जातिप्रथा और उन्मूलन
jati Pratha aur Unmulan Answer given to Mahatma Gandhi dr bhimrao ambedkar
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कोई भी सुधार तब शुरू होता है, जब कोई व्यक्ति अपने समुदाय के मानकों, समुदाय की सत्ता और समुदाय के हित से ऊपर और उससे अलग अपने विचारों, अपनी धारणाओं और स्वयं की स्वतंत्रता और हित पर अधिक बल देता है। लेकिन यह सुधार आगे लगातार संपन्न होगा या नहीं, यह इस पर निर्भर करता है कि उस व्यक्ति का समुदाय उसके दृढ़ विचारों को किस सीमा तक समर्थन देता है। अगर समुदाय में सहनशीलता की भावना है और वह अपने लोगों से न्यायोचित व्यवहार करता है, तो ऐसे व्यक्ति अपने विचारों पर दृढ़ रहेंगे और अंततः अन्य लोगों को भी नए विचारों से सहमत कराने में सफल हो जाएंगे। किन्तु दूसरी ओर, अगर समुदाय सहनशील नहीं है और वह सही या गलत, किसी भी उपाय से ऐसे व्यक्तियों की आवाज को दबा देता है, तो ऐसे व्यक्ति समाप्त हो जाएंगे और सुधार की आशा भी समाप्त हो जाएगी। आजकल किसी भी जाति के पास किसी भी ऐसे व्यक्ति को जाति से बहिष्कृत करने का पूरा अधिकार रहता है, जिसने उस जाति के नियम को तोड़ने का अपराध किया हो। अगर इस बात को समझ लिया जाए कि जाति से बहिष्कृत होने का अर्थ है, उसे समाज के किसी भी कार्य में भाग न लेने देना, तो वस्तुतः यह कहना कठिन है कि जाति - बहिष्कार अधिक कठोर दंड है या मृत्यु। इसलिए आश्चर्य नहीं कि किसी हिन्दू में यह साहस नहीं है कि वह जाति की सीमा को तोड़कर अपनी स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति कर सके। यह सही है कि आदमी अपने सहयोगियों से पूर्णतः सहमत नहीं हो सकता, लेकिन यह भी सही है कि वह उनके बिना रह भी नहीं सकता । वह चाहता यह है कि उसके सभी साथी उसकी अपनी शर्तों पर उसके साथ रहें। लेकिन अगर वे लोग उसकी शर्तें नहीं मानते तो वह किसी भी शर्त पर उनका साथ लेने के लिए तैयार हो जाएगा - भले ही उसे इसके लिए पूर्णतः आत्म-समर्पण करना पड़े। कारण यह है कि कोई भी व्यक्ति समाज के बिना नहीं रह सकता। मनुष्य की असहायता का लाभ उसकी जाति हर समय उठाने के लिए तैयार रहती है और वह इस पर भी बल देती है कि सभी व्यक्ति उस जाति की संहिता का अक्षरशः और तत्वतः पूरा पालन करें। कोई भी जाति किसी भी सुधारवादी व्यक्ति के जीवन को नरकतुल्य बना देने के लिए षड्यंत्र करके बड़ी आसानी से अपने को संगठित कर सकती है। अगर षड्यंत्र अपराध है तो मेरी समझ में यह नहीं आता कि अगर कोई आदमी अपनी जाति के नियमों के विरुद्ध कुछ करने का साहस करता है, तो उसे जाति- बहिष्कृत करने के जघन्य अपराध को कानून में दंडनीय अपराध क्यों नहीं बनाया जाता। लेकिन आजकल जो स्थिति है, उसके अनुसार कानून ने भी हर जाति को इस बात का पूरा अधिकार दे रखा है कि वह अपने सदस्यों के लिए नियम बनाए, उन्हें उनके अनुसार चलाए और विरोधियों को जाति - बहिष्कृत करके दंडित करे। इस प्रकार रूढ़िवादियों ने सुधारकों को उत्पीड़ित करने और सुधारों को समाप्त करने के लिए जाति को सशक्त माध्यम के रूप में अपनाया है।
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हिन्दुओं की नीति और आचार पर जातिप्रथा का प्रभाव अत्यधिक शोचनीय है। जातिप्रथा ने जन-चेतना को नष्ट कर दिया है। उसने सार्वजनिक धर्मार्थ की भावना को भी नष्ट कर दिया है। जातिप्रथा के कारण किसी भी विषय पर सार्वजनिक सहमति का होना असंभव हो गया है। हिन्दुओं के लिए उनकी जाति ही जनता है। उनका उत्तरदायित्व अपनी जाति तक सीमित है। उनकी निष्ठा अपनी जाति तक ही सीमित है। गुणों का आधार भी जाति ही है और नैतिकता का आधार भी जाति ही है। सही व्यक्ति के प्रति ( अगर वह उनकी अपनी जाति का नहीं है) उनकी सहानुभूति नहीं होती । गुणों की कोई सराहना नहीं है, जरूरतमंद के लिए