हिंदुत्व का दर्शन - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindutva Ka Darshan Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
इस प्रकार हिन्दू धर्म में व्यवसाय चयन के लिए अनुमति नहीं है। उसमें आर्थिक स्वतंत्रता नहीं है और कोई आर्थिक सुरक्षा भी नहीं है। आर्थिक दृष्टि से शूद्र की स्थिति बहुत ही कमजोर है।
ज्ञान के प्रसार के लिए दो कसौटियों का पूर्व नियोजित होना आवश्यक है। औपचारिक शिक्षा का होना आवश्यक है। साक्षरता का होना भी आवश्यक है। इन दोनों के बगैर शिक्षा का प्रसार नहीं हो सकता। औपचारिक शिक्षा के बगैर जटिल समाज के सभी साधनों और उपलब्धियों का आदान-प्रदान करना संभव नहीं । औपचारिक शिक्षा के बगैर किसी भी विषय से संबंधित संग्रहीत विचारों तथा अनुभवों का युवा पीढ़ी तक पहुंचना संभव नहीं है और यह विचार तथा अनुभव उन्हें तब तक नहीं मिल सकते, जब तक हम उनको दूसरों के साथ अनौपचारिक संबंध बनाकर शिक्षा प्राप्त करने के लिए छोड़ नहीं देते। औपचारिक शिक्षा के बगैर वह नई दृष्टि प्राप्त नहीं कर सकता। उसका दृष्टिकोण व्यापक नहीं बन सकता और वह अपने दैनिक कार्यक्रमों का गुलाम बनकर अज्ञानी रह जाएगा। परंतु औपचारिक शिक्षा के लिए विशेष माध्यमों, जैसे पाठशालाएं, पुस्तकें, नियोजित साधन-सामग्री और अध्ययन आदि की आवश्यकता होती है। जब तक मनुष्य साक्षर न हो, उसे पढ़ना-लिखना माध्यमों का लाभ कैसे ले सकता है? पढ़ने-लिखने की कला अर्थात् साक्षरता का प्रसार और औपचारिक शिक्षा, यह दोनों बातें साथ-साथ चलने वाली हैं। इन दोनों के अस्तित्व के बगैर ज्ञान का प्रसार नहीं हो सकता है।
इस संदर्भ में हिंदू धर्म की क्या स्थिति है ?
औपचारिक शिक्षा का सिद्धांत हिंदू धर्म में बहुत ही सीमित रूप में है । औपचारिक शिक्षा केवल वेदों के अध्ययन तक ही सीमित है। यह स्वाभाविक था क्योंकि हिंदूओं की यह धारणा थी कि वेदों के बाहर कोई ज्ञान नहीं है। ऐसी स्थिति होने के कारण औपचारिक शिक्षा वेदों के अध्ययन तक ही सीमित रही। इसका एक दूसरा परिणाम यह हुआ कि हिंदुओं ने यह माना कि उनका यही कर्तव्य है; वेदों के अध्ययन के लिए स्थापित पाठशालाओं से केवल ब्राह्मणों को ही लाभ हुआ। शासन के कला तथा विज्ञान के अध्ययन के लिए संस्थाओं की स्थापना करना अपनी जिम्मेदारी नहीं समझी, जिनका व्यापारी तथा मजदूर वर्ग के लिए उपभोग हो सकता था। शासन की इस उपेक्षा के कारण उन्हें दूसरा रास्ता अपनाना पड़ा।
प्रत्येक वर्ग ने, वे जो कार्य परंपरा से करते आ रहे थे, उसे करने का ज्ञान अपने सदस्यों को देने का प्रबंध किया । वैश्य जाति के लोगों का यह कर्तव्य था कि प्रत्येक युवा वैश्य व्यापारिक तंत्र, गणित, कोई भाषा तथा व्यापार की कुछ वास्तविक जानकारी बन सके। इन बातों की शिक्षा उसे उसके पिता के साथ व्यापार करते समय मिल जाती थी। कलाकारों अथवा दस्तकारी वर्ग, जो शूद्रों से उभरा वह अपनी कला, दस्तकारी अपने बच्चों को इसी तरह देने लगा। शिक्षा पारिवारिक बन गई थी । शिक्षा व्यावहारिक थी। उसके केवल विशेष कार्य करने की कुशलता बढ़ाई। उसने नई धारणाएं नहीं बनाईं। उसने दृष्टि का विकास नहीं किया, जिसका नतीजा यह हुआ कि व्यावहारिक शिक्षा ने उसे केवल कार्य करने का एक अलग और समान तरीका सिखाया, जिसे उसकी कुशलता बदलते वातावरण में एक ठोस अयोग्यता बन गई। निरक्षरता हिंदू धर्म का एक कुटिल परंतु संपूर्ण प्रक्रिया का स्वभाविक अंग बन गई। इस प्रक्रिया को समझने के लिए हमारे लिए मनु द्वारा वेदों के अध्ययन तथा शिक्षा से संबंधित जो नियम बनाए गए, उनकी ओर ध्यान देना आवश्यक है। उसमें निम्नलिखित नियमों पर विचार किया गया है :
1. 88. वेदों का अध्ययन करने तथा वेदों की शिक्षा देने का कार्य सृष्टा ने ब्राह्मणों को सौंपा है।
1.89. क्षत्रियों को उसने (सृष्टा से) आदेश दिया है कि वे वेदों का अध्ययन करें।
1.90. वैश्यों को उसने (सृष्टा ने) आज्ञा दी...... वे वेदों का अध्ययन करें। 2.116. जो गुरु की आज्ञा के बगैर वेदों का ज्ञान प्राप्त करेगा, ऐसा माना जाएगा कि उसने धर्मशास्त्रों की चोरी करने का अपराध किया है और वह यातनाओं में डूब जाएगा ।
