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रानाडे, गांधी और जिन्ना - लेखक - डॉ. भीमराव अम्बेडकर

Ranade Gandhi and Jinnah written by Dr B R Ambedkar

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23 मे 2023
Book
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     मैं आपको यह बता दूं कि इस नियंत्रण से मैं बहुत प्रसन्न नहीं हूं। मुझे यह आशंका है कि हो सकता है कि मैं इस अवसर के साथ न्याय न कर सकूं। एक वर्ष पहले जब बंबई में रानाडे की जन्मशती मनाई गई थी तो माननीय श्रीनिवास शास्त्री को बोलने के लिए निमंत्रित किया गया था। अनेक कारणों से वह उस कार्य के लिए सुयोग्य व्यक्ति थे। अपने जीवन के कुछ भाग के लिए वह रानाडे के समकालीन होने का दावा कर सकते हैं। उन्होंने रानाडे को बहुत नजदीक से देखा था और वह रानाडे के इस कार्य के प्रत्यक्ष साक्षी थे, जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया था। उन्हें उनका मूल्यांकन करने तथा उनकी उनके सहकर्मियों के साथ तुलना करने का अवसर मिला था। अतएव वह रानाडे के संबंध में अपने विचार विश्वास के साथ प्रतिपादित कर सकते थे और उनको अपने वैयक्तिक संपर्क के कारण आत्मीयता के साथ व्यक्त कर सकते थे। वह रानाडे के जीवन की झांकी व किस्से बताकर श्रोताओं के समक्ष उनके जीवन चरित्र पर प्रकाश डाल सकते थे। परंतु मेरे पास इनमें से कोई भी योग्यता नहीं है। रानाडे के साथ मेरा संबंध बहुत ही कम रहा है, यहां तक कि मैंने उनको देखा भी नहीं था । रानाडे के संबंध में केवल दो घटनाओं की मुझे याद है। पहली घटना का संबंध उनके निधन से है। मैं सतारा हाईस्कूल में पहली कक्षा का विद्यार्थी था। 16 जनवरी, 1901 को हाईस्कूल बंद कर दिया गया था और उस दिन हम लड़कों ने छुट्टी मनाई थी। हमने जब यह पूछा कि स्कूल बंद क्यों कर दिया गया तो हमें यह बताया गया कि रानाडे की मृत्यु हो गई है। उस समय मेरी आयु लगभग 9 वर्ष की थी। मैं रानाडे के विषय में कुछ नहीं जानता था कि वह कौन थे, उन्होंने क्या किया था । अन्य लड़कों की भांति मैं भी छुट्टी होने पर प्रसन्न था और इस बात को जानने की कोई चिंता व परवाह नहीं थी कि कौन मर गया है। एक और घटना जो मुझे रानाडे की याद दिलाती है, वह पहली घटना के बहुत बाद की है। एक बार मैं अपने पिता जी के पुराने कागजों के कुछ बंडलों को देख रहा था । उस समय उनमें मुझे एक ऐसा कागज मिला, जिससे यह आभास मिला कि वह 'महार जाति के कमीशंड तथा नॉन कमीशंड अधिकारियों द्वारा भारत सरकार को 1892 में जारी किए गए उन आदेशों के विरुद्ध भेजी गई एक याचिका थी, जिन आदेशों में सरकार ने सेवा में महारों की भर्ती पर रोक लगाई थी। पूछताछ करने पर मुझे यह बताया गया कि यह हरजाना प्राप्त करने के लिए याचिका की एक प्रतिलिपि है। इसे रानाडे ने पीड़ित महारों की सहायता के लिए लिखा था। इन दो घटनाओं के अलावा मुझे रानाडे के विषय में कोई बात याद नहीं है। उनके संबंध में व्यक्तिगत रूप से मैं कुछ नहीं जानता। यह केवल वह जानकारी है, जो मुझे उनके काम के विषय में पुस्तक पढ़कर तथा उनके विषय में दूसरे लोगों के कथनों से मिली है। आपको मुझसे यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि मैं व्यक्तिगत अनुभव की कोई ऐसी बात कहूं जिसमें या तो आपकी रुचि हो या आपको उससे शिक्षा मिले। एक सुप्रसिद्ध व्यक्ति के रूप में उनके विषय में मेरे क्या विचार हैं और उनका आज भारतीय राजनीति में क्या स्थान है, मैं वही आपको बताना चाहता हूं।

