भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
आठवाँ भाग: पतितों तथा अपराधियों की धम्म दीक्षा
१. एक आवारे की धम्म- दीक्षा
१. उस समय राजगृह में एक अत्यन्त असंयत आदमी रहता था, जो न अपने माता-पिता का ही आदर करता था, न दूसरे बड़े बूढ़ों का । जब भी उससे कोई पाप-कर्म हो जाता तो वह सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि- देवता की ही पूजा किया करता था ताकि उसे पुण्य लाभ हो और वह अपने में मस्त रहे ।

२. तीन साल तक लगातार पूजा और बलिदान आदि में इतना शरीरिक कष्ट उठाने पर भी उसे किसी प्रकार की शान्ति नहीं मिली
३. अन्त में उसने श्रावस्ती पहुंचकर तथागत से भेट करने की सोची । वहां पहुंचा और जब उसने तथागत के तेजपूर्ण व्यक्तित्व के दर्शन किये, वह उनके चरणों पर गिर पड़ा और अपनी अपरिमित प्रसन्नता प्रकट की ।
४. तब तथागत ने उसे बताया कि पशुओं की बलि देना मूर्खता है, और ऐसे उपचारों में भी जिनमें आदरणीयों का आदर नहीं होता। अन्त में उन्होंने कुछ गाथायें कहीं। उस समय वह सारा स्थान उनके तेज से प्रकाशित हो गया ।
५. तब उस गांव के रहने वाले, विशेष रूप से बच्चों के माता-पिता तथागत की सेवा के लिये आये ।
६. बच्चों के माता-पिता को देखकर और उन्होंने अपने बच्चों के बारे में जो कुछ बताया उसे सुनकर तथागत मुस्कराये और ये गाथायें कहीं-
७. "श्रेष्ठ आदमी ईर्षा से सर्वथा मुक्त होता है। उसका दिमाग खुला होता है और वह खुले प्रकाशयुक्त स्थान पर ही रहता है । यदि कभी उस पर कोई मुसीबत भी आ पड़ती है, वह घबराता नहीं, वह विचलित नहीं होता । उस समय भी वह अपनी बुद्धि का ही परिचय देता हैं ।"
८. “श्रेष्ठ आदमी सांसारिक बातों से सरोकार नहीं रखता । वह न धन की इच्छा रखता है, न संतान की और न जगह जमीन की । वह सावधान रहकर शील का पालन करता है । वह प्रज्ञा के पथ पर चलता है और विचित्र-विचित्र सिद्धान्तो का अनुसरण नहीं करता ।"
९. “श्रेष्ठ आदमी अनित्यता के रूप को भली प्रकार समझ कर और यह जानकर कि यह संसार बालू में जमे वृक्ष के समान है, अपने अस्थिर चित्त मित्र को स्थिरता के पथ पर और अपने अपवित्र - शील मित्र को पवित्रता के पथ पर लाने का पूरा पूरा प्रयास करता है । "