हिंदुत्व का दर्शन - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindutva Ka Darshan Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
अब हम आश्रम-प्रथा को देखें । आश्रम - सिद्धांत हिंदुत्व की एक खास विशेषता है। दूसरे किसी भी अन्य धर्म की शिक्षाओं में इस सिद्धांत ने कोई स्थान पाया हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता। आश्रम - सिद्धांत के अनुसार, जीवन को चार अवस्थाओं में विभाजित किया गया है। ये चार अवस्थाएं हैं - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास । ब्रह्मचर्य अवस्था में मनुष्य अविवाहित होता है और अपना सब समय शिक्षा तथा अध्ययन में व्यतीत करता है। इस अवस्था के समाप्त होने के बाद वह गृहस्थ में प्रवेश करता है अर्थात् वह विवाह करता है, परिवार का पालन-पोषण करता है और भौतिक सुखों की ओर ध्यान देता है। उसके बाद वह तीसरी अवस्था में प्रवेश करता है और वानप्रस्थ कहलाता है। वानप्रस्थी के रूप में वह जंगल में जाकर साधु के रूप में जीवन व्यतीत करता है। परंतु वह अपने परिवार से संबंध विच्छेद नहीं करता अथवा संपत्ति से अपना अधिकार भी नहीं त्यागता । उसके बाद चौथी और अंतिम अवस्था आती है। वह है संन्यास की अवस्था, जिसका मतलब है ईश्वर की खोज में संसार का संपूर्ण त्याग करना। ब्रह्मचारी और गृहस्थ अवस्थाएं एक प्रकार से स्वाभाविक अवस्थाएं हैं। अंतिम दो अवस्थाओं के बारे में केवल सिफारिश की जाती है। उसके बारे में कोई बंधन नहीं है। इस संबंध में मनु ने जो कुछ कहा है, वह निम्न प्रकार है :
6.1. द्विज व्यक्ति, जो नियमानुसार गृहस्थ का जीवन व्यतीत कर चुका है, दृढ़ संकल्प करते हुए तथा अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करते हुए जंगल में जाकर (नीचे दिए गए नियमों का पालन करते हुए), रह सकता है।
6.2. जब एक गृहस्थी देखे कि उसकी त्वचा झुर्रियों से भरने लगी है। उसके बाल सफेद होने लग जाएं और वह अपनु पुत्रों के पुत्र देख ले, तब उसे जंगल में जाकर रहना चाहिए।
6.3. काश्तकारी से उत्पन्न अन्न का त्याग करते हुए, अपनी सभी वस्तुओं का त्याग करते हुए, तथा अपनी पत्नी को पुत्रों के उत्तरदायित्व में सौंपकर अथवा उसे साथ लेकर वह जंगल में चला जाए।
6.33. परंतु इस प्रकार अपने नैसर्गिक जीवन का तीसरा भाग जंगल में गुजार कर अपने जीवन के चौथे हिस्से में सभी सांसारिक संबंधों का त्याग करते हुए वह साधु के रूप में जीवन व्यतीत करे।
इन नियमों में सम्मिलित असमानता यद्यपि पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं है, परंतु यह वास्तविक है। हम यह देख सकते हैं कि यह सभी संस्कार और आश्रम - व्यवस्था केवल द्विज-जन्मे लोगों तक ही सीमित है । शूद्रों को इनसे वंचित रखा गया है ।¹ यद्यपि मनु को उनके समारोह मनाने में कोई आपत्ति नहीं है, परंतु उसे अपने समारोह में उनके द्वारा पवित्र मंत्रों का प्रयोग करने पर आपत्ति है। इस विषय पर मनु ने कहा है :
10.127. वे शूद्र जो अपने संपूर्ण कर्तव्य निभाने को उत्सुक हैं, और जानते हैं कि उन्हें निभाना चाहिए, वे अपने पारिवारिक धार्मिक संस्कारों में उत्तम लोगों का अनुसरण कर सकते हैं, परंतु पवित्र मंत्रों का पाठ किए बिना। केवल उन मंत्रों का उपयोग करें, जिसमें नमस्कार तथा स्तुति का समावेश है, जिसमें उन्हें केवल प्रशंसा मिल सके, परंतु उनके द्वारा कोई पाप न हो ।
स्त्रियों के लिए निम्नलिखित मंत्र को देखें
