नीतीश और नायडू की सत्ता लोलुपता और युवाओं से विश्वासघात
लोकतंत्र में युवा और छात्र देश की रीढ़ होते हैं, लेकिन आज भारत का भविष्य सड़कों पर लहूलुहान है। अपनी नौकरियों, निष्पक्ष परीक्षाओं और सुरक्षित भविष्य की मांग कर रहे शांतिप्रिय छात्रों पर पुलिस की बर्बर लाठियां बरसाई जा रही हैं। इस दमनकारी और क्रूर नीति के लिए केवल केंद्र सरकार ही नहीं, बल्कि सत्ता के लालच में अंधी हो चुकी उसकी दो सबसे बड़ी बैसाखिया
बिहार के पुर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू—सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं।
युवाओं के वोटों से सत्ता के शिखर पर पहुंचे ये दोनों नेता आज अपने ही अन्नदाताओं और भविष्य के हत्यारों के साथ खड़े हैं।

नीतीश कुमार
युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ और प्रशासनिक तानाशाही.
बिहार में परीक्षाओं का मजाक बन चुका है। पेपर लीक, धांधली और भ्रष्टाचार नीतीश कुमार के सुशासन के दावों की पोल खोल रहे हैं।
उनकी जिम्मेदारी पूरी तरह तय है:
क्रूर दमन की राजनीति: अधिकार मांग रहे छात्रों को रोजगार देने के बजाय नीतीश कुमार की पुलिस उन्हें जानवरों की तरह सड़कों पर पीटती है। यह सीधे तौर पर मुख्यमंत्री की सहमति से हो रहा है।
परीक्षा माफिया को संरक्षण: बार-बार होने वाले पेपर लीक और भर्ती घोटालों पर कड़े कदम उठाने के बजाय नीतीश सरकार केवल लीपापोती करती है, जिससे छात्रों का पूरा साल और मेहनत बर्बाद हो जाती है।
कुर्सी के लिए समझौता: अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने के लिए नीतीश कुमार ने बिहार के युवाओं की आवाज का गला घोंट दिया है।
चंद्रबाबू नायडू
किंगमेकर' की चुप्पी या छात्रों के दमन में हिस्सेदारी ?
खुद को आधुनिक और युवाओं का मसीहा बताने वाले चंद्रबाबू नायडू की हकीकत भी आज देश के सामने आ चुकी है। केंद्र सरकार में निर्णायक भूमिका (किंगमेकर) होने के बावजूद उनकी चुप्पी अपराधियों को बढ़ावा दे रही है.
मौन सहमति और कायरता
राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षाओं में धांधली और छात्रों पर हो रहे अत्याचारों पर नायडू की चुप्पी यह साबित करती है कि उनके लिए छात्रों का भविष्य नहीं, बल्कि दिल्ली की सत्ता में उनका हिस्सा ज्यादा कीमती है।
दबाव बनाने में नाकामी: नायडू के पास इतनी राजनीतिक ताकत है कि वे एक झटके में छात्रों के हक में केंद्र सरकार को झुका सकते हैं। लेकिन वे अपनी इस ताकत का इस्तेमाल केवल आंध्र प्रदेश के लिए विशेष फंड और राजनीतिक लाभ लेने के लिए कर रहे हैं, युवाओं को न्याय दिलाने के लिए नहीं।
सत्ता के दोहरे मापदंड और युवाओं से धोखा
नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू दोनों ही इस समय उस दमनकारी व्यवस्था के सबसे बड़े हिस्सेदार हैं जो युवाओं के सपनों को कुचल रही है।
अपराध में बराबर के भागीदार: जब सत्ता की रक्षा के लिए पुलिस छात्रों के सिर फोड़ती है, तो उस लाठी पर केवल पुलिस का नहीं, बल्कि नीतीश और नायडू के समर्थन का भी वजन होता है। सहयोगी दल होने के नाते वे इस पाप से बच नहीं सकते।
वोट बैंक की राजनीति
चुनाव के समय युवाओं के पैर पकड़ने वाले ये नेता सत्ता मिलते ही गिरगिट की तरह रंग बदल लेते हैं। युवाओं के खून से सनी सड़कों पर अपनी सत्ता का महल खड़ा करना इनकी असलियत को बयां करता है।
निष्कर्ष
छात्रों पर हुआ यह लाठीचार्ज केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि देश के युवाओं के खिलाफ एक घोषित युद्ध है।
नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू ने सत्ता के मोह में देश के भविष्य को लावारिस छोड़ दिया है। इतिहास गवाह है कि जिस भी शासक ने युवाओं और छात्रों की आवाज को लाठियों और बंदूकों के दम पर दबाने की कोशिश की है, उसका पतन निश्चित हुआ है। युवाओं के साथ किया गया यह विश्वासघात नीतीश और नायडू की राजनीतिक कब्र खोदने का काम करेगा।
बलीराजा पार्टी, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष - संजय सिग, उत्तर प्रदेश