रानाडे, गांधी और जिन्ना - लेखक - डॉ. भीमराव अम्बेडकर
Ranade Gandhi and Jinnah written by Dr B R Ambedkar
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क्या रानाडे एक महापुरुष थे? उनका व्यक्तित्व निःसंदेह महान था । वह भीमकाय व्यक्ति थे। यह आशावादी स्वभाव, मिलनसार तथा हंसमुख मनोवृत्ति एवं बहुमुखी क्षमता वाले व्यक्ति थे। उनमें सच्चाई थी, जो सब नैतिक गुणों का संगम है और उनकी सच्चाई इस प्रकार की थी, जिसका वर्णन कार्लाइल ने किया है। वह दंभपूर्ण आत्म - श्लाघी सच्चाई नहीं थी। वह स्वाभाविक सच्चाई थी। वह एक मूलभूत व स्वाभाविक विशेषता थी, उसमें बनावट नहीं थी। वह न केवल डीलडौल तथा सच्चाई की दृष्टि से बड़े थे, बल्कि प्रतिभा के भी धनी थे। रानाडे एक उच्च प्रतिभा संपन्न व्यक्ति थे। इसमें किसी व्यक्ति को संदेह नहीं हो सकता। वह उच्च न्यायालय के मात्र एक वकील तथा न्यायाधीश ही नहीं थे, बल्कि वह प्रथम श्रेणी के अर्थशास्त्री, प्रथम श्रेणी के इतिहासकार, प्रथम श्रेणी के शिक्षाविद तथा प्रथम श्रेणी के धर्मतत्वज्ञ भी थे। वह राजनीतिज्ञ नहीं थे। कदाचित, यह अच्छी बात है कि वह राजनीतिज्ञ नहीं थे। क्योंकि यदि वह राजनीतिज्ञ होते, तो हो सकता है कि वह महान व्यक्ति न हो सकते। जैसा कि अब्राहम लिंकन ने कहा था, "राजनीतिज्ञ ऐसे व्यक्ति होते हैं, जिनका हित लोक हित से अलग होता है और जिनको अर्थात् उनमें से अधिकांश को समूह के रूप में लिया जाता है और वे ईमानदार मनुष्यों से काफी हटकर होते हैं।” रानाडे यद्यपि राजनीतिज्ञ नहीं थे, परंतु राजनीति के पारंगत विद्यार्थी थे । वास्तव में, भारत के इतिहास में रानाडे के समकक्ष व्यापक विद्वता, प्रचंड बुद्धि तथा दूरदृष्टि वाले किसी व्यक्ति को ढूंढना कठिन होगा। ऐसा कोई भी विषय नहीं था, जिसे उन्होंने छुआ न हो और जिसमें उन्होंने गूढ़ता व महारत हासिल न की हो। उनका अध्ययन विशाल स्तर का था और वह हर प्रकार से पूर्ण विद्वान थे। वह न केवल अपने समय के मापदंड के अनुसार, बल्कि किसी भी मापदंड के अनुसार महान थे। जैसा कि मैंने कहा है, महान व्यक्ति बनने का कोई भी दावा सच्चाई तथा प्रतिभा में से किसी एक पर या इनके संयुक्त रूप पर निर्भर नहीं होता। यदि रानाडे में ये दो गुण ही होते और इनसे अधिक गुण न होते तो उनको महान नहीं कहा जा सकता था। महान व्यक्ति होने की उनकी उपाधि, उन्होंने जो सामाजिक कार्य किए थे, जिस तरीके से वे कार्य किए, उस पर निर्भर करती है। इस संबंध में कोई संदेह नहीं हो सकता। रानाडे को एक इतिहासवेत्ता, अर्थशास्त्री या शिक्षाविद की अपेक्षा एक समाज सुधारक के रूप में ही अधिक जाना जाता है। उनका संपूर्ण जीवन ही समाज सुधार के लिए अनवरत अभियान में समर्पित रहा। समाज सुधारक के रूप में उनकी जो भूमिका रही है, वही उनके महान होने की उपाधि का आधार है। रानाडे में