सहायता नहीं है । दुखियों की पुकार का कोई जवाब नहीं है। अगर सहायता दें तो वह केवल जाति मात्र तक सीमित है। सहानुभूति है, लेकिन अन्य जातियों के लोगों के लिए नहीं। क्या हिन्दू किसी भी महान और अच्छे व्यक्ति के नेतृत्व को स्वीकार कर सकते हैं और उसका अनुसरण कर सकते हैं? यदि कोई महात्मा हो तो उसकी बात अलग है, लेकिन सामान्य उत्तर यही है कि वह किसी नेता का अनुसरण तभी करेगा, जब वह उसकी जाति को हो । ब्राह्मण, ब्राह्मण नेता को ही मानेगा, कायस्थ, कायस्थ नेता का ही अनुसरण करेगा, आदि आदि । हिन्दुओं में इस बात की क्षमता ही नहीं है कि वे अपनी जाति से भिन्न अन्य जाति के व्यक्ति के गुणों का सही मूल्यांकन कर सकें। गुणों की सराहना तभी होती है, जब वह व्यक्ति अपनी जाति का हो। उनकी पूर्ण नैतिकता उतनी ही निम्न कोटि की है, जितनी जंगली जातियों की होती है। आदमी कैसा भी हो, सही या गलत, अच्छा या बुरा, बस अपनी जाति का होना चाहिए। न उन्हें गुणों की प्रशंसा से मतलब है, न बुराई के विरोध से उनके लिए मुद्दा सिर्फ इतना है कि अपनी जाति का पक्ष लें या नहीं। क्यों हिन्दुओं ने अपनी जाति के हितों- स्वार्थों की रक्षा करने में अपने देश के प्रति विश्वासघात नहीं किया है?

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अगर आप लोगों में से कुछ जातिप्रथा द्वारा उत्पन्न दुष्प्रभावों की इस ऊबने वाली चर्चा सुनते-सुनते थक गए हैं, तो मुझे आश्चर्य न होगा। इसमें कोई नई बात नहीं है। इसलिए अब मैं इस समस्या के रचनात्मक पहलू के बारे में कहना आरंभ करता हूं। आपसे यह अवश्य पूछा जा सकता है कि अगर आप जाति के विरुद्ध हैं, तो आपके विचार से आदर्श समाज किसे कहा जा सकता है? अगर आप मुझसे पूछें तो मेरा आदर्श एक ऐसा समाज होगा, जो स्वाधीनता, समानता और भाईचारे पर आधारित हो। और ऐसा क्यों न हो ? भाईचारे के विषय में क्या आपत्ति हो सकती है? मेरे विचार से तो कोई आपत्ति नहीं हो सकती। आदर्श समाज गतिशील होना चाहिए। उसमें ऐसी भरपूर सरणियां होनी चाहिए कि वह समाज के एक हिस्से में हुए परिवर्तन की सूचना अन्य हिस्सों को दे दें। आदर्श समाज में अनेक प्रकार के हित होने चाहिए, जिन पर लोग सोच-समझकर विचार-विमर्श करें और उनके बारे में एक-दूसरे को बताएं और सब उसमें हिस्सा लें। समाज में विभिन्न लोगों के बीच संपर्क के ऐसे बहुविध और निर्विवाद बिन्दु होने चाहिए, जहां साहचर्य या संगठन के अन्य रूपों से भी संवाद हो सके। दूसरे शब्दों में समाज के भीतर संपर्क का सर्वत्र प्रसार होना चाहिए। इसी को भाईचारा कहा जाता है और यह प्रजातंत्र का दूसरा नाम है। प्रजातंत्र, सरकार का एक स्वरूप मात्र नहीं है। यह वस्तुतः साहचर्य की स्थिति में रहने का एक तरीका है, जिसमें सार्वजनिक अनुभव का समवेत रूप से संप्रेषण होता है। प्रजातंत्र का मूल है, अपने साथियों के प्रति आदर और मान की भावना । क्या स्वाधीनता पर किसी को भी कोई आपत्ति हो सकती है? अगर स्वाधीनता का अर्थ निर्बाध रूप से कहीं भी आने-जाने का अधिकार है, या जीवित रहने तथा शरीर की रक्षा का अधिकार है, तो इसमें कुछ लोगों को ही आपत्ति होगी। अगर स्वाधीनता का अर्थ अपने शरीर को पूर्णतः स्वस्थ रखने के लिए जीविका उपार्जन के लिए संपत्ति, उपकरणों और सामग्री पर अधिकार है, तो इस पर कोई भी आपत्ति नहीं है। स्वाधीनता को वह लाभ क्यों न दिया जाए, जो किसी व्यक्ति की शक्तियों के प्रभावपूर्ण और सक्षम उपयोग से प्राप्त हो सकता है? जातिप्रथा के जो समर्थक जीवन, शरीर और संपत्ति के अधिकार को ही स्वाधीनता मानते हैं, वे स्वाधीनता के इस स्वरूप को एकदम स्वीकार नहीं करेंगे, क्योंकि इसमें अपनी जीविका को स्वयं चुनने का अधिकार निहित है, किन्तु इस स्वाधीनता पर आपत्ति करने का अर्थ है, दासता को शाश्वत बनाना, क्योंकि दासता का