“न खाऊंगा, ना खाने दूंगा” ! यथार्थ .

डॉ. महेंद्र धावडे, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी 

     भारत की राजनीति में भ्रष्टाचार-विरोधी प्रतिबद्धता का एक प्रतीकात्मक नारा बन गया है, जिसे 2014 में नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ से पहले अपनाया था।  इस नारे का मूल उद्देश्य जनता को यह आश्वासन देना था कि उनकी सरकार में न तो भ्रष्टाचार होगा और न ही उसे बर्दाश्त किया जाएगा।

     यह नारा 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी द्वारा बार-बार इस्तेमाल किया गया था।  इसका शाब्दिक अर्थ है—“न तो मैं भ्रष्टाचार करूंगा, न ही किसी और को करने दूंगा।”  यह नारा तब के भ्रष्टाचार-विरोधी माहौल (जैसे 2011 के भारत भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन) में एक प्रभावी संदेश के रूप में उभरा और भाजपा की चुनावी रणनीति का केंद्र बना।

     हालाँकि यह नारा शुरुआत में व्यापक समर्थन प्राप्त करने में सफल रहा, लेकिन समय के साथ विपक्षी दलों और आलोचकों ने इसे “ढकोसला” या “होक्स” कहकर खारिज करना शुरू कर दिया।  कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने 2026 में इस नारे को “hoax” (झूठा वादा) करार दिया और दावा किया कि बाद की घटनाओं (जैसे डेमोनेटाइजेशन, राफेल सौदा, पीएम केयर्स फंड, इलेक्टोरल बॉन्ड्स आदि) ने इस वादे की खोखलीपन को उजागर किया है।

Na Khaunga Na Khane Dunga – Yatharth

     इसी तरह, 2026 में बिहार में हुए “डस्टबिन घोटाले” (जहाँ ₹500 के कूड़ेदान ₹15,490 में खरीदे गए) पर आलोचकों ने कहा कि “ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा” कहने वाले नेताओं ने ही ₹617 करोड़ का घोटाला किया।

     2026 के छात्र आंदोलनों (जैसे जंतर-मंतर प्रदर्शन) के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने इस नारे पर पछतावा जताया है।  एक व्यक्ति ने दावा किया कि उसने स्वयं यह नारा मोदी को सुझाया था, लेकिन अब उसे इस पर अफसोस है।

     दूसरी ओर, भाजपा अभी भी इस नारे को अपने आंतरिक अनुशासन और भ्रष्टाचार-रोधी छवि के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करती है—खासकर पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में संगठनात्मक मजबूती के संदर्भ में।

सच्चाई क्या है ?

     यह नारा एक राजनीतिक वादे के रूप में शुरू हुआ, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो-टॉलरेंस का संकेत देता था।

     वास्तविकता विपरीत है.आलोचकों का तर्क है कि बाद की नीतियों और घोटालों ने इस वादे की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए हैं।जनता में इस नारे को लेकर मिश्रित राय है—कुछ इसे अभी भी आदर्श मानते हैं, जबकि अन्य इसे केवल चुनावी जुमला समझते हैं।

     अंततः, “न खाऊंगा, ना खाने दूंगा” एक राजनीतिक नारा है जिसकी सफलता या विफलता का आकलन शासन की पारदर्शिता, जवाबदेही और भ्रष्टाचार-रोधी कार्रवाई के आधार पर ही किया जा सकता है।

   “BJP में शामिल भ्रष्टाचारी नेता”

     सीधा जवाब यह है कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) में समय-समय पर ऐसे कई नेता शामिल हुए हैं, जिन पर पहले से भ्रष्टाचार या अन्य गंभीर आरोप लगे थे और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुले मंच से बोला और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उनमें से कई को पार्टी में शामिल होने के बाद जांच से राहत मिली है।

     2014 के बाद विपक्ष से BJP में आए और भ्रष्टाचार के आरोपों वाले नेता

     मीडिया रिपोर्ट्स (जैसे इंडियन एक्सप्रेस और द वायर) के अनुसार, 2014 के बाद से कम से कम 25 ऐसे विपक्षी दलों के नेता BJP में शामिल हुए हैं, जिन पर केंद्रीय एजेंसियों (CBI, ED, IT) द्वारा भ्रष्टाचार की जांच चल रही थी।

     इनमें से 23 नेताओं को जांच से राहत मिल चुकी है या उनके मामले ठंडे बस्ते में चले गए हैं।कुछ मामलों में जांच पूरी तरह बंद भी कर दी गई।

     इन नेताओं में शामिल थे अजीत पवार ,प्रफुल्ल पटेल, अशोक चव्हाण, हिमंत बिस्वा सरमा, सुवेंदु अधिकारी (TMC से), प्रताप सरनाईक (शिवसेना), हसन मुश्रीफ (NCP), भावना गवली आदि।

