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प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 62 of 71
01 जून 2023
Book
5,7,1,2,3,,

    एक अन्य प्रकरण जिसमें ये एक-दूसरे के विरोधी दिखाए गए हैं, अयोध्या के राजा अम्बरीष से संबंधित है। कथा इस प्रकार है : ¹

    अम्बरीष एक यज्ञ करा रहा था तो इंद्र बलि पात्र को उठा ले गया । पुरोहित ने कहा कि यह एक अमंगल है जो प्रगट करता है कि राजा का शासन कुशासन- ग्रस्त है और इसके लिए बहुत बड़े प्रायश्चित की जरूरत है, और वह प्रायश्चित है, मानव की बलि । काफी तलाश के बाद राजर्षि अम्बरीष एक ब्रह्मर्षि ऋचीक के पास गए, जो भृगु के वंशज थे। अम्बरीष ने ऋचीक से कहा कि वह बलि के लिए अपना एक पुत्र बेच दे, जिसके लिए उन्हें एक लाख गाएं दी जाएंगी। ऋचीक ने उत्तर दिया कि वह अपने ज्येष्ठ पुत्र को नहीं बेचेंगे, उनकी पत्नी ने कहा कि वह छोटे बेटे को नहीं बेचेगी। उसने कहा कि बड़े पुत्र पर सामान्यतः पिता का दुलार होता है और छोटे पर माता का । तब मझले पुत्र शुनःशेष ने कहा कि इस प्रकार तो उसी को बेचा जाना है और राजा से कहा कि वह उसे ले चलें। एक लाख गाय, एक करोड़ स्वर्ण मुद्राएं, ढेर सारे आभूषण शुनःशेप के बदले में दिए गए। जब वे पुष्कर होकर जा रहे थे, तो अपने मामा विश्वामित्र से मिले जो अन्य ऋषियों के साथ वहां यज्ञ कर रहे थे। शुनःशेप उनकी गोदी में गिर पड़ा और उसने अपने मामा से अपनी विवशता का वर्णन करते हुए दया की भीख मांगी।

Brahman vs Kshatriya dr Bhimrao Ramji Ambedkar

    'विश्वामित्र ने उसे सांत्वना दी और अपने पुत्रों पर इस बात के लिए दबाव डाला कि उनमें से कोई एक शुनःशेप के स्थान पर बलि चढ़ जाए। इस प्रस्ताव पर मधुसयंद और राजर्षि के दूसरे पुत्र सहमत न हुए। उन्होंने दृढ़तापूर्वक कहा कि आप यह कैसे कह सकते हैं कि आपका अपना पुत्र बलि चढ़ जाए और उसके स्थान पर किसी अन्य को बचा लिया जाए? हम इसे ठीक नहीं समझते। यह इसी प्रकार हुआ जैसे कि कोई अपना ही मांस खाए। राजर्षि को इस पर बड़ा क्रोध आया और उन्होंने अपने पुत्रों को शाप दिया कि वे अत्यंत नीच जातियों में पैदा हों, जैसे वशिष्ठ के पुत्र उत्पन्न हुए हैं और वे हजारों वर्षों तक कुत्ते का मांस खाएं। तब उन्होंने शुनःशेप से कहा कि जब तुम रस्सियों से बंध जाओ, तुम्हारे गले में लाल डोरी पड़ी हो, जब तुम्हें सुगंधित लेप चढ़ाए जाएं और जब विष्णु के बलि स्तंभ के निकट ले जाया जाए, तब तुम अग्नि से प्रार्थना करना और अम्बरीष के यज्ञ में इन दो श्लोकों को पढ़ना। तुमको सफलता मिलेगी।


1. म्यूर, खंड 1, पृ. 405-407


    'जब शुनःशेप को ये दो श्लोक प्राप्त हो गए, तब वह तुरंत अम्बरीष के पास गया और उससे तुरंत यज्ञ स्थल के लिए चलने का आग्रह किया। जब उसे यज्ञ के खंभे से बांधा गया और उसे लाल वस्त्र पहनाए गए तो उसने इंद्र और उसके अनुज विष्णु की स्तुतियों में वे श्लोक पढ़े। सहस्राक्ष इंद्र इन गुप्त श्लोकों से प्रसन्न हुआ और उसने शुनःशेप को चिरंजीवी रहने का वरदान दिया। '

