भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
पहला भाग : निकटस्थ जनों से भेंट
१. धम्म प्रचार के केन्द्र
१. धम्म - दूतों की नियुक्ति के बाद भगवान् बुद्ध स्वयं किसी एक जगह नहीं बैठ गये थे । वे भी स्वयं धम्म- दूत बने रहे ।
२. ऐसा लगता है कि भगवान् बुद्ध ने कुछ विशेष स्थानों को धम्म प्रचार का केन्द्र बना लिया था ।
३. ऐसे केन्द्रो में प्रधान थे श्रावस्ती और राजगृह ।

४. उन्होंने लगभग ७५ बार श्रावस्ती की यात्रा की होगी और कोई २४ बार राजगृह की ।
५. कुछ दूसरे स्थान धम्म प्रचार के छोटे केन्द्र थे ।
६. जैसे कपिलवस्तु, जहाँ तथागत ६ बार गये, वैशाली भी छ: बार गये और कम्मासदम्म ४ बार ।
२. भगवान बुद्ध कहाँ कहाँ पधारे?
१. अपनी चारिका करते करते उक्त प्रधान और छोटे केन्द्रो के अतिरिक्त ऐसे और बहुत से स्थान है जहाँ भगवान् बुद्ध गये ।
२. वे उकट्ठा, नादिका, साला, अस्सपुर, घोषिताराम, नालन्दा, आपण तथा एतुमा पधारे ।
३. वे ओपसाद, इच्छा-नंगल, चण्डाल- कप्प, तथा कुसीनारा गये ।
४. वे देवदह, पावा, अम्बसण्डा, सेतव्या, अनुपिया तथा उजूनना गये ।
५. जिन जिन जगहों पर तथागत गये उनके नामों को देखने से पता लगता है कि वे शाक्य जनपद, कुरु जनपद तथा अग जनपद में पधारे ।
६. मोटे रुप से यह कह सकते हैं कि उन्होंने समस्त उत्तरी भारत की यात्रा की ।
७. इन स्थानों की संख्या बहुत अधिक प्रतीत नहीं होती । लेकिन इनके बीच की भी दूरी कितनी है ? लुम्बिनी से राजगृह कोई ढाई सौ मील से कम दूर नहीं है। इससे स्थानों की दूरी का कुछ अन्दाजा लग जाता है ।
८. इन सभी स्थानों पर भगवान् बुद्ध पैदल ही गये हैं । उन्होंने बैलगाडी तक का भी उपयोग नहीं किया ।
९. जब वे चारिका करते थे तो रास्ते में ठहरने के लिये भी कोई जगह नहीं थी । आगे चलकर तो उनके गृहस्थ उपासकों ने उनके रहने-ठहरने के लिये विहार बनवा दिये थे । तथागत बहुधा सड़क के किनारे के वृक्षो की छाया में ही रात बिताते थे ।
१०. जिनके मन में सन्देह थे, उनके सन्देह मिटाते हुए, जो विरोधी थे उनके तर्कों का उत्तर देते हुए, जो बच्चों की तरह उनका विश्वास करते थे उन्हें सत्पथ दिखाते हुए तथागत एक जगह से दूसरी जगह, एक गांव से दूसरें गाँव विचरते थे ।
११. भगवान् बुद्ध जानते थे कि जितने लोग उनका उपदेश सुनने आते थे सब न समान रूप से बुद्धिमान होते थे और न ऐसे ह जिनकी पहले से कुछ पूर्व- धारणायें न बनी हुई हो ।
१२. उन्होंने भिक्षुओं को बता तक दिया था कि श्रोतागण तीन प्रकार के होते हैं:-
१३. “खाली-दिमाग, जिस मूर्ख को कुछ भी दिखाई नहीं देता, यद्यपि वह बार-बार भिक्षुओं के पास जाता है, आदि, मध्य और अन्त तक उनके प्रवचन सुनता है, लेकिन कुछ नहीं समझ सकता । उसे बुद्धि ही नहीं होती ।
१४. “लेकिन उससे अच्छा वह आदमी होता है जिसका चित्त एकाग्र नहीं होता, वह बार-बार भिक्षुओं के पास जाता है, आदि, मध्य और अन्त तक उनके 'प्रवचन' सुनता हैं, और जब तक वहा बैठा रहता है तब तक सबकुछ समझता भी है, लेकिन वहाँ से उठने पर उसके दिमाग में कुछ टिका नहीं रहता । उसका दिमाग कोरा हो जाता है ।
१५. “इन दोनों से प्रशस्त- प्रज्ञ आदमी अच्छा है । वह भी बार-बार भिक्षुओं के पास जाता है, आदि मध्य और अन्त तक उनके प्रवचन सुनता है, वहाँ बैठे- बैठे सब कुछ समझता है, सब कुछ ध्यान में रखता है, स्थिर - चित्त, एकाग्र चित्त और धम्म तथा धाम्मिक विषयों में दक्ष ।"
१६. इन सब के बावजूद भगवान् धम्मोपदेश के उद्देश्य से एक स्थान से दूसरे स्थान पर विचरते ही रहे । उन्होंने कभी कलान्ति अनुभव नहीं की ।
१७. एक 'भिक्षु ‘की तरह ही भगवान् बुद्ध के पास तीन चीवरों से अधिक कभी नहीं रहे । वे दिन में एक बार भोजन ग्रहण करते थे । वे हर रोज घर घर से भिक्षाटन करते थे ।
१८. किसी भी मानव ने इससे कडे 'कर्तव्य' को नहीं निभाया होगा और इतनी प्रसत्रता के साथ ।