भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
३. मल्लिका की श्रद्धा
१. एक बार जब भगवान् बुद्ध श्रावस्ती के जेतवनाराम में ठहरे हुए थे, एक गृहस्थ का प्रिय पुत्र मर गया । पिता उसके शोक से इतना सन्तप्त हुआ कि उसका खाना- ना-पीना और कारोबार सब छूट गया ।
२. वह हमेशा श्मशान-भूमि में जाता था और जोर जोर से चिल्लाता था । 'पुत्र ! तुम कहाँ हो? पुत्र! तुम कहाँ हो ?'

३. शोक-सन्तप्त पिता भगवान् बुद्ध के पास आया और अभिवादन कर एक ओर बैठ गया ।
४. यह देख कि उसका दिमाग सर्वथ खाली था, उसकी किसी भी चीज में दिलचस्पी नहीं थी, वह यह भी नहीं बताता था कि वह क्यों आया; उसकी ऐसी अवस्था देख तथागत ने कहा-- "तुम अपने आप में नहीं हो । तुम्हारा चित्त स्थिर नहीं है ।”
५. “मेरा चित्त स्थिर कैसे रह सकता है, जब मेरा इकलौता प्रिय पुत्र चल बसा ?"
६. “हाँ गृहपति! हमारे प्रियजन शोक, संताप, कष्ट, दुःख और अनुताप का कारण होते ही है ।"
७. गृहस्थ को क्रोध आ गया। बोला-- "ऐसी बात कौन स्वीकार कर सकता है! हमारे प्रिय-जन हमारे लिये आनंद और सुख 'का कारण होते है ।”
८. यह कहता हुआ असन्तुष्ट गृहपति भगवान् बुद्ध के कथन को अस्वीकार कर उठकर चला गया ।
९. समीप ही कुछ जुआरी बैठे जुआ खेल रहे थे । गृहपति उनके पास पहुंचा और उन्हें अपनी सब बात कह सुनाई कि कैसे वह तथागत के पास गया, कैसे तथागत ने उसका स्वागत किया, कैसे तथागत ने उसे क्या कहा और फिर कैसे वह उठकर चाला आया ।
१०. जुआरी बोले-- “तुम्हारा कहना एकदम ठीक है । हमारे प्रिय जन हमारे लिये आनन्द और सुख का कारण होते हैं ।” गृहपति को लगा कि उसे उन जुआरियों का समर्थन प्राप्त है ।
११. धीरे धीरे यह बात फैलती फैलती राजा के निवास तक पहुँच गई । वहाँ राजा ने मल्लिकारानी को कहा कि तुम्हारें श्रमण गौतम ने कहा कि प्रियजन शोक, सन्ताप, कष्ट, दुःख और अनुताप का कारण होते ही है ।
१२. “स्वामी! यदि तथागत ने ऐसा कहा है, तो ठीक ही कहा है।"
१३. “मल्लिका! जैसे कोई शिष्य अपने गुरु की हर बात को 'जी ऐसी ही हैं' कहकर स्वीकार कर लेता है, उसी प्रकार तू भी जो कुछ श्रमण गौतम कहते है उसे यदि तथागत ने ऐसा कहा है तो ठीक ही कहा है' कह कर स्वीकार कर लेती है । जा दूर हट ।”
१४. तब मल्लिका ने नली- धान ब्राह्मण को बुलाया और कहा- “भगवान् बुद्ध के पास जाओ । मेरी ओर से चरणों में सिर रखकर नमस्कार करो । तब कुशल- समाचार पूछ चुकने के बाद पूछो कि क्या जो कुछ भगवान् बुद्ध के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने कहा है, वह उन्हों ने सचमुच कहा है?"
१५. “और जो कुछ भी तथागत उत्तर दें, मुझे आकर ठीक ठीक वैसे ही बताना ।”
१६. मल्लिका रानी की आज्ञा मान ब्राह्मण भगवान बुद्ध के पास पहुंचा और जाकर प्रश्न किया कि क्या उन्होंने वास्तव में वै कहा था ।
१७. “हाँ ब्राह्मण! प्रियजन शोक, सन्ताप, कष्ट, दुःख और अनुताप का कारण होते ही है । ये कुछ प्रमाण हैं ।”
१८. “एक बार, यहीं श्रावस्ती में ही, एक स्त्री की माँ मर गई । बेटी होश- हवास गंवाये, पागल बनी एक बाजार से दूसरे बाजार, एक चौरास्ते से दूसरे चौरास्ते चिल्लाती घूमती थी- “क्या किसी ने मेरी माँ को देखा है ? क्या किसी ने मेरी माँ को देखा है ?" १९. “एक दूसरा प्रमाण, श्रावस्ती की ही एक स्त्री है जिसका पिता मर गया, भाई मर गया -बहन मर गई-- बेटा मर गया-- -- बेटी मर गई--पति मर गया । वह होश-हवास गंवाये, पागल बनी एक बाजार से दूसरे बाजार, एक चौरास्ते से दूसरे चौरास्ते चिल्लाती घूमती थी -- "क्या किसी ने मेरे इन प्रियजनों को देखा है ?"
