भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
पहला भाग : संघ
१. संघ का संगठन
१. भगवान बुद्ध के श्रावक दो हिस्सों में विभक्त थे, भिक्षु और गृहस्थ-श्रावक जो उपासक कहलाते थे ।
२. भिक्षुओं का एक संगठित, संघ' था, गृहस्थों का नहीं था ।
३. बौद्ध भिक्षु प्रथमत : एक परिव्राजक है । यह, परिव्राजक संस्था' बौद्ध भिक्षुओं से भी प्राचीन है ।

४. पुराने, परिव्राजक, ऐसे लोग थे, जिन्होंने पारिवारिक जीवन छोड़ दिया था और इधर से उधर घूमते रहते थे ।
५. जिनका एक जगह से दूसरी जगह जाने का उद्देश्य था भिन्न भिन्न आचार्यों तथा दार्शनिकों से मिलकर सत्य का पता लगाने का प्रयास करना, उनके प्रवचन सुनना और नीति, दर्शन, प्रकृति तथा रहस्यवाद आदि विषयों पर उनसे चर्चा करना ।
६. कुछ पुराने ढंग के ऐसे भी, परिव्राजक थे कि जब तक उन्हें कोई दूसरा 'गुरु' न मिले तब तक किसी एक, गुरु' की अधीनता मे रहते थे । कुछ दूसरे थे जो किसी को अपना, गुरु' नहीं मानते थे और अकेले ही रहते थे ।
७. इन पुराने ढगं के परिव्राजकों में कुछ स्त्रीया परिव्राजकायें भी थी । स्त्री परिब्राजिकायें कभी कभी पुरुष परिव्राजकों के साथ रहती थी और कभी अपने ही अकेली भी ।
८. इन पुराने ढंग के परिव्राजकों का कोई संघ न था, उनके कोई निश्चित नियम-उपनियम न थे । उनके सामने कोई निश्चित आदर्श भी न था ।
९. इतिहास में पहली बार तथागत ने अपने भिक्षुओं का एक संघ बनाया, उसकी व्यवस्था के लिये संघ के नियम बनाये, और संघ के सदस्यों के सामने एक निश्चित आदर्श उपस्थित किया ।
२. संघ में प्रवेश
१. संघ का प्रवेश सभी के लिये खुला था ।
२. जाति-पांति की कोई बाधा न थी ।
३. स्त्री पूरुष की कोई बाधा न थी ।
४ हैसियत की कोई बाधा न थी ।
५ जाति-पाति के लिये संघ में कोई स्थान न था ।
६ सामाजिक स्थिति का संघ में कोई स्थान न था ।
७ संघ के भीतर सभी सदस्य समान थे ।
८ संघ के अन्दर,छोटे-बड़े' को निर्णय सदस्य के गुणों से होता था, न कि उसके जन्म से।
९. जैसा तथागत ने कहा था कि सघ एक समुद्र के समान है और भिक्षु उन नदियों के समान है जो समुद्र में विलीन हो जाती है ।
१०. नदी का अपना नाम होता है और अपना पृथक अस्तित्व रहता है ।
११. लेकिन जैसे ही नदी समुद्र में प्रवेश करती है, न उसका कोई पृथक नाम रहता है और न पृथक अस्तित्व ।
१२. वह सब के साथ मिलकर एक हो जाती है ।
१३. यही हाल,संघ' का है ।जब एक भिक्षु' सघ में प्रवेश करता है, तो वह समुद्र के जल की तरह अन्य सब के साथ मिलकर एक हो जाता है ।
१४. तथागत ने कहा :--उसकी कोई पृथक् जाति नहीं रही । उसकी कोई पृथक हैसियत नहीं रही ।
१५.,संघ' के अन्दर यदि कोई वर्गीकरण था तो पुरुष-स्त्री की दृष्टि से था । भिक्षु संगठन पृथक था और भिक्षुणी - सगठन पृथक ।
१६. संघ में प्रवेश पाने वालों के दो वर्ग थेः श्रामणेर तथा भिक्षु ।
१७. बीस वर्ष के कम आयु रहने पर कोई भी श्रामणेर बन सकता था ।
१८. त्रिशरण तथा दस-शीलों को ग्रहण करने से कोई भी बालक श्रामणेर बन सकता है ।
१९. मैं बुद्ध की शरण ग्रहण करता हूँ, मैं धम्म की शरण ग्रहण करता हूँ तथा मैं संघ की शरण ग्रहण करता हूँ--ये ही तीन शरण है।
२०.,मैं प्राणि-हिंसा से विरत रहूँगा, मैं चोरी नहीं करूँगा, मैं अब्रह्मचर्य से विरत रहूँगा, मैं झूठ नहीं बोलूंगा तथा मैं नशीले पेय- पदार्थों से विरत रहूँगा ।
२१. मैं विकाल-भोजन से विरत रहूँगा, मैं नाचना-गाना-बजाना आदि से विरत रहूँगा, मैं अपने आपको सजाने तथा अंलकृत करने से विरत रहूँगा, मैं ऊँची महान् शैस्याओ अर्थात ऐशोआराम से विरत रहूँगा तथा मैं जात रुप-रजत (साने-चादी) का ग्रहण करने से विरत रहूँगा ।
२२. ये दस, शील' हैं।
२३. एक श्रामणेर जब वाहे, संघ' छोडकर गृहस्थ-वेष धारण कर सकता है । एक श्रामणेर एक भिक्षु से बंधा रहता है और उसका अधिकांश समय उसी की सेवा में खर्च होता है । वह एक प्रकार से, प्रव्रजित नहीं ही गिना जाता ।
२४. दो अवस्थाओं में से गुजरने से आदमी, भिक्षु पद का अधिकारी बनता है --पहली अवस्था, प्रव्रज्या, कहलाती है और दूसरी अवस्था उपसम्पदा,उपसम्पन्न' । 'उपसम्पदा, होने पर ही कोई भिक्षु बनता है ।
२५. जो प्रार्थी आगे चलकर, भिक्षु बनने के उद्देश्य से, प्रव्रज्या, ग्रहण करना चाहता है उसे एक उपाध्याय की खोज करनी पडती है । कम से कम दस वर्ष तक जो भिक्षु रहा हो, वही, उपाध्याय' हो सकता है ।
२६. इस प्रकार का प्रार्थी, यदि उपाध्याय द्वारा स्वीकार कर लिया गया हो, तो परिव्राजक, कहलाता है और उसे उपाध्याय की सेवा करते हुए, उसी के संरक्षण' में रहना पडता है ।
२७. शिक्षण' काल समाप्त होने पर उपाध्याय को ही अपने परिव्राजक का नाम, संघ के सामने प्रस्तावित करना पडता है ।' संघ की हि विशेष बैठक किसी को उपसम्पत्र करने के लिये ही बुलाई जाती है ।' उपसम्पदा' के लिये, उपसम्पदापेक्षी को स्वयं, संघ' से प्रार्थना करनी पडती है ।
२८.,संघ', पहले इस विषय में अपना संतोष कर लेता है कि प्रार्थी योग्य व्यक्ति है वा नहीं और भिक्षु' बनने का अधिकारी है नहीं है? इसके लिये कुछ निश्चित प्रश्न है, जिनका प्रार्थी को उत्तर देना पडता है ।
२९.. संघ, के अनुमति देने पर ही उसे, उपसम्पदा, मिलती है और वह भिक्षु बनता है ।
३०. भिक्षुणी-संघ में प्रवेश पाने के नियम भी बहुत कुछ वे ही वा वैसे ही है जो भिक्षु संघ में प्रवेश पाने के नियम ।