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भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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16 जून 2023
Book
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३. माता और पुत्र तथा पति और पत्नी की अंतिम भेंट

१. मृत्यु से पहले महाप्रजापति और यशोधरा तथागत से भेंट कर सकी ।

२. यही कदाचित् उनकी अन्तिम भेंट थी ।

३. पहले महाप्रजापति गई और उसने जाकर तथागत की पूजा की।

Mata aur Putra tatha pati aur Patni ki antim bhenta - Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

४. वह उनकी ऋणी थी, क्योंकि तथागत ने उसे सद्धम्म का पान कराया था, क्योंकि उसके (अध्यात्म) शरीर ने तथागत के माध्यम से जन्म ग्रहण किया था, क्योंकि उसके शरीर मे धम्म ने तथागत के माध्यम से ही विकास पाया था, क्योंकि उसने तथागत के धम्मरुपी दुग्ध का पान किया था, क्योंकि उसने इन्ही की सहायता से संसार सागर को तैर कर पार किया था--यह कितनी बड़ी बात थी कि वह बुद्ध जननी मानी गई!

५. और तब उसने अपनी बात कही--, “अब मैं इस देह का त्याग कर मृत्यु को प्राप्त होना चाहती हूँ । हे दुःख का अन्त करने वाले भगवान्! मुझे अब इसकी अनुमति दें ।"

६. यशोधरा ने भगवान् बुद्ध से बात करते हुए कहा कि अब वह अठहत्तर वर्ष की हो गई है । तथागत ने कहा कि यह उनक अस्सीवाँ वर्ष है ।

७. यशोधरा ने कहा कि आज की रात ही उसकी अन्तिम रात्रि है । महाप्रजापति की अपेक्षा उसका स्वर अधिक संयत था । उसने तथागत से न मरने की अनुमति मांगी और न महाप्रजापति की तरह उसने उन्ही की शरण ही ग्रहण की।

८. बल्कि उसके प्रति विरुद्ध उसने कहा - मै अपनी शरण आप हूँ ।

९. वह अपने जीवन के सभी बंधन काट चुकी थी ।

१०. वह अपनी कृतज्ञता प्रकट करने आई थी, क्योंकि तथागत ही उसके पथ-प्रदर्शक थे और तथागत से ही उसने धम्म- बल प्राप्त किया था ।


४. पिता और पुत्र में अंतिम भेंट

१. एक बार जब भगवान् बुद्ध राजगृह के वेळूवन में निवास कर रहे थे, उसी समय राहुल अम्बलट्ठिका में ठहरे थे ।

२. अपराहन के बाद जब भगवान् बुद्ध समाधि से उठे तो वह राहुल की ओर गये । उन्हें दूर से ही आता देख राहुल ने उनके लिये आसन बिछा दिया तथा पैर धोने के लिये पानी रख दिया ।

३. राहुल द्वारा बिछाये आसन पर बैठ कर तथागत ने अपने पांव धोये, और राहुल ने भी तथागत को अभिवादन कर एक ओर स्थान ग्रहण किया।

४. राहुल को सम्बोधित कर के तथागत ने कहा - "जिसे जान बूझ कर झूठ बोलने में लज्जा नहीं, वह हुछ भी पाप कर्म कर सकता है । इसलिए राहुल! यह सीखना चाहिये कि हम हँसी-मजाक मे भी कभी झूठ न बोलेंगे ।

५. "इसी प्रकार कोई भी काम करने लगो पहले उसके बारे में सोचों, कोई भी शब्द मुंह से निकालने लगो, पहले उसके बारे में सोचों, कोई भी बात मन मे पैदा हो, पहले उसके बारे मे सोचो।

६. “जब कोई भी काम करने लगो तो पहले उसके बारे में सोचो कि यह तुम्हारे तथा दूसरों के लिये अहितकर तो नही होगा,  एक  दुष्ट-कर्म कष्टादायी होता है । यदि तुम्हारा विचार कहे कि यह काम ऐसा ही है, तो उससे विरत रहो ।

७. “लेकिन यदि सोचने- विचारने से लगे कि यह काम अहितकर नहीं है, हितकर है तो तुम उसे कर सकते हो ।

८. मैत्री का अभ्यास करो; क्योकि मैत्री भावना के अभ्यास से द्वेष का शमन हो जायगा ।

९. “करुणा का अभ्यास करो, क्योंकि करुणा भावना का अभ्यास करने से खीझ का शमन हो जायगा ।

१०. “मुदिता का अभ्यास करो - क्योंकि मुदिता - भावना का अभ्यास करने से अरति का शमन हो जायगा ।

११. "उपेक्षा का अभ्यास करो, क्योंकि उपेक्षा- भावना को अभ्यास करने में चंचलता का शमन हो जायगा ।

१२. “शरीर के अशुभ रुप का चिन्तन करो, क्योंकि ऐसा करने से काम - राग का शमन हो जायगा ।

