भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
३. भिक्षु के व्रत
१. एक उपासक और एक श्रामणेर भी “शील' ग्रहण करता है । उसे वे पालन करने होते है ।
२. एक भिक्षु उन, शीलो, को, शील, रुप में ग्रहण करता ही है, किन्तु वह उन्हें व्रत' रुप में भी ग्रहण करता है । उसे अपने व्रतो, को भंग नहीं करना होता यदि वह उन्हें तोडता हैं तो वह दण्डनीय होता है ।
३. एक भिक्षु स्त्री गमन से विरत रहने का व्रत लेता है।

४. एक भिक्षु चोरी से विरत रहने का व्रत लेता है ।
५. एक भिक्षु (किसी परा-प्राकृतिक शक्ति के सम्बन्ध में) शेखी न मारने का व्रत लेता है ।
६. एक भिक्षु किसी मनुष्य की हत्या न करने का व्रत लेता है ।
७. एक भिक्षु किसी भी नियम बाह्य वस्तु को अंगीकार न करने का व्रत लेता है ।
८. भिक्षु के पास इन आठ चीजों ते। अतिरिक्त और कुछ नहीं होना चाहिये-- तीन चीवर--( १) अन्तर- वासक (अन्दर का वस्त्र); (२) उत्तरासंघ (ऊपर का वस्त्र); (३) संघाटी (शीतादि से बचाव के लिये दोहरी चादर) ।
४. कमर पर लपेटने की एक पेटी ५. भिक्षा पात्र ६. उस्तरा (छुरा-कुल्हाडी ? ) ७. सूई धागा ८. पानी छानने का कपडा
९ एक भिक्षु अकिंचनता का व्रत लेता है । उसे मुख्य रुप से अपनी भिक्षा मांग कर खानी होती है । उसे, भिक्षा-जीवी होना चाहिये । उसे एकाहारी वा विकाल-भोजन- विरत होना चाहिये । जहाँ, संघ' के लिये विहार न हों, वहाँ वृक्ष के तले भी रहना चाहिये ।
१०. एक भिक्षु किसी भी व्यक्ति की हर आज्ञा मानने का व्रत नहीं लेता । अपने ज्येष्ठों के प्रति बाह्य सम्मान प्रदर्शन आदि की अपेक्षा एक श्रमणेर से अवश्य रखी जाती है । उसकी अपनी मुक्ति और एक धम्मोपदेशक के रुप में उसकी उपयोगिता उसकी अपनी साधना पर निर्भर करती है। उसे अपने से बड़े किसी एक व्यक्ति की आज्ञा में नहीं रहना होता, बल्कि धम्म की आज्ञा में रहना होता है ।उसका बडा न किसी परा- प्राकृतिक प्रज्ञा का ही मालिक माना जाता है और न उसके पास कोई ऐसी ही सामर्थ्य होती है जो उसे,पाप-मुक्त' कर सके । वह यदि खडा रहता है तो अपने बल पर खड़ा रहता है और यदि गिरता है तो अपने से गिरता है । इसके लिये उसे सोचने की स्वतन्त्रता रहनी ही चाहिये ।
११. चार विशेष-व्रत ऐसे हैं जिनका भंग होने से भिक्षु पाराजिका का अपराधी बन जाता है । पाराजिका का दोषी होने पर संघ-त्याग ही एकमात्र दण्ड है ।
४. सांघिक नियमों सम्बन्धी दोष
१. अपने लिये किसी भी,व्रत' का भंग भिक्षु के लिये, धम्म के विरुद्ध किया गया अपराध है ।
२. उक्त अपराधों के अतिरिक्त कुछ और भी अपराध थे जो भिक्षु कर सकता था । वे संघादिसेस कहलाते थे---सांघिक नियमों सम्बन्धी दोष ।
३. विनय-पिटक के अनुसार संघादिसेस तेरह है ।
४. सघादिसेसो का नम्बर पाराजिकाओं के बाद है ।
५. भिक्षु और प्रतिबन्ध
१. इन अपराधों से साफ साफ बचे रहने की कोशिश के साथ साथ भिक्षु को कुछ और भी प्रतिबन्ध स्वीकार करने पडते है । गृहस्थ के समान एक भिक्षु जो चाहे सो नहीं ही कर सकता ।
२. इस प्रकार के कुछ प्रतिबन्ध, निस्सग्गीय - पाचित्तिय' कहलाते है । इनकी संख्या छबीस है ।
३. उनका सम्बन्ध चीवरों की स्वीकृति-अस्वीकृति से है, ऊनी बिछावन, भिक्षा पात्र तथा रोगी की अवश्यकताओं की स्वीकृति- अस्वीकृति से है ।
४. उनका सम्बन्ध चांदी सोने के लेने न लेने से भी है । भिक्षु द्वारा किये जानें वाले क्रय-विक्रय से है तथा सांघिक - वस्तु को निजी बना लेने से है ।
५. इन दोषो का दण्ड भी निस्सगीय (नैसर्गिक) और पाचित्तिय (पश्चाताप प्रकट करना) ही है ।
६. इन प्रतिबन्धों के अतिरिक्त भिक्षु जीवन के कुछ और भी प्रतिबन्ध है । वे केवल पाचित्तिय कहलाते हैं । उनकी संख्या बानवे है ।
६. भिक्षु और शिष्टाचार के नियम
