड-समान होता है। उसके मित्र रिश्तेदार तथा संगी-साथी उसका आथित्य स्वीकार करने से मना कर देते हैं। वे उसे अपने घरों में आमोद-प्रमोद के लिए आमंत्रित नहीं करते। वह अपने बच्चों के रिश्ते नहीं कर सकता। यहां तक कि उसकी विवाहित पुत्रियां भी उसके घर नहीं आ सकतीं, क्योंकि उन्हें अपनी जाति से बहिष्कार का भय रहता है। उसका पुरोहित, उसका नाई तथा धोबी उसका कार्य करने से मना कर देता है। उसके अपने जाति-बिरादरी के लोग उसके साथ यहां तक संबंध विच्छेद कर लेते हैं कि वे उसके घर में हुई किसी सदस्य की मृत्य पर उसके दाह संस्कार में भी जाने को मना कर देते हैं। कुछ मामलों में जाति से निष्कासित किए गए व्यक्ति को मंदिरों तथा श्मशानघाट पर भी जाने से रोका जाता है।
जाति से निसकासन के ये कारण अप्रत्यक्ष रूप से जाति के विधान को दर्शाते हैं। लेकिन ये सभी नियम और विधान मौलिक नहीं हैं। इनमें से कुछ ऐसे हैं, जो अनावश्यक हैं। उनके बिना जातिप्रथा बनी रह सकती है। आवश्यक तथा अनावश्यक के बीच दूसरे प्रश्न को पूछकर भेद किया जा सकता है। क्या कोई हिंदू जो अपनी जाति से बहिष्कृत कर दिया गया है, पुनः अपनी जाति में शामिल किया जा सकता है? हिन्दुओं में प्रायश्चित करने की प्रथा है। समाज में निष्कासित व्यक्ति को प्रायश्चित करना पड़ता है। प्रायश्चित करते समय कुछ बातें ध्यान में रखनी होती हैं। पहले तो यह कि जाति के अपराधों में मामलों के कोई प्रायश्चित नहीं होता। दूसरी बात यह है कि ये प्रायश्चित अपराध के अनुसार बदलते रहते हैं। कुछ मामलों में इन प्रायश्चितों में बहुत ही अल्प दंड शामिल होता है। अन्य मामलों में दंड बहुत ही कठोर होता है।
प्रायश्चित के होने और न होने का विशेष महत्व है, इसे स्पष्ट रूप से समझ लिया जाना चाहिए। प्रायश्चित के न होने का मतलब यह नहीं है कि कोई व्यक्ति अपराध करे और उसे माफ कर दिया जाए। इसके विपरीत इसका तात्पर्य यह है कि अपराध की प्रकृति ऐसी है जिसकी गहनता को मापा नहीं जा सकता और यदि अपराधी को निष्कासित कर दिया गया तो उसे पुनः जाति में शामिल नहीं किया जा सकता। उसका उसी जाति में पुनः प्रवेश संभव नहीं है, जिस जाति से उसे निष्कासित किया गया है। प्रायश्चित के होने का अर्थ यह है कि अपराध शमन हो सकता है। अपराधी निर्धारित प्रायश्चित कर सकता है और उस जाति में पुनः प्रवेश पा सकती है, जिससे उसे निष्कासित किया गया है।
दो अपराध ऐसे हैं, जिनके लिए कोई प्रायश्चित नहीं होता। ये हैं (1) हिंदू धर्म से अन्य धर्म में धर्मान्तरण तथा (2) अन्य जाति या अन्य धर्म के व्यक्ति के साथ शादी-विवाह। यह स्पष्ट है कि यदि इन अपराधों के कारण किसी व्यक्ति को अपनी जाति से निकाला गया है तो यह हमेशा के लिए बहिष्कृत हो गया ।
अन्य अपराधों के लिए निर्धारित प्रायश्चित कठोर हैं। वे अपराध दो हैं (1) किसी अन्य जाति या गैर हिंदू व्यक्ति के साथ खान-पान करना, तथा ( 2 ) वह व्यवसाय करना, जो उस जाति का नहीं है। अन्य अपराधों के मामलों में दंड बहुत ही हल्का-फुल्का होता है, लगभग न के बराबर ।
जाति के मौलिक तत्व कौन से हैं तथा जाति में क्या शामिल होता है, इस बात का पता लगाने के लिए सबसे विश्वसनीय सूत्र प्रायश्चित से संबंधित नियमों द्वारा उपलब्ध कारण बताए गए हैं। वे जिनके उल्लंघन पर प्रायश्चित की व्यवस्था ही नहीं है, वे जाति प्रथा की आत्मा हैं तथा वे जिनके उल्लंघन पर प्रायश्चित की व्यवस्था है और जो कठोरतम होते हैं, वह जाति प्रथा का शरीर है। अतः यह बिना किसी हिचक से कहा जा सकता है कि जाति के चार मूल नियम हैं। जाति को सामाजिक समूह के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसमें (क) हिंदू धर्म में विश्वास तथा कुछ विनियमों में बंधा होना, (ख) शादी विवाह, (ग) खान-पान, तथा (घ) व्यवसाय | जिसका कि एक सामान्य नाम है, जिसके द्वारा इसे पहचाना जा सकता है।