अमेरिका में भागवत : विवेकानंद नंबर टू या पाखंडी नंबर वन !

( आलेख : राजेंद्र शर्मा )

     "अगर कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमान रहें ही नहीं, तो वह हिंदू रहेगा ही नहीं।" और यह भी कि, "अगर कोई खुद को हिंदू कहता है, तो उसे यह मानना होगा कि रास्ते (पूजा पद्घतियां) अलग-अलग हैं, पर एक ही लक्ष्य को जाते हैं।" हिंदू की यह परिभाषा और पहचान, किसी और ने नहीं, आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने न्यूयार्क के अपने दौरे पर पेश की है। जाहिर है कि हिंदू और हिंदुत्व की इस तरह की उदार परिभाषा पेश करने के जरिए, संघ प्रमुख न सिर्फ आरएसएस की, बल्कि उसके द्वारा सख्ती से नियंत्रित मोदी शासन की भी, इसके लिए दुनिया भर में हो रही आलोचनाओं को नकारने की कोशिश कर रहे थे कि वे असल में हिंदू सर्वोच्चतावादी राज और राजनीति के प्रतिनिधि हैं, जो हर प्रकार के अल्पसंख्यकों के अधिकारों की दुश्मन है।  

     बहरहाल पश्चिम में आरएसएस-मोदी राज के धर्मनिरपेक्ष मेकओवर की यह कोशिश, कारगर होती नजर नहीं आती है। इसकी मोटे तौर पर दो बड़ी वजहें हैं। पहली तो यही कि यह कोशिश बढ़ती संख्या में अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक अधिकार तथा मानवाधिकार संगठनों ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र संघ के मंचों द्वारा भी, मोदी के राज में धार्मिक अल्पसंख्यकों समेत विभिन्न कमजोर तबकों के साथ बढ़ते भेदभाव तथा उनके अधिकारों पर बढ़ते हमलों की, एक के बाद लगातार आ रही रिपोर्टों के दबाव में की जा रही थी। यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (यूएससीआईआरएफ) के मोदी राज को साल दर साल धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति के पहलू से 'गंभीर चिंता' का विषय घोषित करने और हर बार अमेरिकी सरकार पर इस सिलसिले में भारत पर दबाव डालने के लिए पाबंदियां लगाने की मांग करने के बाद, अब संयुक्त राष्ट्र संघ की कमेटी ऑन एलीमिनेशन आफ रेशियल डिस्क्रिमिनेशन (सीईआरडी) ने भी अपनी समीक्षा रिपोर्ट में, भारत की स्थिति को 'गंभीर चिंता' का विषय कहा है।  

Alpsankhyak Atyachar Aur America Mein Bhagwat Ka Virodh

     परदेश में मोदी राज और उसके वाहक के रूप में आरएसएस के इस मेकओवर के लोगों को भ्रमित न कर पाने की और भी बड़ी वजह, इस राज तथा आरएसएस का वास्तविक आचरण है, जो आरएसएस के मेकओवर की इस कोशिश को, एक भोंडे प्रहसन में तब्दील कर देती है। यह संयोग ही नहीं है कि ठीक उस समय, जब मोहन भागवत अमेरिका में यह साबित करने की कोशिश कर रहे थे कि उनकी हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना तो सर्वसमावेशी है, ठीक उसी समय सत्ताधारी भाजपा का आईटी सेल, देश में एक ऐसा नया आक्रामक वीडियो रील अभियान छेड़ रहा था, जिसकी एक और सिर्फ एक ही थीम है — विरोधियों के खिलाफ भयानक हिंसा। लेकिन, सत्ताधारी पार्टी के प्रचार आह्वान में हिंसा के स्वर का बढ़ना ही, अकेला बदलाव नहीं था, जो भारत में ठीक उसी समय हो रहा था, जब अमेरिका में भागवत एक झूठा उदार मुखौटा लगाने की कोशिश कर रहे थे। जब अमेरिका में भागवत यह कह रहे थे कि 'अगर कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमान रहें ही नहीं, तो वह हिंदू रहेगा ही नहीं', ठीक उसी समय भाजपा-शासित उत्तराखंड और ओडिशा से इसकी रिपोर्टें आ रही थीं कि किस तरह, इस दौरान जारी एसआईआर की प्रक्रिया को, टार्गेट कर के मतदाता सूचियों से मुसलमानों के नाम काटे जाने के मौके में तब्दील किया जा रहा है। उधर चंद महीने पहले संघ-भाजपा द्वारा फतेह किए गए प. बंगाल में, एक ओर चर्चों तथा पादरियों पर हिंसक हमलों की शुरूआत हो रही थी और दूसरी ओर, दुर्गा पूजा के बंगाली प्रभावों से 'शुद्घीकरण' की मुहिम छेड़ी जा रही था। 