साहस तथा दूरदृष्टि दोनों ही थे, जिनकी आवश्यकता सुधारक के लिए होती है। जिन परिस्थितियों में उनका जन्म हुआ था, उनमें उनके साहस और दूरदृष्टि का बराबर का महत्व था। जिस कालखंड में वह जन्में थे, उसमें यह बात केवल अचरज की बात होती कि उनमें पैगम्बर की सी दूरदृष्टि थी। मैंने तो यह बात यहूदी दृष्टिकोण से कही है । रानाडे का जन्म 1842 में किर्की के युद्ध से लगभग 24 वर्ष बाद हुआ था। उस युद्ध में मराठा साम्राज्य का अंत हो गया था।

मराठा साम्राज्य के पतन ने विभिन्न लोगों के अंदर विभिन्न प्रतिक्रियाएं उत्पन्न कीं । नातू जैसे कुछ लोग इस बात से प्रसन्न थे कि ब्राह्मण पेशवा का अभिशप्त शासन समाप्त हो गया है। परंतु इस बात में कोई संदेह नहीं हो सकता कि महाराष्ट्र में अधिकांश लोग इस घटना से स्तंभित रह गए थे। जब समूचा भारत विदेशी गिरोहों के बढ़ते कदमों से घिरता जा रहा था और भारत की जनता को तिल-तिल करके क्रमशः दास बनाया जा रहा था, तब यहां महाराष्ट्र के नन्हे से कोने में एक हट्टीकट्टी जाति रहती थी, जो यह जानती थी कि स्वतंत्रता क्या होती है? उसने स्वतंत्रता के लिए भूरपूर लड़ाई लड़ी थी और मीलों तक इसकी स्थापना की थी। अंग्रेजों की विजय से उनकी यह अनमोल थाती समाप्त हो गई थी। इस बात की कल्पना की जा सकती है कि महाराष्ट्र की सर्वोत्तम प्रतिभा किस प्रकार पूर्णतया भौचक व हैरान हो गई थी और उसके सामने पूर्णतया अंधेरा छा गया था। ऐसी महान विपत्ति के प्रति क्या स्वाभाविक प्रतिक्रिया हो सकती थी? यह होनी के आगे आत्म-समर्पण और घुटने टेकने के अलावा और क्या हो सकता है? इस पर रानाडे की क्या प्रतिक्रिया हुई? यह अत्यंत भिन्न रूप में हुई। आशा थी कि जो गिरे हैं, वे उठेंगे भी, वास्तव में उनके अंदर एक नया विश्वास उपजा जो इस आशा का आधार था। मैं उनके ही शब्दों का उद्धृत करता हूं :
"मैं अपने धर्म के दो सिद्धांत के प्रति अनन्य आस्था व्यक्त करता हूं। हमारा यह देश आशावाद का साकार रूप है। हमारी जाति यह श्रेष्ठ जाति हैं। "
वह आशा तथा विश्वास के नवीन मूसा सिद्धांत को केवल प्रस्तुत करके ही चुप नहीं बैठे। उन्होंने इस आशा की प्राप्ति के प्रश्न पर भी अपना ध्यान दिया। इसकी पहली आवश्यकता, वास्तव में पतन के कारणों का निष्पक्ष विश्लेषण करने की थी। रानाडे ने यह महसूस किया कि यह पतन हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में कुछ कमजोरियों के कारण हुआ था और जब तक इन कमजोरियों को दूर नहीं किया जाता, तब तक आशा व आकांक्षा पूरी नहीं हो सकती। अतएव उन्होंने नवीन सिद्धांत के बाद कर्तव्य के लिए आह्वान किया था। यह कर्तव्य हिन्दू समाज में सुधार करने के कर्तव्य के अलावा कोई और कर्तव्य नहीं था। अतएव सामाजिक सुधार उनके जीवन का एक प्रमुख उद्देश्य हो गया था। उनके अंदर सामाजिक सुधार की भावना विकसित हुई और इसका