प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
ये उदाहरण कुछ ऐसे हैं, जो एक विशिष्ट ब्राह्मण और एक विशिष्ट क्षत्रिय के बीच व्यक्तिगत संघर्ष के हैं। आगे अब जो उदाहरण दिए जा रहे हैं, वे एक ओर ब्राह्मणों और दूसरी ओर क्षत्रियों के बीच वर्ग या जातिगत संघर्ष से संबंधित है। ये केवल संघर्ष ही नहीं थे, और न इन्हें जातीय संघर्ष जैसा कहना ही ठीक है। ये संघर्ष वर्ग संघर्ष थे, जो एक वर्ग ने दूसरे वर्ग की जड़ें खोदने के लिए किए थे। महाभारत में ऐसे दो वर्ग संघर्षों का वर्णन है। पहला संघर्ष हैह्य क्षत्रियों और भार्गव ब्राह्मणों के बीच का है। यह संघर्ष हैह्य राजा कृतवीर्य के समय में हुआ । महाभारत के आदि पर्व में इसका वर्णन इस प्रकार है:
एक राजा था, जिसका नाम कृतवीर्य था।¹ इस राजा का पुरोहित भृगु था, जो वेदों में पारंगत था। राजा की कृपा से उसके राजपुरोहित के पास प्रचुर धन-धान्य हो गया । जब वह दिवंगत हो गया तो उसके वंशजों को धन की आवश्यकता पड़ी। वे धन मांगने भृगुओं के पास गए, जिनकी संपन्नता से वे अवगत थे। कुछ भृगुओं ने अपनी संपत्ति जमीन में गाड़ रखी थी। क्षत्रियों के डर के कारण ब्राह्मणों को दान दे दी थी। एक बार ऐसा हुआ कि जब कोई क्षत्रिय जमीन खोद रहा था, तो उसे एक भृगु के घर में गड़ा धन प्राप्त हुआ। उस क्षत्रिय ने दूसरे क्षत्रियों को एकत्र किया और उन सबने उस कोष को देखा। इस पर वे उत्तेजित हो गए, और उन्होंने सभी भृगुओं का वध कर दिया, जिनको वे तिरस्कार की दृष्टि से देखते थे। क्षत्रियों ने ब्राह्मणों के गर्भस्थ शिशुओं का भी वध कर दिया। विधवाएं हिमालय पर्वत की ओर भाग गईं। उनमें से एक ने अपने अजन्मे शिशु को अपनी जंघा में छिपा लिया। एक ब्राह्मण ने जब क्षत्रियों को इसकी सूचना दी तो वे उसे मारने पहुंच गए, किंतु वह अपनी माता की जंघा से बाहर निकल आया और अपनी दीप्ति से आक्रमणकारियों को अंधा बना दिया। कुछ काल तक पहाड़ों में भटकने के बाद उन्होंने उस बालक की माता से विनयपूर्वक अपनी दृष्टि लौटाने का अनुरोध किया। किंतु उसने कहा कि वे उसके विलक्षण शिशु और्व के पास जाएं, जिसमें सभी वेदों और छहों वेदांग समाहित हैं, क्योंकि उसी ने अपने संबंधियों के वध के प्रतिकार स्वरूप उनको निर्वस्त्र किया और उनकी दृष्टि छीनी है और वही उनकी दृष्टि उन्हें लौटा सकता है। तद्नुसार वे उसके पास गए और उनकी दृष्टि उन्हें वापस मिल गई। और्व ने सारी सृष्टि के विनाश के लिए तपस्या की, क्योंकि वह भृगुओं के विनाश का प्रतिशोध लेना चाहता था। इसलिए वह तपस्या करने लगा। इस पर देवताओं, असुरों, मानवों में खलबली मच गई। तब उसके पितृगण प्रकट हुए और उन्होंने उससे कहा कि वह अपना संकल्प त्याग दें, क्योंकि वे क्षत्रियों से कोई प्रतिशोध नहीं लेना चाहते हैं। इसका कारण भृगुओं की निर्बलता भी नहीं है कि वे क्षत्रियों के द्वारा किए गए हत्याकांड को भूल जाएं। उन्होंने कहा कि जब हम अपनी वृद्धावस्था से ऊब चुके थे तो हम स्वयं यह
1. म्यूर, खंड 1, पृ. 448-49
