हिंदुत्व का दर्शन - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindutva Ka Darshan Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
यही कुछ मुद्दे हैं, जो हिंदुओं की जाति - श्रेष्ठता की व्यवस्था में किसी जाति का स्थान और स्तर निश्चित करते हैं।
जाति-व्यवस्था की यह क्रमिक बनावट एक विशेष तरह की सामाजिक मानसिकता बनने और बनाने के लिए जिम्मेदार है, जिस पर अवश्य ही ध्यान देना चाहिए। प्रथम, इसके कारण विभिन्न जातियों में प्रतिष्ठा के लिए प्रतिस्पर्धी की भावना निर्मित होती है। दूसरा, विभिन्न जातियों के बीच एक दूसरे के लिए द्वेष और घृणा की भावना पनपती है।
इस द्वेष तथा घृणा की भावना ने केवल कहावतों में ही स्थान प्राप्त नहीं किया, बल्कि उसे हिंदू साहित्य में भी स्थान मिला है। मैं यहां, सहयादि खंड नाम के धर्म - शास्त्र का संदर्भ दे रहा हूं जो अनेक पुराणों में से एक है। यह पुराण भी हिदुओं के पवित्र ग्रंथों का ही एक भाग है लेकिन इसका विषय अन्य पुराणों से बिल्कुल अलग है। इसमें विभिन्न जातियों की मूल उत्पत्ति के बारे में बतलाया गया है। ऐसा करते हुए, उसमें अन्य जातियों को कुलीन उत्पत्ति का बताया गया है, जब कि ब्राह्मण को सबसे घृणित उत्पत्ति का बताया गया है। यह सब मनु से प्रतिशोध की प्रतिक्रिय स्वरूप किया गया। एक प्रकार से यह ब्राह्मण जाति पर लगाया गया बहुत ही बुरा लांछन है। स्वभाविक था कि पेशवाओं ने उसे नष्ट करने की आज्ञा दी थी। परंतु इस पुराण की कुछ प्रतियां नष्ट होने से बच गईं।
लेकिन कुछ प्रश्न करने से पहले मैं यहां एक बात का और उल्लेख करता हूं।
संभवतः वर्तमान हिंदू मार्क्सवाद के घोर विरोधी हैं। इसके पीछे कारण यह है कि मार्क्स के वर्ग संघर्ष के सिद्धांत से वे बहुत ही भयभीत हो जाते हैं। लेकिन वहीं लोग यह भूल जाते हैं कि भारत न केवल वर्ग संघर्ष, बल्कि वर्ग युद्ध की भूमि बन चुका है।
सबसे दुखदायी वर्ग-युद्ध ब्राह्मण और क्षत्रियों के बीच हुआ था। हिन्दुओं का श्रेष्ठ साहित्य इन दो वर्णों के बीच हुए संघर्षों से भरा पड़ा है।
पहला ज्ञात संघर्ष ब्राह्मण और राजा वेण के बीच हुआ था। वेण राजा अंग का पुत्र था, जो अत्रि वंश का था । उसकी मां सुनीता, मृत्यु की बेटी थी । काल (मृत्यु) की पुत्री के इस पुत्र पर अपने मातृक दादा नाना के कलंक के कारण वह अपने राजा के कर्तव्यों का त्याग करके विषय-वासना में जीवन व्यतीत कर रहा था। इस राजा ने वेदों की आज्ञाओं का उल्लंघन करते हुए अपनी गैर - धार्मिक व्यवस्था की स्थापना की थी। उसके राज्य में लोग धर्मशास्त्रों को अध्ययन नहीं करते थे और देवों को यज्ञ के समय सोमरस की आहुति नहीं दी जाती थी । उसने स्पष्ट घोषित किया था -
'मैं ही यज्ञ का उद्देश्य हूं, यज्ञकर्ता भी और स्वयं यज्ञ हूं। मेरे लिए ही यज्ञ किया जाए और आहुति दी जाए। '
बाद में मारिची ऋषि के नेतृत्व में ऋषियों ने उसे निम्न प्रकार से संबोधित किया-
'हम एक ऐसा समारोह मनाने जा रहे हैं, जो अनेक वर्षों तक चलेगा। हे वेण, अनाचार का पालन न करो । यह तुम्हारा शाश्वत् कर्तव्य नहीं है। तुम प्रत्येक लक्षण से अत्रि के वंश के प्रजापति हो और तुन्हें अपनी प्रजा की रक्षा करनी चाहिए । '