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     जैसा कि आप भलीभांति जानते हैं कि रानाडे के कुछ मित्र हैं, जो उनको एक महापुरुष के रूप में चित्रित करने में झिझक नहीं करते और कुछ अन्य लोग ऐसे हैं, जो उसी समान आग्रह से उनको वह स्थान प्रदान नहीं करते। फिर सच्चाई क्या है? परंतु यह प्रश्न मेरे विचार से एक और प्रश्न पर निर्भर होना ही चाहिए। वह प्रश्न है कि क्या इतिहास महापुरुषों का जीवन चरित्र होता है। यह प्रश्न प्रासंगिक भी है और महत्वपूर्ण भी। क्योंकि यदि महापुरुष इतिहास के निर्माता नहीं तो कोई कारण नहीं कि हम सिनेमा के सितारों से अधिक ध्यान उनकी ओर दें इस संबंध में अलग-अलग विचार हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जो इस बात पर जोर देते हैं कि एक व्यक्ति कितना भी महान हो, समय ही उसका सृजनहार है, समय ही उसको बनाता है। समय ही सब कुछ करता है। वह कुछ नहीं करता। जिन लोगों का यह विचार व मत है, मेरे विचार से वे इतिहास की गलत व्याख्या करते हैं । ऐतिहासिक परिवर्तनों के कारणों के संबंध में तीन अलग-अलग मत रहे हैं। हमारे पास इतिहास के ऑगेस्टिनियन सिद्धांत हैं। उसके अनुसार इतिहास केवल एक दैवी योजना की अभिव्यंजना है। उसके अंतर्गत मानव जाति को युद्ध तथा पीड़ा झेलते हुए उस समय तक निरंतर बने रहना है, जब तक वह दैवी योजना कयामत के दिन पूरी न हो सके । वकिल का मत है कि इतिहास की रचना भूगोल तथा भौतिकी ने की है। कार्ल मार्क्स ने तीसरा मत प्रतिपादित किया है। उसके अनुसार इतिहास आर्थिक शक्तियों का प्रतिफल है। इन तीनों में से कोई भी यह स्वीकार नहीं करता कि इतिहास महापुरुषों की जीवनी होता है। वास्तव में, वे इतिहास के निर्माण में व्यक्ति को कोई स्थान नहीं देते। केवल धर्म - विज्ञानियों को छोड़कर और कोई भी इतिहास के ऑगेस्टिनियन सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता। जहां तक बकिल तथा मार्क्स का संबंध है, यद्यपि उनके कथन में सत्यता है, परंतु उनके मत पूर्ण सत्य को निरुपित नहीं करते। उनका यह मत बिल्कुल गलत है कि इतिहास के निर्माण में व्यक्ति से इतर शक्तियां ही सब कुछ होती हैं और व्यक्ति का उसे बनाने में कोई हाथ नहीं होता है। व्यक्ति से इतर शक्तियां एक निर्धारी कारक होती हैं, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता। परंतु यह बात भी स्वीकार की जानी चाहिए कि व्यक्ति से इतर शक्तियों का प्रभाव व्यक्ति पर निर्भर करता है। चकमक हर स्थान पर विद्यमान नहीं हो सकता, परंतु जहां विद्यमान होता है, वहां अग्रि उत्पन्न करने के लिए चकमक से चकमक को रगड़ने के लिए मनुष्य की आवश्यकता होती है। बीज सर्वत्र नहीं पाए जाते। परंतु वे जहां पाए जाते हैं, वहां भी मनुष्य की आवश्यकता पड़ती है। उन्हें बोने के लिए जमीन को कमाना पड़ता है, जमीन को भुरभुरा करना पड़ता है। उसे अनुकूल बनाने के लिए खाद-पानी देना पड़ता है और इस तरह नींव पड़ती है, कृषि की। अनेक ऐसे क्षेत्र हैं जहां धातुएं नहीं पाई जातीं, परंतु जहां पर पाई जाती हैं वहां भी उनसे वे मशीनें तथा उपकरण बनाने के लिए मनुष्य की आवश्यकता पड़ती है, जो कि सभ्यता तथा संस्कृति के आधार स्तंभ हैं।

    सामाजिक शक्तियों को ही देखें विभिन्न प्रकार की अनेक दुखद स्थितियां उत्पन्न होती हैं। ऐसी ही एक प्रकार की स्थिति वह है, जिसका वर्णन थायर ने थियोडोर रुजवेल्ट के जीवन चरित्र में किया है। वह कहते हैं :