चाहते थे कि क्षत्रिय हमारी हत्या कर दें। किसी भृगु के घर में जो धन छिपा था, वह भी घृणा उत्पन्न करने के लिए जान-बूझकर छिपाया गया था, ताकि क्षत्रिय भड़क उठें। हम सब स्वर्ग में आना चाहते थे। हमें धन से कोई लेना-देना नहीं था। उसके पितरों ने कहा कि उन्होंने यह उपाय सोचा, क्योंकि वे आत्महत्या का पाप नहीं करना चाहते थे। और अंत में उन्होंने और्व से कहा कि वह अपना क्रोध त्याग दे और उस पाप का भागी न बने जो वह सोच रहा है। उन्होंने कहा- हे पुत्र ! क्षत्रियों का विनाश न कर, और न ही सातों लोकों को नष्ट कर। अपने क्रोध का दमन कर जो तेरी तपस्या को निष्फल कर देगा। किंतु और्व ने उत्तर दिया कि वह अपने वचन को व्यर्थ नहीं जाने देगा। जब तक उसका क्रोध किसी का विनाश नहीं करेगा तो वह स्वयं ही अपने क्रोध की चपेट में आ जाएगा और उसने न्याय, औचित्य तथा कर्तव्य की साक्षी देकर अपने पितरों की दयाशीलता का प्रतिवाद किया। किंतु उसके पितरों ने उसे समझा लिया और कहा कि वह अपने क्रोध की अग्नि को समुद्र में छोड़ दे, जहां वह जल में जंतुओं का विनाश कर देगी और इस प्रकार उसके वचन की पूर्ति भी हो जाएगी । '
दूसरा वर्ग युद्ध, और जो विनाशकारी भी था, भार्गव ब्राह्मणों ने हैह्य क्षत्रियों के विरुद्ध छेड़ा था। इसमें भार्गव ब्राह्मणों के नेता परशुराम थे। परशुराम के जन्म की कथा विष्णु पुराण में इस प्रकार आती है:
‘गाधि की पुत्री सत्यवती का विवाह ऋचीक नाम के एक वृद्ध ब्राह्मण से हुआ, जो भृगु वंश का था।¹ इसका उद्देश्य यह था कि उससे जो पुत्र उत्पन्न हो, उसमें ब्राह्मण के गुण विद्यमान हों। ऋचीक ने अपनी स्त्री के लिए चावल, जौ, दाल, घी और दूध से युक्त चारू नामक भोजन तैयार कराया। इसी प्रकार का पदार्थ उसने अपनी पत्नी की माता के लिए भी तैयार कराया। उनका विचार था कि वह भी एक ऐसा पुत्र उत्पन्न करें, जिसमें योद्धा के गुण विद्यमान हों। किंतु सत्यवती की मां ने अपनी पुत्री को समझा-बुझा कर उसका भोजन अपने भोजन के साथ बदल दिया। जब उसके पति घर लौटे तो अपनी पत्नी से यह जानकर बहुत कुपित हुए । '
मैं उसके कथन को मूल रूप से नीचे उद्धृत कर रहा हूं:
'हे पापी स्त्री, तूने यह क्या कर दिया। मुझे तेरा शरीर भयानक प्रतीत होता है। अवश्य ही तूने अपनी माता के लिए तैयार किए चारू भोजन को खाया है। यह ठीक नहीं हुआ। मैंने उसमें वीरों के सभी गुण, संपूर्ण पराक्रम, शूरता और बल की संपत्ति का आरोपण किया था। तुम्हारे भोजन में शांति, ज्ञान, तितिक्षा आदि संपूर्ण ब्राह्मणोचित गुणों का समावेश किया था। उनका विपरीत उपयोग करने से तेरे जो पुत्र होगा, वह अति भयानक, युद्धप्रिय और
1. म्यूर, खंड 1, पृ. 349 350
हत्या-कर्म में प्रवृत्त क्षत्रियों जैसा आचरण करने वाला होगा और तुम्हारी माता के शांतिप्रिय और ब्राह्मणों का आचरण करने वाला पुत्र होगा। यह सुनते ही सत्यवती ने अपने पति के चरण पकड़ लिए और कहा - भगवन्, मैंने अज्ञान से ही ऐसा किया है। मुझ पर दया कीजिए और ऐसा कीजिए कि मेरा पुत्र ऐसा नहीं हो, जैसा कि आपने वर्णन किया है। भले ही वैसे गुण वाला पौत्र हो जाए। इस पर मुनि ने कहा ऐसा ही होगा।
'तदन्तर उसने जमदग्नि को जन्म दिया और उसकी माता ने विश्वामित्र को उत्पन्न किया। सत्यवती कौशिकी नाम की नदी हो गई। जमदग्नि ने इक्ष्वाकु वंश की रेणु की कन्या रेणुका से विवाह किया। उससे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम परशुराम था। '
महाभारत के वन पर्व में परशुराम के परिवार का और भी ब्यौरा मिलता है, जो निम्नलिखित है:
