भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
सातवाँ भाग : स्त्रियों की धम्म दीक्षा
१. महाप्रजापति गौतमी, यशोधरा तथा अन्य स्त्रियों की धम्म दीक्षा
१ जब सिद्धार्थ कपिलवस्तु लौटे तो शाक्य स्त्रियाँ भी 'संघ' में प्रविष्ट होने के लिए उतनी ही उत्सुक थी जितने पुरुष ।
२. ऐसी स्त्रियों की अगुआ स्वयं महाप्रजापति गौतमी थी ।

३. जिस समय तथागत शाक्यों के न्यग्रोधाराम में ठहरे हुए थे, महाप्रजापति गौतमी उनके पास पहुँची और बोली- “भगवान! यह अच्छा होगा यदि स्त्रियों को भी तथागत के धम्म - विनय के अनुसार प्रव्रजित होने की अनुज्ञा मिले ।”
४. “गौतमी! रहने दे । ऐसे विचार को मन में उत्पन्न न होने दे ।” दूसरी और तीसरी बार भी महाप्रजापति गौतमी ने अपनी प्रार्थना दोहराई । दूसरी और तीसरी बार भी उसे वही उत्तर मिला ।
५. तब महाप्रजापति गौतमी बहुत ही दुःखित, चिन्तित हुई । उसने तथागत के सामने सिर झुकाया और आंखों मे आँसू लिए, हुई चली गई ।
६. जब तथागत न्यग्रोधाराम से चारिका के लिये निकल पडे, तो महाप्रजापति गौतमी और शाक्य स्त्रियाँ इक्ट्ठी हुई और विचार करने लगी कि तथागत के प्रार्थना स्वीकार न करने पर, अब आगे क्या किया जाये ?
७. शाक्य स्त्रियों ने सोचा कि वे तथागत के इस इनकार को उनका " अन्तिम निर्णय नहीं मानेंगी और किसी न किसी तरह तथागत को राजी करेंगी। उन्होने यह भी निर्णय किया कि वे एक कदम आगे जायेंगी और स्वयं परिव्राजिका' बनकर तथागत के सामने उपस्थित होंगी ।
८. तदनुसार महाप्रजापति गौतमी ने अपने बाल काटे, काषाय-वस्त्र पहना और दूसरी अनेक स्त्रियों को साथ लिये तथागत से भेंट करने के लिये निकली ।
९. धीरे-धीरे अन्य स्त्रियों के साथ महाप्रजापति गौतमी वैशाली के कूटागार- भवन में पहुंची । उस समय उसके पांव सूजे हुए थे और उन पर धूल चढी थी ।
१०. उसने अपनी वही प्रार्थना, जो उसने उस समय की थी, जब तथागत न्यग्रोधाराम में ठहरे हुए थे, दोहराई और तथागत ने भी फिर उसे पूर्ववत् ही अस्वीकार कर दिया ।
११. प्रार्थना के दुबारा अस्वीकृत हो जाने से प्रजापति गौतमी बहुत खिन्न हुई और कूटागार के दरवाजे के बाहर जाकर खड़ी हो गई । वह नहीं जानतीं थी कि अब वह क्या करे? जिस समय वह इस प्रकार खड़ी हुई थी, आनन्द ने कूटागार की ओर जाते समय, उसे देखा और पहचान लिया ।
१२. उसने महाप्रजापति से प्रश्न किया -- “तू यहाँ इस प्रकार बरामदे के बाहर क्यों खड़ी है? तेरे पाँव सूजे हैं। उन पर धूल चढ़ी है । चेहरा दुःखी हैं । आंखों से आंसू बह रहे हैं ।” “आनन्द! क्योकि तथागत स्त्रियों को घर से बेघर हो उनके धम्म और विनय के अनुसार प्रव्रजित होने की आज्ञा नही देते । "
१३. तब आनन्द स्थविर वहां गये जहाँ तथागत थे और तथागत को अभिवादन कर एक ओर बैठ गये । इस प्रकार बैठ कर आनन्द ने तथागत से निवेदन किया, “भगवान! महाप्रजापति गौतमी बरामदे के बाहर खड़ी है। उसके पाँव सूजे हैं । उन पर धूल चढी है । चेहरा दुःखी है । आँखो से आँसू बह रहे हैं । क्योकि तथागत स्त्रियों को, घर से बेघर हो तथागत के धम्म और विनय के अनुसार, प्रव्रजित होने की आज्ञा नहीं देते । भगवान यह अच्छा हो यदि महाप्रजापति गौतमी की इच्छा के अनुसार स्त्रियों को भी प्रव्रजित होने की आज्ञा मिल जाये । "
१४. “क्या महाप्रजापति गौतमी ने तथागत की विशेष सेवा नही की है जब मौसी की हैसियत से, तथागत की माता का शरीरान्त हो जाने पर, वह अपने स्तन से ही तथागत को दुग्ध-पान कराती रही है? यह अच्छा होगा, भगवान! यदि स्त्रियों को भी, घर से बेघर हो, तथागत के धम्म और विनय के अनुसार प्रव्रजित होने की अनुज्ञा मिले ।”
१५. “आनन्द! रहने दो । तुम्हे यह न रूचे कि स्त्रियों को भी प्रव्रजित होने की अनुज्ञा मिले ।” दूसरी बार और तिसरी बार भी आनन्द ने अपनी प्रार्थना दोहराई और दूसरी तथा तीसरी बार भी आनन्द की प्रार्थना अस्वीकृत ही हुई ।
१६. तब आनन्द स्थविर ने तथागत से प्रश्न किया- “भगवान! आपके द्वारा स्त्रियों को प्रव्रजित न होने देने का क्या कारण हो सकता है?"
