भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
चौथा भाग: समर्थक और प्रशंसक
१. धानंजानी ब्राह्मणी की श्रद्धा
१. तथागत के अनगिनत समर्थक और प्रशंसक थे । उनमें से एक धानंजानी थी ।
२. वह भारद्वाज ब्राह्मण की पत्नि थी । उसका पति तथागत से घुणा करता था । लेकिन धानंजानी भगवान् बुद्ध की भक्त थी । उसकी श्रद्धा उल्लेख करने योग्य है ।

३. एक बार भगवान् बुद्ध राजगृह के समीप वेळूवन विहार के कलन्दक- - निवास नामक स्थान पर ठहरे हुए थे ।
४. उसी समय भारद्वाज परिवार के एक ब्राह्मण की धानंजानी नामक पत्नि अपने पति के साथ राजगृह में रहती थी ।
५. पति तो तथागत का बड़ा ही विरोधी था, लेकिन धानंजानी बुद्ध धम्म और संघ के प्रति उतनी ही प्रसत्र थी । उसे त्रिरत्न की स्तुति करने मे आनन्द आता था । जब कभी वह इस प्रकार मुँह खोलकर प्रशंसा करने लगती, उसका पति कान बंद कर लेता ।
६. एक बार जब उसने बहुत से ब्राह्मणो को भोजन के लिये निमंत्रित किया था, उसने ब्राह्मणी से कहा कि वह और जो चाहे करे किन्तु बुद्ध की स्तुति सुनाकर वह उसके अतिथियों को अप्रसन्न न करे ।
७. धानंजानी ऐसा कोई वचन देने को तैयार न थी । उसने उसे धमकाया कि तलवार से केले को काट डालने की तरह वह उसके टुकडे टुकडे कर देगा । वह आत्म-बलिदान के लिये तैयार थी । इस प्रकार उसने अपनी वाणी की स्वतंत्रता की रक्षा की, और उसने भगवान् स्तुति में पांच सौ बुद्ध की गाथायें कह सुनाई ! ब्राह्मण ने बिना शर्त के पराजय स्वीकार की ।
८. भोजन पात्र तथा सुनहरी चम्मच रख दिये गये थे । अतिथि भोजन करने बैठे । अतिथियों को भोजन कराते समय ही उसकी बलवती भावना ने जोर मारा । वह वेळूवणाभिमुख हुई और उसने त्रि-रत्न की स्तुति की ।
९. अपमानित अतिथि उठ खड़े हुए। एक नास्तिका की उपस्थिति से सारा भोजन अपवित्र हो गया था । थू थू करते हुए वे वहाँ से विदा हुए । ब्राह्मण ने सारा 'भोज' चौपट कर देने के लिये ब्राह्मणों को बहुत गालियाँ दीं ।
१०. उसने फिर भारद्वाज ब्राह्मण को भोजन कराते समय त्रि - रत्न की स्तुति की 'बुद्ध को नमस्कार है, धम्म को नमस्कार है, संघ को नमस्कार है ।
११. उसके ऐसा कहने पर भारद्वाज ब्राह्मण बहुत कोधित हुआ और चिल्लाया चण्डालिनी कही की, हर समय उसी सिर- मुण्डे के गीत गाती रहती है । हे चण्डालिनी ! मैं तेरे गुरु को जाकर सबक सिखाता हूँ ।
१२. धानंजानी का उत्तर था "हे ब्राह्मण! सदेव, समार, स- ब्रह्म लोक में किसी श्रमण-ब्राह्मण, किसी देवता या किसी मनुष्य को भी नहीं पाती जो उस अर्हत संबुद्ध को इस प्रकार भला बुरा कह सके। लेकिन तुम उनके पास जाओं, तब तुम स्वयं देखोगे ।”
१३. तब खिझा हुआ और अप्रसत्र ब्राह्मण तथागत की खोज में निकला । वहाँ पहुँच कर, जहाँ तथागत ठहरे हुए थे, उसने शिष्टाचार की बातचीत की और तब एक ओर जा बैठा ।
१४. इस प्रकार बैठे हुए ब्राह्मण ने तथागत से प्रश्न पूछे -- "सुखपूर्वक रहने के लियें हमें किसकी हत्या करनी चाहिये ? और रोना न पडे, इसके लिये किसकी हिंसा करनी चाहिये ? गौतम ! वह क्या है जिसकी हत्या का तुम सब से अधिक समर्थन करते हो ?”
