भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
पहला भाग उनके समर्थक
१. राजा बिम्बिसार का दान
१. राजा बिम्बिसार तथागत का एक सामान्य अनुयायी न था, वह भगवान् बुद्ध के प्रति अत्यन्त श्रद्धावान था और धम्म के कार्यो में बहुत सहायक था ।
२. गृहस्थ उपासक बन जाने पर बिम्बिसार ने कहा- “भगवान्! आप भिक्षु संघ सहित कल के भोजन के लिये मेरा निमंत्रण स्वीकार करें ।"

३. तथागत ने मौन रहकर स्वीकार किया ।
४. राजा बिम्बिसार ने जब जाना कि उसका निमंत्रण स्वीकृत हो गया, वह अपने स्थान से उठा और तथागत को अभिवादन किया तथा प्रदक्षिणा करके चला गया ।
५. रात बीत जाने पर बिम्बिसार ने बढ़िया से बढिया भोजन तैयार कराये और समय हो जाने पर तथागत को सूचना दी, "भगवान्!भोजन तैयार है"
६. पूर्वाह्न में तथागत ने चीवर पहन, अपना पात्र - चीवर ले पूर्व जटिल भिक्षुओं के साथ राजगृह में प्रवेश किया ।
७. तथागत राजा बिम्बिसार के महल में पहुंचे और भिक्षु संघ सहित बिछे आसन पर बैठे । राजा बिम्बिसार ने बुद्ध प्रमुख भिक्षु संघ को अपने हाथ से भोजन परोसा । भोजन कर चुकने के बाद तथागत ने जब अपने हाथ और पात्र धो लिये, तो बिम्बिसार उनके पास आ बैठा ।
८. उनके पास बैठकर राजा बिम्बिसार ने सोचा: "मैं तथागत के लिये निवास स्थान की व्यवस्था कहाँ करूँ ? जगह ऐसी होनी चाहिये जो गाँव से बहुत दूर भी न हो और ऐसी होनी चाहिये जो बहुत नजदीक भी न हो, जो लोग उनके पास आना-जाना चाहे, उनके लिये आना-जाना सुगम हो, जहाँ दिन में बहुत भीड न हो और रात में बहुत शोर न हो, जो एकान्त हो, जन समूह से प्रच्छन्न हो और शान्ति जीवन बिताने के लिये बहुत अच्छी हो ।
९. तब राजा बिम्बिसार को ध्यान आया: मेरा अपना वेळूवन उद्यान है, जो न नगर से बहुत दूर है और न नगर के बहुत समीप है, जो आने-जाने के लिये सुगम है। मैं क्यों न उसे बुद्ध- प्रमुख भिक्षु संघ को दान कर दू?"
१०. तब राजा ने एक जल भरी स्वर्ण झारी ली और भगवान् बुद्ध के हाथ पर जल डालते हुए कहा- "मैं यह वेळूवन उद्यान बुद्ध- प्रमुख भिक्षु को दान देता हूँ।” तथागत ने उद्यान स्वीकार कर लिया ।
११. तब तथागत ने राजा बिम्बिसार को अपने 'प्रवचन से उत्साहित किया, आनन्दित किया और आल्हादित किया तथा अपने स्थान से उठकर चले गए ।
१२. उसके बाद तथागत ने भिक्षुओं को सम्बोधित किया- “भिक्षुओं! मैं विहार को स्वीकार करने की अनुमति देता हूँ ।"
२. अनाथपिण्डिक का दान
१. उपासकत्व ग्रहण कर चुकने के अनन्तर अनाथपिण्डिक एक बार भगवान् बुद्ध के पास गया । अभिवादन कर चुकने के अनन्तर वह एक ओर बैठा और बोला :-
२. “भगवान्! आप जानते हैं कि मैं श्रावस्ती में रहता हूँ जो धन-धान्य से सम्पन्न है और जहाँ शान्ति विराजती है । वहाँ ह प्रसेनजित् का शासन हैं ।
३. “मैं वहाँ एक विहार की स्थापना करना चाहता हूँ । आप कृपया वहाँ पधारे और उस विहार का दान स्वीकार करें ।”