    अंतिम प्रकरण, जिसमें इन दोनों की प्रतिद्वंद्विता का संकेत मिलता है, वह राजा कल्माषपाद से संबंधित हैं। इसका वर्णन महाभारत के आदि पर्व में इस प्रकार किया गया है:

    'कल्माषपाद इक्ष्वाकु वंश का राजा था। विश्वामित्र उसके राजपुरोहित बनना चाहते थे, लेकिन राजा वशिष्ठ को चाहता था। एक बार जब राजा मृगया पर गया और उसने बहुत से पशु-पक्षियों का शिकार कर लिया, तब वह बहुत थक गया। उसे भूख और प्यास लग आई। उसने वशिष्ठ के सौ पुत्रों में से ज्येष्ठ पुत्र शक्ति को रास्ते से हट जाने को कहा। ऋषि ने विनम्रतापूर्वक कहा, 'वह रास्ता मेरा है। हे राजन, सभी लोग कहते हैं कि राजा को चाहिए कि वह ब्राह्मण के लिए रास्ता खाली कर दे। यह अनादि नियम है।' दोनों में से कोई पक्ष दूसरे को रास्ता देने को तैयार नहीं था। विवाद बढ़ता गया। तब राजा ने मुनि पर अंकुश चला दिया। मुनि ने जैसा कि अन्य मुनि क्रुद्ध होने पर कहते हैं, राजा को नरभक्षी हो जाने का शाप दे डाला। उस समय कल्माषपाद के पौरोहित्य पद को लेकर विश्वामित्र और वशिष्ठ के बीच शत्रुता चल रही थी । विश्वामित्र राजा के पीछे-पीछे चल रहे थे। जब राजा शक्ति के साथ विवाद में उलझा हुआ था तब वह उसके पास गया। जब उसने अपने प्रतिद्वंद्वी के पुत्र को देखा तो वह छिप गया और मौके की तलाश में उनके पास से निकल गया। राजा शक्ति की अनुनय-विनय करने लगा, लेकिन विश्वामित्र उनमें समझौता नहीं होने देना चाहता था। अतः उसने एक राक्षस को आदेश दिया कि वह राजा के शरीर में प्रवेश कर ले। ब्रह्मर्षि के पाप और विश्वामित्र का आदेश दोनों के प्रभाव से राक्षस ने आदेश का पालन किया । विश्वामित्र ने देखा कि उसका उद्देश्य पूरा हो गया, तब वहां से चल दिया। रास्ते में राजा को एक भूखा ब्राह्मण मिला। उसने अपने रसोइए के हाथों (जो कुछ अन्य वस्तुएं नहीं ला सकता था ) खाने के लिए नरमांस भेजा। उसने उसे वैसा ही शाप दिया, जैसा शक्ति ने दिया था। अब तो शाप द्विगुणित हो गया। राजा के खा लेने के कारण शक्ति उसका पहला शिकार बना । विश्वामित्र की प्रेरणा से वशिष्ठ के अन्य पुत्रों को भी यही भोगना था। विश्वामित्र ने शक्ति को मरा हुआ देखकर राक्षस को वशिष्ठ के अन्य पुत्रों की ओर भी प्रेरित किया। इस प्रकार उस भयंकर राक्षस ने उन पुत्रों का भी भक्षण कर लिया, जो शक्ति से छोटे थे, जैसे कोई सिंह वन में छोटे-छोटे पशुओं का भक्षण कर लेते हैं। विश्वामित्र द्वारा अपने पुत्रों के किए गए विनाश को सुनकर वशिष्ठ ने धैर्य बनाए रखा, जैसे विशाल पर्वत को पृथ्वी धारण कर रखे हो। उन्होंने अपने ही नाश का ध्यान किया, लेकिन कौशिकों को विनष्ट करने की कल्पना नहीं की। उस ब्रह्मर्षि ने मेरू की चोटी से छलांग लगा ली। लेकिन वह चट्टान पर ऐसे गिरे, जैसे कोई रुई के ढेर पर गिरता है। उन्होंने जब यह देखा कि मैं मरने से बच गया हूं, तब वह जंगल में जल रही विशाल अग्नि में प्रवेश कर गए। यह आग भयंकर रूप से जल रही थी, लेकिन यह भी उन्हें नहीं जला सकी और पूरी तरह से ठंडी पड़ गई। तब वे अपने गले में चट्टान को बांधकर समुद्र में कूद पड़े, लेकिन वहां तरंगों ने उन्हें सूखे तट पर लाकर फेंक दिया। वह तब अपनी कुटिया में चले आए। वहां उन्होंने उसे सूनी और निर्जन पाया। तब पुनः दुःख से भर गए और बाहर निकल आए। उन्होंने देखा कि वर्षा होने से विपाशा में बाढ़ आ गई है और वह अपने तट पर बहुत से पेड़ों को उखाड़ती बह रही है। उन्होंने उसमें डूबने की सोची और अपने हाथ-पैरों को बांध उसमें डुबकी लगा ली। लेकिन नदी ने उनके सारे बंधन तोड़ दिए और सूखे तट पर ला दिया। इस नदी का नाम उन्हीं का दिया हुआ है। उन्होंने इसके बाद शतद्रु (सतलुज ) नदी को देखा और उन्होंने उसमें छलांग लगा ली। नदी में घड़ियाल आदि थे। यह ब्रह्मर्षि को, जो अग्नि के समान दीप्तमान थे, देखकर सैकड़ों दिशाओं में बहने लगी, जिससे इसका यह नाम पड़ा है। इसके परिणामस्वरूप यह पुनः सूखे तट पर आ गए। उन्होंने जब यह देखा कि वह अपने को नहीं मार सकते, तब वह पुनः अपने आश्रम को लौट गए। '