बढ़ावा देने में उन्होंने कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। इसके लिए उन्होंने जो तरीके अपनाए, उनमें बैठकें करना, शिष्ट मंडल भेजना, भाषण व उपदेश, लेख, साक्षात्कार व पत्र शामिल थे। ये सब कार्य उन्होंने निरंतर व अथक उत्साह के साथ किए। उन्होंने अनेक सभाओं, सोसायटियों की स्थापना की। उन्होंने कई पत्रिकाओं को स्थापित किया । परंतु वह इससे संतुष्ट नहीं हुए। वह सामाजिक सुधार के काम को बढ़ावा देने के लिए कुछ ऐसी चीजे चाहते थे, जो अपेक्षाकृत और अधिक स्थायी और अधिक व्यवस्थित हों । अतएव उन्होंने सामाजिक सम्मेलन (सोशियल कांफ्रेंस) नामक एक अखिल भारतीय संगठन की स्थापना की। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक सहायक के रूप में चला। सामाजिक बुराइयों पर चर्चा करने के लिए वर्षानुवर्ष बैठकें होती थीं। रानाडे हर वर्ष उसके वार्षिक अधिवेशनों में उपस्थित होते थे, जैसे कि यह उनकी तीर्थयात्रा हो वह सामाजिक सुधार के हेतु कार्य व उद्देश्यों को प्रोत्साहित करते थे।
सामाजिक सुधार के कार्य व हेतु को प्रोत्साहित करने में रानाडे ने बहुत उत्साह दिखाया । इस पीढ़ी के बहुत से लोग ऐसे दावे पर शायद हंसेंगे जेल में जाना भारत में शहादत का काम हो गया है। इसे देशभक्ति का काम तथा साहस का काम माना जाता है। अधिकांश लोग जो अन्यथा ध्यान देने के अयोग्य होंगे और जिनके मामले में यह कहना ठीक ही हो सकता था कि वे बदमाश व दुष्ट थे जिन्होंने राजनीति को अपने अंतिम सहारे के रूप में अपना लिया था, जेल में जाकर वे शहीद हो गए हैं और उन्होंने नाम तथा प्रसिद्धि प्राप्त कर ली है, जो कम से कम कहने के लिए तो अति विस्मयकारी है। यदि जेल के जीवन में वैसी यातनाएं होतीं, जिन्हें तिलक जैसे व्यक्तियों तथा उनकी पीढ़ी के लोगों ने सहा था तो इस विचार में कुछ सार होगी। जेल के जीवन में आज कोई आतंक या भय नहीं रहा है। यह अब केवल नजरबंदी का मामला हो गया है। राजनीतिक कैदियों को अब अपराधी नहीं माना जाता। उनको एक अलग श्रेणी में रखा जाता है। उनको किसी कठिनाई या परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता । उनकी प्रसिद्धि या प्रतिष्ठा को कोई ठोस नहीं पहुंचती और उनको अलग भी नहीं रखा जाता। इसके लिए किसी प्रकार के साहस की आवश्यकता नहीं। परंतु जब भी जब जेल के जीवन में, जैसा कि तिलक के समय में था, वास्तव में यातनाएं थीं। राजनीतिक बंदी एक समाज सुधारक से अधिक साहस रखने का दावा नहीं कर सकते थे। अधिकांश लोग यह महसूस नहीं करते हैं कि समाज एक व्यक्ति के विरुद्ध सरकार की अपेक्षा कहीं अधिक मात्रा में अत्याचार तथा दमनचक्र चला सकता है। दमन के जो साधन तथा क्षेत्र समाज के समक्ष खुले हैं, वे सरकार के समक्ष खुले साधनों तथा क्षेत्रों की अपेक्षा बहुत अधिक व्यापक हैं और वे उनसे अधिक प्रभावी भी