अर्थ केवल कानूनी अधीनीकरण या परतंत्रता नहीं है। इसका अर्थ है, समाज में व्याप्त वह स्थिति, जिसमें कुछ लोगों को विवश होकर अन्य लोगों से उन प्रयोजनों को भी स्वीकार करना होता है, जिनके अनुसार उन्हें आचरण करना है। यह स्थिति तब भी रह सकती है, जब कानूनी अर्थ में दासता का अस्तित्व न हो। यह स्थिति जातिप्रथा की तरह ऐसी दशाओं में पाई जाती है, जहां कुछ व्यक्ति अपनी पसंद का धंधा छोड़कर स्वयं पर थोपे गए अन्य धंधे करने पर विवश हो जाते हैं। क्या समानता पर कोई आपत्ति हो सकती है? फ्रांस की क्रांति के नारे का यह सबसे विवादास्पद अंश रहा है। समानता के विरुद्ध आपत्तियां ठीक हो सकती हैं और यही मानना होगा कि सभी लोग एक समान नहीं होते। लेकिन उससे क्या होता है। समानता भले ही काल्पनिक वस्तु हो । किन्तु फिर भी उसे निर्देशक सिद्धांत के रूप में स्वीकार करना ही होगा। मनुष्य की शक्ति तीन बातों पर निर्भर है ( 1 ) शारीरिक आनुवांशिकता, (2) सामाजिक विरासत या दाय, जो उसे माता-पिता द्वारा देखभाल, शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान का संचय और उसे बर्बर की अपेक्षा अधिक सक्षम मनुष्य बनाने वाले सभी साधन के रूप में प्राप्त होते हैं, और (3) उसकी अपनी कोशिशें इन तीनों पहलुओं की दृष्टि से निःसंदेह मनुष्य असमान है। किन्तु प्रश्न यह है कि क्या उनके असमान होने के कारण हम भी उन्हें असमान मानकर व्यवहार करें। इस प्रश्न का जवाब समानता के विरोधियों को अवश्य देना होगा। जहां तक व्यक्तिवादियों का दृष्टिकोण है, लोगों को इसलिए असमान माना जाना चाहिए, क्योंकि उनके प्रयत्न भी असमान होते हैं। प्रत्येक मनुष्य की शक्ति के पूर्ण विकास के लिए उसे अधिक से अधिक प्रोत्साहन देना वांछनीय है। लेकिन अगर मनुष्य को उल्लिखित दो कारणों से असमान मानकर उसके साथ व्यवहार किया जाए तो उसका क्या परिणाम होगा? स्पष्ट है कि जो व्यक्ति जन्म, शिक्षा, परिवार का नाम, व्यावसायिक संबंध और विरासत में मिली संपत्ति की दृष्टि से बेहतर है, वह अधिक अच्छा माना जाता है। किन्तु ऐसी स्थितियों में जो चयन होगा, उसे योग्य व्यक्ति का चयन नहीं कहा जाएगा। चयन विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्ति का होगा। इसलिए यदि हम तीसरे कारण से लोगों को असमान मानने पर बाध्य होते हैं, तो यह भी उपयुक्त प्रतीत होता है कि पहले दो कारणों से हम लोगों को यथासंभव एक समान समझें। दूसरी ओर, यह भी तर्क दिया जा सकता है कि यदि समाज के लिए अपने सदस्यों का अधिकतम सहयोग लेना अच्छा है, ऐसा तभी संभव हो सकता है, जब कि प्रत्येक कार्य के आरंभ में उन्हें यथासंभव एक समान मानकर उनसे व्यवहार किया जाए। यह एक कारण है, जिसके फलस्वरूप हम एक समानता को अस्वीकार नहीं कर सकते। लेकिन समानता को स्वीकार करने का एक अन्य कारण भी है। एक राजनीतिज्ञ को असंख्य लोगों से व्यवहार करना पड़ता है। उसके पास न तो समय है और न यह जानकारी कि वह प्रत्येक व्यक्ति को अलग-अलग पहचाने और तदनुसार यथोचित व्यवहार करे, अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता या उसकी सामर्थ्य के अनुसार व्यवहार करे। मनुष्यों के प्रति न्यायोचित व्यवहार कितना ही वांछनीय या तर्कसंगत हो, तथापि विशाल जनसंख्या को वर्गीकृत करना या उन्हें अलग- अलग करना संभव नहीं है। इसलिए राजनीतिज्ञ को एक सरल और व्यापक नियम का पालन करना चाहिए और वह सरल और व्यापक नियम यह है कि सभी लोगों को एक समान माना जाए, इसलिए नहीं कि सब समान हैं, बल्कि इसलिए कि उनका वर्गीकरण या उन्हें अलग-अलग करना असंभव है। समानता का सिद्धांत पूर्णतः भ्रांतिपूर्ण है, लेकिन कुल मिलाकर यही तरीका है, जिससे कोई राजनीतिज्ञ राजनीति कर सकता है, क्योंकि राजनीति पूर्णतः व्यावहारिक विषय है, जिसकी कसौटी भी पूर्णतः व्यावहारिक होती है।