भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
५. पति - पत्नि के लिए जीवन- नियम
१. एक पति को अपनी पत्नी का सत्कार करना चाहिये, उसके प्रति आदर भाव प्रदर्शित करना चाहिये, पत्नि व्रत पालन करना चाहिये, उसे अधिकारी बनाना चाहिए, तथा उसे गहने आदि बनवाकर देने चाहीये। क्योंकि स्त्री उसे प्यार करती है, उसके सभी कार्य अच्छी तरह करती है, वह उसके तथा अपने मायके सभी सम्बन्धियों का आतिथ्य करती है, वह पति व्रता होती है, उसके लाये सामान की रक्षा करती है और अपने तमाम कर्तव्यों को बडी होशियारी तथा दक्षता से पूरा करती है ।

२. “एक कुल-पुत्र को अपने मित्रों तथा साथियों के साथ उदारता का व्यवहार करना चाहियें, शालीनता तथा उदाराशयता से पेश आना चाहिये । उसे उनके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिये जैसा वह अपने साथ करता है और उसे अपने वचन का पक्का होना चाहिये । क्योंकि उसके मित्र और उसके परिचित उसे प्यार करते है, उसकी अरक्षित स्थिति में वह उसकी रक्षा करते है और ऐसे समय में उसकी सम्पत्ति की रक्षा करते है । खतरे के समय वे उसके शरण-स्थान होते है । मुसीबत पड़ने पर वे साथ नहीं छोड़ते । वे उसके परिवार का ख्याल रखते है ।
६. मालिक और नौकर के लिये जीवन-नियम
१. “एक मालिक को चाहिये कि वह अपने नौकरों तथा कामगारों को उनकी सामर्थ्य के अनुसार काम दे, उन्हें भोजन तथा मजदूरी दे, बीमारी में उनकी देख-भाल करे, असाधारण स्वादिष्ट चीजे बाँट कर खाए और समय समय पर उन्हें छुट्टी भी दे । क्योंकि नौकर और कामगार अपने मालिक से प्रेम करते है, वे उससे पहले सोकर उठते है, उसके सो जाने पर सोने जाते है, जो कुछ मिलता है उसीसे संतुष्ट रहते है । वे अपना काम अच्छी तरह से करते है और सर्वत्र उसका यश फैलाते है ।
२. “एक कुल-पुत्र को चाहिये कि वह अपने गुरुओं की मन-वचन तथा कर्म से प्रेमपूर्वक सेवा करे, उनके लिये सदैव अपने घर के द्वार खुले रखे तथा उनकी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करे । क्योंकि गुरुजन उसे बुराई से बचाते है, उसे भलाई करने की प्रेरणा करते है, वे उससे मैत्री रखते है, जो उसने अभी तक नहीं सुना वह उसे सुनाते है तथा जो सुना है उसे ठीक और निर्दोष बनाते है ।"
७. कुमारियों के लिये जीवन नियम
१. एक बार भगवान् बुद्ध भद्दिय के पास जातीय वन में ठहरे थे । मेण्डक का पौत्र उग्गह वहाँ आया और अभिवादन करके एक ओर बैठ गया । उस प्रकार बैठे हुए उग्गह ने तथागत से निवेदन किया:-
२. “भगवान्! अन्य तीन भिक्षुओं के साथ कल के लिये मेरा भोजन का निमंत्रण स्वीकार करें ।"
३. तथागत ने अपने मौन से स्वीकार किया ।
४. जब उग्गह ने देखा कि तथागत ने उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया, वह अपने स्थान से उठा, अभिवादन किया और तथागत की प्रदक्षिणा करके चला गया ।
५. रात के बीत जाने पर, दूसरे दिन तथागत ने पूर्वाह्न के समय चीवर धारण किया और पात्र तथा (दूसरा) चीवर ले, जहाँ उग्गह का घर था वहाँ गये और बिछे आसनपर बैठे । उग्गह में तथागत को अपने हाथ से नाना प्रकार के भोजनों से संतर्पित किया ।
६. जब तथागत भोजन समाप्त कर चुके, तो वह एक ओर बैठ गया । इस प्रकार बैठे हुए उसने कहा:-
७. “भगवान्! मेरी ये लडकियाँ अपने अपने पति के घर चली जायेंगी । भगवान्! आप उन्हें परामर्श दें, आप उन्हे उपदेश दे, जो चिरकाल तक उनके हित तथा सुख का कारण हो ।”
८. तब भगवान् ने उन लड़कियों को उपदेश दिया--"लडकियों! इस प्रकार का अभ्यास डालों कि हमारा हित और भलाई चाहने वाले हमारे अनुकम्पक माता-पिता जिस किसी पति को भी हमें सौंप देंगे, हम उससे पहले सोकर उठने वाली होंगी और उससे पीछे सोने वाली होंगी । हम काम करने वाली होंगी और सभी चीजों को व्यवस्थित रखने वाली तथा मधुर भाषिणी होंगी । लडकियों! तुम्हें ऐसा अभ्यास डालना चाहिये ।
९. “लडकियों! और यह भी अभ्यास डालना चाहिये कि हमारे पति के माता- -पिता, सगे सम्बन्धी तथा साधुगण -- जो कोई भी घर आयें, उनका आदर करने वाली होंगी, उनका स्वागत करने वाली होंगी, उनके आने पर उन्हें आसन और जल देने वाली होंगी ।
१०. “लडकियों! और यह भी अभ्यास डालना चाहिये कि हमारे पति का जो भी काम होगा चाहे ऊन का हो और चाहे राई को हो- हम उसमे दक्ष और होशियार होंगी। हम उस काम की समझ हासिल करेंगी जिससे हम उसे स्वंय कर सकें, करा सकें ।
११. लडकियों! और यह भी अभ्यास डालना चाहियें कि घर के जितने नौकर-चाकर होंगे हम उन सबके काम की देख-भाल रखेंगी कि किसने क्या और कितना काम किया है और क्या और कितना काम नहीं किया है? हम रोगियों का बलाबल जानेगी, और जिसको जैसा भोजन देना चाहिये वैसा भोजन देंगी ।
१२. “लडकियों! और यह भी अभ्यास डालना चाहिये कि जो रुपया जो धान, जो सोना तथा चाँदी पति घर लायेंगे, हम उसे सुरक्षित रखेंगी, उसकी हिफाजत करेंगी ताकि कोई चोर, कोई उचक्का, कोई डाकू उसे न ले जा सके ।
१३. यह उपदेश सुनने को मिला तो उग्गह की लडकियाँ बहुत प्रसन्न हुई । वे तथागत की बडी कृतज्ञ थीं ।
८. उपसंहार
१. तथागत के इस प्रकार कहने पर तरुण गृहपति श्रुणाल बोला --“भगवान् अद्भुत है! जैसे कोई उखडे को जमा दे, अथवा ढके को उघाड़ दे, अथवा किसी पथ भ्रष्ट को रास्ता दिखा दे, अथवा अन्धेरे में रास्ता दिखा दे कि आंख वाले रास्ता देख लेंगे । इसी प्रकार तथागत ने नाना तरह से सत्य का प्रकाश कर दिया है ।”
२. "और मैं भी, बुद्ध, धम्म तथा संघ की शरण जाता हूँ । कृपया भगवान् आप मुझे प्राण रहने तक अपना शरणागत उपासक स्वीकार करें ।"