हैं। दंड संहिता में ऐसे कौन से दंड की व्यवस्था है, जिसकी तुलना बहिष्कार के दंड की गंभीरता तथा मात्रा से की जा सके? अधिक साहस किसमें होता है? उस समाज सुधारक में जो समाज को चुनौती देता है और अपने लिए बहिष्कार की सजा को आमंत्रित करता है, या उस राजनीतिक बंदी में जो सरकार को चुनौती देता है और केवल कुछ महीनों की या कुछ सालों की जेल की सजा पाता है? इनमें एक और भी अंतर है, जिसे समाज सुधारक तथा राजनीतिक देशभक्त द्वारा दर्शाए गए साहस का अनुमान लगाने या मूल्यांकन करने में प्रायः ध्यान में नहीं रखा जाता। जब समाज सुधारक समाज को चुनौती देता है, तब कोई भी व्यक्ति उसको शहीद कहकर उसका स्वागत नहीं करता। कोई भी व्यक्ति उसका मित्र तक बनने के लिए तैयार नहीं होता। उससे लोग घृणा करते हैं और बचकर रहते हैं, परंतु जब राजनीतिक देशभक्त सरकार को चुनौती देता है, तो सारा समाज उसका समर्थन करता है। उसकी प्रशंसा की जाती है, उसकी सराहना की जाती है और उसे उद्धारक के रूप में तथा मुक्तिदाता के रूप में आदर किया जाता है। कौन अधिक साहस दिखाता है? वह समाज सुधार जो अकेला लड़ता है, या वह राजनीमिक देशभक्त जो बहुत बड़ी संख्या में अपने समर्थकों के सहयोग से लड़ता है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि रानाडे ने समाज - सुधार के कार्य को हाथ में लेते समय साहस दिखाया था। वास्तव में, उन्होंने उच्चकोटि का साहस दर्शाया था। क्योंकि आप यह बात याद रखें कि उनके समय में सामाजिक तथा धार्मिक प्रयासों तथा रीतिरिवाजों को, चाहे वे जितने घटिया तथा अनैतिक थे, परम पवित्र तथा अलंघनीय माना जाता था तथा जब उनके दैवी व उत्कृष्ट तथा नैतिक आधार पर कोई संदेह प्रकट करता था, या उस पर कोई प्रश्न खड़ा करता था, चुनौती देता था, तो उसकी बात को केवल एक अपसिद्धांत शासन विरुद्ध ही नहीं माना जाता था, बल्कि उसे असहनीय ईशनिंदा तथा धर्मविरोध व देवद्रोह के रूप में माना जाता था।
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एक सुधारक के रूप में उनका मार्ग सरल व निष्कंटक नहीं था। वह अनेक दिशाओं से अवरुद्ध था। जिन लोगों को वह सुधारना चाहते थे, उनकी भावनाएं प्राचीन अतीत में गहरी धंसी हुई थीं। उनका विश्वास था कि उनके पूर्वज सबसे अधिक बुद्धिमान तथा सबसे कुलीन व उत्कृष्ट व्यक्ति थे और उन्होंने सर्वोच्च आदर्श समाज व्यवस्था की स्थापना की थी। हिन्दू समाज की जो लज्जास्पद तथा त्रुटिपूर्ण बातें रानाडे को महसूस हुई, वे उनके लिए धर्म की सबसे पवित्र निषेधाज्ञाएं थीं। जनसाधारण की यह मनोवृत्ति थी । बुद्धि जीवी दो वर्गों में बंटे हुए थें एक वर्ग वह था जो रूढ़िवादी विश्वास वाला था, परंतु उसका दृष्टिकोण राजनीतिक नहीं था और एक वर्ग वह था जो अपने विचारों से आधुनिक था, परंतु उसके लक्ष्य तथा उद्देश्य मूलतः राजनीतिक थे। पहले वर्ग