2.66. यज्ञोपवीत-संस्कार को छोड़कर स्त्रियों को बाकी समारोह क्रियाएं अपनी आयु तथा क्रम से वेद पाठ किए बिना करनी चाहिएं जिससे उनका शशीर परिपूर्ण बन सके।
मनु ने शूद्रों को धार्मिक संस्कार - विधियों के लाभ से वंचित क्यों रखा? शूद्रों को संन्यासी बनने के लिए उसने जो निषेध किया है, यह बात भ्रमित करने वाली है। संन्यास का मतलब है आत्म-त्याग और सभी सांसारिक सुखों का परित्याग । कानून की भाषा में संन्यास का अर्थ एक प्रकार से नागरिक जीवन की मृत्यु के समान होता है। इस तरह जब मनुष्य संन्यासी बन जाता है, उसी क्षण से उसे मृत मानकर उसका वारिस तुरंत उसके स्थान पर विराजमान होता है। अगर कोई शूद्र संन्यासी बन जाए तब उसके साथ भी यही स्थिति हो सकती है। ऐसी स्थिति से उस शूद्र को छोड़कर और किसी को कोई नुकसान नहीं हो सकता। फिर यह रोक क्यों? यह एक महत्वपूर्ण विषय है और धार्मिक विधि तथा संन्यास का महत्व तथा अर्थ स्पष्ट करने के लिए मैं मनु को ही यहां उद्धत करना चाहूंगा। मनु के निम्नलिखित श्लोकों पर हम विचार करें :
1. स्त्रियों को भी वंचित रखा है।
2.26. द्विज-जन्में मनुष्य को वेदों द्वारा निर्देशित गर्भ धारण समारोह तथा धार्मिक संस्कार करने चाहिए, जिसके कारण उसका शरीर इस जन्म में तथा मृत्य के बाद पवित्र बन जाता है और पाप से मुक्त हो जाता है।
2.28. वेदों के अध्ययन से प्रतिज्ञाओं से आहुति चढ़ाकर पवित्र पाठों के उच्चारण से, तीनों वेदों के उपार्जन से, देव ऋषि तथा पितरों को तर्पण देकर, पुत्रों को जन्म देकर, महान यज्ञ करके तथा धार्मिक संस्कारों द्वारा इस मानव शरीर को ब्रह्म प्राप्ति के योग्य बनाया जाता है।
यह संस्कारों का ध्येय तथा उद्देश्य है । मनु ने संन्यास का भी ध्येय तथा उद्देश्य स्पष्ट किया है :
6.81. इस प्रकार से, धीरे-धीरे जो सभी संबंधों का त्याग करता है तथा सभी द्वन्द्वों से मुक्त होता है, वही केवल ब्रह्म में लीन होता है।
6.85. एक द्विज - जन्मा व्यक्ति, जो लगातार उपरोक्त कर्तव्यों का पालन करते हुए संन्यास लेता है, वह इस धरती पर सभी पापों से मुक्त हो जाता है और श्रेष्ठ ब्रह्म पद को प्राप्त होता है।
इन श्लोकों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि स्वयं मनु के अनुसार धार्मिक संस्कारों का उद्देश्य शरीर पवित्र बनाना, तथा पाप से इस जीवन में तथा उसके बाद के जीवन में मुक्ति पाना, और अपने-आपको ईश्वर के साथ मिलन के योग्य बनाना है। मनु के अनुसार, संन्यास का उद्देश्य है ईश्वर तक पहुंचना और उसमें विलीन हो जाना है और फिर भी मनु कहता है कि धार्मिक विधि तथा संन्यास केवल उच्च वर्गों का ही अधिकार है। वह शूद्रों के लिए उन्मुक्त नहीं। क्या ? शूद्र के लिए अपना शरीर पवित्र बनाना तथा अपनी आत्मा को शुद्ध बनाना आवश्यक नहीं है? क्या शूद्र ईश्वर तक पहुंचने की अभिलाषा नहीं रख सकता? कदाचित मनु ने इसका उत्तर 'हां' में दिया होगा। तब उसने ऐसे नियम क्यों बनाए ? इसका उत्तर यह है कि मनु सामाजिक असमानता में कट्टर विश्वास रखता था और वह धार्मिक समानता को स्वीकार करने के खतरे को जानता था । यदि मैं ईश्वर के सामने समान हूं तब इस धरती पर समान क्यों नहीं बन सकता? मनु शायद इस प्रश्न से भयभीत था। इसकी स्वीकृति देने और सामाजिक असमानता को समाप्त करने के लिए धार्मिक समानता की अनुमति देने के बजाय उसने धार्मिक समानता को नकारना ही अधिक पसंद किया।
इस तरह से आपको हिंदुत्व के दर्शन में सामाजिक तथा धार्मिक असमानता, दोनों का समावेश मिलेगा।