२०. “एक तीसरा प्रमाण, श्रावस्ती का ही वह आदमी है जिसकी माँ मर गई, जिसका पिता मर गया, भाई मर गया, बहन मर गई, बेटा मर गया, बेटी मर गई, पत्नि मर गयी । वह होश - हवास गंवाये, पागल बना एक बाजार से दूसरे बाजार एक चौरास्ते से दूसरे चौरास्ते चिल्लाता हुआ घूमता था - "क्या किसी ने मेरे इन प्रियजनों को देखा है?”
२१. “एक और प्रमाण श्रावस्ती की वह स्त्री है जो अपने मायके गई, उसके माता- पिता उसे उसके पति से छीन कर किसी दूसरे आदमी से ब्याह देना चाहते थे, जिसे वह पसन्द नही करती थी ।
२२. “उसने अपने पति को यह बात बता दी । उसके पति ने उसके दो तुकडे कर दिये और उसके बाद स्वयं भी आत्म-हत्या कर दिया ताकि उन दोनों का मरण साथ साथ हो सके।"
२३. ब्राह्मण नली- धान ने यह सब कुछ जाकर शब्दशः रानी मल्लिका को कह सुनाया ।
२४. तब रानी मल्लिका राजा के पास पहुंची और बोली- “स्वामी! क्या आपको अपनी इकलौती पुत्री वजिरा प्रिय है?” "हाँ! प्रिय है ।”
२५. “यदि आपकी वजिरा को कुछ हो जाय तो आपको कष्ट होगा या नहीं?" "यदि वजिरा को कुछ हो जाय तो इसका मेरे जीवन पर बडा बुरा प्रभाव पडेगा ।"
२६. “स्वामी! क्या आपको मैं प्रिय हूँ?” "हाँ! प्रिय हो !”
२७. “यदि मुझे कुछ हो जाय तो आपको दुख होगा या नहीं?" "यदि तुम्हें कुछ हो जाय तो इसका मेरे जीवन पर बडा बुरा प्रभाव पडेगा ।"
२८. “स्वामी! क्या आपको काशी - कोशल की जनता प्रिय है?" "हाँ प्रिय है ।" "यदि उसे कुछ हो जाय तो आपको अनुताप होगा या नहीं ।"
२९. “यदि काशी-कोशल की जनता को कुछ हो जाय तो मुझे बडा अनुताप होगा, यह हो ही कैसे सकता है कि ऐसा न हो ।” ३०. “तो भगवान् बुद्ध ने क्या इससे कोई भिन्न बात कही थी?” राजा ने पश्चाताप प्रकट करते हुए उत्तर दिया-- “मल्लिका! नही यही कहा था ।"
४. एक गर्भिणी की तीव्र अभिलाषा
१. एक बार भगवान बुद्ध मग्ग- देश के, सुसुभार पर्वत पर भेसकलावन के मृगदाय में ठहरे हुए थे । 'पद्म' नाम का बोधि राजकुमार का प्रासाद अभी बनकर समाप्त हुआ था । उसमें किसी श्रमण-ब्राह्मण वा अन्य किसी भी व्यक्ति का वास नहीं हुआ था ।
२. राजकुमार ने संजिक- पुत्र नाम के एक ब्राह्मण को कहा :- "भगवान् बुद्ध के पास जाकर मेरी ओर से उनके चरणों में नमस्कार करो । उनका कुशल-समाचार पूछो, और उन्हें भिक्षु संघ सहित कल के भोजन का निमंत्रण दो ।
३. निमंत्रण भगवान् बुद्ध तक पहुंचा, जिन्होंने उसे मौन रहकर स्वीकार किया और जिसकी सूचना राजकुमार को मिल गई । ४. रात के बीत जाने पर राजकुमार ने अपने 'पद्म' नाम के महल में श्रेष्ठ भोजन तैयार कराया और सीढीयो पर सफेद वस्त्र बिछवाया । इसके बाद उसने उस तरुण ब्राह्मण की जबानी भोजन की तैयारी की सूचना भिजवाई ।
५. यह हो जाने पर, उस दिन पूर्वाह्न में चीवर पहन तथा पात्र (चीवर) हाथ में ले तथागत वहाँ आये जहाँ अपने महल के दरवाजे के बाहर राजकुमार प्रतीक्षा कर रहा था ।
६. तथागत को आता देखकर, राजकुमार आगे बढा, अभिवादन किया और तथागत के पीछे पीछे महल की ओर वापस आया ।