का नेतृत्व श्री चितलेकर कर रहे थे और दूसरे का श्री तिलक। वे दोनों रानाडे के विरुद्ध एकजुट हो गए और उन्होंने उनके मार्ग में यथासंभव अधिक से अधिक कठिनाइयां उपस्थित कीं। उन्होंने केवल समाज सुधार के ध्येय को ही सबसे ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि जैसा कि अनुभव से पता चलता है, उन्होंने भारत में राजनीतिक सुधार के ध्येय को भी सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। राजनीति से विमुख या रूढ़िवादी विचारधारा के लोग हेगलवादी दृष्टि में विश्वास रखते थे। यह मेरे लिए एक पहेली है, अर्थात आदर्श को प्राप्त करना तथा यथार्थ को आदर्श बनाना। इसमें यह बात एकदम गलत है। हिन्दू धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था ऐसी है कि आप इसके आदर्श स्वरूप को यथार्थता प्रदान करने के लिए आगे नहीं बढ़ सकते, क्योंकि आदर्श बुरा होता है। न ही आप यथार्थ को आदर्श की स्थिति पर पहुंचाने का प्रयास कर सकते हैं, क्योंकि यथार्थ अर्थात् वर्तमान परिस्थिति बद से भी बदतर है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। हिन्दू धार्मिक व्यवस्था को लीजिए या हिन्दू सामाजिक व्यवस्था को लीजिए और इसकी सामाजिक उपयोगिता तथा सामाजिक न्याय की दृष्टि से जांच कीजिए। यह कहा जाता है कि धर्म उस समय तक अच्छा होता है, जब वह टकसाल से ताजा-ताजा निकलता है। परंतु हिन्दू धर्म तो प्रारंभ से ही एक खोटा सिक्का जैसा रहा है। समाज के हिन्दू आदर्श ने जैसा कि हिन्दू धर्म द्वारा निर्धारित किया गया है, हिन्दू समाज पर सबसे अधिक भ्रष्ट करने वाले तथा विकृत करने वाले प्रभाव के रूप में कार्य किया है। उसका स्वरूप तथा तत्व नीत्शेवादी है। नीत्शे के जन्म लेने से बहुत पहले ही मनु ने उस सिद्धांत की घोषणा कर दी थी, जिसका प्रचार करने का नीत्शे ने प्रयास किया। यह एक ऐसा धर्म है, जिसका अभीष्ट स्वतंत्रता, समानता तथा भ्रातृत्व की स्थापना करना नहीं है। यह एक सिद्धांत है, जो शेष हिन्दू समाज द्वारा अतिमानव ब्राह्मण की पूजा व उपासना का पोषण करता है। यह इस बात को प्रस्तुत करता है कि अतिमानव तथा एकमात्र उसका वर्ग ही जीवित रहने तथा शासन करने के लिए उत्पन्न हुए हैं। दूसरे लोग जन्म उनकी सेवा करने के लिए ही होता है, अन्य किसी कार्य के लिए नहीं । उनका जीवन अपना जीवन नहीं होता और अपने स्वयं के व्यक्तित्व को विकसित करने का उनको कोई अधिकार नहीं होता। यह हिन्दू धर्म का सिद्धांत रहा है। हिन्दू दर्शन, चाहे वह वेदांत हो या सांख्य, न्याय और वैशेषिक, हिन्दू धर्म को किसी रूप में प्रभावित किए बिना अपनी धुरी पर घूमता रहा है। इस सिद्धांत को चुनौती देने का साहस उसमें कभी नहीं हुआ। यह हिन्दू दर्शन को प्रत्येक वस्तु ब्रह्ममय है, केवल बुद्धि का ही खिलवाड़ रहा। यह कभी भी सामाजिक दर्शन नहीं हुआ। हिन्दू