Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar - भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर - Page 47 मुख्य मजकूराकडे जा

भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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16 जून 2023
Book
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३. निर्वाण प्राप्त करना धम्म है

१. भगवान् बुद्ध ने कहा है, "निर्वाण से बढ़कर सुखद कुछ नहीं ।"

२. भगवान बुद्ध द्वारा उपदिष्ट सभी धम्मो में निर्वाण का प्रमुख स्थान हैं ।

Nirvan prapt karna Dhamma hai

३. निर्वाण क्या है? भगवान बुद्ध ने निर्वाण का जो अर्थ किया है, वह उस से सर्वथा भिन्न है जो उनके पूर्वजों ने किया है ।

४. उनके पूर्वजों की दृष्टि में निर्वाण का मतलब था 'आत्मा' का मोक्ष ।

५. निर्वाण के चार स्वरूप थे : (१) लौकिक, (खाओ, पिओ और मौज उड़ाओ); (२) यौगिक; (३) ब्राह्मणी; ( ४ ) औपनिषदिक

६. ब्राह्मणी और औपनिषदिक निर्वाण में एक समानता थी । निर्वाण के दोनों स्वरूपों में 'आत्मा' की एक स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार की गई थी - यह सिद्धान्त भगवान् बुद्ध को अमान्य ही था । इसलिये भगवान बुद्ध को निर्वाण के ब्राह्मणी और औपनिषदिक स्वरूप का खण्डन करने में, उसे अस्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं हुई ।

७. निर्वाण की भौतिक कल्पना इतनी अधिक जड़ता लिये हुए थी कि वह कभी भी बुद्ध के गले से उतर ही न सकती थी । इसमें कुछ भी आध्यात्मिक तत्व नहीं था ।

८. भगवान् बुद्ध को लगता था कि निर्वाण के ऐसे स्वरूप को स्वीकार करना किसी भी मानव की बड़ी से बड़ी हानि करना है ।

९. इन्द्रियों की भूख की संतुष्टि उस भूख को बढ़ाने का ही कारण बनती है । इस प्रकार के जीवन में से सुख कभी उत्पन्न नहीं हो सकता । इसके विपरीत इस प्रकार के सुख में से अधिकाधिक दुःख ही उत्पन्न हो सकता हैं ।

१०. निर्वाण का यौगिक स्वरूप एक सर्वथा अस्थायी अवस्था थी । इसका 'सुख' नकारात्मक था । इसके माध्यम से संसार से सम्बन्ध-विच्छेद हो सकता था । यह दुःख से बच निकलना था, किन्तु सुख -प्राप्ति नहीं थी । इससे जितने भी कुछ 'सुख' की आशा की जा सकती थी, वह 'सुख' अधिक से अधिक योग की अवधि भर था । यह स्थायी नही था । यह अस्थायी था ।

११. बुद्ध का निर्वाण का स्वरूप अपने पूर्वजों के स्वरूप से सर्वथा भिन्न है ।

१२. बुद्ध के निर्वाण के स्वरूप के मूल में तीन बातें हैं ।

१३. इसमें से एक तो यह है कि किसी 'आत्मा' का सुख नहीं, बल्कि प्राणी का सुख ।

१४. दूसरी बात यह है कि संसार में रहते समय प्राणी का सुख । 'आत्मा' की 'मुक्ति' और मरणानन्तर 'आत्मा' की बुद्ध के विचारों से सर्वथा 'मुक्ति' विरुद्ध बातें हैं ।

१५. तीसरा विचार जो बुद्ध के निर्वाण के स्वरूप का मूलाधार है वह है राग द्वेषाग्नि को शान्त करना ।

१६. राग तथा द्वेष प्रज्जवलित अग्नि के समान है, यह बात भगवान् बुद्ध ने अपने उस प्रवचन में कही थी, जो उन्होंने बुद्ध-गया में रहते समय भिक्षुओं को दिया था । भगवान् बुद्ध ने कहा;

१७. भिक्षुओं, सभी कुछ जल रहा है। भिक्षुओ, क्या सभी कुछ जल रहा है?

