डॉ. महेंद्र धावडे, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी
बलीराजा पार्टी एससी, एसटी की तर्ज पर ओबीसी की जनगणना करने के पक्ष पर बात करती है, इस्लिये कानूनी सलाह ली जा रही है.यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण और गंभीर तकनीकी चिंता है, जिसे लेकर देश के कई राजनेताओं, समाजशास्त्रियों और नीति निर्धारकों के बीच लगातार बहस चल रही है।आपकी बात बिल्कुल सही है कि अगर डिजिटल ऐप या जनगणना फॉर्म में ओबीसी (OBC) के लिए एक अलग, स्पष्ट और केंद्रीय स्तर का रकाना (कॉलम/ब्लॉक) नहीं रखा गया, तो आंकड़ों के निर्धारण और उनकी सत्यता में कई बड़ी व्यावहारिक समस्याएं आएंगी।
राज्यों और केंद्र की ओबीसी सूचियों में अंतर
भारत में ओबीसी आरक्षण की दो अलग-अलग सूचियां होती हैं।जिसका उपयोग केंद्र सरकार की नौकरियों और आईआईटी/एम्स जैसे केंद्रीय संस्थानों में दाखिले के लिए होता है।हर राज्य की अपनी अलग सूची होती है। उदाहरण के लिए, कोई जाति किसी राज्य में ओबीसी (या ईबीसी/बीसी) श्रेणी में आ सकती है, लेकिन केंद्र की सूची में वह सामान्य (General) श्रेणी में हो सकती है।यदि फॉर्म में सिर्फ "OBC (Yes/No)" का रकाना होगा, तो एक व्यक्ति अपने राज्य के हिसाब से 'हां' भर देगा, लेकिन केंद्र के डेटा में वह गलत दर्ज हो जाएगा।

जाति उप-जातियों की जटिलता
यदि जनगणना कर्मी ऐप में किसी विशिष्ट जाति का नाम हाथ से टाइप (Free Text Entry) करता है, तो भारी विसंगतियां पैदा होंगी।
उदाहरण के लिए, एक ही जाति को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग स्पेलिंग या स्थानीय उप-नामों (जैसे- यादव, अहीर, राव) से पुकारा जाता है।
डिजिटल सिस्टम 'Yadav' और 'Jadav' या 'Kushwaha' और 'Koeri' को दो अलग जातियां मान सकता है, जिससे डेटा का सही निर्धारण (Aggregation) करना लगभग असंभव हो जाएगा।
रोहिणी आयोग और विवाद
केंद्र सरकार ने ओबीसी के भीतर भी अति-पिछड़ों को न्याय दिलाने के लिए रोहिणी आयोग (Rohini Commission) का गठन किया था। आयोग का मानना है कि ओबीसी की कुछ ही जातियों को आरक्षण का बड़ा लाभ मिला है।अगर डिजिटल जनगणना में जातियों का सटीक और स्पष्ट वर्गीकरण नहीं हुआ, तो यह पता लगाना मुश्किल होगा कि ओबीसी के भीतर कौन सी उप-जातियां आज भी सबसे ज्यादा पिछड़ी हुई हैं।
संवैधानिक अधिकार
सातवीं अनुसूची (Union List - Entry 69): भारतीय संविधान की 7वीं अनुसूची के तहत 'जनगणना' (Census) संघ सूची (Union List) का विषय (प्रविष्टि 69) है। इसका मतलब है कि संसद ही इस पर कानून बना सकती है और केंद्र सरकार ही इसे लागू कर सकती है।अनुच्छेद 246 (Article 246): यह अनुच्छेद केंद्र सरकार को संघ सूची के विषयों (जैसे जनगणना) पर कानून बनाने और उस पर प्रशासनिक कार्रवाई करने की अनन्य शक्ति देता है।अनुच्छेद 340 (Article 340): यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC) की स्थिति की जांच करने और उनके कल्याण के लिए कदम उठाने का अधिकार देता है। इसी के तहत ओबीसी डेटा जुटाना संवैधानिक रूप से मान्य माना गया है।
वैधानिक प्रक्रिया
राष्ट्रीय स्तर पर ओबीसी डेटा जुटाने की कानूनी प्रक्रिया जनगणना अधिनियम, 1948 (Census Act, 1948) के प्रावधानों के तहत पूरी की जाती है।धारा 3 (अधिसूचना जारी करना): इस कानून की धारा 3 के तहत केंद्र सरकार (गृह मंत्रालय) आधिकारिक राजपत्र (Gazette Notification) में अधिसूचना जारी कर पूरे देश में या किसी हिस्से में जनगणना कराने की घोषणा करती है। 2027 की जनगणना और जाति गणना के लिए सरकार ने इसी धारा के तहत अधिसूचना जारी की है।धारा 8 (नागरिकों की बाध्यता): इस धारा के तहत देश के प्रत्येक नागरिक का यह कानूनी कर्तव्य है कि वह जनगणना अधिकारी द्वारा पूछे गए सभी सवालों (जैसे उसकी जाति या ओबीसी स्थिति) का सच्चा और सही जवाब दे। गलत जानकारी देना या जानकारी छुपाना इस कानून के तहत दंडनीय है।धारा 11 (दंड का प्रावधान): यदि कोई व्यक्ति जानकारी देने से इनकार करता है या जनगणना कर्मियों के काम में बाधा डालता है, तो इस धारा के तहत जुर्माने या कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है।धारा 15 (डेटा की गोपनीयता): यह इस प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके अनुसार, जनगणना में जुटाया गया किसी भी व्यक्ति का व्यक्तिगत डेटा पूरी तरह गोपनीय (Confidential) रहेगा। इसे किसी अदालत या अन्य एजेंसी के साथ साझा नहीं किया जा सकता। सरकार केवल सामूहिक आंकड़े (Aggregate Statistical Data) ही सार्वजनिक कर सकती है।
भारत के संविधान और कानूनी ढांचे के अनुसार, जनगणना (Census) कराने और उसमें ओबीसी (OBC) या किसी भी जाति का डेटा जुटाने का विशेष अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। राज्य सरकारें अपने स्तर पर 'सर्वे' (जैसे बिहार का जाति सर्वे) तो कर सकती हैं, लेकिन वे आधिकारिक 'जनगणना' नहीं करा सकतीं।
ओबीसी जनगणना को लेकर देश में चल रही राजनीतिक और सामाजिक बहस बहुत गहरी है। जहां एक तरफ सरकार और उसके समर्थक इसे पिछड़े वर्गों के सशक्तिकरण के लिए एक ऐतिहासिक कदम मानते हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष और कई आलोचक इसे महज एक राजनीतिक 'जुमला' (चुनावी हथकंडा) करार देते हैं।सुप्रीम कोर्ट ने भी कई मामलों में कहा है कि आरक्षण की सीमा तय करने या बढ़ाने के लिए सरकारों के पास 'सटीक और समकालीन डेटा' (Quantifiable Data) होना जरूरी है। सरकार इसी कानूनी जरूरत को पूरा करने के लिए यह कदम उठा रही है।जनगणना के जमीन पर लागू होने के बाद आंकड़े SC,ST जैसे स्पष्ट ना होने से OBC किस रूप में सामने आते हैं। नीति विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस डेटा के आधार पर वास्तव में पिछड़ी जातियों को शिक्षा, नौकरियों और बजट में उनका हक मिलता है, तो यह एक बड़ा सामाजिक सुधार साबित होगा। अन्यथा, जनगणना का 'जुमला' वाला आरोप सही प्रतीत होने लगेगा।