दार्शनिकों ने अपने दर्शन तथा अपने मनु दोनों को अलग-अलग हाथों में रखा, दाएं को यह पता नहीं कि बाएं के पास क्या था। हिन्दू को उनके परस्पर विरोध से कभी कष्ट नहीं होता। जहां तक उनकी समाज- व्यवस्था का संबंध है, क्या उससे अधिक भ्रष्ट और कुछ हो सकता है? जातिप्रथा चातुर्वर्ण्य का जो कि हिन्दू का आदर्श है, एक भ्रष्ट रूप है। कोई व्यक्ति जो जन्मजात जड़बुद्धि या मूर्ख नहीं है, चातुर्वर्ण्य को समाज का आदर्श रूप कैसे स्वीकार कर सकता है? व्यक्तिगत रूप से तथा सामाजिक रूप से यह एक मूर्खता या अपराध है। केवल एक वर्ग को ही शिक्षा तथा ज्ञान प्राप्त करने का अधिकारी होना, केवल एक वर्ग को ही व्यापार करने का अधिकारी होना, केवल एक वर्ग को ही सेवा करने के लिए होना, व्यक्ति के लिए इसके परिणाम स्पष्ट व प्रत्यक्ष हैं। आपको ऐसा विद्वान व्यक्ति कहां मिल सकता है, जिसके पास आजीविका का कोई साधन न हो और वह अपनी शिक्षा को विकृत न करे? आपको ऐसा सिपाही कहां मिल सकता है, जिसकी कोई शिक्षा तथा संस्कृति न हो और वह अपने शस्त्रों का उपयोग संरक्षण के लिए करे विनाश के लिए नहीं? आपको ऐसा व्यापारी कहां मिलेगा, जिसके पास फूटी कौड़ी तक न हो ओर वह ऐसी अर्जनवृत्ति अपना ले, जो घटिया स्तर पर न पहुंचे? आपको ऐसा सेवक कहां मिल सकता है जो न तो शिक्षा प्राप्त करे, न शस्त्र ग्रहण करे और न जीविकोपार्जन के अन्य साधन अपनाए और अपना मनचाहा निर्माता बने। यदि यह व्यक्ति के लिए हानिकारक है तो यह समाज को भी भेध्य तथा नाजुक बना देती है। समाज संरचना को केवल एक अच्छे मौसम के अनुकूल होना ही पर्याप्त नहीं है, उनके तूफान को झेलने की भी शक्ति होनी ही चाहिए। क्या हिन्दू वर्ग व्यवस्था किसी आक्रमण की झंझा को झेल सकती है? जाहिर है कि नहीं झेल सकती। चाहे प्रहार हो या प्रतिरक्षा, समाज को इस योग्य होना ही चाहिए कि वह अपनी शक्तियों का संघटन कर सके। जहां कर्तव्यों तथा दायित्वों का वितरण तथा निर्धारण एकांगी तथा अपरिवर्तनीय हो, वहां संगठन कैसे हो सकता है? नब्बे प्रतिशत हिन्दू ब्राह्मण, वैश्य तथा शूद्र - हिन्दू सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत शस्त्र धारण नहीं कर सकते थे। यदि देश की सैन्य संख्या में खतरे के समय वृद्धि नहीं की जा सकती, तो देश की रक्षा किस प्रकार की जा सकती है? जैसा कि प्रायः आरोप लगाया जाता है, बुद्ध ने हिदू समाज को अपने अहिंसा के सिद्धांत द्वारा कमजोर बनाया था। हिन्दू समाज को कमजोर बनाने वाले बुद्ध नहीं, बल्कि चातुर्वर्ण्य का वह ब्राह्मणवादी सिद्धांत है जो न केवल हिन्दू, अपितु हिन्दू समाज के अपकर्ष के लिए भी उत्तरदायी है। आपमें से कुछ लोग मेरी उस बात को बुरा मानेंगे जो मैंने हिन्दू समाज पर हिन्दू सामाजिक-धार्मिक आदर्श के भ्रष्टकारी प्रभाव के विषय में कही है। परंतु सच्चाई क्या है? क्या इस