७. सीढियों के नीचे भगवान बुद्ध चुपचाप रुक गये । राजकुमार बोला - "मैं प्रार्थना करता हूँ कि बिछे धुस्सों पर चरण-रज पड़ने दें । मैं तथागत से प्रार्थना करता हूँ कि इस धुस्से पर चरण-रज पड़ने दें --जो कि चिरकाल तक मेरे हित तथा सुख के लिये होगा ।” लेकिन तथागत चुप रहे ।
८. दूसरी बार भी राजकुमार ने प्रार्थना की । तब भी तथागत आगे नहीं बढे । तीसरी बार भी उसने प्रार्थना की, तब तथागत ने आनन्द की ओर देखा ।
९. आनन्द समझ गये और उन्होंने कहा कि वह धुस्से लपेट दिये जाये, क्योंकि तथागत पीछे आने वाले लोगों का ख्याल कर-- भावी जनता का ख्याल कर उस धुस्से पर पैर नहीं रखेंगे ।
१०. राजकुमार ने धुस्से इकट्ठे करवा दिये और महल में ऊपर बैठने के लिये आसन लगवाये ।
११. तब भिक्षु-संघ भगवान् बुद्ध ऊपर पधारे और बिछे आसनों पर विराजमान हुए ।
१२. राजकुमार ने अपने हाथ से भिक्षुसंघ और तथागत को भोजन परोसा ।
१३. भोजन की समाप्ति पर राजकुमार एक नीचा आसन ग्रहण कर एक ओर बैठ गया और बोला- “भगवान्! क्या वास्तविक कल्याण- आराम के रास्ते पर चलने से प्राप्त होता है वा कष्ट सहन के रास्ते पर चलने से ?"
१४. तथागत ने उतर दिया, पूर्व में, बोधी- लाभ करने से पूर्व मैं भी इस बारे में विचार करता था । जिस समय, मेरे काले काले बाल थे, तारुण्य के मध्य में था अपने रोते- माता पिता को छोड़कर मैंने सिर के बाल और दाढी मुंडा ली थी तथा काषाय वस्त्र धारण कर प्रव्रजित हो गया था--एक परिव्राजक कल्याण पथ का पथिक, अनुपम शान्ति की तलाश करने वाला ।
१५. “अब मेरा निश्चित मत है । यदि आदमी सद्धर्म को जानता है, तो वह दुःख का अन्त कर सकता है।"
१६. राजकुमार बोला-- “क्या अद्भुत सद्धम्म है ! क्या अद्भुत सद्धम्म की व्याख्या है ! यह समझने में कितना सुकर है ।” १७. तब तरुण ब्राह्मण बोल उठा--' . “राजकुमार! यद्यपि आपने इस प्रकार समर्थन किया है, किन्तु आपने बुद्ध धम्म तथा संघ की शरण नहीं ग्रहण की। "
१८. राजकुमार का उत्तर था: -- - "ऐसा मत कहों। ऐसा मत कहो । क्योंकि मैंने अपनी मातृश्री से सुना है कि जिस समय भगवान् बुद्ध कोसाम्बी के घोसिताराम में ठहरे हुए थे, वह गर्भिणी अवस्था मे ही भगवान् बुद्ध के पास गई और जाकर एक ओर बैठ गई । एक ओर बैठ कर उसने कहा- भगवान्! चाहे लडका हो और चाहे लडकी हो, जिस शिशु को मै इस समय अपने गर्भ में धारण किये हुए हूँ, वह मेरी अनुत्पन्न संतान बुद्ध, धम्म, तथा संघ की शरण ग्रहण कर रही है । भगवान्! इस शिशु को इसके जीवन भर अपना शरणागत उपासक स्वीकार करें ।"
१९. “दूसरी बार जब भगवान् बुद्ध यहाँ इस भग्गदेश में ही सिंसुभारगिरि पर भेसकलावन में ठहरे हुए थे, मेरी दाई मुझे तथागत के पास ले गई और सामने खडी होकर बोली- “यह बोधि राजकुमार बुद्ध, धम्म तथा संघ की शरण ग्रहण करता है ।"
२०. “अब मैं तीसरी बार, स्वयं यह शरण ग्रहण करता हूँ और तथागत से प्रार्थना करता हूँ कि वे मुझे अपना शरणागत उपासक स्वीकार करें ।"
५. केनिय द्वारा किया गया स्वागत
