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जातिप्रथा और उन्मूलन

jati Pratha aur Unmulan Answer given to Mahatma Gandhi dr bhimrao ambedkar

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03 मे 2023
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    हिन्दुओं ने न केवल वन्य जातियों को सभ्य बनाने का मानवतावादी कार्य करने का कोई प्रयास नहीं किया, बल्कि ऊंची जाति वाले हिन्दुओं ने जान-बूझकर हिन्दू समाज की निचली जातियों को ऊंची जाति के सांस्कृतिक स्तर पर ऊपर उठने की मोहलत नहीं दी। मैं उसके दो उदाहरण देता हूं: एक है सुनार समुदाय जाति और दूसरा पाठारे प्रभु समुदाय। ये दोनों ही समुदाय महाराष्ट्र में काफी मशहूर हैं। ये दोनों ही समुदाय ब्राह्मणों के तौर-तरीकों और आदतों को अपनाने की कोशिश करते हुए अपनी सामाजिक हैसियत बढ़ाने का प्रयास कर रहे थे। शेष अन्य समुदाय भी ऐसा ही करते थे। सुनार लोग अपने को दैवज्ञ ब्राह्मण बताते थे और धोती को दोहरी करके पहनते थे तथा 'नमस्कार' कहकर अभिवादन करते थे। धोती को पहनने का यह ढंग और नमस्कार करना, ये दोनों ही ब्राह्मणों के खास रिवाज थे। ब्राह्मणों ने उनकी इस नकल को पसंद नहीं किया और न ही सुनारों के इस प्रयास को पसंद किया कि लोग उन्हें भी ब्राह्मण समझें। उन्होंने पेशवा के प्राधिकार से सुनारों के ब्राह्मणों वाले तौर-तरीके अपनाने के प्रयास को बंद कराने में सफलता प्राप्त कर ली। उन्होंने बंबई स्थित ईस्ट इंडिया कंपनी परिषद् के अध्यक्ष से सुनारों के विरुद्ध निषेधाज्ञा भी जारी करवा दी। पाठारे प्रभु संप्रदाय में किसी समय विधवाओं के पुनर्विवाह की प्रथा थी। लेकिन उस जाति के कुछ लोग विधवाओं के पुनर्विवाह की प्रथा को कुछ समय के बाद सामाजिक पिछड़ेपन का प्रतीक मानने लगे, जिसका खास कारण यह था कि यह ब्राह्मणों में प्रचलित प्रथा के प्रतिकूल थी। इसलिए पाठारे प्रभु समुदाय के कुछ लोगों ने अपने समुदाय का स्तर ऊंचा करने के लिए अपनी जाति में प्रचलित विधवा विवाह प्रथा को रोकने का प्रयत्न किया। पूरा समुदाय दो खेमों में बंट गया। एक पुनर्विवाह के पक्ष में और दूसरा विपक्ष में पेशवा ने उन लोगों का पक्ष लिया, जो विधवाओं के पुनर्विवाह के पक्ष में थे ओर इस तरह उन्होंने पाठारे प्रभु समुदाय को ब्राह्मणों के तौर-तरीके अपनाने से रोक दिया। हिन्दू लोग मुसलमानों की इसलिए आलोचना करते हैं कि उन्होंने तलवार के बल पर अपना धर्म फैलाया। वे ईसाई धर्म का भी इसलिए उपहास करते हैं कि वे धर्म न्यायाधिकरण के आदेश से काम करते हैं। लेकिन यदि सच पूछा जाए तो हमारे आदर का अधिक पात्र कौन है? वे मुसलमान या ईसाई जो बलपूर्वक अनिच्छुक व्यक्तियों को वह सब करने के लिए विवश कर देते हैं जिसे वे उनकी मुक्ति के लिए आवश्यक समझते हैं, अथवा वे हिन्दू जो ज्ञान का प्रकाश फैलाने नहीं देते, जो दूसरों को अंधेरे में रखने की कोशिश करते रहते हैं, जो अपने बौद्धिक और सामाजिक दाय को उन लोगों के साथ मिल- बांटना नहीं चाहते, जो उस दाय को अंगीकृत करने के लिए पूरी तरह तैयार और इच्छुक हैं? मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि अगर मुसलमानों को क्रूर माना जाए तो हिन्दुओं को भी निकृष्ट माना जाना चाहिए और निकृष्टता क्रूरता से भी अधिक निंदनीय है।