आरोप का खंडन किया जा सकता है? क्या विश्व में ऐसा कोई समाज है, जहां ऐसे लोग रहते हों, जो एकदम अलग-थलग रहते हों और जिनकी परछाई पड़ना और जिन्हें देखना पाप हो। क्या कोई ऐसा समाज है जिसमें आपराधिक जनजातियां रहती हों? क्या कोई ऐसा समाज है, जिसमें नंग-धड़ंग आदिवासी एवं बनवासी हों ? वे गिनती में कितने हैं? क्या वे सैकड़ों की संख्या में है? क्या हजारों की संख्या में हैं? मेरी कामना है कि उनकी संख्या नगण्य हो । दुख की बात यह है कि उनकी संख्या लाखों में है? लाखों अछूत हैं, लाखों जरायम पेशा जनजातियां हैं, लाखों आदिम जनजातियां हैं। घोर आश्चर्य ! हिन्दू सभ्यता, सभ्यता है या उसके नाम पर कलंक है? यह तो आदर्श का हाल है। अब आप उन परिस्थितियों की ओर ध्यान दीजिए, जो उस समय विद्यमान थीं, जब रानाडे मंच पर उतरे थे। जिस अधोगति की अवस्था में वे उस समय पहुंच गए थे, जब अंग्रेज मंच पर आए और रानाडे जैसे सुधारकों को उनका सामना करना पड़ा था, उस अवस्था को अब महसूस करना असंभव है। मैं बुद्धिजीवी वर्ग की दशा से आरंभ करता हूं। सभ्यता का पालनपोषण तथा मार्गदर्शन उसके बुद्धिजीवी वर्ग पर ब्राह्मणों द्वारा प्रदत्त नेतृत्व पर निर्भर होना ही चाहिए। प्राचीन हिन्दू कानून के अधीन ब्राह्मण को पुरोहित वर्ग का लाभ प्राप्त था और ब्राह्मण चाहे हत्या का दोषी हो, उसे फांसी की सजा नहीं दी जाती थी और ईस्ट इंडिया कंपनी उसे यह विशेषाधिकार 1817 तक देती रही। इसमें संदेह नहीं, क्योंकि उस पर श्रेष्ठता का ठप्पा लगा था। पर क्या उसमें कोई श्रेष्ठता शेष रह गई थी? उसके व्यवसाय की समूची श्रेष्ठता लुप्त हो चुकी थी। वह समाज के लिए दीमक बन चुका था। ब्राह्मण ने योजनाबद्ध तरीके से समाज को खोखला किया और धर्म का अनुचित लाभ उठाया। जिन दिनों पुराणों तथा शास्त्रों की रचना ब्राह्मण ने की, वे उन धूर्तताओं की अनमोल खोज है जिनका दुरुपयोग ब्राह्मणों ने निर्धन, अशिक्षित तथा अंधविश्वासी हिन्दू जन-साधारण को उल्लू बनाने, बहकाने तथा ठगने के लिए किया। इस भाषण में उनके संबंध में हवाला देना असंभव है। मैं यहां पर केवल उन बाध्यकारी उपायों को उल्लेख कर सकता हूं, जिन्हें ब्राह्मणों ने अपने अधिकारों तथा विशेषाधिकारों को भुनाने के लिए उन पर औचित्य तथा पवित्रता का ठप्पा लगाया और हिन्दुओं का अहित किया। जो लोग उनकी जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, वे 1795 के रेगुलेशन (विनिमय ) XXI की प्रस्तावना को पढ़ें। उसके अनुसार जब कभी भी एक ब्राह्मण कोई भी ऐसी वस्तु प्राप्त करना चाहता था जिसे कि वह अपने शिकार से उसकी इच्छा से प्राप्त नहीं कर सकता था तो वह विभिन्न प्रकार के दबाव डालने वाले उपायों का सहारा लेता था। वह अपने शरीर को चाकुओं तथा उस्तरों से चीरता था, या किसी विष को निगलने की धमकी देता था। ये उसकी सामान्य चालें होती