हिंदुत्व का दर्शन - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindutva Ka Darshan Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
तीसरे टकराव की घटना ब्राह्मणों और राजा नहुष के बीच में घटी। यह कहानी महाभारत के उद्योग पर्व में विस्तार से दी गई है यह इस प्रकार से है:
राक्षक वृत्र की हत्या करने के बाद इंद्र एक ब्राह्मण की हत्या से घबरा गया (क्योंकि वृत्र को 'ब्राह्मण माना जाता था), और उसने अपने-आपको पानी में छुपा लिया तब देवताओं के इस राजा के अदृश्य हो जाने के कारण स्वर्ग तथा पृथ्वी का संपूर्ण व्यवहार भ्रम में पड़ गया तब ऋषि और देवताओं ने नहुष से राजा बनने की प्रार्थना की। बहुत कहने के बाद उसने राजा बनना स्वीकार किया। इस पद पर पहुंचने से पहले तक उसने सदाचार का जीवन व्यतीत किया था लेकिन भोग-विलास और ऐश्वर्य की सभी वस्तुओं के बीच वह अपने संयम को नियंत्रण में नहीं रख सका। इस तरह वह रासलीला में खो गया। वहां तक कि इंद्र की पत्नी इंद्राणी को भी भोगने की उसकी इच्छा हुई। रानी ने देवताओं के गुरु अंगिरस बृहस्पति की शरण ली, जिसने उसे रक्षा का वचन दिया। इस पर राजा नहुष बहुत क्रोधित हुआ। देवताओं ने उसे बहुत समझाया, लेकिन नहुष बोला कि 'व्यभिचारी इच्छाओं में वह स्वयं इंद्र से अधिक बुरा नहीं है। प्रख्यात ऋषि की पत्नी अहिल्या के साथ इंद्र ने उसके पति के जीते जी ही संभोग किया था। तब आप सभी ने उसे क्यों नहीं रोका?"
नहुष के ऐसा कहने पर देवता इंद्राणी को लाने के लिए चले गए। लेकिन बृहस्पति उसे देने के लिए तैयार नहीं था। तथापि उसके कहने पर इंद्राणी ने नहुष से कुछ देर के लिए समय की याचना करते हुए कहा कि पहले वह जानना चाहती है कि उसके पति का क्या हुआ ?
उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली गई। बाद में इंद्र की ओर से देवता विष्णु के पास गए और विष्णु ने वचन दिया कि यदि इंद्र उसके लिए बलि दे, तब वह दोषमुक्त हो जाएगा तथा अपना प्रभुत्व प्राप्त करेगा। इस तरह नहुष का नाश हो जाएगा। इस आधार पर इंद्र ने बलि दी, जिसका परिणाम इस प्रकार बताया गया है : 'ब्राह्मण हत्या का पाप, वृक्ष, नदियां, पर्वत, पृथ्वी, स्त्रियां तथा अन्य तत्वों में विभाजित होने के कारण देवों के राजा वसव (इंद्र) की दोषों तथा पाप से मुक्ति हो गई और वह आत्मनुशासित बन गया।' इसके कारण नहुष के श्रेष्ठत्व को धक्का पहुंचा। बताया जाता है कि उसने अपना प्रभुत्व पुनः प्राप्त कर लिया होगा क्योंकि, जैसा हमें बताया गया है, इंद्र फिर नष्ट हो गया था, तथा अदृश्य हो गया था। जब इंद्र अदृश्य हो गया, तब इंद्राणी अपने पति की खोज में निकली। बहुत कोशिशों के बाद उपश्रिता (रात्रि तथा निशाचरों