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    हिन्दू धर्म प्रचारमूलक धर्म था या नहीं, यह विवादास्पद है। कुछ लोगों का विचार है कि यह प्रचारमूलक धर्म कभी नहीं रहा। दूसरों की यह मान्यता है कि यह प्रचारमूलक था तथापि यह स्वीकार करना ही होगा कि किसी समय यह प्रचारमूलक आवश्यक रहा होगा, क्योंकि यह अगर ऐसा न होता तो इसका प्रसार पूरे भारत में सर्वत्र न हो पाता । यह तथ्य भी अवश्य स्वीकार करना होगा कि आज यह प्रचारमूलक नहीं रह पाया है। इसलिए सवाल यह नहीं है कि हिन्दू धर्म प्रचारमूलक धर्म था या नहीं। असली सवाल यह कि हिन्दू धर्म प्रचारमूलक क्यों नहीं रह पाया ? मेरे पास इसका यह जवाब है कि हिन्दू धर्म तब से प्रचारमूलक धर्म नहीं रह गया, जब से हिन्दुओं में जातिप्रथा का उद्गम हुआ । जातिप्रथा धर्म-परिवर्तन नहीं होने देती । धर्म परिवर्तन में सिर्फ यही समस्या नहीं होती कि नई धारणाएं और नए सिद्धांत अपना लिए जाएं बल्कि दूसरी ओर सबसे बड़ी समस्या इसमें यह पैदा होती है कि धर्म परिवर्तित व्यक्ति को किस जाति में स्वीकार किया जाए ? जो भी हिन्दू अन्य धर्मियों को अपने धर्म में शामिल करना चाहता है, उसे यह समस्या अनिवार्य रूप से झेलनी पड़ती है। किसी क्लब की सदस्यता तो सबसे लिए समान रूप से खुली रहती है, किन्तु किसी जाति विशेष की सदस्यता हर ऐरे गैरे के लिए नहीं खुली रहती । जाति का नियम ही यह है कि उसकी सदस्यता उसी जाति में उत्पन्न व्यक्ति को प्राप्त होती है। जातियां स्वशासित होती हैं। किसी को कहीं भी यह अधिकार नहीं है कि किसी जाति को किसी बात के लिए विवश करे कि वह अपने सामाजिक जीवन में किसी नव-आगंतुक को स्वीकार कर ले। हिन्दू समाज अनेक जातियों का समूह है, और क्योंकि हर-एक जाति एक बंद निगमित संस्था की तरह है, इसलिए धर्म परिवर्तित व्यक्ति के लिए (किसी भी जाति में) कहीं कोई स्थान नहीं है। इस प्रकार इस जातिप्रथा ने ही हिन्दुओं को हिन्दू धर्म फैलाने से रोका और अन्य धार्मिक समुदायों को इसमें लीन होने से रोका। अतः जब तक जातिप्रथा रहेगी, हिन्दू धर्म को प्रचारात्मक धर्म नहीं बनाया जा सकता और शुद्धि न केवल मूर्खता होगी, बल्कि निरर्थक भी होगी।

Speech prepared by Dr Bhimrao Ambedkar for the annual conference of Lahore Jatpant Todak Mandal 1936