१५. तथागत ने उत्तर दिया:-- “सुखपूर्वक रहने के लिये क्रोध की हत्या करनी चाहिये । और रोना न पडे, इसके लिये हमें क्रोध की हिंसा करनी चाहिये हे ब्राह्मण! क्रोध की -- जिसका विषैला मूल है, जिसका उत्तेजनापूर्वक शिखर है और जिस में हत्यारा माधुर्य है । श्रेष्ठ जनों ने इसी प्रकार की हिंसा की प्रशंसा की है। यदि भविष्य में और रोना पीटना न हो, तो क्रोध की हिंसा कर डालनी चाहिये ।"
१६. भगवान् बुद्ध के प्रवचन के श्रेष्ठत्व को समझ भारद्वाज ब्राह्मण बोला- “भगवान अदभुत है । भगवान् अद्भुत है । जैसे कोई आदमी गिरी पडी वस्तु को स्थिर कर दे, अथवा प्रच्छन्न को प्रकट कर दे, अथवा मार्ग-भ्रष्ट को ठीक रास्ता दिखा दे, अथवा अन्धेरे में प्रदीप प्रज्वलित कर दे ताकि आँखवाले बाहर की चीजे देख ले इसी प्रकार भगवान् बुद्ध ने मुझे नाना प्रकार से अपना सद्धम्म प्रकट कर दिया है । भगवान्! मैं बुद्ध, धम्म तथा संघ की शरण ग्रहण करता हूँ? मैं गृहस्थी त्याग कर प्रव्रजित होना चाहता
१७. इस प्रकार धानंजानी न केवल स्वयं भगवान् बुद्ध की भक्त थी, किन्तु उसने औरों को भी भक्त बनाया ।
२. विशाखा की दृढ श्रद्धा
१. विशाखा अड्ग: जनपद के भद्दीय नगर में जन्मी थी ।
२. पिता का नाम धनंजय और माता को नाम सुमना था ।
३. एक बार सेल ब्राह्मणा के निमंत्रण पर बहुत से भिक्षुओं सहित तथागत ने भद्दीय की यात्रा की । सेल ब्राह्मण की पोती विशाखा की आयू उस समय सात वर्ष की थी।
४. यद्यपि विशाखा की आयु केवल सात वर्ष की ही थी तब भी उसने भगवान् बुद्ध के दर्शन करने की इच्छा प्रकट की। मेण्डक ने उसे आज्ञा दे दी कि वह तथागत के दर्शन कर आये। साथ के लिये उसने पांच सौ साथी पाँच सौ दास और पांच सौ रथ भी दिये ।
५. रथ को कुछ दूरी पर खड़ा करके वह पैदल तथागत के पास पहुंची ।
६. भगवान् बुद्ध ने उसे धम्म का उपदेश दिया और वह उन की गृहस्थ शिष्या (उपासिका) बन गई ।
७. इसके बाद पन्द्रह दिन तक मेण्डक भगवान् बुद्ध और उनके भिक्षु संघ को प्रतिदिन निमंत्रित करके भोजन कराता रहा ।
८. अन्त में जब प्रसेनजित् के कहने पर बिम्बिसार ने धनंजय को कोशल जनपद में रहने के लिये भेज दिया तो विशाखा भी अपने माता-पिता के साथ गई और साकेत में रहने लगी ।
९. श्रावस्ती का एक सेठ था । नाम था मिगार । वह अपने पुण्यवर्धन नामक पुत्र का विवाह करना चाहता था । उसने कुछ लोंगों को योग्य लडकी की खोज में भेज रखा था ।
१०. लडकी की खोज करने वाली मण्डली घूमते घूमते साकेत आ पहुंची । उन्होंने देखा कि किसी त्योहार के दिन विशाखा पर स्नान करने जा रही है ।
११. उसी समय जोर की वर्षा आई । विशाखा की सखियाँ भाग खड़ी हुई । लेकिन विशाखा नहीं भागी । वह अपनी समान गति से चलती हुई उस जगह जा पहुंची जहाँ मिगार के 'दूत' खडे थे ।
१२. उन्होंने उससे पूछा—‘तूने दौड़ कर अपने कपडे क्यो नहीं बचाये ?' उसने उत्तर दिया कि उसके पास कपड़ों की कमी नहीं है, किन्तु दौडने से फिसल कर गिर पड़ने और अंग भंग हो जाने तक का डर रहता है । 'अविवाहित लडकियां' वह बोली 'उस सामान की तरह से है जो बिक्री के लिये रखा है। उनकी शक्ल-सूरत ठीक रहनी चाहिये ।'
१३. जिन्हें उसके सौन्दर्य ने पहले ही प्रभावित कर दिया था वे उसकी बुद्धि से और भी प्रभावित हुए। दूतों ने उसे एक पुष्प गुच्छ भेंट किया, जो विवाह के प्रस्ताव का प्रतीक था - स्वीकृत हुआ ।
१४. विशाखा के घर लौटने पर दूत भी पीछे पीछे घर आये । उन्होंने पुष्पवर्धन से विवाह करने का प्रस्ताव विशाखा के पिता धनंजय के सम्मुख उपस्थित किया । प्रस्ताव स्वीकृत हुआ और पत्रों की अदला बदली द्वारा स्थिर हुआ ।