    "प्रत्येक वर्ग, दल या संस्था में एक ऐसा समय आता है, जब उसका विकास रूक जाता है, उसकी धमनियां कठोर हो जाती हैं, उसके युवा वर्ग का कोई स्वप्न ही नहीं होता, उसके वृद्धजन कोई स्वप्न ही नहीं देखते, वे अपने अतीत में ही खोए रहते हैं और हताश होकर अतीत को ही शाश्वत बनाए रखने का प्रयत्न करते हैं। राजनीति में भी जब घोर जड़ता की यह प्रक्रिया आ जाती है, तब हम उसे दूर करने का प्रयास नहीं करते। परिवर्तित तथा नवीन परिस्थितियों के साथ स्वयं को समायोजित करने में असमर्थ पाकर हम वापस अतीत में चले जाते हैं, उसी प्रकार जिस प्रकार एक बूढ़ा आदमी पुरानी आराम कुर्सी में धंस जाता है।"

    दूसरी प्रकार की स्थिति अपकर्ष की स्थिति नहीं, बल्कि विनाश की स्थिति है। इसकी संभावना जब भी कोई संकट होता है, उस समय तो रहती ही है। पुराने तरीके, पुरानी आदतें तथा पुराने विचार समाज का उत्थान व उत्कर्ष करने तथा उसका मार्गदर्शन करने में असफल रहते हैं। जब तक उनमें नवीनतम नहीं आती, तब तक उनके जीवित रहने की संभावना नहीं होती। कोई भी समाज निर्विघ्न नहीं चलता। उसमें अपकर्ष तथा विनाश की संभावनाओं के भूचाल आते ही रहते हैं। प्रत्येक समाज को उनका सामना करना पड़ता है। कुछ जीवित रहते हैं, कुछ नष्ट हो जाते हैं और कुछ में गतिहीनता और अपकर्ष होने लगता है। यह क्यों होता है? क्या कारण है कि कुछ जीवित रहते हैं? कार्लाइल ने इसका उत्तर दिया है। वह अपनी विशिष्ट शैली में कहते हैं:

     "जरूरी नहीं कि कोई युग नष्ट-भ्रष्ट हो ही, यदि वह पर्याप्त महान एवं विद्वान व्यक्ति को प्राप्त कर लें। यदि समय की सही मांग को पहचानने वाले ज्ञानचक्षु हों, उसे सही मार्ग दिखाने का साहस एवं शौर्य हो तो किसी भी युग का उद्धार हो सकता है।"

मुझे यह उन लोगों के लिए एक बिल्कुल निर्णायक उत्तर प्रतीत होता है, जो इतिहास के बनाने में मनुष्य को कोई स्थान प्रदान करने से इन्कार करते हैं। संकट काल का मुकाबला नए तरीकों की खोज से किया जा सकता है जब कोई नया मार्ग व तरीका नहीं मिलता तो समाज का पतन हो जाता है। समय संभावित नवीन मार्ग प्रस्तुत कर सकता है। परंतु सही मार्ग पर चलना समय का काम नहीं है। यह काम मनुष्य का है। अतएव मनुष्य इतिहास के निर्माण का एक साधन है और पर्यावरण संबंधी शक्तियों के, चाहे दैवी हों या सामाजिक, भले ही सर्वप्रथम हों, पर वे अंतिम चीज नहीं हैं।

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     महापुरुष किसे कहा जा सकता है? यदि पूछा जाए कि क्या सिकंदर, अत्तिला सीजर तथा तैमूरलंग जैसे शूरवीर योद्धा हैं, तो प्रश्न का उत्तर देना कठिन नहीं है । वीर योद्धा युग निर्माता होते हैं और व्यापक परिवर्तन लाते हैं। वे अपनी विजय के प्रचंडनाद से अपने समकालीन व्यक्तियों को स्तंभित और चकित कर देते हैं। वे महान हो जाते हैं। वे इसकी प्रतीक्षा नहीं करते कि लोग उन्हें महान कहें। जैसे हिरनों के बीच में शेर होता है, वैसे ही वे मनुष्यों के बीच होते हैं। परंतु यह बात भी उतनी ही सच है कि मानव जाति के इतिहास पर उनका स्थायी प्रभाव बहुत ही कम होता है। उनकी विजय संकुचित हो जाती है और यहां तक कि नेपोलियन जैसे महान सेनानायक को भी अपनी समूची विजय सफलताओं के बाद फ्रांस को मूल से भी लघु आकार में देखना और छोड़ना पड़ा। जरूरत पड़ने पर जब उन पर कुछ दूरी से दृष्टिपात किया जाता है तो विश्व के समूचे कार्य-व्यापार में वे केवल सामयिक महत्व की दीख पड़ती हैं और जिस समाज में घटित होती हैं, उस पर कोई स्थायी प्रभाव नहीं डालतीं। उनके जीवन तथा नैतिक आचरण का वृत्त रोचक हो सकता है, परंतु वे समाज को प्रभावित नहीं करते और समूचे समाज के स्वरूप को बदलने के लिए वे कोई प्रभाव नहीं छोड़ते तथा कोई परिवर्तन नहीं लाते ।

