भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
३. अंतिम वचन
१. उस समय भगवान् बुद्ध ने आनन्द को कहा:--
२. “आनन्द! हो सकता कि तुम यह सोचने लगों कि अब हमारे शास्ता चले गये । अब हमारा मार्ग-दर्शक नही रहा । लेकिन आनन्द! तुम्हें ऐसे नही सोचना चाहिये । मेरे बाद जो कुछ मैंने धम्म-विनय सिखाया-प -पढाया है, वही तुम्हारा शास्ता होगा ।

३. आनन्द! इस समय परस्पर एक दूसरे को समान सम्बोधन से ही पुकारने की प्रथा है । बडे छोटे का भेद नही । मेरे बाद बन्द हो जानी चाहिये । बडा छोटे को नाम लेकर वा आवुसों (आयुष्यमान) कहकर पुकार सकता है, किन्तु छोटा जब अपने से बडे को पुकारे तो उसे या तो उसके 'गोत्र' से पुकारना चाहिये अथवा 'भन्ते' कह कर पुकारना चाहिये ।
४. “और आनन्द! यदि संघ चाहे तो मेरे मरने के बाद जो छोटे-मोटे नियम है उन्हें छोड़ भी सकता है ।
५. “आनन्द ! तुम जानते हो कि छन्न कैसा जिद्दी, उल्टे मार्ग पर चलने वाला तथा 'विनय'को न मानने वाला है?
६. “आनन्द! मेरे बाद छन्न को 'ब्रह्म- दण्ड दिया जाय ।”
७. “भगवान्! 'ब्रह्म- दण्ड' से आपका क्या अभिप्राय है?"
८. “आनन्द! छन्न चाहे कुछ भी कहे, उसे कहने दिया जाय, उसके साथ बोला न जाय, उसे कुछ कहा न जाय, उसे कुछ भी शिक्षा न दी जाय । हो सकता है कि इस तरह उसका कुछ सुधार हो जाय ।"
९. तब तथागत ने भिक्षुओं को सम्बोधित किया:--
१०. “हो सकता है कि किसी भी भिक्षु के मन में बुद्ध के विषय में, धम्म के विषय में, संघ के विषय में, कुछ भी शंका हो, सन्देह हो, विचिकित्सा हो । अथवा मार्ग के ही विषय में कुछ भी शका हो, सन्देह हो, विचिकित्सा हो । यदि हो, तो भिक्षुओं! अब समय है, पूछ लो । बाद मे न पछताना कि “हमारा शास्ता हमारे सम्मुख था, हमने पूछकर अपनी शंका न मिटाई ।”
११. ऐसा कहने पर भिक्षु चुप रहे ।
१२. तब दूसरी बार और तीसरी बार भी तथागत ने अपनी बात दोहराई । तीसरी बार भी भिक्षु मौन ही रहे ।
१३. तब तथागत ने कहा - “हो सकता है कि मेरे प्रति गौरव होने के कारण तुम मौन हो । मित्र के मित्र से पूछने की तरह पूछो।”
१४. तब भी भिक्षु चुप ही रहे ।
१५. तब आनन्द स्थविर ने तथागत को कहा - "भगवान्! अद्भुत है । भगवान् । आश्चर्य है । मुझे अपने 'संघ' का विश्वास है । इतने भिक्षु एक भी नहीं है, जिस बुद्ध के बारे में शंका हो, धम्म के बारे में शंका हो, संघ के बारे में शंका हो अथवा (आर्य) मार्ग के बारे में शंका हो ।"
१६. “आनन्द! तुम्हे तो इस बात का विश्वास है । किन्तु तथागत को इस बात का ज्ञान है कि इन भिक्षुओं में से किसी एक को भी, किसी एक भी विषय में शंका नहीं है। मेरे इन पाँच सौ भिक्षुओं में से जो सब से कम उन्नत है वह भी कम से कम स्त्रोतापन्न अवश्य है, अर्थात स्रोत में आ पड़ा है और उसी की बोधि- प्राप्ति सुनिश्चित है ।”
१७. तब तथागत ने भिक्षुओ को सम्बोधित किया--
१८. “भिक्षुओं । मैं फिर तुम्हें स्मरण करा रहा हूँ । सभी संस्कार अनित्य हैं । अप्रमादपूर्वक अपने लक्ष्य की प्राप्ति में लगे रहो ।”
१९. तथागत के अन्तिम शब्द ये ही थे ।