भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
२. प्रकृति नामक चंडालिका की धम्म - दीक्षा
१. उस समय भगवान् बुद्ध श्रावस्ती में अनाथ - पिण्डक के जेतवनाराम में विराज रहे थे ।
२. तथागत का शिष्य आनन्द भिक्षार्थ नगर में गया था। भोजनानन्तर आनन्द पानी पीने के लिये नदी की ओर जा रहा था ।
३. उसने एक लड़की को देखा जो नदी से घड़े में पानी भर रही थी । आनन्द ने उससे पानी मांगा ।

४. लड़की का नाम प्रकृति था । बोली- “मैं चाण्डाल-कन्या हूँ । मैं पानी नहीं दे सकती ।”
५. आनन्द ने उत्तर दिया--"मुझे पानी चाहिए। मुझे तुम्हारी जाति नही चाहिये ।" तब लड़की ने आनन्द को अपने बरतन से कुछ पानी दिया ।
६. तब आनन्द जेतवन लौट आये । वह लड़की भी आनन्द के पीछे पीछे आई और आनन्द के निवास स्थान का पता लगा लिया । उसने यह भी मालूम कर लिया कि उसका नाम आनन्द है और वह बुद्ध-शिष्य है ।
७. घर लौट कर उसने अपनी मां मातंगी से सारा वृत्तान्त कहा और जमीन पर लेट कर रोने लगी ।
८. मां ने रोने का कारण पूछा । लडकी बोली--“यदि तुम मेरा विवाह करना चाहती हो, तो मैं केवल आनन्द से करूँगी, मै किसी अन्य से नहीं करूँगी।"
९. माता ने पता लगाया । लौट कर लड़की से बोली -- "विवाह असम्भव हैं। क्योंकि आनन्द ने ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण कर रखा हैं ।"
१०. यह बात सुनी तो लड़की बहुत दुःखी हुई । उसने खाना-पीना छोड़ दिया । वह इसे भाग्य रेखा स्वीकार करने को तैयार न थी । इसलिये उसने कहा -- “मां! तुम जादू-टोना जानती हो । क्यों नहीं? तो तुम इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए क्यो जादू-टोना नहीं करतीं?" मां बोली -- "मै देखूंगी कि क्या हो सकता है।"
११. मातंगी ने आनन्द को भोजन के लिए निमंत्रण दिया । लड़की बहुत प्रसन्न हुई । मातंगी ने तब आनन्द को कहा कि उसकी लड़की उससे शादी करने लिये अत्यन्त व्याकुल है । आनन्द ने उत्तर दिया, “ मैं ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण कर चुका हूँ । मैं किसी भी स्त्री से विवाह नहीं कर सकता ।"
१२. मातंगी बोली -- “यदि तुम मेरी लडकी से विवाह नहीं करते, तो वह आत्महत्या कर लेगी । उसकी तुम्हारी प्रति इतनी अधिक आसक्ति है ।” आनन्द का उत्तर था - "मैं असमर्थ हूँ।”
१३. मातंगी घर में गई और लडकी से कहा कि आनन्द तो विवाह करने से इनकार करता है।
१४. लड़की चिल्लाई -- “मां! तुम्हारा मन्तर-जन्तर कहां गया?” मातंगी बोली- “मेरा मन्तर जन्तर तथागत के मन्तर-जन्तर के विरुद्ध असर नहीं करता । "
१५. लड़की चिल्लाई -- “मां! दरवाजा बन्द कर दे । उसे बाहर न जाने दे । मैं देखूंगी कि आज ही रात को वह मुझे पत्नी रूप में कैसे नहीं ग्रहण करता?"
१६. मां ने वैसा ही किया, जैसा लड़की चाहती थी। रात होने पर मां ने कमरे में बिस्तर लगा दिया । लड़की ने अपने आप को अच्छी से अच्छी तरह अलंकृत किया और अन्दर आई । आनन्द पर इसका कुछ प्रभाव नहीं पडा ।
१७. अन्त में मां ने अपने जादू-टोने का प्रयोग किया । परिणाम स्वरूप कमरे में आग जल उठी। मां ने आनन्द के कपड़ों को पकड़ा और बोली-- “यदि तुम अब भी मेरी लड़की से विवाह करना स्वीकार नहीं करते तो मैं तुम्हें आग में झोंक दूंगी ।" तब भी आनन्द झुका नहीं । मां और लड़की दोनों को हार माननी पड़ी । उन्होंने आनन्द को स्वतन्त्र कर दिया ।
१८. वापिस लौटकर आनन्द ने सारी आप-बीती तथागत को कह सुनाई ।
१९. दूसरे दिन वह लड़की आनन्द को खोजती हुई जेतवन पहुंची । आनन्द भिक्षाटन लिए निकल रहे थे । उसे देखा तो उससे बच निकलना चाहा । लेकिन जहां जहां आनन्द गया, लड़की ने पीछा किया ।
२०. जब आनन्द लौटा तो उसने देखा कि लड़की जेतवन बिहार के दरवाजे पर खड़ी उसकी प्रतीक्षा कर रही है ।
