डॉ. महेंद्र धावडे, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपनी कठोर आंतरिक अनुशासन, 'एकचालकानुवर्तित्व' (एक नेतृत्व के प्रति निष्ठा) और सांघिक शिष्टता के लिए जाना जाता है। इसके बावजूद, एक जीवंत संगठन होने के नाते और विशेष रूप से राजनीतिक मोर्चे (BJP) पर सत्ता के अभूतपूर्व विस्तार के बाद, इसके भीतर और सहयोगी संगठनों के साथ वैचारिक, रणनीतिक और व्यावहारिक टकराव के कई बिंदु समय-समय पर सामने आते रहे हैं।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ प्रचारक और पूर्व सह-सरकारवाह सुरेश सोनी और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच के रिश्ते तथा संघ के भीतर उनके प्रभाव को लेकर राजनीतिक गलियारों और मीडिया रिपोर्टों में लंबे समय से विभिन्न चर्चाएं होती रही हैं।

विवाद -
पिछले एक दशक में भाजपा में एक ही नेता (नरेंद्र मोदी) के इर्द-गिर्द केंद्रित राजनीति और सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण को लेकर संघ के भीतर एक वर्ग असहज रहा है। संघ का मानना है कि सामूहिक नेतृत्व और संस्थागत निर्णय प्रक्रिया ही स्थायी होती है।
सुरेश सोनी भूमिका
लंबे समय से (विशेषकर 2006 से 2014 के बीच) संघ और भाजपा के बीच समन्वय (Liaison Person) का मुख्य दायित्व संभाला था। 2013-14 के दौरान नरेंद्र मोदी को भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की प्रक्रिया में संघ की ओर से उनकी भूमिका को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है।
१)भाजपा के मामलों में उनके कथित हस्तक्षेप और निर्णयों को लेकर समय-समय पर पार्टी के भीतर कुछ वरिष्ठ नेताओं द्वारा असंतोष व्यक्त करने की खबरें मीडिया में आईं। पूर्व में एल.के. आडवाणी के समर्थकों और मध्य प्रदेश की राजनीति में उनके प्रभाव को लेकर कई तरह के मतभेद सामने आए थे।
२)साल 2014 में मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले की जांच के दौरान कुछ बयानों में उनका नाम कथित तौर पर आने के बाद विवाद खड़ा हुआ था, हालांकि सोनी ने इसे अपने खिलाफ राजनीतिक साजिश बताया था। इसके बाद संघ ने उनके स्थान पर कृष्ण गोपाल को भाजपा के साथ समन्वय का दायित्व सौंप दिया था और सोनी को कुछ समय के लिए अध्ययन अवकाश पर भेज दिया गया था।
३)पिछले कुछ समय से वे संघ के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल के सदस्य के रूप में सक्रिय रहे हैं। मध्य प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री मोहन यादव के आने के बाद और भाजपा की आंतरिक संगठनात्मक बैठकों में सुरेश सोनी की मौजूदगी व उनके दौरों को लेकर मीडिया विश्लेषकों द्वारा राज्य भाजपा में सत्ता संतुलन और समानांतर प्रभाव केंद्रों की चर्चा की जाती रही है।
संघ और भाजपा के अंतर्संबंधों में किसी भी नेता की भूमिका को लेकर मीडिया में 'घमासान' या 'दखलंदाजी' जैसे शब्दों का प्रयोग राजनीतिक विश्लेषणों के तहत किया जाता है, जबकि संघ आधिकारिक तौर पर इसे एक स्वाभाविक वैचारिक और संगठनात्मक समन्वय की प्रक्रिया मानता है।
४)पहले देशभर में संघ व भाजपा के बीच समन्वय का काम देख रहे सोनी इन दिनों हाशिये पर हैं। उनके बारे में हुए इस निर्णय को व्यापम घोटाले से जोड़कर भी देखा जा रहा है। एसटीएफ के समक्ष मिहिर के बयान में सोनी का नाम आया था।