    'इन दोनों में एक-दूसरे के प्रति व्यापक शत्रुता के ये कुछ विशेष उदाहरण हैं। यह शत्रुता बड़ी भीषण थी। यहां तक कि विश्वामित्र वशिष्ठ की हत्या तक के लिए तैयार थे। इसका वर्णन महाभारत के शल्य पर्व में मिलता है। महाभारतकार लिखता है:

    'विश्वामित्र और ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के बीच अपनी-अपनी तपस्या में भी भारी शत्रुता थी।¹ वशिष्ठ का एक स्थानुतीर्थ में विशाल आश्रम था। उसके पूर्व में विश्वामित्र का आश्रम था। दोनों तपस्वी प्रतिदिन एक-दूसरे से बढ़-चढ़कर आहुतियां देते थे । विश्वामित्र वशिष्ठ के प्रभुत्व को देखकर बहुत अधिक ईर्ष्या रखते थे। वह गहरे सोच में डूब गए। उनका विचार इस प्रकार था : 'सरस्वती नदी अपनी धारा के साथ वशिष्ठ ऋषि को, जो जप करने वालों में सर्वश्रेष्ठ हैं, मेरे पास बहाकर ले आएगी, जब यह श्रेष्ठ ब्राह्मण मेरे पास आएगा, तो मैं निश्चित रूप से उसका वध कर दूंगा।' ऐसा संकल्प करके विश्वामित्र ने जब अपनी आंखें खोलीं, तो वे क्रोध से जल उठीं और उन्होंने नदियों की देवी का आह्वान किया। यह देवी सरस्वती उनके पास आई तो वह बड़ी आशंकित हुई, क्योंकि वह उनकी शक्ति से अवगत थी। कांपती हुई वह हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ी हो गई, जैसे कि किसी स्त्री का पति उसके सामने मार डाला गया हो। वह बड़ी दु:खी थी। उन्होंने उनसे पूछा कि मैं आपकी क्या सेवा करूं। उत्तेजित मुनि बोले  - 'वशिष्ठ को तुरंत मेरे पास लाओ, मैं उसका वध करूंगा। कमल लोचनी देवी ने हाथ जोड़कर भय से ऐसे कांपने लगी जैसे तेज हवा में लताएं कांपती हैं, किंतु विश्वामित्र ने यद्यपि उनकी दशा देख ली थी, फिर भी अपना आदेश दोहराया। सरस्वती जानती थी कि उनका संकल्प कितना पापमय है और वशिष्ठ की शक्ति भी अपरिमेय है। वह कांपती हुई वशिष्ठ की ओर चली गई। वह सोच रही थी कि उसे कहीं दोनों मुनियों का शाप न झेलना पड़े। जो कुछ विश्वामित्र ने कहा था, उसने वह वशिष्ठ को बताया । उसका लटका हुआ, पीला और चिंतित चेहरा देखकर वशिष्ठ ने कहा, 'हे नदियों की देवी ! जो मुझे कहना है, कह। मुझे निस्संकोच विश्वामित्र के