की देवी ) की सहायता से उसने एक बहुत छोटे रूप में, हिमालय से उत्तर में एक समुद्र में कमल के डंठल पर से उसे जीवित खोज निकाला। उसने उसे नहुष के दुष्ट इरादों के बारे में बताया और कहा कि वह अपनी शक्ति के बल पर उसे मुक्त कराए और अपना प्रभुत्व पुनः स्थापित करे। चूंकि नहुष के पास इंद्र से अधिक शक्ति थी, अतः उसने कोई कदम उठाने से पहले उसे एक उपाय बताया, जिसमें अपहरण करने वाले को उसके स्थान से हटाया जा सकता है। उसने अपनी पत्नी से कहा कि वह नहुष से कहे, 'यदि वह ऐसी दिव्य पालकी पर सवार हो उसके पास आएगा जिसे ऋषि कंधा दिए हों, तो वह स्वयं को उसे समर्पित कर देगी' इस प्रकार देवताओं की यह बात नहुष के पास पहुंची, जिसने इंद्राणी का स्वागत किया। उसने अपना प्रस्ताव रखा। उसने कहा- 'हे देवताओं के राजा, मेरी कामना है कि आप ऐसे वाहन पर सवार होकर आएं जैसा विष्णु, रुद्र और राक्षसों के पास भी न हो, और प्रख्यात ऋषि उसके सारथी हों। '
नहुष ने इस प्रार्थना का अनुमोदन किया और स्वयं अपने मुंह से अपनी ही प्रशंसा करते हुए कहा : 'जो मुनियों को अपना सारथी बनाए, वह किसी अल्प शक्ति का पुरुष नहीं हो सकता। मैं शक्ति का कठोर उपासक हूं। मैं भूतकाल, वर्तमान तथा भविष्य का स्वामी हूं और प्रत्येक बात मुझ पर निर्भर होती है। इसलिए हे देवी, तुम्हारे प्रस्ताव का मैं बिना संकोच पालन करूंगा। सात ऋषि तथा सभी ब्राह्मण मुनि मेरे रथ के सारथी होंगे। हे सुंदर देवी, अब तू मेरी शक्ति और चमत्कार देख । ' इसी प्रकार यह कहानी आगे बढ़ती है : इसी के अनुसार, उस अहंकारी, क्रूर, धर्मद्रोही, दुष्ट तथा दुराचारी पुरुष ने सभी ऋषियों को अपने रथ से बांध दिया। ऋषियों ने उसकी आज्ञा का पालन किया। इस प्रकार उसने उन्हें रथ खींचने के लिए बाध्य किया। इंद्राणी फिर बृहस्पति के पास गई, जिसने उसे आवश्वासन दिया। किस तरह वह स्वयं उत्पीड़नकर्ता के विनाश के लिए यज्ञ करेगा और इंद्र का अदृश्य स्थान खोज निकलेगा। फिर अग्नि को इंद्र की खोज करने और बृहस्पति के पास लाने के लिए भेजा गया। इंद्र के आगमन पर बृहस्पति ने उसकी अनुपस्थिति में जो कुछ भी वहां हुआ, वे सारी बातें कह डालीं। जब इंद्र, कुबेर, यम, सोम तथा वरुण के साथ नुहष का विनाश करने की योजना बना रहे थे, तब अगस्त्य मुनि वहां आए और उन्होंने इंद्र को उसके प्रतिस्पर्धी की हार पर बधाई दी। घटना कैसे घटी, उसकी कहानी इस तरह से बताई है : 'उस पापी नहुष का रथ खींचते-खींचते ब्राह्मण ऋषियों ने महापुरुष नहुष से एक समस्या का समाधान करने को कहा और पूछा 'हे महापराक्रमी कीर्तिवान राजा, जिन ब्राह्मण मंत्रों का पाठ राजा को बलि देते समय किया जाता है, उन्हें आप अधिकृत मानते हैं या नहीं ?'
