हिंदुत्व का दर्शन - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindutva Ka Darshan Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
II
यह एक बहुत ही लंबी घुमावदार प्रक्रिया है, परंतु मुख्य विषय की छानबीन करने से पूर्व यह एक आवश्यक प्राथमिकता थी फिर भी जब हम अन्वेषण की यह प्रक्रिया आरंभ करते हैं, तो हमारे सामने कुछ आरंभिक कठिनाई आती हैं। हिंदू ऐसी जांच-पड़ताल का सामना करने के लिए तैयार नहीं हैं। वे कहते हैं कि या तो धर्म उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं है अथवा वे इस विचार की ओट ले लेते हैं - जिसे तुलनात्मक धर्म के अध्ययन से पुरस्कृत किया है कि सभी धर्म अच्छे हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि ये दोनों ही मत गलत और निराधार हैं।
इसके अलावा, धर्म एक सामाजिक शक्ति है। जैसा मैंने पहले स्पष्ट किया है, धर्म दैवी शासन की योजना का समर्थन करता है। यह योजना समाज के अनुसरण के लिए एक आदर्श बन जाती है। आदर्श अस्तित्वहीन हो सकता है, इस अर्थ में कि इसकी रचना अभी की जानी है। यद्यपि वह अस्तित्वहीन है, परंतु वास्तविक है क्योंकि, जैसे प्रत्येक आदर्श में कोई कार्य प्रवण शक्ति निहित होती है, उसी प्रकार इस आदर्श में भी है। जो लोग धर्म के महत्व को नकारते हैं, वे लोग यह बात भूल जाते हैं। इतना ही नहीं, इस आदर्श के पीछे कितनी विराट शक्ति तथा मान्यता होती है, यह बात भी वे समझ नहीं सकते। शायद ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमें आदर्श और वास्तविक, दोनों में अंतर दिखाई देता है और ऐसा हमेशा ही होता है, चाहे हमारा आदर्श धार्मिक हो अथवा लैकिक । लेकिन दोनों आदर्शों की तुलनात्मक शक्ति नापने की एक और कसौटी है वह है, मनुष्य की स्वाभाविक अंत:प्रेरणा को कुचलने की उनकी शक्ति | आदर्श का संबंध कुछ ऐसी चीजों से होता है, जो दूरवर्ती होती है और मनुष्य की स्वाभाविक अंत:प्रेरणा का संबंध उसके प्रति समीप के वर्तमान से होता है अब जब हम दोनों आदर्शों को मनुष्य की स्वाभाविक अंत:प्रेरणा पर छोड़ देते हैं, तो दोनों में ही स्पष्ट रूप से भिन्नता नजर आती है। धार्मिक आदर्शों की आवश्यकताओं के सामने मनुष्य की स्वाभाविक अंतःप्रेरणा अपने-आप झुक जाती है, चाहे दोनों आदर्श एक-दूसरे के विरोधी हों। दूसरी ओर, यदि दो आदर्शों में संघर्ष होता है तब मनुष्य की स्वाभाविक अंत:प्रेरणा लौकिक आदर्श के सामने नहीं झुकती । इसका अर्थ है कि धार्मिक आदर्श का बिना किसी ऐच्छिक लाभ की आंकाक्षा के मानवता पर अधिकार होता है। यही बात शुद्ध लौकिक आदर्श के बारे में नहीं कही जा सकती। उसका प्रभाव उसके भौतिक लाभ प्राप्त करा देने की शक्ति पर निर्भर होता है। मानव बुद्धि पर इन दोनों आदर्शों का जो प्रभाव और अधिकार है, उसमें कितना अंतर है, यह बात इससे स्पष्ट होती है। जब तक उनमें विश्वास है, धार्मिक आदर्श कभी भी अपने कार्य में असफल नहीं होता। धर्म की उपेक्षा करना सजीव संवेदनाओं की उपेक्षा करना है ।