१. आपण में सेल नाम का एक ब्राह्मण रहता था, जो तीनों वेदो में पारंगत था, व्याख्या सहित कर्मकाण्ड का पण्डित था, शब्द-शास्त्र तथा शब्दों की व्युत्पति का ज्ञाता था, पांचवी विद्या इतिहास से परिचित था । वह व्याकरण जानता था, और लोकायत-शास्त्र भी जानता था तथा महापुरुष लक्षणों की भी जानकारी रखता था । वह तीन सौ तरूण ब्राह्मणों को वेदमंत्र सिखाता था ।
२. अग्नि-पूजक केनिय ब्राह्मण इस सेल ब्राह्मण को मानने वाला था। अपने तीन सौ शिष्यों के साथ जब वहाँ पहुंचा कि सभी अग्नि- पूजक भिन्न भिन्न कार्यों में व्यस्त है और स्वंय केनिय पृथक पृथक खाना बना रहा है।
३. यह देखा तो सेल ब्राह्मण केनिय ब्राह्मण से बोला- "यह सब क्या है? क्या कोई बारात जिमाई जाने को है? या कोई यज्ञ रचा है ? अथवा उसके सब राजकर्मचारियों के साथ मगध नरेश बिम्बिसार को ही कल के दिन भोजन के लिये निमंत्रित किया है?"
४. "सेल ! यह कोई बारात भी नहीं जिमाई जा रहीं है और न मैंने सभी राजकर्मचारियों सहित मगध नरेश बिम्बिसार को निमंत्रित
किया है। लेकिन मैंने एक बडा यज्ञ रचा है। श्रमण गौतम साढ़े बारह सौ भिक्षुओं के साथ चारिका करते करते आपण पधारे हैं। ५. " श्रमण गौतम के बारे में यह कीर्ति शब्द सुना गया है कि वे अर्हत है सम्यक् समबुद्ध हैं।"
६. “मैंने कल उन्हीं को अपने भिक्षु संघ सहित यहाँ भोजन के लिये निमंत्रित किया है। यह जो तैयारी हो रही है, यह सब उन्हीं के लिये है।"
७. सेल ने प्रश्न किया - “केनिय! क्या तू ने कहा कि वे सम्यक् समबुद्ध हैं?” "हाँ! मैंने कहा कि वे सम्यक् समबुद्ध हैं।” “क्या तूने सचमुच कहा कि वे सम्यक् समबुद्ध है।" "हाँ मैंने सचमुच कहा कि वे सम्यक् समबुद्ध है।”
६. तथागत की राजा प्रसेनजित द्वारा की गई स्तुति
१. एक बार भगवान् बुद्ध श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के जेतवनाराम में ठहरे हुए थे।
२. उस समय कोशल-नरेश प्रसेनजित् उस बनावटी-युद्ध से लौटे ही थे, जिसमें वे विजयी हुए थे। उद्यान में पहुँचकर वे उधर घूम गये। जहाँ तक रथ से जाया जा सकता था, वे रथ से गये। आगे जाकर रथ से उतर गये और पैदल गये।
३. उस समय कुछ भिक्षु खुले में चहल-कदमी कर रहे थे। कोशल-नरेश प्रसेनजित् उनके पास गया और बोला-- “भन्ते! इस समय तथागत भगवान् अर्हत सम्यक् समबुद्ध किस जगह विराजमान हैं? मैं उनके दर्शन करना चाहता हूँ।”
४. “महाराज! वे वहाँ है। द्वार बंद है। बिना घबराये आप धीरे से वहाँ चले जायें, बरामदे में प्रवेश करें, खांसे और दरवाजे की कुण्डी खटखटाये । तथागत तुम्हारे लिये दरवाजा खोल देंगे ।”
५. तब कोशल-नेरश प्रसेनजित् जैसा बताया गया था, उसी प्रकार वहाँ पहुंचा, खांसा और दरवाजे की कुण्डी खटखटाई । था ने दरवाजा खोल दिया ।
६. तब प्रसेनजित् ने तथागत की 'गन्ध-कुटी' में प्रवेश किया, तथागत के चरणों पर अपना सिर रखा, उन चरणों को चूमा और हाथ से स्पर्श किया और अपने आगमण की सूचना दी, "भगवान्! मैं कोशल-नरेश प्रसेनजित् हूँ ।
७. भगवान बुद्ध ने पूछा -- "लेकिन, महाराज! इस शरीर में ऐसी क्या विशेषता है कि आप इस शरीर के प्रति इतना भक्ति - भाव प्रदर्शित कर रहे हैं ?”