२१. आनन्द ने तथागत से कहा कि किसी प्रकार वह लड़की उसका पीछा नहीं छोड़ती हैं । तथागत ने उसे बुलावा भेजा ।
२२. जब लड़की सामने आई तथागत ने प्रश्न किया. - "तू आनन्द का पीछा किसलिये कर रही है?” लडकी का उत्तर था कि वह उससे विवाह करके रहेगी । बोली -- "मैने सुना है कि वह अविवाहित है । मै भी अविवाहित हूँ ।”
२३. भगवान बुद्ध बोले -- “आनन्द! भिक्षु है । उसके सिर पर बाल नहीं हैं । यदि तुम भी उसी की तरह मुण्डन करा लो तो मैं देखूंगा कि कुछ हो सकता है।"
२४. लड़की बोली -- “मै इसके लिए तैयार हूँ ।" भगवान बुद्ध ने कहा- "मुण्डन कराने से पूर्व तुम्हें अपनी मां से अनुमति लेनी होगी ।”
२५. लडकी मां के पास आई और बोली -- "मां ! जो तुम नहीं कर सकी, वह मैं कर सकी हूँ । भगवान बुद्ध ने वचन दिया है कि यदि मैं मुण्डन करा लू तो वह आनन्द से मेरा विवाह करा देंगें ।"
२६ मां क्रुद्ध होकर बोली, "तुम्हे ऐसा नहीं करना चाहिए । तुम मेरी लड़की हो और तुम्हें सर के बाल रखने चाहिए । तुम आनन्द जैसे श्रमण से शादी करने के लिए इतना क्यों तड़पती हो? मैं किसी अच्छे आदमी से तुम्हारी शादी करा दूंगी।"
२७. उसका उत्तर था -- "या तो मै आनन्द से शादी करूंगी, या मर जाऊंगी। तीसरी बात होने को ही नहीं है ।"
२८. मां बोली -- “तुम मेरा अपमान क्यों कर रही हो?” लड़की बोली - “यदि मैं तुम्हे प्रिय हूँ तो जैसा मैं चाहूँ वैसा मुझे करने दो।”
२९. मां ने अपना विरोध वापस ले लिया और लड़की ने मुण्डन करा लिया ।
३०. तब लड़की तथागत के सामने उपस्थित हुई । बोली- "आपके आदेश के अनुसार मैंने अपना मुण्डन करा लिया है।"
३१. तथागत ने कहा -- “आखिर तू चाहती क्या है? उसके शरीर का कौन सा हिस्सा है जिससे तुझे प्रेम है?” लड़की बोली - "मै उसकी नाक से प्यार करती हूँ। मैं उसके मुंह से प्यार करती हूँ। मैं उसके कानों से प्यार करती हूँ। मै उसकी आवाज से प्यार करती हूं। मैं उसकी आंखों से प्यार करती हू । मैं उसकी चाल से प्यार करती हूँ ।"
३२. तब तथागत बोले, “क्या तुम जानती हो कि आखें आँसुओं का अड्डा मात्र हैं । नाक सींढ का घर है । मुंह मे थुक ही भरा ह कानों में मैल ही मैल होता है और शरीर मल-मूत्र का खजाना मात्र हैं।”
३३. जब स्त्री-पुरुष सहवास करते हैं वे बच्चों को जन्म देते हैं । जहा जन्म है वहीं मृत्यु भी हैं । जहा मृत्यु है वहीं दुःख भी है । लडकी! मै नहीं जानता, कि आनन्द से शादी करके तू क्या पायेगी ?”
३४. लडकी गम्भीरतापूर्वक सोचने लगी और इस परिणाम पर पहुँची कि आनन्द से शादी करना बेकार है, जिसके लिये वह मरी जा रही थी । उसने अपना यह मत तथागत पर प्रकट कर दिया ।
३५. तथागत को अभिवादन कर लड़की बोली- “अज्ञान के वशीभूत होकर ही मैं आनन्द के पीछे लगी थी । अब मेरी आंखे खुल गई हैं । मैं उस नाविक की तरह हूँ जिसकी नौका एक दुर्घटना के बाद दूसरे किनारे जा लगी है । मैं एक आरक्षित वृद्ध पुरुष की तरह हूँ जिसे सुरक्षा मिल गई है। मैं उस अन्धे पुरुष की तरह हूँ जिसे दृष्टि प्राप्त हो गई है । तथागत के ज्ञानामृत ने मेरी निद्रा भंग कर दी है।"
३६. “भाग्यवान् है हे प्रकृति! यद्यपि तू चाण्डाल-कन्या है किन्तु तू श्रेष्ठ पुरुषो और स्त्रियों के लिये आदर्श का काम देगी । तू 'नीच' जाति की है सही, लेकिन ब्राह्मण तुझसे शिक्षा ग्रहण करेंगे । न्याय तथा धम्म के पथ से विचलित न होना । तेरी कीर्ति राज- सिंहासन पर बैठी हुई रानियों की कीर्ति से बढ़ जायेगी ।”
३७. शादी की बात जाती रही तो अब उसके सामने 'भिक्षुणी संघ' में प्रविष्ट होने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग न था ।
३८. उसने इच्छा प्रकट की तो वह भिक्षुणी-संघ में ले ली गई । यूं निस्सन्देह वह 'नीचतम' जाति की थी ।