१३. "सभी चीजों की 'अनित्यता' की भावना करो, क्योकि ऐसा करने से अहंकार का शमन हो जायगा ।"

१४. ऐसा भगवान् बुद्ध ने कहा। राहुल ने सुना तो उसने प्रसत्र हो अभिनन्दन किया ।


५. भगवान बुद्ध और सारिपुत्र की अन्तिम भेंट

१. भगवान् बुद्ध श्रावस्ती के जेतवन विहार में गन्ध कुटी में विराजमान थे ।

२. पाँच सौ भिक्षुओ को साथ लिये सारिपुत्र वहाँ पहुँचे ।

३. तथागत को अभिवादन कर सारिपुत्र ने निवेदन किया कि अब मेरा अन्तिम समय समीप आ पहुँचा है । क्या तथागत अब मुझे शरीर-त्याग की अनुमति देते हैं?

४. भगवान् बुद्ध ने सारिपुत्र से पूछा-- "क्या तूने अपने परिनिर्वाण के लिये कोई स्थान विशेष चुना है?"

५. सारिपुत्र का उत्तर था- “मैं मगध के नालक नाम के गांव में पैदा हुआ था । जिस घर में पैदा आ था वह अभी भी है । मैंने उसी को चुना है ।"

६. तथागत बोले-- “प्रिय सारिपुत्र ! जो अच्छा लगे सो करो ।”

७. सारिपुत्र तथागत के चरणों पर गिर कर बोले-- “मैंने एक हजार कल्प तक पारमिताओं का अभ्यास केवल एक ही इच्छा को लेकर किया है और वह यह कि मुझे आपके चरणों की वन्दना करनी मिले । मेरी यह इच्छा पूरी हो गई । मेरी प्रसत्रता का कोई ठिकाना नही ।

८. "हमारी पुनरुत्पति की सम्भावना नहीं है । इसलिये यही हमारी अन्तिम भेंट है । तथागत मेरे अपराधों को क्षमा करे ।

९. तथागत बोले-- “सारिपुत्र ! क्षमा करने के लिए कुछ है ही नही ।"

१०. जब सारिपुत्र चलने लगे तो तथागत भी उनके प्रति गौरव प्रकट करने के लिए गन्धकुटी के बाहर आये और बरामदे में खडे हो गये ।

११. तब सारिपुत्र बोले-- “जब मुझे प्रथम बार दर्शन हुआ, मैं अत्याधिक आनन्दित हुआ । यह इस समय का दर्शन भी मेरे लिये अत्यन्त आनन्ददायक है। क्योंकि मैं जानता हूँ कि यही अन्तिम दर्शन है ।”

१२. बिना पीठ पीछे किये, सारिपुत्र हाथ जोडे जोडे वहाँ से विदा हुए ।

१३. तब भगवान् बुद्ध ने उपस्थित भिक्षु मण्डली को कहा- 'अपने ज्येष्ठ भ्राता के पीछे-पीछे जाओ।' उस बार और पहली बार - भिक्षुसंघ तथागत को छोड़ कर सारिपुत्र के पीछे पीछे गया ।

१४. अपने गाव पहुँच कर सारिपुत्र ने ठीक उसी कोठरी में जिसमें जन्म ग्रहण किया था,परिनिर्वाण प्राप्त किया ।

१५. सारिपुत्र का दाह संस्कार किया गया । उनकी अस्थियाँ तथागत के पास ले जाई गई ।

१६. सारिपुत्र के ‘फूल' सामने आये तो तथागत बोले--'वह सब से अधिक बुद्धिमान था, उसमें संग्रह-वृत्ति का लेश भी न था, वह उत्साही और परिश्रमी था । उसे 'पाप' से घुणा थी । भिक्षुओं! उसके 'फूल' देखो। क्षमाशीलता में वह पृथ्वी के समान था । उसने क्रोध को जीत लिया था । वह कभी किसी इच्छा के वशीभूत न होता था । वह इन्दिय-जयी था । वह करुणा तथा मैत्री की मूर्ति था ।

१७. उसी समय महामोदगल्यायन भी राजगह के समीप एक एकान्त - विहार में रहते थे । तथागत के शत्रुओं द्वारा नियुक्त हत्यारों हत्या कर डाली ।

१८. महामोदगल्यायन की दुःखद मृत्यु का समाचार तथागत तक पहुँचा । सारिपुत्र और महामोदगल्यायन उनके दो मुख्य शिष्य थे । सारिपुत्र धम्म सेनापति कहलाते थे । तथागत अपनी धम्म- परम्परा चालू रखने के लिए कदाचित् उन्हीं पर निर्भर करते थे ।

१९. उन दोनों की मृत्यु से तथागत के मन में बहुत संवेग उत्पन्न हुआ।

२०. उसके बाद उन्हें श्रावस्ती में रहना अच्छा नहीं लगा। वे श्रावस्ती से विदा हुए ।