४. भगवान बुद्ध ने मौन रहकर स्वीकार किया ।
५. जब सेठ अनाथपिण्डिक घर लौटा तो उसने जेत राजकुमार का उद्यान देखा-- हराभरा और निर्मल जल के स्रोतों से युक्त । उसने सोचा-- “भगवान् बुद्ध के भिक्षु संघ के लिये यह स्थान सब से अधिक उपयुक्त होगा ।"
६. राजकुमार उद्यान बेचना नहीं चाहता था, इसलिये उसने कीमत बहुत अधिक बताई । पहले तो उसने इनकार ही किया, लेकिन आखिर में कहा- "लेना ही हो तो सारी जमीन पर कार्षापण (श्री, सोने का सिक्का) बिछाण दो ।"
७. अनाथपिण्डिक प्रसन्न हुआ, और कार्षापण बिछाने लगा । तब राजकुमार बोला- "रहने दो, मैं बेचना ही नहीं चाहता ।” लेकिन अनाथपिण्डिक का आग्रह था कि अब जब तुम एक बार उसकी किमत लगा चुके और मैं उतनी ही किमत देने के लिये तैयार हूँ तो तुम्हें जमीन देनी पडेगी । बात यहाँ तक बड़ी कि न्यायालय तक पहुची ।
८. इस बीच लोग इस असामान्य घटना की चर्चा करने लगे और राजकुमार को भी जब यह पता लगा कि अनाथपिण्डिक धनी तो था ही किन्तु वह बड़ा श्रद्धावान तथा धार्मिक था, उसने अनाथपिण्डिक से जमीन लेने का उद्देश्य पूछा । जब उसे पता लगा जमीन तथागत के लिये विहार बनवाने को ली जा रही है तो उसने भी उस पूण्य - कार्य में हिस्सेदार बनने की इच्छा प्रकट की । उसने जमीन की आधी ही कीमत स्वीकार की । बोला- 'जमीन तुम्हारी । पेड मेरे मैं अपनी ओर से वृक्षों का दान करता हूँ ।'
९. विहार का शिलान्यास हो चुकने पर वहाँ संघ के योग्य एक विशाल विहार बनवाया गया जो बहुत ही सुन्दर लगता था । १०. इस विहार का नाम पडा, 'अनाथपिण्डिक का जेतवनाराम' । संक्षिप्त रुप 'जेतवन विहार ही रह गया । अनाथपिण्डिक ने तथागत को कपिलवस्तु से श्रावस्तीं पधारने और विहार को स्वीकार करने का निमंत्रण दिया ।
११. जब तथागत जेतवन पधारे, अनाथपिण्डिक ने पुष्प वर्षा की और सुगन्धित धूप जलाई । उसने एक सोने की झारी से तथागत के हाथ पर पानी डालते हुए कहा: “मैं संसार भर के भिक्षुसंघ को यह विहार समर्पित करता हूँ ।”
१२. तथागत ने विहार स्वीकार किया और दानानुमोदन करते हुए कहा- "सभी अमंगलो का नाश हो । यह दान 'दाता' के साथ-साथ सारी मानवता की कल्याण- - वृद्धि का कारण बने । ”
१३. अनाथपिण्डिक बुद्ध के प्रधान शिष्यों में से एक था- दान दाताओ में प्रमुख ।
३. जीवक का दान
१. जब कभी तथागत राजगृह में होते, वैद्य जीवक दिन में दो बार तथागत के दर्शनार्थ जाता ।
२. जीवक को लगा कि राजा बिम्बिसार ने तथागत को जिस वेळूवन का दान किया है, वह बहुत दूर है ।
३. राजगृह में 'आम्रवन' नाम का उसका अपना एक बगीचा था, जो कि उसके अपने स्थान से नजदीक था ।
४. उसने सोचा कि वह एक अंग - सम्पूर्ण विहार बनवाये और विहार तथा बगीचा तथागत को समर्पित कर दे ।
५. अपने मन में यह विचार लेकर वह तथागत के पास पहुंचा और उनसे प्रार्थना की कि वह उसकी कामना पूरी होने दें ।
६. तथागत ने मौन रहकर स्वीकार किया ।