१७. “भगवान जानते है कि ब्राह्मण का यह मत है कि शूद्र और स्त्रिया कभी मोक्ष नहीं प्राप्त कर सकतीं क्योकि वे अपरिशुद्ध होती है और पुरुषो के मुकाबले में निम्न जाति की होती है । इसीलीये वे शूद्रों और स्त्रियों को प्रव्रज्या नहीं लेने देते ? तो क्या तथागत की दृष्टि भी ब्राह्मणों के समान ही है?”
१८. “क्या तथागत ने ठीक उसी प्रकार शूद्रों को भी संघ में प्रविष्ट नहीं किया है जैसे ब्राह्मणो को ? भगवान ! स्त्रियों से ही ऐसा भेद- भाव करने का क्या कारण है?"
१९. “क्या तथागत का यह मत है कि तथागत के धम्म और विनय के अनुसार चलकर स्त्रिया निर्वाण प्राप्त नहीं कर सकती?”
२०. तथागत बोले -- “आनन्द ! मुझे गलत तौर पर मत समझो । मेरा मत है कि पुरूषों की तरह ही स्त्रिया भी निर्वाण प्राप्त कर सकती है । आनन्द! मुझे गलत तौर पर मत समझो । मैं पुरूषों को स्त्रियों की अपेक्षा किसी भी तरह विशेष नहीं मानता । महाप्रजापति गौतमी की प्रार्थना को जो मैने स्वीकार नही किया है, वह स्त्रियों को पुरुषो की अपेक्षा हेय समझने के कारण नहीं, बल्कि व्यवहारिक कारणों से ही ।”
२१. “भगवान! मैं बड़ा प्रसन्न हूँ कि तथागत ने मुझ पर यथार्थ कारण प्रकट कर दिया है । लेकिन क्या व्यवहारिक कारणों से महाप्रजापति गौतमी की प्रार्थना सर्वथा अस्वीकृत होनी चाहिये ? क्या ऐसा करने से लोग धम्म की निन्दा नहीं करेंगे? क्या लोग ऐसा नहीं कहेंगे कि तथागत के धम्म - विनय में पुरूषों की अपेक्षा स्त्रियों को हेय माना जाता है? क्या जिन व्यवहारिक कठिनाइयों की तथागत को चिन्ता है, उनसे बचने के लिए कुछ नियम नहीं बनाये जा सकते?”
२२. “अच्छा! आनन्द! यदि महाप्रजापति का इतना आग्रह है कि मेरे धम्म-विनय में उन्हें प्रव्रजित होने की अनुमति मिलनी चाहिये, तो मैं इसे स्वीकार करता हूँ । लेकिन इसके लिये महाप्रजापति गौतमी को स्त्रियों की ओर से आठ बातें स्वीकार करनी होगी और स्त्रियों से उनका पालन कराना भी उसकी जिम्मेदारी होगी । यही महाप्रजापति की दीक्षा होगी ।"
२३. तब आनन्द स्थविर ने तथागत से उन आठ नियमों की जानकारी प्राप्त की और जाकर प्रजापति गौतमी को वह सब बातचीत सुना दी जो तथागत से हुई थी ।
२४. महाप्रजापति गौतमी बोली . “आनन्द! जिस प्रकार अलंकार- प्रिय कोई कुमार या कुमारी, यदि स्तानान्तर उसे कमल के फूलों की, वा चमेली के फूलों की, वा अतिमुक्त की माला दी जाय और वह उसे दोनों हाथों में लेकर सिर पर रखे, उसी प्रकार आनन्द! मै इन आठो नियमों को अपने सिर पर जीवन पर्यन्त पालन करने के लिये, धारण करती हूँ ।"
२५. तब आनन्द स्थविर तथागत के पास आये और अभिवादन कर एक और बैठ गये । एक और बैठ कर आनन्द स्थविर ने तथागत को कहा -- “महाप्रजापति गौतमी ने इन आठों नियमों के पालन कराने की जिम्मेदारी अपने सिर पर ले ली है । इसलिये अब यह उसकी उपसम्पदा मान ली जाय ।"
२६. अब महाप्रजापति गौतमी ने प्रव्रज्या - उपसम्पदा ग्रहण की और उसके साथ ही उन पांच सौ शाक्य देवियों ने भी जो महाप्रजापति गौतमी के साथ चलकर आई थी । इस प्रकार प्रव्रजित उपसम्पन्न होकर प्रजापति गौतमी तथागत के सामने आई और तथागत को अभिवादन किया । तथागत ने उसे धम्म और विनय की शिक्षा दी ।
२७. शेष पाँच सौ भिक्षुणियों को तथागत के ही एक शिष्य नन्दक ने धम्म और विनय की शिक्षा दी ।
२८. महाप्रजापति गौतमी के साथ जिन शाक्य -देवियों ने प्रव्रज्या ग्रहण की अर्थात् भिक्षुणियां बनीं, उनमें यशोधरा भी थी । भिक्षुणी होने पर उसका नाम भद्दा कच्चाना (भद्रा कात्यायना ) हुआ ।