थी, जिनको वह अपनी स्वार्थ पूति के लिए चलाता था। हिन्दुओं पर दबाव डालकर उन्हें मजबूर करने के लिए ब्राह्मणों द्वारा कुछ अन्य तरीके भी अपनाए जाते थे। वे जितने लज्जाजनक थे, उतने ही विलक्षण भी थे। एक सामान्य चलन यह था कि वह अपने शिकार के घर के सामने कूढ़ खड़ा कर देता था । कूढ़ एक गोल अहाता होता था, जिसमें एक लकड़ी का ढेर लगा दिया जाता था। अहाते के अंदर एक बुढ़िया को बैठा दिया जाता था, जो उसके उद्देश्य की पूर्ति नहीं करने पर कूढ़ में जलने के लिए तैयार रहती थी। इस प्रकार का दूसरा उपाय यह था कि वह उसकी महिलाओं तथा बच्चों को अपने शिकार की नजरों के सामने बैठा देता था और उनके सिर काटने की धमकी देता था। तीसरी युक्ति धरने की थी। शिकार के द्वार पर अनशन किया जाता था। यह तो कुछ भी नहीं। ब्राह्मणों ने गैर-ब्राह्मणों की महिलाओं का कौमार्य भंग करने के अधिकार के लिए दावा करना आरंभ कर दिया था। इस चलन का प्रचलन कालीकट के जेमोरिन के परिवार में तथा वैष्णवों के वल्लभचारी संप्रदाय में था । ब्राह्मण अधोगति के रसातल में धंस चुका था। जैसा बाइबल कहती है, “यदि लवण ने अपनी लवणता खो दी हो तो किस तत्व से उसे लवणता प्रदान की जाए।" इसमें संदेह नहीं कि हिन्दू समाज ने अपने नैतिक बंधनों को ढीला करके उन्हें एक खतरनाक कगार पर पहुंचा दिया था। इस नैतिक अधोगति को रोकने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी को 1819 में एक विनिमय (1819 का VII ) पारित करना पड़ा। इस अधिनियम की प्रस्तावना में कहा गया है कि महिलाओं को बड़े पैमाने पर काम पर लगाया जाता था ताकि वे वेश्यावृति के लिए पत्नियों तथा बच्चियों को प्रलोभन देकर ले जाएं। यह एक सामान्य प्रथा थी । पति तथा पिता अपने परिवारों को तज देते थे। लोगों में विवेक था ही नहीं और उसके अभाव में सामाजिक पापों व अपराधों के विरुद्ध नैतिक रोष की आशा करना व्यर्थ ही था । वास्तव में, ब्राह्मण हर प्रकार के दोष, अपराध या पाप का समर्थन करने में लगे हुए थे । इसका एक सहज कारण यह था कि वह तो उनके जीवन की बैशाख थी। उन्होंने अस्पृश्यता का समर्थन किया। अस्पृश्यता ने लाखों लोगों को दासता के नरक में धकेल दिया। उन्होंने जातिवाद का समर्थन किया। उन्होंने बाल-विवाह और बाध्यकारी वैधव्य का समर्थन किया। वर्ण-व्यवस्था के ये दो घोर कलंक हैं। उन्होंने सती प्रथा का समर्थन किया। उन्होंने बहुविवाह के नियम वाली क्रमिक असमानता की समाज व्यवस्था का समर्थन किया। उसके कारण राजपूतों ने अपनी हजारों पुत्रियों का गला जन्म लेते ही घोंट दिया। घोर लज्जाजनक ! घोर पाप ! क्या ऐसा समाज सभ्य राष्ट्रों को अपना मुंह दिखा सकता है? क्या ऐसा समाज अपने अस्तित्व के बने रहने की आशा कर सकता है? ऐसे प्रश्न उठाए रानाडे ने। उनका निष्कर्ष था कि यदि जीवित रहना है तो कठोर सामाजिक सुधार करने होंगे।