     जब भागवत इसका उपदेश कर रहे थे कि, 'हरेक मनुष्य की गरिमा का सम्मान होना चाहिए,' ठीक तभी उनके संघ पोषित राज में उत्तराखंड में, देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष के दलित होने के कारण, उनकी सभा के बाद सभा मंच का बाकायदा यज्ञ कर के 'शुद्घीकरण' किए जाने के बाद, सत्ताधारी पार्टी के नेतागण उसका बचाव करने से लेकर, उसे झुठलाने तक में लगे हुए थे, जबकि देश के कानून के अनुसार यह संज्ञेय अपराध है। और जब भागवत अमेरिकी श्रोताओं को यह भरोसा दिला रहे थे कि उनके विचार-परिवार की नजरों में 'सब मनुष्य समान हैं', उसके आस-पास संसद में विपक्ष के नेता, राहुल गांधी के महिला स्वतंत्रता के पक्ष में बोलते हुए, 'पितृसत्ता' पर हमला करने और उसे सैद्घांतिक-धार्मिक वैधता देने के लिए 'मनुस्मृति' की आलोचना करने के लिए, सत्ता में बैठे भागवत अनुयायी, महिलाओं और शूद्रों की पूर्ण अधिकारहीनता की पैरवी करने वाली इस नियमावली का हिंदू-धार्मिक ग्रंथ कहकर बचाव ही नहीं कर रहे थे, इस आलोचना को हिंदुओं पर हमला बताकर, इस बहस को भी सांप्रदायिक मोड़ देने की कोशिश कर रहे थे। कहने की जरूरत नहीं है कि इन और ऐसे सभी मामलों में संघ की सेनाएं, जमीन पर भारत में और वास्तव में एक हद तक तो अमेरिका समेत पश्चिम में भी, उन तमाम उदार आदर्शों के खिलाफ युद्घ ही छेड़े रही हैं, जिनका उपदेश भागवत संघ के मेकओवर के लिए कर रहे थे और भागवत ने कभी उन्हें टोका हो, इसके कोई साक्ष्य नहीं हैं।  

     कहीं ऐसा तो नहीं कि न सिर्फ सत्ता में बैठी भाजपा, बल्कि उसके दबाव में संघ परिवार का बड़ा हिस्सा ही, आरएसएस प्रमुख के विचारों से दूर चला गया हो? तत्काल कम से कम तीन प्रसंग ऐसे याद आते हैं, जिनमें स्वयं संघ प्रमुख भागवत वर्तमान शासन और संघ परिवार को, न्यूयार्क के उनके उपदेश से ठीक उल्टी दिशा में धकेलने की अगुआई करते हुए दुनिया ने देखा था। पहला प्रसंग, मोदी राज के शुरूआती दौर का है, जब गो-गुंडों की मॉब लिंचिंग का सिलसिला शुरू ही हो रहा था। 6 अगस्त 2016 को दिल्ली में एक आयोजन में प्रधानमंत्री मोदी ने इसके खिलाफ कड़े शब्दों का प्रयोग करते हुए, कहा था कि बहुत से लोग दिन में गोरक्षक बन जाते हैं और रात को अपराध करते हैं। उन्होंने राज्यों से उनसे सख्ती से निपटने का आग्रह भी किया था। अगले दिन, तेलंगाना में प्रधानमंत्री ने यही बात दोहरायी थी। 