फिर, सभी धर्म सत्य तथा उत्तम हैं, ऐसा विचार करना निश्चित रूप से अनुकरण की दृष्टि से गलत है। हमें यह बात बहुत खेद के साथ कहनी पड़ती है कि यह विचार तुलनात्मक धर्म के अध्ययन से उत्पन्न होता है। परंतु तुलनात्मक धर्म ने मानवता की एक बहुत ही महान सेवा की है। सभी लौकिक धर्मों का यह कहना था कि वे ही केवल मात्र उत्तम धर्म है उनका यह अधिकार तथा गर्व इस अध्ययन से भंग हो गया। यद्यपि यह सच है कि तुलनात्मक धर्म के अध्ययन ने केवल मात्र अवैचारिक और मठाधीशों के एकाधिकार के आधार सत्य धर्म तथा असत्य धर्म में जो अनियमित तथा संदिग्ध भेद बना हुआ था, उसे निरस्त कर दिया; और दूसरी ओर इसके कारण धर्म के संबंध में झूठी धारणाएं भी बनीं। इसमें सबसे हानिकारक धारणा वह है, जिसका मैंने इसके पूर्व उल्लेख किया है। वह धारणा यह है कि सभी धर्म समान रूप से उत्तम हैं और उनमें कोई भेद करने की आवश्यकता नहीं। इससे बड़ी गलती कोई दूसरी नहीं हो सकती। धर्म एक व्यवस्था तथा शक्ति है और सभी सामाजिक प्रभावों तथा संस्थाओं के समान वह भी अपने प्रभाव में आबद्ध समाज को लाभ अथवा हानि पहुंचाता है। जैसा कि प्रो. टीले¹ ने स्पष्ट किया है, धर्म-
"मानव इतिहास का एक अत्यंत शक्तिशाली माध्यम है, जिसने राष्ट्रों का निर्माण तथा विध्वंस किया, साम्राज्यों को एक साथ जोड़ा तो दूसरी ओर विभाजित भी किया है; उसने सबसे नृशंस प्रथाओं तथा अन्यायी कृत्यों को मान्यता दी, सबसे पराक्रमी कार्य, आत्मत्याग और निष्ठा की भावना को प्रेरित किया है; धर्म के कारण एक ओर क्लेश, विद्रोह तथा रक्तरंजित युद्ध हुआ, तो दूसरी ओर धर्म के कारण राष्ट्रों में स्वत्रंता, सुख और शांति भी आई। वह एक स्थान पर जुल्मों का साथ देता है, तो दूसरे स्थान पर गुलामी की जंजीरे तोड़ देता है। कभी एक नई देदीप्यमान सभ्यता का निर्माण करता है, तो कभी-कभी विज्ञान, कला आदि के विकास का सबसे बड़ा शत्रु बनता है ।"
धर्म की शक्ति के परिणामों में इतनी विलक्षण विसंगति के बावजूद वह जो रूप धारण करता है तथा जो आदर्श निश्चित करता है, उसे बिना किसी परीक्षण के उत्तम माना जा सकता है। यह इस पर निर्भर करता है कि किसी धर्म ने दैवी शासन की योजना के रूप में कौन से सामाजिक आदर्श प्रदान किए हैं। यह एक ऐसा प्रश्न है, जिस पर तुलनात्मक धर्म के विज्ञान ने विचार नहीं किया । वस्तुतः यह एक ऐसा प्रश्न है, जो तुलनात्मक धर्म का जहां अंत होता है, वहीं से आरंभ होता है। यद्यपि धर्म अनेक हैं, परंतु वे सभी समान रूप से उत्तम हैं, ऐसा कहकर हिन्दु लोग इस प्रश्न का उत्तर टाल रहे हैं। परंतु वास्तविक स्थिति ऐसी नहीं है।
हिन्दु समाज हिंदुत्व के दर्शन का परीक्षण करने की बात को कितना भी टालने का प्रयास करे ऐसे परीक्षण से भाग नहीं सकता। उसे इसका सामना करना ही होगा।
1. ट्री आफ लाइफ, पृष्ठ 5