१८. “भिक्षुओ, चक्षु-इन्द्रिय जल रहा है, रूप जल रहा है, चक्षु-विज्ञान जल रहा है, चक्षु-संस्कार जल रहा है, और उस संस्कार से जो भी सुख-वेदना और असुख-अदुख वेदना उत्पन्न होती है, वह वेदना भी जल रही है।”

१९. " और ये किस से जल रहे हैं?"

२०. “ये रागाग्नि से जल रहे हैं, ये द्वेषाग्रि से जल रहे है, ये मोहाग्नि से जल रहे हैं, ये जाति, जरा, मरण, दुःख दौर्मनस्य तथा उपायास से जल रहे हैं।"

२१. “भिक्षुओ, श्रोत्र-इन्द्रिय जल रहा है, शब्द जल रहा है, घ्राण-इन्द्रिय जल रहा है, गन्ध जल रहा है, जिव्हा जल रही है, रस जल रहे है, काय जल रहा है, चित्त के संकल्प - विकल्प जल रहे है और चित्त के संस्कारों से जो भी सुख - वेदना, दुःख वेदना और असुख- अदुख वेदना उत्पन्न होती है, वह वेदना भी जल रही हैं।”

२२. " और ये किस से जल रहे हैं?"

२३. “मै कहता हूँ, ये रागाग्नि से जल रहे हैं, द्वेषाग्नि से जल रहे ह, मोहाग्नि से जल रहे है, ये जाति, जरा, मरण, दुःख, दौर्मनस्य तथा उपायास से जल रहे हैं।"

२४. “भिक्षुओ, इसका ज्ञान होने से जो विज्ञ है और जो श्रेष्ठ है उसके मन में उपेक्षा उत्पन्न होती है, उपेक्षा उत्पन्न होने से रागाग्नि आदि की शान्ति होती है और रागाग्नि आदि के शान्त हो जाने से वह 'मुक्त' हो जाता है; और मुक्त हो जाने से वह जानता है कि मै 'मुक्त' हो गया हूँ ।"

२५. निर्वाण सुखद कैसे हो सकता है? यह एक दूसरा प्रश्न है जिसका उत्तर अपेक्षित है ।

२६. सामान्य तौर पर यह कहा -समझा जाता है कि अभाव आदमी को दुःखी बनाता है। लेकिन हमेशा यही बात ठीक नहीं होती । आदमी बाहुल्य के बीच में रहता हुआ भी दुःखी रहता है ।

२७. दुःख लोभ का परिणाम है और लोभ दोनों को होता है, जिनके पास नहीं है उन्हें भी और जिनके पास है, उन्हें भी ।

२८. भगवान् बुद्ध ने भिक्षुओं को दिये एक प्रवचन में यह बात भली प्रकार सुस्पष्ट कर दी हैं --

२९. भिक्षुओं, लोभ से लुब्ध, द्वेष से दुष्ट और मोह से मूढ़ चित्त से आदमी अपने दुःखों से दुःखी रहता है, आदमी दूसरों के दुःखो, से दुखी रहता है, आदमी मानसिक वेदना और पीड़ा अनुभव करता है ।

३०. “किन्तु यदि लोभ, द्वेष तथा मोह का मूलोच्छेद हो जाय तो आदमी न अपने दुःखों से दुखी रहेगा, न दूसरों के दुःखो से दुखी रहेगा और न मानसिक वेदना और पीड़ा अनुभव करेगा ।"

३१. “इस प्रकार भिक्षुओ, निर्वाण इसी जीवन में प्राप्य है, भविष्य जीवन में ही नहीं, अच्छा लगने वाला है, आकर्षक है और बुद्धिमान श्रावक इसे हस्तगत कर सकता है ।”

३२. जो चीज आदमी को जला डालती है और जो उसे दुःखी बनाती है, यहां उसे स्पष्ट कर दिया गया है । आदमी के राग-द्वेष को जलती हुई अग्नि के समान कहकर भगवान् बुद्ध ने आदमी के दुःख की सर्वाधिक जोरदार व्याख्या की है ।