पास ले चल । कहीं वह तुझे शाप न दे दे। दयालु ऋषि की वाणी सुनकर सरस्वती ने सोचा कि वह किस प्रकार बुद्धिमानी का कार्य कर सकती है। उसने मन में विचार किया कि वशिष्ठ मेरे प्रति सदैव दयालु रहे हैं। मुझे इनका कल्याण करना चाहिए । फिर उन्हें विश्वामित्र का ख्याल आया, जो उसके किनारे पर यज्ञ कर रहे थे। उसने सोचा कि यह एक अच्छा अवसर है। अपनी तेज धार से सरस्वती ने अपने किनारे को काट डाला। इस प्रकार मित्र और वरुण ( वशिष्ठ के पुत्र) को बहाकर नीचे की ओर ले गई। और जब वह उसे इस तरह बहाकर ले जा रही थी, तो ऋषि ने नदी की पूजार्चना की। हे सरस्वती ! तू ब्रह्मकुंड से निकली है और अपनी श्रेष्ठ धाराओं के रूप में सारे संसार में विचरती है। तू आकाश में निवास करती है। तू बादलों के माध्यम से वर्षा करती है। तू ही सभी नदियों का स्वरूप है। तुझमें पालक शक्ति, मेधा और प्रकाश है, तू वाणी है, तू स्वाहा है, ये सारा संसार तेरा दास है, तू सभी प्राणियों की आश्रयदाता है।


1. म्यूर, खंड 1, पृ. 420-422


    'वशिष्ठ को सरस्वती द्वारा निकट लाते देख विश्वामित्र शस्त्र तलाश करने लगे, जिससे वे वशिष्ठ का वध कर सकें। उनके क्रोध को देखते हुए कि कहीं ब्रह्महत्या न हो जाए, यह सोचकर सरस्वती वशिष्ठ को पूर्वी दिशा में दूर ले गई। इस तरह दोनों ऋषियों के आदेश का पालन तो हो गया, लेकिन विश्वामित्र की मनोकामना पूर्ण नहीं हुई। जब विश्वामित्र ने देखा कि वशिष्ठ इस प्रकार बचा लिए गए हैं, तो वे क्रोध से अधीर हो उठे और नदी से इस प्रकार बोले 'हे नदियों की देवी! तूने मुझे चकमा दिया, जा तेरा पानी रक्त में बदल जाएगा, जो केवल राक्षसों के उपयोग में ही आ सकेगा। सरस्वती को जब ऐसा शाप मिला, तो एक वर्ष तक उसमें रक्तिम जल बहता रहा। राक्षसों के लिए उसकी धारा तीर्थस्थल बन गई, विशेष रूप से वह स्थान जहां से वशिष्ठ को बहाया गया था। राक्षस इस रक्त को नाचते-गाते पीने लगे, जैसे कि उन्हें स्वर्ग मिल गया हो। कुछ समय पश्चात् जब वहां कुछ ऋषि आए, तो वे रक्तिम जल को देखकर भयभीत हो गए, जिसे राक्षस उपयोग में ला रहे थे। तब उन्होंने इस नदी की रक्षा का विचार किया । '