१५. जब राजा प्रसेनजित् ने सुना तो उसने साथ साकेत चलने के लिये कहा । यह असाधारण सम्मान की बात थी । धनंजय ने राजा, उसके राजधिकारियो, मिगार, पुण्यवर्धन तथा सब बारातियों का बडा ही आदर सत्कार किया । आतिथ्य में किसी तरह की कमी न होने दी ।
१६. वधु के लिये गहने बनाने को पांच सौ सुनार नियुक्त किये गये । धनंजय ने अपनी लडकी के दहेज मे धन से भरी पांच सौ गाडियाँ तथा सोने और पशुओं से भरी पांच सौ गाडियाँ दीं ।
१७. जब विशाखा के विदा होने का समय आया तो धनंजय ने उसे दस उपदेश दिये, जिन्हें मिगार ने भी साथ के कमरे में ही होने के कारण सुन लिया । ये दस उपदेश थे - (१) घर की आग बाहर नहीं जाने देना, (२) बाहर की आग घर में नहीं आने देना, (३) जो बदले मे दे उन्हें ही देना, (४) जो बदले में न दे उन्हें नहीं देना, (५) जो दे उसे देना, (६) जो नहीं दे उसे न देना, (७) प्रसत्रता पूर्वक बैठना, (८) प्रसत्रता पूर्वक खाना पीना, (९) आग को संभालना, तथा (१०) गृह देवताओं का सम्मान करना ।
१८. दूसरे दिन धनंजय ने आठ गृहस्थो को अपनी लडकी के गुण दोषों का विवेचन करने के लिये नियुक्त किया और उनका कर्तव्य था कि यदि विशाखा पर कोई आरोप लगाया जाय तो उसकी जाँच करे ।
१९. भिंगार चाहता था की उसकी पुत्र- वधु को श्रावस्ती की जनता देखे । लोग सडक के दोनों ओर खड़े थे और विशाखा ने रथ में खडे खडे श्रावस्ती में प्रवेश किया । जनता ने उस पर से तरह तरह की चीजें न्योछावर की, किन्तु वे सभी चीजें उसने लोगों में बाँट दीं ।
२०. भिंगार निगण्ठों का उपासक था । विशाखा के घर पर आने के बाद शीघ्र ही उसने उन्हें बुला भेजा । उनके आने पर मिँगार ने विशाखा को उनका स्वागत करने के लिये कहा । लेकिन उनकी नग्नता देखकर ही विशाखा उद्विग्न हो उठी । उसने उनके प्रति सम्मान प्रदर्शित करने से इनकार कर दिया ।
२१. निगण्ठो ने आग्रह किया कि विशाखा को वापिस भेज दिया जाय किन्तु भिंगार ने प्रतीक्षा करना उचित समझा ।
२२. एक दिन जब मिंगार खाना खा रहा था और विशाखा पास खडी पंखा झल रही थी, घर के बाहर एक भिक्षु खड़ा दिखाई दिया । विशाखा एक ओर हट गई कि मिंगार की नजर उस पर पड जाय । लेकिन मिंगार ने 'भिक्षु 'की ओर देखा तक नहीं । वह अपना खाना खाता रहा ।
२३. यह देख विशाखा ने भिक्षु से कहा--भन्ते आगे बड जाये, मेरा श्वसूर बासी भोजन खाता है । मिंगार को बहुत क्रोध आया । उसने उसे वापिस भेजना चाहा । किन्तु विशाखा के कहने पर मामला उन आठ 'पंचो के सामने उपस्थित किया गया ।
२४. विशाखा के विरुद्ध जितने भी आरोप लगाये गये थे, उन्होंने उन सब की जांच की । किन्तु विशाखा को निर्दोष पाया ।
२५. विशाखा ने तब आज्ञा दी कि उसे उसके पिता के घर भिजवाने की तैयारी की जाय । भिंगार और उसकी पत्नी ने क्षमा मांगी । विशाखा ने इस शर्त पर रहना स्वीकार किया कि मिंगार भगवान् बुद्ध और उनके भिक्षुओं को घर पर निमंत्रित करेगा ।
२६. यह उसने किया । किन्तु निगण्ठो के दबाव के कारण उसने तथागत को भोजन कराने का काम विशाखा को ही सौंपा, अपने पर्दे की ओट से तथागत का 'प्रवचन' सुनता रहा ।
२७. उस 'प्रवचन' का उस पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि वह उपासक हो गया ।
२८. वह विशाखा के प्रति अत्यन्त कृतज्ञ था । इसके बाद से वह उसको अपनी माता के समान समझने लगा और उसी प्रकार आदर सत्कार करने लगा । इसी लिये इसके बाद से विशाखा का नाम भिंगार माता पड़ गया ।
२९. विशाखा की ऐसी ही दृढ श्रद्धा थी ।