मनुष्य को अपने पापों से मुक्त होने के प्रयास को रोकना ! मनुष्य को ईश्वर के समीप आने पर रोक ! किसी भी बृद्धिमान व्यक्ति को ऐसे नियम घृणित लगने चाहिएं और विकृत मस्तिष्क की निशानी लगने चाहिएं। हिंदु धर्म केवल समानता को ही नकारता है, ऐसा नहीं है, परंतु वह मानव व्यक्तित्व की पवित्रता को ही नकारता है। यह इसका एक चकित कर देने वाला उदाहरण है।
बात यहीं समाप्त नहीं होती क्योंकि मनु केवल मानव-व्यक्तित्व को अमान्य करने पर ही नहीं रुका। उसने जान-बूझकर मानव-व्यक्तित्व का अधःपतन किया। हिंदुत्व के दर्शन के इस पहलू को स्पष्ट करने के लिए मैं केवल दो उदाहरण देता हूं।
जो लोग जाति-व्यवस्था का अध्ययन करते हैं, वे उसकी उत्पत्ति के बारे में पूछताछ करें, यह स्वाभाविक है। जाति-व्यवस्था का जनक होने के कारण विभिन्न जातियों की उत्पत्ति के लिए मनु को स्पष्टीकरण देना होगा। मनु ने उसकी उत्पत्ति क्या बताई है? उसका स्पष्टीकरण सरल है। वह कहता है कि किस मूल चार वर्गों को छोड़कर सभी शेष जातियां उनसे ही जन्मी हैं। वह कहता है कि ये जातियां मूल चार वर्णों के स्त्री-पुरुषों के बीच होने वाले अविवाहित संबंधों तथा व्यभिचार की उपज है। इन चार वर्णों के स्त्री-पुरुष में अनैतिकता तथा स्वेच्छाचार इतना असीमित हो गया कि उसके कारण इन असंख्य आत्माओं से भी अनगिनत जातियों का उदय हुआ। मनु ने इन चार मूल वर्णों के स्त्री-पुरुषों के चरित्र पर बिना सोचे- विचारे वे असभ्य आरोप लगाए क्योंकि अगर चांडाल - अछूतों का पुराना नाम - ब्राह्मण स्त्री और वैश्य पुरुष के व्यभिचार का परिणाम हैं, तो यह बात स्पष्ट है कि चांडालों की इतनी बड़ी संख्या देखकर यह माना जाएगा कि प्रत्येक ब्राह्मण स्त्री वैश्य तथा दुराचारिणी थी और प्रत्येक वैश्य पुरुष सब कुछ छोड़कर व्यभिचारी जीवन व्यतीत करता था । ऐसा प्रतीत होता है कि किस विभिन्न जातियों को हीन बनाने की अपनी मूर्ख लालसा की पूर्ति के लिए इन जातियों को नीच उत्पत्ति का कारण बताकर मनु जान-बूझकर ऐतिहासिक तथ्यों को विकृत बना रहा है। इस संबंध में मैं केवल दो उदाहरण देता हूं। हम मनु की 'मगध' और 'वैदेहिक' जातियों की उत्पत्ति लेते हैं और महान व्याकरणाचार्य पाणिनि की उन्हीं जातियों को दी गई उत्पत्ति से उसकी तुलना करते हैं। मनु का कहना है कि 'मगध' जाति वैश्य पुरुष और क्षत्रिय स्त्री के संभोग से उत्पन्न हुई है। मनु कहता है किस 'वैदेहिक' जाति वैश्य पुरुष और ब्राह्मण स्त्री के संभोग से उत्पन्न हुई। अब पाणिनि को देखें। पाणिनि कहते हैं कि 'मगध' का अर्थ है, वह व्यक्ति जो मगध नाम के देश का निवासी हो । 'वैदेहिक' के संबंध में पाणिनि कहते हैं, इसका मतलब है वह व्यक्ति को 'विदेह' नाम के देश का निवासी हो । दोनों में कितना विरोधाभास है। पाणिनि ईसा से 300 वर्ष पहले हुआ। मनु ईसा के 200 वर्ष पश्चात् हुआ। तब लोगों पर पाणिनी के समय में कोई कलंक नहीं लगा था। वे लोग मनु के हाथों कलंकित हो गए। इसका उत्तर यही है कि मनु उन लोगों को अध:पतित करने पर तुलना हुआ था। मनु लोगों को जान-बूझकर बदनाम करने पर क्यों तुला हुआ था? यह ऐसा कार्य है, जिसकी खोज-बीन¹ अभी की जानी है। परंतु इस बीच हमारे सामने एक ऐसा विलक्षण विरोधाभास आता है कि जब धर्म मनुष्य मात्र को ऊंचा उठाने में और उन्नत करने में लगा हुआ था, हिंदु धर्म उन्हें अध:पतित और अप्रतिष्ठित करने में व्यस्त था।
1. देखिए मेरा निबंध, 'मनु ऑन कास्ट-ए पजल' (यह लेख प्राप्त हुए पत्रों में नहीं मिला है)।