'जमदग्नि और सत्यवती के पांच पुत्र थे।¹ उनमें सबसे छोटा पुत्र परशुराम था, जो उग्र स्वभाव का था। उसने अपने पिता की आज्ञा से अपनी माता का वध कर दिया था, जो कुवासना में ग्रस्त होने के कारण पवित्र नहीं रह गई थी। उसके चार भाइयों ने अपनी मां का वध करना अस्वीकार कर दिया था और इस कारण अपने पिता के शाप के कारण उनका तेज नष्ट हो गया था। किंतु परशुराम के आग्रह पर उसके पिता ने उनकी माता को पुनः जीवित कर दिया और उसके भाइयों को उनकी शक्ति लौटा दी थी। परशुराम मातृहत्या के पाप से मुक्त हो जाता है और अपने पिता से चिरायु होने का वरदान प्राप्त करता है। '
दूसरा जाति-युद्ध राजा कृतवीर्य के पुत्र हैहय वंशीय राजा अर्जुन के शासन काल में हुआ था। इस संघर्ष का आरंभ ब्राह्मणों से हुआ, जो अपने कुछ विशेषाधिकारों और शक्तियों पर बल दे रहे थे और अर्जुन तिरस्कारयुक्त शब्दों द्वारा उनकी भर्त्सना कर रहा था। महाभारत के अनुशासन पर्व में इसका वर्णन इस प्रकार हुआ है:
'तब सूर्य के समान चमकते हुए तेजस्व रथ पर चढ़कर अपने पराक्रम के नशे में उन्मत्त होकर वह बोला वीरता, साहस, ख्याति, शूरता, शक्ति और बल की दृष्टि से कौन मेरी बराबरी कर सकता है?² जब वह अपनी बात कह चुका तब उसे संबोधित करते हुए आकाशवाणी हुई, हे मूर्ख, क्या तू नहीं जानता कि ब्राह्मण क्षत्रिय से उत्तम होता है। क्षत्रिय अपनी प्रजा पर जो शासन करता है, वह ब्राह्मण की सहायता से करता है। अर्जुन ने उत्तर दिया, यदि मैं चाहूं तो सृष्टि कर सकता हूं और यदि मैं क्रुद्ध हो जाऊं तो सभी जीवों का विनाश कर दूं। कोई ब्राह्मण कार्य, विचार या शब्द में मुझसे श्रेष्ठ नहीं है। पहला सिद्धांत यह है कि ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं और दूसरा यह कि क्षत्रिय श्रेष्ठ
1. म्यूर, खंड 1, पृ. 450
2. म्यूर, खंड 1, पृ. 454
हैं। तुमने इन दोनों के बारे में बताया, लेकिन इन दोनों में अंतर है। ब्राह्मण क्षत्रियों पर निर्भर होते हैं और क्षत्रिय ब्राह्मणों पर निर्भर नहीं होते। ब्राह्मण क्षत्रियों पर अत्याचार करते हैं और इसके लिए वेदों का सहारा लेते हैं। प्रजा की रक्षा, अर्थात् न्याय क्षत्रिय का धर्म है। ब्राह्मणों को उनसे जीविका प्राप्त होती है, तब ब्राह्मण क्षत्रियों से श्रेष्ठ क्यों कर हो सकते हैं? मैं आज से उन सभी ब्राह्मणों को अपने अधीन रखूंगा जो भिक्षा पर निर्भर करते हैं और जो अपने को श्रेष्ठ समझते हैं। चूंकि गायत्री ने आकाश में सत्य कहा है। अतः मैं उन अनुशासनहीन ब्राह्मणों को अपने वश में करूंगा, जो मृग की खाल पहनते हैं। उन तीनों लोकों में कोई भी, चाहे वह कोई देव हो या मानव, मुझे राजसिंहासन से च्युत नहीं कर सकता, जिसके कारण मैं प्रत्येक ब्राह्मण से श्रेष्ठ हूं।'
‘यह सुनकर वायु देवता प्रकट हुए और अर्जुन से बोले: 'तुम इस दूषित भावना को त्याग दो और ब्राह्मणों का आदर करो।¹ यदि तुम अपना अहित करोगे तो तुम्हारे राज्य में विप्लव मच जाएगा। वे तुम्हें पराजित कर देंगे, वे तुम्हें अपने अधीन कर लेंगे। वे तुम्हें तुम्हारे राज्य से निष्कासित कर देंगे । कृतवीर्य ने पूछा: आप कौन हैं? वायु ने उत्तर दिया: ‘मैं देवताओं का दूत वायु हूं। मैं तुम्हें तुम्हारे हित की बात बता रहा हूं।' कृतवीर्य ने कहा: 'हे वायुदेव, ऐसी बात बता रहे हो यह कहकर आपने ब्राह्मणों के प्रति भक्ति और अनुराग का परिचय दिया है। यह बताइए कि क्या ब्राह्मण पृथ्वी पर उत्पन्न किसी भी जीव के समान है? या यह बताइए कि यह परम श्रेष्ठ ब्राह्मण क्या वायु जैसा है ? अग्नि जल के समान है, या सूर्य, या आकाश जैसा है ?
