हिंदुत्व का दर्शन - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindutva Ka Darshan Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
अध्याय - 1
हिंदुत्व का दर्शन
I
हिंदुत्व का दर्शन क्या है? यह ऐसा प्रश्न है, जो अपनी तार्किक विचार श्रृंखला में उत्पन्न होता है। परंतु उसकी तार्किक श्रृंखला के अलावा भी इसका इतना महत्व है कि इसे बिना विचार किए छोड़ा नहीं जा सकता। इसके बिना हिंदुत्व के उद्देश्यों और आदर्शों को कोई भी समझ नहीं सकता ।
इस संबंध में यह बिल्कुल साफ है कि इस तरह का अध्ययन करने से पहले विषय की पृष्ठभूमि को स्पष्ट करना, और साथ ही उससे संबंधित शब्दावली को परिभाषित करना भी बहुत आवश्यक है।
आरंभ में ही यह सवाल पूछा जा सकता है कि इस प्रस्तावित शीर्षक का क्या अर्थ है? क्या 'हिंदु धर्म का दर्शन' और 'धर्म का दर्शन' शीर्षक एक समान है ? मेरी इच्छा है कि इसके पक्ष और विपक्ष पर अपने विचार प्रस्तुत करूं। लेकिन वास्तव में मैं ऐसा नहीं कर सकता। इस विषय पर मैंने बहुत-कुछ पढ़ा है, लेकिन मैं स्वीकार करता हूं कि मुझे 'धर्म के दर्शन का स्पष्ट अर्थ अभी तक नहीं मिल पाया है। इसके पीछे शायद दो कारण हो सकते हैं। पहला यह कि धर्म एक सीमा तक निश्चित है लेकिन दर्शनशास्त्र में किन-किन बातों का समावेश किया जाए, यह निश्चित नहीं । '¹ दूसरे, दर्शन और धर्म परस्पर विरोधी न भी हों, उनमें प्रतिस्पर्धा तो अवश्य ही है, जैसा कि दार्शनिक और अध्यात्मवादी की कहानी से पता चलता है। उस कहानी के अनुसार, दोनों के बीच चल रहे बाद-विवाद के दौरान, अध्यात्मवादी ने दार्शनिक पर यह दोषारोपण किया कि यह 'एक अंधे पुरुष की तरह है, जो अंधेरे कमरे में एक
1. मुनरो के इनसाइक्लोपीडिया ऑफ एजुकेशन में 'फिलासफी' शीर्षक के अंतर्गत लेख देखें।
काली बिल्ली को खोज रहा है, जो वहां है ही नहीं।' इसकी प्रतिक्रियास्वरूप दार्शनिक ने अध्यात्मवादी पर आरोप लगाया कि वह 'एक ऐसे अंधे व्यक्ति की तरह है, जो अंधेरे कमरे में एक काली बिल्ली को खोज रहा है, जब कि बिल्ली का वहां कोई अस्तित्व है ही नहीं, और भी वह उसे पा लेने की घोषणा करता है।' शायद 'धर्म का दर्शन' शीर्षक ही गलत है, जिसके कारण उसकी सही व्याख्या करने में भ्रम पैदा होता है। प्रोफेसर प्रिंगले पेटीसन¹ ने धर्म के दर्शन का अर्थ समझाते हुए जो अपना बुद्धिमत्तापूर्ण मत व्यक्त किया है, वह मुझे उसके निश्चित विषय के बहुत करीब लगता है। प्रोफेसर प्रिंगले के अनुसार :
"सामान्यतः हम जिसे धर्म का दर्शन कहते हैं, उसके संदर्भ में कुछ शब्द उपयोगी हो सकते हैं। बहुत पहले दार्शनिक प्लेटों (अफलातून) ने दर्शनशास्त्र को किसी विषय पर विहंगम दृष्टि डालना कहा था। इसे हम दूसरे शब्दों में इस प्रकार भी कह सकते हैं कि दर्शन संसार के सभी प्रमुख रूपों के संदर्भ में समग्र और संपूर्ण विश्व का अंश मात्र होते हुए इन मुख्य लक्षणों को उनके परस्पर संबंधों के अर्थ में समझने का एक प्रयास है। केवल इसी तरह हम संसार की प्रक्रिया, आधार और इसके स्वरूप के बारे में अपने अंतिम निष्कर्षो तक पहुंचने तथा समझने की क्षमता प्राप्त कर सकते हैं और किन्हीं विशेष कारणों के महत्व का सही अंदाजा लगा सकते हैं। तदनुसार, किसी भी विशेष अनुभव को, धर्म के दर्शन को, कला के दर्शन और विधि के दर्शन को, व्यक्ति जिन मनुष्यों तथा संसार के मध्य निवास करता है, उसके प्रति