हिंदू ओबीसी के मूक क्रांति के जननायक मंडल

डॉ. महेंद्र धावडे, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी

     बी. पी. मंडल (बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल) के जन्मदिवस (25 अगस्त 1918) के अवसर पर मंडल आयोग (Mandal Commission) और उनके सामाजिक योगदान को याद किया जाता है. बी. पी. मंडल भारत में सामाजिक न्याय के सबसे बड़े पुरोधाओं में से एक माने जाते हैं, जिन्होंने देश की राजनीति और सामाजिक ताने-बाने को हमेशा के लिए बदल दिया।

मंडल आयोग का इतिहास

    भारतीय संविधान के अनुच्छेद 340 (Article 340) के तहत राष्ट्रपति को पिछड़े वर्गों की स्थिति की जांच के लिए आयोग गठन करने का अधिकार है.मंडल आयोग से पहले 1953 में 'काका कालेलकर आयोग' (प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग) बना था, लेकिन उसकी सिफारिशें ठंडे बस्ते में चली गईं. इसके बाद 1 जनवरी 1979 को मोरारजी देसाई सरकार ने द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग (मंडल आयोग) का गठन किया।

Hindu OBC Chya Mook Kranti Che Jananayak – B P Mandal

    वर्ष 1979 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार ने इस आयोग का गठन किया था।इसे आधिकारिक तौर पर सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा वर्ग आयोग (SEBC) या 'द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग' कहा जाता है।बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और सांसद बी. पी. मंडल ने इस आयोग की अध्यक्षता की, जिसके कारण इसका नाम 'मंडल आयोग' पड़ा।

पिछड़ेपन की पहचान के पैमाने

    बी. पी. मंडल की अध्यक्षता वाले इस आयोग ने केवल जाति को आधार नहीं बनाया. उन्होंने वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ तरीके से जातियों के पिछड़ेपन को मापने के लिए 11 सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक संकेतक (Indicators) तैयार किए।इन मानकों के आधार पर देश में 3,743 जातियों को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के रूप में चिन्हित किया गया, जिनकी आबादी कुल जनसंख्या की लगभग 52% थी।

मुख्य सिफारिशें

    आयोग ने देश की आबादी में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की हिस्सेदारी लगभग 52% आंकी और सरकारी नौकरियों व शैक्षणिक संस्थानों में 27 प्रतिशत आरक्षण देने की सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश की।मंडल आयोग ने 31 दिसंबर 1980 को अपनी ऐतिहासिक रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपी थी।आयोग की सिफारिशों को एक दशक बाद, 7 अगस्त 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (V.P. Singh) की सरकार द्वारा लागू करने की घोषणा की गई।

राजनीति और समाज पर असर

    मंडल आयोग के लागू होने से देश के शोषित, वंचित और पिछड़े वर्गों को भारतीय लोकतंत्र व प्रशासनिक नौकरियों में बड़ी हिस्सेदारी मिली।इस आयोग की राजनीतिक चेतना के कारण उत्तर भारत की राजनीति में लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार और शरद यादव जैसे बड़े पिछड़े वर्ग के नेताओं का उभार हुआ।

'इंद्रा साहनी' कोर्ट केस

     1990 में जब वी.पी. सिंह सरकार ने इसे लागू किया, तो देशभर में उग्र आंदोलन और विरोध प्रदर्शन हुए।इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, जिसे इतिहास में 'इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ' (Indra Sawhney vs Union of India) या 'मंडल केस' के नाम से जाना जाता है।मंडल आयोग के क्रियान्वयन ने भारत में सदियों से हाशिए पर रहे सामाजिक समूहों को प्रशासन की मुख्यधारा में लाकर खड़ा कर दिया, जिसे समाजशास्त्री भारतीय लोकतंत्र की 'मूक क्रांति' (Silent Revolution) कहते हैं.

     आज भी हर साल 25 अगस्त को बी. पी. मंडल की जयंती पर देश भर में राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों द्वारा उनके सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को याद कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है।