नहुष ने, जिसकी बुद्धि अंधकार से घिरी हुई थी, उत्तर दिया : "नहीं" ऋषियों ने एक साथ मिलकर कहा 'तुम अनाचार में व्यस्त हमें सदाचार नहीं करने दे रहे हो। यह मंत्र, जिसका इसके पूर्व महान ऋषियों ने पठन किया है, हम इसे पवित्र मानते हैं।' इस तरह मुनियों से वाद-विवाद करते हुए, अनाचार से प्रभावित होकर राजा ने मेरे (मुनि अगस्त) मस्तक पर अपना पैर रख दिया, जिसके कारण राजा की कीर्ति समाप्त हुई और साथ ही शक्ति भी नष्ट हो गई। जब एकाएक वह उत्तेजित हो गया, और भय से घबराया तब मैंने कहा: 'हे मूर्ख, तुम उन पवित्र मंत्रों की निंदा करते हो जिनकी रचना पूर्व ऋषियों ने की है। यहीं नहीं, ब्रह्मा - समान स्तर वाले ऋषियों को अपना रथ खींचने के लिए बाध्य करते हो। अतएव तुम अपनी कीर्ति तथा योग्यता खोकर स्वर्ग से उतरकर धरती पर निवास करो। तब आगे चलकर तुम एक हजार वर्षों तक धरती पर सांप की तरह घिसटते रहोगे और समय पूरा होने पर स्वर्ग में जाओगे ।
इस तरह उस दुष्ट मनुष्य का पतन हो गया ।
इसके पश्चात् राजा निमी और ब्राह्मण के संघर्ष का संदर्भ है। विष्णु पुराण में यह कथा निम्न प्रकार से है:
राजा निमी ने ब्राह्मण ऋषि वशिष्ठ से एक ऐसे यज्ञ का अधिष्ठाता बनने की प्रार्थना की, जो एक हजार वर्षों तक चले । उत्तर में वशिष्ठ ने कहा कि वे पांच सौ वर्षों के लिए इंद्र के साथ यज्ञ करने में पहले से ही व्यस्त हूं और उन्होंने अपनी असमर्थता व्यक्त की, लेकिन कहा कि इस अवधि के बीत जाने के बाद वे उसके पास लौट आएंगे। राजा ने कुछ नहीं कहा और वशिष्ठ वहां से चले गए। लेकिन वापस लौटने पर ऋषि ने देखा कि राजा ने गौतम ऋषि (जो कि ब्राह्मण ऋषि वशिष्ठ के ही बराबर तेजस्वी थे) और अन्य ऋषियों को उस यज्ञ के लिए नियुक्त किया । उपेक्षा से भरे इस व्यवहार से क्षुब्ध होकर उन्होंने राजा को, जो उस समय नींद में था, शाप दिया कि उसका शरीर नष्ट हो जाएगा। इसकी प्रतिक्रिया में राजा ने भी वशिष्ठ को शाप दिया कि राजा के शाप ने भी अपना प्रभाव दिखलाया उसके बाद उसकी मृत्यु हो गई। बाद में वशिष्ठ ने दूसरा शारीरिक रूप धारण किया। इस शाप के परिणामस्वरूप वशिष्ठ का भी तब पुनर्जन्म हुआ, जब उर्वशी को देखकर ऋषियों के वीर्य की बूंदें गिरीं। निमी के शव का संलेपन किया गया। जिस यज्ञ को वशिष्ठ ने आरंभ किया था, उसके समापन पर देवगण ऋषि-मुनियों से विचार-विमर्श के बाद उसे पुनर्जीवित करना चाहते थे, लेकिन वशिष्ठ ने इंकार कर दिया, तब देवताओं ने उसकी इच्छा के अनुसार उसका अस्तित्व सभी जीवित प्राणियों की आंखों के अंदर सुरक्षित कर रख दिया। इसी तथ्य के परिणामस्वरूप वे (ऋनि-मुनि) आंखों को मूंदते खोलते रहते हैं (निमिष का अर्थ है, ‘पलक झपकाना')। मनु ने ब्राह्मणों और राजा सुमुख के बीच एक अन्य संघर्ष की चर्चा की है। लेकिन इस संघर्ष के विस्तृत विवरण नहीं मिलते।