4. 99. द्विज, शूदों की उपस्थिति में वेदों का अध्ययन न करें।
9.18. स्त्रियों का वेदों के श्लोकों से कोई सरोकार नहीं है।
11.198. यदि किसी द्विज ने (अनुचित रूप से) वेदों का रहस्योद्घाटन किया है (अर्थात् शूद्रों तथा स्त्रियों को ) तो वह (पाप करता है), एक वर्ष जौ का आहार करके अपने पाप का प्रायश्चित करता है।
इन श्लोकों में तीन भिन्न-भिन्न प्रस्तावों का समावेश है। ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य वेदों का अध्ययन कर सकते हैं। परंतु इनमें से केवल अकेले ब्राह्मणों को ही वेदों की शिक्षा देने का अधिकार है। परंतु शूद्रों के संबंध में, उनको वेदों का अध्ययन ही नहीं करना चाहिए, बल्कि उसके पठन को भी नहीं सुनना चाहिए ।
मनु के उत्तराधिकारियों ने शूद्रों की वेदों के अध्ययन से संबंधित इस अयोग्यता को एक अपराध बना दिया, जिसके लिए कड़ी सजा हो सकेगी।
उदाहरण के लिए गौतम ऋषि ने कहा है :
12.4. यदि शूद्र जान-बूझकर वेदों का पठन सुनता है, तब उसके कानों में पिछलता शीशा या लाख डाली जाए। यदि वह वेदों का उच्चारण करता है, तब उसकी जबान काट दी जाए, यदि वह वेदों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करता है, तब उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएं।
कात्यायन ऋषि ने भी इसी प्रकार के विचार व्यक्त किए हैं।
ऐसा कहा जा सकता है कि प्राचीन संसार ने सामान्य लोगों को शिक्षा देने की अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल होने का अपराध किया है, परंतु संसार में ऐसा कोई भी समाज नहीं है, जिसने अपनी सामान्य जनता को धर्म ग्रंथों का अध्ययन करने की मनाही का अपराध किया हो। किसी भी समाज ने कभी भी अपनी सामान्य जनता पर शिक्षा प्राप्त करने पर प्रतिबंध लगाने का अपराध नहीं किया है। किसी भी समाज ने ऐसी चेष्टा नहीं की कि सामान्य मनुष्यों द्वारा ज्ञान प्राप्त करने के प्रयासों को दंड देने योग्य अपराध घोषित किया जाए। केवल मनु ही एक ऐसा दैवी कानून बनाने वाला व्यक्ति है, जिसने सामान्य जन के ज्ञान के अधिकार को नकारा ।
परंतु, मैं इस पर अधिक चर्चा करने की और प्रतीक्षा नहीं कर सकता। मैं बहुत शीघ्र यह बताने के लिए चिंतित हूं कि सामान्य जनता पर वेदों के अध्ययन के विरुद्ध प्रतिबंध लगाने से किस प्रकार निरक्षरता तथा विधर्मी जीवन के अज्ञान का निर्माण हुआ? इसका उत्तर सरल है। यह बात समझना आवश्यक है कि पढ़ाई-लिखाई का वेदों के अध्ययन तथा शिक्षा से स्वभाविक संबंध है। पढ़ाई-लिखाई उन लोगों के लिए एक आवश्यक चीज थी, जिन्हें वेदों के अध्ययन का विशेष अधिकार था और वे इस अध्ययन के लिए मुक्त थे। जिन्हें वेदों के पढ़ने का अधिकार नहीं था, उनके लिए पढ़ाई-लिखाई आवश्यक नहीं थी। इस प्रकार से शिक्षा वेदों के अध्ययन का एक निमित्त बन गई। नतीजा यह हुआ कि वेद के अध्ययन तथा शिक्षा से संबंधित सिद्धांत पढ़ाई-लिखाई की कला पर भी लागू हो गया। जिन लोगों को वेदों के अध्ययन का अधिकार था, उन लोगों को ही पढ़ने-लिखने का अधिकार प्राप्त हुआ। जिन लोगों को वेदों के अध्ययन का अधिकार नहीं था, उन लोगों को पढ़ने-लिखने के अधिकार से भी वंचित रखा गया। इस प्रकार यह कहना सर्वथा उपयुक्त है कि मनु के विधान के अनुसार पढ़ना-लिखना कुछ मुट्ठी भर ऊंचे वर्णों का अधिकार बन गया और निरक्षरता उन अनके नीचे वर्णों का भाग्य बन गई।
इस विश्लेषण में थोड़ी आगे बढ़ने पर यह स्पष्ट हो जाएगा कि शिक्षा का निषेध करने के कारण मनु ही उस अज्ञान के लिए जिम्मेदार है। जिसमें सर्वसाधारण जनता फंस गई।
इस प्रकार हिंदुत्व ज्ञान के प्रसार का एक माध्यम होने की बजाए अंधकार का एक सिद्धांत है।
इन तथ्यों पर विचार करते हुए हम यह कह सकते हैं कि स्वतंत्रता की उन्नति के लिए जिन स्थितियों की आवश्यकता होती है, हिन्दू धर्म उनके विरुद्ध है। इसलिए वह स्वतंत्रता को नकारता है।