     • तृणमूल कांग्रेस (TMC)से सुवेंदु अधिकारी सहित तीन नेता।

     • तेलुगु देशम पार्टी (TDP)से दो नेता।

     • समाजवादी पार्टी और YSR कांग्रेस से एक-एक नेता।

BJP का दावा और विपक्ष का आरोप

     विपक्ष का आरोप-BJP एक “वॉशिंग मशीन” की तरह काम कर रही है, जहाँ भ्रष्टाचार के आरोपों वाले नेता शामिल होते ही “साफ” हो जाते हैं।

     केंद्र और विभिन्न राज्यों की भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार के कार्यकाल के दौरान विपक्ष, नागरिक समाज और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा चुनावी बॉन्ड (Electoral Bonds), राफेल डील, पीएम केयर्स फंड (PM CARES) और विपक्षी नेताओं के दलबदल ("वाशिंग मशीन") जैसे कई मामलों पर भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की कमी के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

     भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में आयुष्मान भारत योजना में एक ही मोबाइल नंबर पर लाखों लाभार्थियों के पंजीकृत होने और द्वारका एक्सप्रेसवे के निर्माण लागत में अत्यधिक वृद्धि (प्रति किलोमीटर खर्च में भारी उछाल) को लेकर वित्तीय अनियमितताओं के संकेत दिए गए थे।

     मध्य प्रदेश में पूर्व का 'व्यापम घोटाला' (सरकारी नौकरियों और दाखिले की परीक्षा में फर्जीवाड़ा) सबसे चर्चित रहा है। इसके अलावा हाल ही में विपक्षी दलों ने उज्जैन भूमि विकास और पटवारी भर्ती परीक्षा के पेपर लीक मामलों में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं।

      कर्नाटक विधानसभा चुनाव (2023) से पहले राज्य ठेकेदार संघ ने आरोप लगाया था कि वहां की तत्कालीन BJP सरकार में किसी भी सरकारी टेंडर या सार्वजनिक कार्य को पास कराने के लिए 40 प्रतिशत तक कमीशन मांगा जाता था।

     महाराष्ट्र में बीजेपी सरकार के कार्यकाल मे 56% कमिशन देने की बात सरकारी ठेकेदारो ने कह देने से बीजेपी सरकार भ्रष्टाचार का केंद्र बिंदू होने की बात स्पष्ट होती है ।

     उत्तर प्रदेश में समय-समय पर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे 69000 शिक्षक भर्ती, पुलिस आरक्षी भर्ती) के पेपर लीक होने और मूल्यांकन प्रक्रियाओं में धांधली के आरोप लगे हैं, जिसे लेकर युवाओं ने बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन किए।

ज़मीनी सच्चाई

     भारत के सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित किया क्योंकि यह नागरिकों के 'जानने के अधिकार' का उल्लंघन करती थी. डेटा सार्वजनिक होने पर यह सामने आया कि सिर्फ BJP ही नहीं, बल्कि विभिन्न क्षेत्रीय और विपक्षी दलों को भी कॉर्पोरेट घरानों से भारी चंदा मिला था। कानूनी तौर पर योजना रद्द हुई, लेकिन किसी व्यक्ति पर सीधे व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का दोष साबित नहीं हुआ।

द्वारका एक्सप्रेसवे

     सड़क परिवहन मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि CAG ने प्रति किलोमीटर लागत का अनुमान कैबिनेट द्वारा स्वीकृत सामान्य 2-लेन सड़क के आधार पर लगाया था। जबकि द्वारका एक्सप्रेसवे एक अत्यंत जटिल 8-लेन का एलिवेटेड (उठा हुआ) एक्सप्रेसवे और 6-लेन की सर्विस रोड (कुल 14 लेन) है, जिसमें टनल और फ्लाईओवरों के कारण वास्तविक खर्च बढ़ा, न कि किसी वित्तीय हेराफेरी से।

     साल 2018 में सामने आया यह भारत का सबसे बड़ा बैंकिंग धोखाधड़ी मामला था। हीरा कारोबारी नीरव मोदी और मेहुल चोकसी ने पीएनबी बैंक के कुछ अधिकारियों के साथ मिलकर जाली लेटर्स ऑफ अंडरटेकिंग (LoUs) के जरिए करीब 14,000 करोड़ रुपये का गबन किया और देश से फरार हो गए।

     2014 से 2026 के बीच भारत में कम से कम 152 पेपर लीक के मामले सामने आए हैं, जिनसे देश के लगभग 7.5 करोड़ छात्र और नौकरी के इच्छुक उम्मीदवार प्रभावित हुए हैं. मीडिया रिपोर्ट्स, विभिन्न खोजी डेटा और विपक्षी दलों के दावों के अनुसार, पिछले एक दशक में औसतन हर महीने एक बड़ा पेपर लीक दर्ज किया गया है।

     सारांश-भारत सरकार और राज्य सरकार से भारतीय जनता ,किसान,जवान,महिला,व्यापारी, लघु उद्योजक और छात्र आदि का भरोसा ऊठ गया है जो की आने वाले समय मे भारत मे सरकार को इसकी बडी किंमत चुकाना पडेगा ऐसा लगता है ।