उस मूर्ख वेण ने, जो सदाचार नहीं जानता था, इन महान ऋषियों की हंसी उड़ाते हुए उन्हें उत्तर दिया, 'मेरे अलावा कर्तव्य की आज्ञा देने वाला और कौन हो सकता है। मुझे किसकी आज्ञा का पालन करना है? इस पृथ्वी पर पवित्र ज्ञान, सामर्थ्या तपस्या और सत्य में मेरे बराबर कौन हो सकता है? जो लोग झूठे तथा मूर्ख हैं, वे नहीं जानते कि मैं ही सभी मनुष्यों का स्रोत हूं। इस कथन का विश्वास करने में कोई झिझक नहीं। यदि मैं चाहूं तो सारी पृथ्वी को जलाकर राख कर सकता हूं। उस पर मूसलाधार वर्षा ला सकता हूं, अथवा स्वर्ग और पृथ्वी को बंदी बना सकता हूं।'
अंत में उसकी अज्ञानता और मूर्खता के कारण जब वेण पर उनका कोई अधिकार नहीं चल सका, तब वे शक्तिशाली ऋषि क्रोधित हो गए और उन्होंने इस बलवान तथा झगड़ालू राजा को पकड़ लिया और उसकी बाई जांघ को घिसने के बाद एक काला मनुष्य पैदा हुआ जो कद का छोटा था और भयभीत होने के कारण हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। उसे उत्तेजित देखकर अत्रि ने कहा, 'बैठ जाओ निषाद'। वह बाद में निषाद वंश का संस्थापक बना। वह धीवर (मछेरे) लोगों का भी जन्मदाता है, जो वेण के भ्रष्ट आचरण से उत्पन्न हुए । इसी प्रकार विंध्याचल निवासी तुरवार तथा तुम्बुरा, दोनों उसके इसी प्रकार के आचरण से उत्पन्न हुए, जो अत्यंत उच्छृंखल थे। बाद में उन्हीं शक्तिशाली ऋषियों ने क्रोधित और उत्तेजित होकर पुनः वेण के दाएं हाथ को घिसा, जैसे लोग अरनी की लकड़ी घिसते हैं, और उससे अग्नि के समान तेजस्वी शरीर वाला प्रिथ उत्पन्न हुआ।
इस वेण के पुत्र (प्रिंथ) ने बाद में हाथ जोड़कर उन महान ऋषियों को संबोधित किया-
'प्रकृति ने मुझे समझने की बहुत कमजोर शक्ति दी है। मुझे बताओ, मैं अपने कर्तव्यों को कैसे समझं ? मुझे सही तरह से बताएं कि मैं उनका उपयोग कैसे करूं? मैरे ऊपर संदेह न करो। मेरे कर्तव्यों और उद्देश्यों के बारे में आप जो कुछ भी कहेंगे, मैं पालन करूंगा।'
तब उन देवताओं तथा महान ऋषियों ने उनसे कहा -
'कोई भी कर्तव्य तुम्हें बताया जाए, उसका यह ध्यान किए बिना कि वह तुम्हें पसंद है अथवा नहीं, सभी प्राणी मात्र को समान दृष्टि से देखते हुए, क्रोध, लालसा तथा अहंकार, इन तीनों लालसाओं को दूर रहकर बिना झिझक पालन करो। अपनी सामर्थ्य से उन लोगों के शास्त्रों पर रोक लगाओ जो सदाचार से हट जाते हैं। अपने कर्तव्य के प्रति निरंतर श्रद्धा रखो और मन, वचन, कर्म से तुम पृथ्वी पर वेद या ब्राह्मणों की रक्षा करोगे, और वचन दो कि तुम ब्राह्मणों को दंड नहीं दोगे' तब वेण के पुत्र ने उनकी बात मन से स्वीकार की। परिणामस्वरूप सभी ऋषि उससे प्रसन्न हुए। ज्ञानी मुनि शुक्र उसके पुरोहित बने । बालखिल्प और सारस्वत उसके मंत्री और गर्ग ऋषि उसके ज्योतिषि बने ।
दूसरा संघर्ष ब्राह्मण और क्षत्रिय राजा पुरुरवा के बीच हुआ। उसका संक्षिप्त संदर्भ महाभारत के आदि पर्व से प्राप्त होता है।
पुरुरवा का जन्म इला से हुआ था। उसका समुद्र के तेरह द्वीपों पर साम्राज्य था और ऐसे व्यक्ति उसके साथी थे, जो सभी श्रेष्ठ मानव थे। वह स्वयं भी एक महान और कीर्तिवान पुरुष था । अपनी सामर्थ्य के नशे में चूर होकर पुरुरवा ने ब्राह्मणों के साथ युद्ध करके उनके सभी अधिकार छीन लिए थे। यहां तक कि ब्राह्मण के स्वर्ग से प्रकट हुए सनत कुमार की चेतावनी को भी उसने नहीं माना। इस पर क्रोधित होकर ऋषियों ने उसे शाप दे दिया। इस तरह से वह लोभी सम्राट अपनी शक्ति के अहंकार के कारण नष्ट हो गया।