१. एक भिक्षु का व्यवहार बहुत अच्छा होना चाहिये । शिष्टाचार के नियम पालन करने में उसे आदर्श होना चाहिये ।
२. इस उद्देश्य की शुइात के लिए तथागत ने बहुत से शिष्टाचार सम्बन्धी नियम बनाये ।
३. ये शिष्टाचार के नियम, सेखिय - धम्म, कहलाते थे । उनकी संख्या पचहत्तर है ।
७. भिक्षु और अपराधों का विचार
१. ये नियम, ये विधान केवल, विधान, बनाने के लिये न थे । उनकी कानूनी स्थिति थी जिसके अनुसार पहले किसी पर निश्चित,आरोप' लगाना होता था, तब संघ उसका विचार करता था और तभी वह या तो दोष-मुक्त मान कर छोड़ दिया जाता था वा दण्ड दिया जाता था ।
२. बिना विधिवत् अदालती विचार के कभी किसी भिक्षु को दण्डित नहीं किया जा सकता था ।
३. जिस जगह पर अपराध हुआ हो, उसी जगह के निवासी भिक्षुओ का ही न्यायलय होता था ।
४. न्यायालय के लिये आवश्यक संख्या में भिक्षु उपस्थित न हो तो कोई मुकद्दमा नहीं चल सकता था ।
५. जब तक किसी पर कोई निश्चित, आरोप' न लगाया जाय तब तक कोई मुकद्दमा कानूनी नहीं माना जाता था ।
६. कोई मुकद्दमा कानूनी नहीं माना जाता था तब तक उसकी सारी कार्रवाई उस व्यक्ति की उपस्थिति में न हो जिस पर आरोप ' लगाया गया
७. कोई मुकद्दमा कानूनी नहीं माना जाता था जब तक कि उस भिक्षु को जिस पर कोई आरोप लगाया गया हो, अपनी सफाई देने का पूरा अवसर न मिला हो ।
८. एक अपराधी भिक्षु को निम्नलिखित दण्ड दिये जा सकते थे--
(१) तर्जनीय कर्म
(२) नियस्स कर्म
(३) प्रब्रार्जनीय कर्म
(४) उत्येपनीय कर्म
(५) प्रतिसारणीय कर्म
९. विहार से बाहर कर देने के कर्म (परिवास - कर्म) के बाद अआन-कर्म (आवाहन कर्म) हो सकता था । यह परिवास कर्म के बाद संघ द्वारा क्षमादान दिये जाने पर हो सकता था ।
८. भिक्षु और अपराध स्वीकृति
१. भिक्षुओ के सँघठन को लेकर जो सर्वाधिक मौलिक और अनुपम संस्था वा प्रथा भगवान् बुद्ध ने आरम्भ की वह अपराध- स्वीकृति की संस्था थी । यह उपोसथ कहलाती थी ।
२. तथागत ने इस बात को समझ लिया था कि जिन बातों को उन्होंने, अपराधों की कोटि में रखा है उनका पालन कराया जा सकता है ।लेकिन कुछ दूसरे प्रतिबन्ध भी थे जो अपराध नहीं थे । उनका कहना था कि चरित्र-निर्माण के लिये और चरित्रको सदृढ बनाये रखने के लिये प्रतिबन्धों का होना आवश्यक है और यह भी देखना आवश्यक है कि उनका पालन होता है या नहीं?
३. लेकिन इन प्रतिबन्धों को पालन कराने का कोई प्रभावशाली ढंग खोज निकालना आसान न था । इसलिये उन्होंने खुली अपराध-स्वीकृति को भिक्षु के अन्तर्मन के संगठन करने और उसे गलत कदम उठाने से बचाये रखने का एक साधन बनाया ।
४. अपराध-स्वीकृति प्रतिबन्धों के न पालन करने को लेकर थी । भिक्षु नियमो का संग्रह,प्रातिमोक्ष' कहलाता है ।
५. उपोसथ (अपराध स्वीकृति) के लिये एक, सीमा के भिक्षुओं- -का एक जगह इकट्ठा होना आवश्यक है । दोनो पक्षों की दो अष्टमियाँ कृष्ण पक्ष की चतुदर्शी और शुक्ल पक्ष की पंचदर्शी-ये चार दिन उपोसथ माने जाते है ।इनमें से चतुदर्शी और पंचदर्शी को, प्रातिमोक्ष' का पाठ और उसके हिसाब से उपोसथ कर्म हो सकता था ।
६. उपोसथ होने पर भिक्षु एक एक करके प्रातिमोक्ष के नियमों का पाठ करता है और प्रत्येक नियम का पारायण कर चुकने पर कहता है, "क्योंकि आप सब लोग चुप है, इसलिये मैं समझता कि आप में से किसी ने भी इनमें से किसी नियम का उल्लंघन नहीं किया।" वह यह तीन बार कहता है । उसके बाद अगले प्रतिबंधन नियम को पढता है।
७. भिक्षुणी संघ को भी ऐसी ही उपोसथ बैठक करनी होती है ।
८. अपराध स्वीकृति पर, आरोप' और मुकद्दमा चल सकता है ।
९. यदि कोई अपराध स्वीकार न करे तो कोई भी भिक्षु किसी के अपराध' की रिपोर्ट कर सकता है--यदि उसने उस नियम का उल्लंघन करते देखा हो और तब ,आरोप' और उसके बाद मुकद्दमा आरम्भ हो सकता है ।