३३. राग-द्वेष की अधीनता ही आदमी को दुःखी बनाती है । राग-द्वेष को 'संयोजन' अथवा बंधन कहा गया है । जो आदमी को निर्वाण तक नहीं पहुंचने देते । ज्यों ही आदमी राग-द्वेष की झोंक से मुक्त हो जाता है, उसके लिये निर्वाण-पथ खुल जाता है वह दुःख का अन्त कर सकता है।

३४. भगवान् बुद्ध ने इन संयोजनों को तीन विभागों में विभक्त किया हैं-

३५. पहला विभाग वह है जिसका सम्बन्ध हर प्रकार की तृष्णा से है, जैसे कामुकता और लोभ ।

३६. दूसरा वर्ग वह है जिसका सम्बन्ध सभी प्रकार की वितृष्टग से है - जैसे घृणा, क्रोध और द्वेष (दोष) ।

३७. तीसरा वर्ग वह है जिसका सम्बन्ध सभी तरह की अविद्या से है जड़ता, मूर्खता और मूढता ( मोह) ।

३८. पहली (राग) अग्नि और दूसरी (द्वेष) अग्नि का सम्बन्ध आदमी की उन भावनाओं से है और उस दृष्टि कोण से है जो उसका दूसरों के प्रति है, जबकि तीसरी (मोह) अग्नि का सम्बन्ध उन सभी विचारों से है जो सत्य से भिन्न हैं ।

३९. भगवान् बुद्ध के निर्वाण के सिद्धान्त के बारे में बहुत सी गलत- - फहमियाँ हैं ।

४०. शब्द की व्युत्पत्ति की दृष्टि से 'निर्वाण' शब्द का शब्दार्थ है बुझ जाना ।

४१. शब्द की इस व्युत्पत्ति को लेकर आलोचकों ने 'निर्वाण' को दो कौड़ी का नहीं रहने दिया है, उसे एक सर्वथा बेहूदा सी चीज बना दिया है ।

४२. उनका कहना है कि निर्वाण का मतलब है सभी मानवी प्रवृत्तियों का बुझ जाना अर्थात् मृत्यु ।

४३. इस प्रकार उन्होंने निर्वाण के सिद्धान्त का मजाक उड़ाने की कोशिश की है ।

४४. जो कोई भी इस ‘अग्नि-स्कन्धोपम' सूक्त की भाषा का विचार करेगा, उसे यह स्पष्ट हो जायेगा कि निर्वाण का यह अर्थ कदापि नहीं है ।

४५. इस प्रवचन में यह नहीं कहा गया है कि जीवन जल रहा है और बुझ जाना मृत्यु हैं । इसमें यह कहा गया है कि राग- अग्नि जल रही है, द्वेषाग्रि जल रही है तथा मोहाग्नि जल रही हैं ।

४६. इस अग्नि-स्कन्धोपम सूक्त में यह कही नही कहा गया कि आदमी की हर प्रकार की प्रवृत्तियों का मूलोच्छेद कर देना चाहिए । इसमें आग में घी डालना ही मना किया गया है ।

४७. दूसरी बात यह है कि आलोचक 'निर्वाण' और 'परिनिर्वाण' का भेद करना भी भूल गये हैं ।

४८. उदान के अनुसार "जब शरीर बिखर जाता है, जब तमाम सज्ञायें रूक जाती हैं, तब तमाम वेदनाओं का नाश हो जाता है, जब सभी प्रकार की प्रक्रिया बंद हो जाती है और जब चेतना एक दम जाती रहती है" तभी परिनिर्वाण होता है । इस प्रकार परिनिर्वाण का मतलब है पूरी तरह बुझ जाना ।

४९. निर्वाण का कभी यह अर्थ नहीं हो सकता । निर्वाण का मतलब है अपनी प्रवृत्तियों पर इतना काबू रखना कि आदमी धम्म के मार्ग पर चल सके । इससे अधिक और इसका दूसरा कुछ आशय ही नहीं ।

५०. राध को समझाते हुए स्वयं भगवान बुद्ध ने यह स्पष्ट किया था कि निर्दोष जीवन का ही दूसरा नाम निर्वाण है ।

५१. एक बार राध स्थविर भगवान बुद्ध के पास आये । आकर भगवान बुद्ध को अभिवादन कर एक और बैठ गये । इस प्रक बैठकर राध स्थविर ने भगवान् बुद्ध से कहा:- “भन्ते! निर्वाण किस लिये है? "

५२. तथागत ने उत्तर दिया- “निर्वाण' का मतलब है रागाग्नि द्वेषाग्नि तथा मोहाग्नि का बुझ जाना ।”

५३. "लेकिन भन्ते ! निर्वाण का उद्देश्य क्या है?"