    जब प्रश्न किसी ऐसे व्यक्ति के विषय में पूछा जाता है जो सेनाध्यक्ष नहीं है तो उत्तर देना कठिन हो जाता है। क्योंकि उस समय यह प्रश्न जांच व कसौटी का प्रश्न हो जाता है और अलग लोगों की अलग-अलग जांच व कसौटी होती है।

    नायक - पूजा के प्रबल पक्षधर कार्लाइल की अपनी एक निजी कसौटी व जांच थी। उन्होंने निम्नलिखित शब्दों में उसका उल्लेख किया है :

    "लेकिन विशेष रूप से महापुरुष के बारे में मैं अति आग्रह से यह कहने का साहस करूंगा कि इस पर तो विश्वास किया ही नहीं जा सकता कि वह सत्यनिष्ठ के अलावा वह कुछ और भी हो सकता है कोई व्यक्ति तभी समर्थ होगा, जब वह सर्वप्रथम सत्यनिष्ठ हो, उसे मैं निष्ठावान व्यक्ति कहूंगा निष्ठा कैसी गहन, अति खरी निष्ठा । सभी वीर- गुणी व्यक्तियों का सर्वोपरि प्रधान लक्षण है।"

    कार्लाइल ने निःसंदेह सच्चाई की अपनी कसौटी की परिभाषा विशेष रूप से स्पष्ट शब्दों में दी है और ऐसा करने में उसने अपने पाठकों को इस बात की भी चेतावनी दी है कि इसकी व्याख्या करने में सच्चाई के विषय में उनके विचार हैं:

    "वह सच्चाई नहीं, जो स्वयं को सच्चा कहती है: ओह, बिल्कुल नहीं! वह वास्तव में अति तुच्छ बात है; एक छिछली, आत्म- श्लाघी, स्व- आरोपित सच्चाई जो बहुधा मुख्यतः अभिमान एवं अहंकार पूर्ण होती है। महापुरुष की सच्चाई इस प्रकार की होती है कि उसके विषय में वह कुछ बोल ही नहीं सकता, उसका उसे बोध ही नहीं होता। इसके विपरीत मेरा विचार है कि वह पाखंड से अधिक सचेत रहता है। महापुरुष तो कभी भी अपने को ईमानदार कहकर आत्म-प्रशंसा नहीं करता, वह उससे कोसों दूर रहता है; वह शायद स्वयं से भी यह नहीं पूछता कि क्या वह ऐसा है बल्कि मैं तो यह करूंगा कि उसकी सच्चाई तो स्वयं उस पर भी निर्भर नहीं करती, वह सच्चाई का पल्ला छोड़ ही नहीं सकता।"

    लार्ड रोजबरी ने एक और कसौटी नेपोलियन के संबंध में प्रस्तुत की । नेपोलियन जितना महान जनरल था, उतना ही समान प्रशासक भी था । क्या नेपोलियन महान था ? इस प्रश्न का उत्तर देते समय रोजवरी ने निम्नलिखित भाषा का प्रयोग किया :

    “यदि 'महान' से अभिप्राय नैतिक और प्रतिभा संबंधी गुणों के समन्वय से है तो वह निश्चित रूप से महान नहीं है। परंतु वह असाधारण तथा सर्वोच्च होने के अर्थ में महान है। इसमें हमें कोई संदेह नहीं हो सकता । यदि महानता का अर्थ प्राकृतिक शक्ति, प्रधानता, मानवता से परे किसी मानवीयता से है, तब नेपोलियन निश्चय ही महान है। उस वर्णनातीत चिंगारी के अलावा जिसे हम प्रतिभा कहते हैं, वह बुद्धि तथा शक्ति के ऐसे समन्वय का प्रतीक है, जिसकी शायद किसी भी न तो बराबरी की गई और न ही कभी उसे लांघा गया।"