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    हिन्दू समुदाय जिन कारणों से शुद्धि करने में असमर्थ है, उन्हीं कारणों से उनका संगठन भी असंभव है। संगठन का मूल आधार यह है कि हिन्दुओं के मन से उस कायरता और बुजदिली को हटा दिया जाए, जिसके कारण वह मुसलमानों और सिखों से अलग हो जाते हैं तथा अपनी रक्षा के लिए वीरता के स्थान पर चालाकी और धोखेबाजी के घटिया तरीके अपनाते हैं। एक स्वाभाविक प्रश्न यह है कि सिख या मुसलमान को वह शक्ति कहां से प्राप्त होती है, जिससे वह बहादुर और निडर बन जाता है। मेरा विश्वास है कि यह इसलिए नहीं है कि उनके शरीर में अपेक्षाकृत अधिक शक्ति होती है, या उनकी खुराक अधिक अच्छी है, या वे अधिक व्यायाम करते हैं। यह शक्ति उनके मन में उत्पन्न इस भावना के कारण है कि अगर किसी सिख पर खतरा होगा तो सारे सिख उसके बचाव के लिए दौड़े आएंगे और यदि मुसलमान पर हमला हुआ, सारे मुसलमान उसकी मदद को आएंगे। हिन्दुओं के पास ऐसी शक्ति नहीं है। उसके मन में यह विश्वास नहीं है कि शेष हिन्दू उसके बचाव के लिए आएंगे। अकेले होने और भाग्य से अकेले रहने के इस अहसास के कारण वह शक्तिहीन रहता है। उसके मन में बुजदिली और कायरता घर कर जाती है और लड़ाई होने पर या तो वह आत्म समर्पण कर देता है, या भाग जाता है। दूसरी ओर सिख या मुसलमान निडर होकर लड़ता रहता, क्योंकि उसे पता है कि अकेला होने के बावजूद वह अकेला नहीं रहेगा। उसके मन में इस विश्वास का होना उसे लड़ते रहने में सहायक होता है और दूसरे में इस विश्वास का अभाव पराजय स्वीकार करने की स्थिति पैदा कर देता है। यदि इस विषय का और आगे अध्ययन किया जाए और यह पता लगाया जाए कि सिखों और मुसलमानों में इस आत्म-विश्वास का क्या कारण है और हिन्दुओं में मदद और बचाव के विषय में इतनी निराशा क्यों भरी हुई है, तो आपको ज्ञात होगा कि इसका कारण उनके अपने रहन-सहन के तौर-तरीकों में अंतर है। एक ओर सिखों और मुसलमानों के आपसी रहन-सहन का तरीका, उनमें भाईचारे की भावना पैदा करता है। दूसरी ओर हिन्दुओं के आपसी रहन-सहन के तौर-तरीके इस भावना को पैदा नहीं होने देते। सिखों और मुसलमानों में एकता का वह सामाजिक तत्व है, जो उन्हें भाई-भाई बनता है। हिन्दुओं में एकता का ऐसा कोई तत्व नहीं है और कोई भी हिन्दू दूसरे हिन्दू को अपना भाई नहीं मानता। इससे स्पष्ट हो जाता है कि सिख लोग ऐसा क्यों कहते और सोचते हैं कि एक सिख या एक खालसा सवा लाख आदमियों के बराबर होता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि एक मुसलमान हिन्दुओं की भीड़ के बराबर क्यों है । निःसंदेह यह अंतर हिन्दुओं की जातिप्रथा के कारण है। जब तक जातिप्रथा रहेगी, हिन्दुओं में संगठन नाम की कोई बात नहीं रहेगी और जब तक उनमें संगठन नहीं होगा हिन्दू कमजोर और डरपोक रहेंगे। हिन्दू कहते हैं कि उनकी कौम बड़ी सहनशील है । मेरे मत से यह बात सही नहीं है। अनेक अवसरों पर यदि उनका असहनीय रूप देखा जा सकता है और कुछ अवसरों पर उनमें सहनशीलता देखी जाती है, तो उसका कारण यह है कि या तो वे विरोध करने में अत्यधिक शक्त हैं, या पूरी तरह उदासीन हैं। हिन्दुओं की यह उदासीनता इस कदर उनकी आदत का हिस्सा बन चुकी है कि हिन्दू किसी अपमान या अन्याय को बुजदिल बनकर सहता रहेगा। मौरिस के शब्दों में उनमें यह दिखाई देता है। कि “बड़े लोग छोटे लोगों को कुचल रहे हैं, ताकतवर लोग कमजोरों को मार रहे हैं, क्रूर लोग निडर होकर विचरण कर रहे हैं, दयालु लोग साहस न होने के कारण चुप हैं और श्रीमान लोग लापरवाह हैं।" हिन्दू देवता भी धैर्यवान और सहिष्णु हैं इसलिए अन्याय और उत्पीड़न के शिकार हुए हिन्दुओं की दयनीय स्थिति की कल्पना करना असंभव नहीं है। उदासीनता किसी समुदाय को लगने वाली सबसे घातक बीमारी है। हिन्दू परस्पर इतने उदासीन क्यों हैं? मेरे विचार से यह उदासीनता जातिप्रथा के कारण है और इसके कारण किसी अच्छे काम के लिए भी उनमें संगठन और सहयोग होना असंभव हो गया है।