इसके पश्चात् वायु ने अनेक उदाहरण दिए, जिनमें ब्राह्मणों की श्रेष्ठता बताई गई थी। इस पर अर्जुन ने ब्राह्मणों के प्रति अपना बैर भाव त्याग दिया और वह उनका मित्र बन गया। अनुशासन पर्व में उसने कहा:-
‘मैं सदा ब्राह्मणों के हित में उनके साथ में रहता हूं।² मैं ब्राह्मणों के लिए समर्पित हूं। और सदा उनकी इच्छाओं के अनुरूप कार्य करता हूं। और यह दत्तात्रेय (एक ब्राह्मण) की ही अनुकंपा है कि मुझे यह शक्ति और ख्याति प्राप्त हुई है और मैं धर्म-परायण हूं।'
दूसरे चरण में परशुराम का उल्लेख है, जिन्होंने क्षत्रियों का संहार किया था। शांति पर्व में इस प्रकरण का वर्णन इस प्रकार है:
'अर्जुन एक विनम्र और धर्मपरायण और दयालु स्वभाव का राजा था। इसलिए उसने किसी को कष्ट देने की बात कभी नहीं सोची।³ परंतु उसके पुत्र हठधर्मी और अत्याचारी थे, इस कारण वे उसकी मृत्यु का कारण बन गए। वे अपने पिता को बताए
1. म्यूर, खंड 1, पृ. 454
2. म्यूर, खंड 1, पृ. 473
3. वही, पृ. 454-455
बिना जमदग्नि का बछड़ा ले आए। इसके परिणामस्वरूप परशुराम ने अर्जुन पर आक्रमण किया और उसकी भुजाएं काट दीं। उसके पुत्र ने जमदग्नि का वध कर दिया। अपने पिता का वध किए जाने पर परशुराम उत्तेजित हो उठे और यह प्रतिज्ञा की कि मैं पृथ्वी से क्षत्रियों का विनाश कर दूंगा । उसने अपने शस्त्र उठाए और अर्जुन के सभी पुत्र-पौत्रों तथा हैह्य वंश के हजारों क्षत्रियों का विनाश कर दिया और पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर दिया। इस तरह जब वे क्षत्रियों का विनाश कर चुके, तब उनके मन में करुणा उत्पन्न हुई और वे वन चले गए। कई हजार वर्षों के बीत जाने के बाद इस वीर का, जो स्वभावतः क्रोधी था, रैभ्य के पुत्र और विश्वामित्र के पौत्र ने भरी सभा में इन शब्दों द्वारा उपहास उड़ाया - 'क्या ये प्रतर्दन तथा अन्य व्यक्ति वीर नहीं हैं, जो ययाति के नगर के यज्ञ में उपस्थित हुए हैं? क्या ये क्षत्रिय नहीं हैं? आप अपने संकल्प को पूर्ण करने में असफल रहे और इस सभा में व्यर्थ ही गर्व करते हैं। आप क्षत्रियों के डर के कारण पर्वत पर चले गए, जबकि पृथ्वी पर क्षत्रियों के सैकड़ों वंशज शासन करते आ रहे हैं।' यह शब्द सुनकर परशुराम ने अपने हथियार उठाए । जो सैकड़ों क्षत्रिय बच गए थे, वे अब शक्तिशाली राजा बन गए थे। परशुराम ने इन सभी का उनकी संतति सहित वध किया और अनगिनत शिशु, जो गर्भस्थ थे, उनको भी मार डाला। फिर भी कुछ शिशुओं को उनकी माताओं ने बचा लिया । '