५)RSS की पारंपरिक रूप से अनुशासित शाखाओं में एक खामोश सत्ता संघर्ष चल रहा है। लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद,RSS प्रमुख मोहन भगवत ने भारतीय जनता पार्टी के साथ RSS के संपर्क अधिकारी सुरेश सोनी को बदलने का फैसला किया। लेकिन सोनी, जो RSS के सह सरकार्यवाह या संयुक्त महासचिव हैं, मध्य प्रदेश के एक शिक्षा घोटाले में नाम आने के बाद पद छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
६)सोनी ने मध्य प्रदेश में शिक्षकों की भर्ती में अनियमितता के आरोपों में अपना नाम घसीटा है। यह मुद्दा इतना गंभीर हो गया कि कई शीर्ष RSS नेताओं ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से सोनी का नाम लीक होने पर अपनी नाराजगी व्यक्त की। RSS खुद को "अनुशासित" और "एकजुट" बताता रहा है लेकीन RSS के संगठन के संपर्क अधिकारी को न बदल पाना एक गंभीर संकट है। RSS के शीर्ष नेताओं में शायद इतना मतभेद आज तक देखने को नही मिला है ।BJP और RSS के सूत्रों के अनुसार, सोनी संघ परिवार में इतने मजबूत स्तंभ हैं कि उन्हें चुपचाप हटाना तभी संभव होगा जब वे स्वयं पद छोड़ना चाहें। पिछले दस वर्षों में उनकी शक्ति इतनी बढ़ गई है कि संघ परिवार में उनका प्रभाव RSS प्रमुख मोहन भागवत के बराबर हो गया है। उनके पद के लिए कुछ दावेदारों की चर्चा पहले से ही खुलेआम चल रही थी। नरेंद्र मोदी के करीबी माने जाने वाले RSS के संयुक्त महासचिव कन्नड़ भाषी दत्तात्रेय होसबले संगठन के भीतर चुपचाप अपनी ताकत बढ़ा रहे थे है ।
७)इंद्रेश कुमार का मोदी पर दिया गया बयान पढ़कर किसी भी आम इंसान को सोचने पर मजबूर कर देता है ।"भगवान राम ने भाजपा को उसके अहंकार के लिए दंडित किया है और उसकी सीटों की संख्या 240 तक सीमित कर दी है”।
८)भाजपा नेताओं ने 'मोदी की गारंटी' अभियान को आगे बढ़ाया। यही कारण था कि पहले चरण के मतदान के बाद आरएसएस ने थोड़ा पीछे हट गया।
RSS के मिजाज को भांपते हुए, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इस मुद्दे को सार्वजनिक करते हुए बयान दिया, “शुरुआत में भाजपा इतनी मजबूत नहीं थी, इसलिए हमने RSS का सहारा लिया। लेकिन अब बीजेपी-RSS से आगे निकल चुकी है और उसे संगठन चलाने या चुनाव लड़ने में RSS की मदद की जरूरत नहीं है।”
९) जिन्ना विवाद के समय, भागवत ने होसबले को ही आडवाणी को यह बताने के लिए भेजा था कि उन्हें विपक्ष के नेता पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।
संघ के इस फैसले से मोदी के लिए रास्ता आसान हो जाएगा, क्योंकि होसबले को मोदी समर्थक और समझौतावादी नेता माना जाता है।
टकराव के बिंदु
१)भाजपा द्वारा चुनाव जीतने के लिए विपक्षी दलों के भ्रष्ट या धुर-विरोधी नेताओं को शामिल करने और उन्हें टिकट या मंत्री पद देने की रणनीति पर संघ का पुराना कैडर आपत्ति जताता रहा है।
२)संघ का आनुषंगिक संगठन स्वदेशी जागरण मंच (SJM) और भारतीय मजदूर संघ (BMS) कॉर्पोरेट समर्थक नीतियों, अंधाधुंध निजीकरण और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के खिलाफ रहे हैं।