    एक तीसरी कसौटी है, जिसे दार्शनिकों ने बताया है या यदि और ठीक-ठाक कहें तो इसे लोगों ने बताया है, जो मानवीय कार्यव्यापार के दैवी निर्देश में विश्वास करते हैं । महापुरुष कौन होता है, उसके विषय में उनकी अवधारणा अलग है। उनके विचारों को संक्षेप में रोजबरी ने इस प्रकार व्यक्त किया है- "महापुरुष विश्व में एक महान प्राकृतिक या अलौकिक शक्ति के रूप में अवतरित होता है। वह समाज की गंदगी की सफाई करता है तथा उसे सही मार्ग पर ले जाता है। वह शुद्धिकारक तथा संकटमोचक वरदान होता है। वह एक विराट कार्य में लगा होता है, जो अंशतः सकारात्मक तथा मुख्यतः नकारात्मक होता है, परंतु सबका संबंध सामाजिक पुनरुद्वार से होता है।

    इनमें से सही व सच्ची कसौटी कौन सी है? मेरे विचार से सभी कसौटियां अपूर्ण हैं, कोई भी पूर्ण नहीं है। सच्चाई तो महापुरुष की कसौटी होनी ही चाहिए। कलेमेन्सो ने एक बार कहा था कि अधिकांश राजनेता दुष्ट व बदमाश होते हैं। राजनेता अनिवार्यतः, महापुरुष नहीं होते और जिन लोगों के अनुभव पर उसने अपना मत कायम किया, वे स्पष्टतः ऐसे लोग हैं, जिनमें सच्चाई का अभाव रहा है। फिर भी, कोई भी इस बात को स्वीकार नहीं कर सकता कि सच्चाई इसकी प्रमुख या एकमात्र कसौटी ही है, क्योंकि सच्चाई ही काफी नहीं होती। एक महापुरुष में सच्चाई तो होनी चाहिए, क्योंकि समूचे नैतिक गुणों के संगम के बिना कोई व्यक्ति महान नहीं कहला सकता। परंतु एक व्यक्ति को महान बनाने में केवल सच्चाई के अलावा भी कोई गुण होना चाहिए। एक व्यक्ति सच्चा हो सकता है, परंतु फिर भी वह मूर्ख हो सकता है। एक मुर्ख व्यक्ति एक महान व्यक्ति के ठीक विपरीत होता है। एक व्यक्ति इसलिए महान होता है कि वह समाज को संकट की घड़ी में से उबारने के लिए मार्ग ढूंढ लेता है। परंतु मार्ग को ढूंढ़ने में उसकी सहायता क्या चीज कर सकती है? वह ऐसा केवल प्रतिभा की सहायता से कर सकता है। प्रतिभा प्रकाश है। इसके अलावा और कोई चीज काम नहीं करती। यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि सच्चाई के बिना कोई व्यक्ति महान नहीं हो सकता। क्या एक महान व्यक्ति को बनाने के लिए यह पर्याप्त है ? इस अवस्था में मेरे विचार से हमें एक प्रसिद्ध व्यक्ति और एक महान व्यक्ति में अंतर समझना चाहिए। क्योंकि मेरा निश्चय है कि एक महान व्यक्ति एक प्रसिद्ध व्यक्ति से बहुत ही भिन्न होता है। एक व्यक्ति की सच्चाई, ईमानदारी या निष्कपटता तथा प्रतिभा जैसे गुण उसे अपने साथियों की तुलना में प्रसिद्ध व्यक्ति होने के लिए पर्याप्त होते हैं। परंतु वे उसे एक महान व्यक्ति के पद व सम्मान तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त नहीं होते। एक महान व्यक्ति में मात्र एक प्रसिद्ध व्यक्ति की अपेक्षा कुछ अधिक होना चाहिए। वह अधिक चीज क्या होनी चाहिए ? यहां पर दार्शनिक द्वारा दी गई महान व्यक्ति की परिभाषा का महत्व सामने आता है। एक महान व्यक्ति को सामाजिक उद्देश्य की गतिशीलता से प्रभावित होना चाहिए और उसे समाज के अंकुश तथा अपमार्जक के रूप में काम करना चाहिए। ये वे तत्व हैं, जिनसे एक महान व्यक्ति की एक प्रसिद्ध व्यक्ति से अलग पहचान की जा सकती है और इन्हीं में सर्वोत्तम कार्यों के सम्मान तथा आदर के उसके अधिकार निहित हैं।

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