“OBC जनगणना से क्यों है इंकार ? जब OBC मांगे अपना राजनीतिक अधिकार !"

डॉ. महेंद्र धावडे, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी 

महाराष्ट्र स्थानीय निकाय चुनावों (Zilla Parishads, Panchayat Samitis, और Municipal Corporations) में ओबीसी (OBC) आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उससे ओबीसी वर्ग को हुए नुकसान की पूरी कानूनी व राजनीतिक स्थिति।

     भारत में जातिगत जनगणना (Caste Census) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के राजनीतिक अधिकारों को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों, संगठनों और विचारकों के बीच अलग-अलग दृष्टिकोण हैं।

     सुप्रीम कोर्ट ने विकास किशनराव गवली बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में महाराष्ट्र जिला परिषद और पंचायत समिति अधिनियम के उस प्रावधान को खारिज कर दिया, जिसके तहत ओबीसी को सीधे 27% राजनीतिक आरक्षण दिया जाता था।

     संविधान के अनुच्छेद 243 (विशेषकर 243D और 243T) में संशोधन और स्थानीय निकाय चुनावों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण बहस का विषय है। 

     अनुच्छेद 243D और 243T के तहत उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण देना राज्यों के लिए संवैधानिक रूप से अनिवार्य (Mandatory) है।

Gine Hi Nahi Jaate OBC Janganana aur Rajniti Adhikar ki Ladai

     अनुच्छेद 243D(6) और 243T(6) के तहत OBC को आरक्षण देने का अधिकार पूरी तरह से राज्य सरकारों के विवेक (Discretionary) पर छोड़ दिया गया है। वे चाहें तो कानून बनाकर आरक्षण दे सकती हैं, अन्यथा नहीं। ओबीसी समर्थक नेताओं का मानना है कि जब तक इसे संवैधानिक रूप से अनिवार्य नहीं बनाया जाता, तब तक ओबीसी को पूर्ण न्याय नहीं मिल सकता।

सुप्रीम कोर्ट का 'ट्रिपल टेस्ट

     सुप्रीम कोर्ट ने के. कृष्णमूर्ति (2010) और विकास किशनराव गवली (2021) मामलों में यह स्पष्ट किया कि राजनीतिक पिछड़ापन, सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन से अलग होता है। कोर्ट ने स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण लागू करने के लिए राज्यों के सामने तीन शर्तें (Triple Test) रखी हैं।

१) स्थानीय निकायों में पिछड़ेपन की प्रकृति और प्रभाव की जांच के लिए एक समर्पित आयोग (Dedicated Commission) का गठन करना।

२) आयोग की सिफारिशों के आधार पर स्थानीय निकाय-वार आवश्यक आरक्षण का अनुपात तय करना।

३) कुल आरक्षण (SC, ST और OBC मिलाकर) किसी भी स्थिति में 50% की सीमा से अधिक नहीं होना चाहिए।

     इसके कारण कई राज्यों में डेटा या समर्पित आयोग न होने की वजह से ओबीसी सीटों को सामान्य घोषित कर चुनाव कराने के अदालती आदेश आए, जिससे ओबीसी संगठनों और बलीराजा पार्टी जैसे राजनीतिक पार्टियों में असंतोष बढ़ा है ।

OBC को मिलने वाला 27% का कोटा घटकर 10% से 15% या कुछ जगहों पर शून्य

     १)जिन आदिवासी-बहुल या ग्रामीण जिलों (जैसे गढ़चिरौली, नंदुरबार आदि) में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की आबादी पहले से ही बहुत अधिक है, वहां उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण देने के बाद 50% की सीमा के भीतर ओबीसी के लिए बहुत कम जगह बचती है। इसके चलते कई जिलों में ओबीसी को मिलने वाला 27% का तय कोटा घटकर 10% से 15% या कुछ जगहों पर शून्य तक रह गया है।

     २)जब महाराष्ट्र सरकार ने बिना 'ट्रिपल टेस्ट' पूरा किए अध्यादेशों के जरिए चुनाव कराने की कोशिश की, तो सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी के लिए आरक्षित सीटों पर रोक लगा दी और राज्य चुनाव आयोग को आदेश दिया कि इन ओबीसी सीटों को सामान्य (ओपन) श्रेणी के रूप में पुन: अधिसूचित कर चुनाव कराए जाएं। इससे ओबीसी वर्ग के हाथ से कई पारंपरिक सीटें निकल गईं।

     ३) ग्राम पंचायतों, पंचायत समितियों और जिला परिषदों को जमीनी राजनीति की नर्सरी माना जाता है। OBC कोटा सीमित होने या सीटें जनरल होने के कारण ओबीसी समाज के स्थानीय कार्यकर्ताओं के लिए नेतृत्व में आने के अवसर सीमित हो गए हैं।

     ४)सुप्रीम कोर्ट के फैसलों, वार्ड परिसीमन (Delimitation) के विवादों और बांठिया आयोग (Banthia Commission) की रिपोर्ट के बाद भी कानूनी अड़चनों के कारण महाराष्ट्र में जिला परिषदों और नगर निगमों के चुनाव लंबे समय से टलते रहे हैं। इस प्रशासनिक शून्य के कारण ओबीसी नेता अपने अधिकार के लिए लोकतांत्रिक रूप से दावेदारी नहीं कर पा रहे हैं।

     सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त बांठिया आयोग ने ओबीसी को 27% तक आरक्षण देने की सिफारिश तो की, लेकिन 50% की कुल संवैधानिक सीमा को बनाए रखा। इसी वजह से यह समस्या आज भी जस की तस बनी हुई हैं।

Justice for OBC

     १)बलीराजा पार्टी का तर्क है कि जब तक अनुच्छेद 243 में संशोधन करके ओबीसी आरक्षण को राज्यों के विवेक से हटाकर "संवैधानिक बाध्यता" नहीं बनाया जाता और 50% की सीमा को शिथिल नहीं किया जाता, तब तक स्थानीय राजनीति में ओबीसी की भागीदारी सुरक्षित नहीं होगी।

     २)ओबीसी समुदाय की आबादी देश में सबसे बड़ी है। स्थानीय स्वशासन (Panchayati Raj) जमीनी स्तर पर नेतृत्व तैयार करता है, इसलिए वहां मजबूत प्रतिनिधित्व के बिना उनका वास्तविक राजनीतिक सशक्तिकरण अधूरा रहेगा इसलिये बलीराजा पार्टी इसका ओबीसी जनगणना का पुरजोर समर्थन करती है ।

     ३)पूरे देश में ओबीसी की स्थिति एक जैसी नहीं है। कुछ राज्यों में कुछ ओबीसी जातियां राजनीतिक और आर्थिक रूप से बेहद मजबूत हैं, जबकि कुछ बेहद पिछड़ी (EBC) हैं। ऐसे में बिना ठोस डेटा के एकतरफा संवैधानिक आरक्षण देने से जमीनी स्तर पर विसंगतियां पैदा हो सकती हैं।

     ४)बलीराजा पार्टी ने समय-समय पर ओबीसी समुदाय का उपयोग मुख्य रूप से 'वोट बैंक' के रूप में किया है ऐसा आरोप लगाया है । डॉ. महेंद्र धावड़े का तर्क है कि आबादी के अनुपात में इस वर्ग को आज भी सरकारी नौकरियों, उच्च शिक्षा और न्यायपालिका के उच्च पदों पर उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला है।

     ५)सर्वोच्च न्यायालय ने देशव्यापी स्तर पर जातिगत जनगणना कराने या उसे डिजिटल सेंसस टूल (जैसे सेंसस 2027) में ड्रॉप-डाउन मेनू के रूप में अनिवार्य रूप से जोड़ने के आदेश देने से इनकार किया है। अदालत का मानना है कि जनगणना का प्रारूप तय करना और डेटा एकत्र करने का तरीका पूरी तरह से सरकार का नीतिगत निर्णय (Policy Decision) है।

OBC,न्यायालय और सरकार

     भारत में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण और अधिकारों को लेकर सरकार की नीतियों और अदालती फैसलों पर अलग-अलग दृष्टिकोण और राजनीतिक बहसें देखने को मिलती हैं।

     १)27% आरक्षण लागू करने में देरी से लेकर बलीराजा पार्टी आरोप लगाती है कि कई राज्यों में, जैसे मध्य प्रदेश में, ओबीसी को 27% आरक्षण देने के कानून पर लंबे समय से अदालती विवाद चल रहे हैं।

     २)'क्रीमी लेयर' (OBC Creamy Layer) के निर्धारण को लेकर हाल ही में हुए अदालती फैसलों और सरकारी स्पष्टीकरणों के कारण कई प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC) के अभ्यर्थियों की नियुक्तियाँ अटकी रही हैं। सरकार द्वारा कोर्ट में बार-बार अतिरिक्त समय मांगने को बलीराजा पार्टी ने 'गुमराह करने' और अधिकारों से वंचित रखने की राजनीतिक मंशा के रूप में देखते हैं।

     ३)केंद्रीय सूची में शामिल 2,600 से अधिक ओबीसी जातियों में से रोहिणी आयोग (Rohini Commission) की प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, 97% आरक्षण का लाभ केवल 25% प्रभावी उप-जातियों को मिला है, जबकि 37% जातियों को शून्य लाभ हुआ है। आलोचकों का कहना है कि सरकार इस रिपोर्ट को लागू करने में देरी कर रही है, जिससे सबसे पिछड़े वर्गों को उनका हक नहीं मिल पा रहा है।

     इस प्रकार, एक तरफ जहां विभिन्न राजनीतिक दल और सामाजिक कार्यकर्ता इसे सरकारों और व्यवस्था द्वारा ओबीसी समाज को उलझाने को उलझाने की साजिश है । न्यायालय ओबीसी की संख्या की मांग करती है तो सरकार ओबीसी जनगणना करने से इनकार करती है । भारत के राजनीति में सबसे अधिक आबादी वाली जनसंख्या के साथ सरकार और न्यायपालिका अपराध कर रही है ऐसा कहने और लिखने कोई परहेज नही है ।