५४. "राध! निर्दोष जीवन का मूल निर्वाण में है । निर्वाण ही उद्देश्य है । निर्वाण ही मकसद है ।”

५५. 'निर्वाण' का मतलब सभी (प्रवृत्तियो का ) बुझ जाना नही है, यह बात सारिपुत्र ने भी अपने इस प्रवचन में स्पष्ट की है :-

५६. एक बार भगवान बुद्ध श्रावस्ती में, अनाथपिण्डक के जेतवनाराम में विहार कर रहे थे। उसी समय सारिपुत्र भी वहीं ठहरे हुए थे ।

५७. भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं को सम्बोधित करके कहा:- “भिक्षुओ! धम्म के दायाद बनो । भौतिक वस्तुओं के दायाद न बनो । मेरी तुम पर अनुकम्पा है । इसलिये मैं तुम्हें धम्म का दायाद बनाता हूँ ।”

५८. भगवान बुद्ध ने यह कहा और तब वह उठकर (गन्ध) - कुटी में चले गये।

५९. सारिपुत्र पीछे रह गये। तब भिक्षुओं ने सारिपुत्र से प्रार्थना की कि वह बतायें कि निर्वाण क्या है?

६०. तब सारिपुत्र ने भिक्षुओं को उत्तर देते हुए कहा- “भिक्षुओ! लोभ बुरा है, द्वेष बुरा है ।"

६१. “इस लोभ और इस द्वेष से मुक्ति पाने का साधन मध्यम मार्ग है, जो आँख देने वाला है, जो ज्ञान देने वाला है, जो हमें शान्ति, अभिज्ञा, बोधि तथा निर्वाण की ओर ले जाता हैं ।"

६२. “यह मध्यम-मार्ग कौन सा है ? यह मध्यम मार्ग आर्य अष्टांगिक मार्ग के अतिरिक्त कुछ नहीं, यही सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीविका, सम्यक् प्रयत्न (व्यायाम), सम्यक् स्मृति तथा सम्यक् समाधी, भिक्षुओ! यही मध्यम मार्ग हैं।”

६३. "हाँ! भिक्षुओ! क्रोध बुरी चीज है, द्वेष बुरी चीज है, ईर्ष्या बुरी चीज है, मात्सर्य बुरी चीज है, कंजूसपन बुरी चीज है, लालच बुरी चीज है, ढोंग बुरी चीज है, ठगी बुरी चीज है, उद्वतपन बुरी चीज है, मोह बुरी चीज है तथा प्रमाद बुरी चीज है।”

६४. “मोह तथा प्रमाद के नाश के लिये मध्यम मार्ग हैं, जो आँख देने वाला है, जो ज्ञान देने वाला है, जो हमें शान्ति, अभिज्ञा, बोधि तथा निर्वाण की ओर ले जाता हैं ।"

६५. "निर्वाण आर्य अष्टांगिक मार्ग के अतिरिक्त और कुछ है ही नही ।"

६६. इस प्रकार सारिपुत्र ने कहा । प्रसन्न चित्त भिक्षु सारिपुत्र का प्रवचन सुन प्रमुदित हुए ।

६७. निर्वाण के मूल में जो विचार है वह यही है कि यह निष्कलंकता का पथ है। किसी को भी निर्वाण से और कुछ समझना ही नहीं चाहिये ।

६८. सम्पूर्ण उच्छेदवाद एक अन्त है और परिनिर्वाण दूसरा अन्त है। निर्वाण मध्यम-मार्ग है ।

६९. यदि निर्वाण को इस प्रकार ठीक तरह से समझ लिया जाय, तो निर्वाण के सम्बन्ध में सारी गड़बड़ी दूर हो जाती हैं ।