३)चुनाव जीतने के लिए भाजपा को अक्सर अत्यधिक जातिगत जोड़-तोड़ और क्षेत्रीय उप-जातियों को साधने की राजनीति करनी पड़ती है। कई बार टिकटों के बंटवारे या मुख्यमंत्रियों/मंत्रियों के चयन में जब संघ सामाजिक संतुलन या सुशासन को प्राथमिकता देना चाहता है, तो भाजपा केवल 'चुनावी जीत की क्षमता' (Winnability) को देखती है।
४)भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(c) सभी नागरिकों को बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के संघ या संगठन बनाने का मौलिक अधिकार देता है। जब तक कोई संगठन गैर-कानूनी गतिविधियों में लिप्त न हो, सरकार किसी भी निजी संस्था या संगठन को जबरन अपने नियंत्रण में नहीं ले सकती।
५)लेकीन सारांश यही है कि RSS के बने आलीशान दप्तर बनाने के लिये और जमीन खरीदने के लिये जो करोड़ों रुपया ख़र्च किया गया उसको जाच की दायरे मे लाया जायेगा और दबाव बनाया जायेगा । यदि संघ सरकार की बात मान लेता है तो संघ संघ प्रमुख तय करने का अधिकार सरकार अपने पास ले लेंगी और संघ को अपने हिसाब से कार्य करने के लिये बाध्य करेगी ।
६)देश के पूर्व उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का शामिल होना ही था। आखिर क्यों संघ भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं को आंख दिखाने वाले जगदीप धनखड़ को मंच दे रहा है ? क्या धनखड़ को मंच पर बुलाना किसी को राजनीतिक संदेश देने की रणनीति थी?
७)सुरेश सोनी को कई बार संघ प्रमुख मोहन भागवत सीधे तौर पर साफ कह चुके हैं कि वह भाजपा में दखल देना बंद करें। संघ और भाजपा के बीच समन्वय का जिम्मा अब उनके पास नहीं है। लेकिन इसके बाद भी सुरेश सोनी लगातार भाजपा के भीतर कई बड़े फैसलों के पीछे देखे जा रहे हैं।
८)मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री चयन से लेकर पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा का दतिया से टिकट कटवाने से लेकर कई मामलों में उनका नाम सामने आता रहा है। कई बार मध्यप्रदेश सरकार के मुश्किल वक्त में वह समन्वयक की भूमिका में भी नजर आ जाते हैं। पिछले दिनों चित्रकूट, रीवा की मुलाकातें चर्चा में आई थीं।
९) चुनावों के बाद भाजपा और संघ के बीच कुछ रणनीतिक मुद्दों या बयानों को लेकर जो आंतरिक खींचतान दिखती है, उसे कुछ लोग गलतफहमी में "सरकार द्वारा संघ को दबाने या नियंत्रण में लेने की कोशिश" समझ लेते हैं।
पब्लिक प्रॉपर्टी' और नियमों के तहत कार्रवाई का अधिकार
अदालतें सरकार को मनमानी करने से रोकती हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि संगठन कानून से ऊपर है। सरकार के पास कुछ स्थितियों में कार्रवाई करने का वैध अधिकार होता है।
सार्वजनिक संपत्ति का नियमन
हाल ही में कर्नाटक जैसे राज्यों में 'सार्वजनिक संपत्ति उपयोग नियमन विधेयक' (Public Property Bill) जैसे कानून लाए गए हैं। इसके तहत सरकारी मैदानों, स्कूलों या सड़कों पर किसी भी कार्यक्रम या पथ-संचलन के लिए स्थानीय प्रशासन (DC/SP) से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य किया जा सकता है। यदि कोई संगठन बिना अनुमति के ऐसी जगहों का उपयोग करता है, तो प्रशासन कानूनी कार्रवाई कर सकता है।
यदि संगठन देश के स्थापित कानूनों (जैसे टैक्स नियम, भूमि उपयोग कानून) का उल्लंघन करेगा, तो सरकार को उस पर कार्रवाई करने का पूरा अधिकार होगा।
इसी कोई बात को लेकर दोनों के बीच टकराव चल रहा है ,देखना होगा आगे क्या होता है ।