     लेकिन, उसके बाद अचानक प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे पर मौन साध लिया और साल भर बाद, बापू से जुड़े साबरमती आश्रम की शताब्दी के एक आयोजन में काफी दबे शब्दों में इसकी शिकायत की कि गोभक्ति के नाम पर लोगों की हत्याएं हो रही हैं, जो स्वीकार्य नहीं है। ऐसी हिंसा को गांधी जी ने मंजूर नहीं किया होता। हुआ यह था कि प्रधानमंत्री के शुरूआती बयानों के बाद, खुद मोहन भागवत ने सार्वजनिक बयान देकर, कथित गोरक्षकों का यह कहकर बचाव किया था कि उनमें ज्यादातर 'अच्छा काम' कर रहे थे। मोदी ने फौरन पांव पीछे खींच लिए और उसके बाद न उन्हें गोरक्षकों की हिंसा दिखाई दी और न किसी भाजपा सरकार ने ऐसे मामलों में कोई खास कार्रवाई की। 

     इसी प्रकार, 2018 के अपने दशहरा संबोधन में, मोहन भागवत ने मोदी सरकार से मांग की थी कि अब अदालत के फैसले की जरूरत नहीं है, संसद से कानून बनाकर राम मंदिर बनाया जाए। बाद में नवंबर के आखिर में हुई विहिप की हुंकार रैली में उन्होंने फौरन मंदिर बनाने की मांग को और बढ़ाया। याद रहे कि 2019 की दूसरी तिमाही में चुनाव होने थे। 2019 के नवंबर तक, सुप्रीम कोर्ट से मंदिर के पक्ष में निर्णय आ चुका था। इसके बाद भी, 'मथुरा-काशी बाकी है' के नारे पर अपने एक बहुप्रचारित लंबे साक्षात्कार में भागवत ने यह तो कहा था कि आरएसएस इन्हें लेकर आंदोलन नहीं चलाने जा रहा है, लेकिन इसके साथ यह भी जोड़ दिया था कि आरएसएस के सदस्य निजी हैसियत से इन आंदोलनों में शामिल हो सकते हैं! साफ है कि भागवत और उनका संगठन, सक्रिय रूप से वर्तमान हुकूमत को, बहुसंख्यकवादी तानाशाही के रास्ते पर धकेलने में ही लगे रहे हैं और पश्चिम में अब जो बतकही कर रहे हैं, शुद्घ पाखंड है। 

     राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष आयोजन के बहाने से, संघ प्रमुख भागवत ने अमेरिका में सार्वभौम एकात्मता या यूनिवर्सल वननैस के अपने उपदेश के जरिए, विवेकानंद-टू बनना चाहा है। न्यूयार्क के मेडिसन स्क्वायर गार्डेन सभागार में भागवत का करीब पौने घंटे का व्याख्यान ही इस दौरे का मुख्य ईवेंट था। लेकिन, इस आयोजन में अगर करीब पांच हजार लोग, जिनमें जाहिर है कि प्रचंड बहुमत प्रवासी भारतीयों का था, श्रोताओं के रूप में शामिल हुए थे, तो सैकड़ों की संख्या में लोग, जिनमें भी प्रवासी भारतीयों की ही संख्या ज्यादा थी, विरोध जताने के लिए आयोजन स्थल के बाहर भी जमा हुए थे। बहरहाल, इस दौरे की असली सुर्खियां बनीं, इससे पहले न्यूयार्क में ही आयोजित कथित विभिन्न धर्मों के नेताओं के सम्मेलन से, जो एएचईएडी नाम के मंच द्वारा आयोजित किया गया था, जिसके तार कुछ परोक्ष रूप से आरएसएस के अमेरिका में सक्रिय बाजू, हिंदू सेवकसंघ (एचएसएस) से जुड़ते हैं। इस आयोजन ने संघप्रमुख को ईसाई, यहूदी तथा मुस्लिम धर्म का प्रतिनिधित्व करने के दावेदार वक्ताओं के साथ बोलने का मौका दिया था। यहीं भागवत ने यह दिखाने के लिए कि आरएसएस, एक हिंदू श्रेष्ठतावादी या सुप्रीमेसिस्ट संगठन नहीं है, हिंदू-इतर पश्चिमी श्रोताओं को सुहाने वाली बहुत सी अच्छी-अच्छी बातें कहीं, लेकिन संघ की असलियत की पृष्ठभूमि ने, भागवत के विवेकानंद एक्ट को प्रहसन बना दिया। गए थे विवेकानंद-टू बनने और लौटेंगे, पाखंडी नंबर वन बनकर। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका 'लोकलहर' के संपादक हैं।)