अपने दृष्टिकोण, अनुभव के विश्लेषण तथा व्याख्या के अर्थ में ही लेना चाहिए और जब कुछ घटनाएं, जिन पर हम अपना ध्यान केंद्रित करते हैं, इतनी सार्वभौमिक और उल्लेखनीय होती हैं कि वे धर्म के इतिहास से मनुष्य के धार्मिक अनुभव के दर्शन से भी प्रकट हों, तब ऐसी सभी घटनाएं हमारे दार्शनिक निष्कर्षों पर निर्णायक प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकतीं। वस्तुतः अनेक लेखकों द्वारा इस विषय पर व्यक्त किए गए विचार मात्र सामान्य विचार हैं।
जिन तत्वों के साथ धर्म के दर्शन का संबंध है, उनकी संपूर्ति इस विषय के अत्यंत बोधगम्य अर्थ में धर्म के इतिहास से होती है। जैसा कि प्रसिद्ध विद्वान टीले ने कहा है, 'सभ्य तथा असभ्य संसार के सभी मृत और सजीव
1. दि फिलासफी ऑफ रिलीजन, आक्सफोर्ड, पृष्ठ 1-2
धर्म अपने सभी अभिव्यक्त रूपों में एक ऐतिहासिक या मनोवैज्ञानिक तत्व हैं।' इस बात पर ध्यान देना होगा कि ये घटनाएं धर्म के दर्शन का आधार तो बनती हैं, परंतु वे स्वयं दर्शन अथवा टीले के शब्दों में, धर्म का 'विज्ञान' नहीं बनती। टीले कहते हैं, 'मैंने सभी विद्यमान धर्मों का बारीकी से वर्णन किया है। उन्होंने उनके सिद्धांतों, परंपराओं और दंतकथाओं के बारे में भी प्रकाश डाला है। जो तत्व संस्कारों की शिक्षा देते हैं, उनका, और धर्मों से साथ जुड़े हुए लोगों के संगठनों का भी वर्णन किया है। टीले महोदय ने इस क्षेत्र में बहुत कार्य किया है। उन्होंने विभिन्न धर्मों का उनकी उत्पत्ति से लेकर विकास तक और बाद में पतन तक का पता लगाया है। उन्होंने केवल उन्हीं बातों को ही संगृहीत किया है, जिनके आधार पर धर्म का विज्ञान क्रियाशील रहता है। उनका कहना है कि ऐतिहासिक जानकारी चाहे कितनी भी पूर्ण हो, पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इतिहास दर्शन नहीं है। धर्म का दर्शन निश्चित करने के लिए धर्म के विभिन्न रूपों में जो समान तत्व है, जिसकी जड़ें हम मानव स्वभाव में देख सकते हैं, उसे जानना आवश्यक है। ऐसे तत्व का विकास उसके संपूर्ण रूपों में और उसके विकास के नीचे के ऊपर तक ही स्पष्ट अवस्थाओं द्वारा जाना जा सकता है। उसके साथ ही मानव-सभ्यता के मुख्य तत्वों से उनके जो गहरे संबंध हैं, उन्हें भी जाना जा सकता है।"
यदि इसे ही धर्म का दर्शन समझा जाए, तब जिसे तुलनात्मक धर्म कहा जाता है, उसके अध्ययन का ही यह एक अलग नाम है, जिसका एक और उद्देश्य यह है कि धर्म के विभिन्न रूपों में जो समान तत्व है, उसे जाना जाए। ऐसा मुझे लगता है। ऐसे अध्ययन का क्षेत्र और महत्व चाहे कुछ भी हो, किंतु 'धर्म का दर्शन' शीर्षक का प्रयोग प्रो. प्रिंगले-पेटीसन ने जिस अर्थ में किया है, मैं उसके बिल्कुल विपरीत अर्थ में रहा हूं। मैं 'दर्शन' शब्द का उसके मूल अर्थ में ही प्रयोग कर रहा हूं, जिसके दो अर्थ हैं। इसका अर्थ है उपदेश, जैसा कि लोग सुकरात और प्लेटो के दर्शन के बारे में कहते हैं। दूसरे अर्थ में, इसका तात्पर्य है किसी भी विषय तथा घटना पर निर्णय देते समय सूक्ष्म विवेक-बुद्धि का प्रयोग करना । इस आधार पर अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए मेरे धर्म का दर्शन, केवल वर्णनात्मक शास्त्र नहीं है। मैं उसे वर्णनात्मक और नियमबद्ध शास्त्र दोनों मानता हूं। जहां तक उसका धर्म के उपदेश के साथ संबंध है, धर्म का दर्शन केवल वर्णनात्मक शास्त्र बनता है। परंतु जब उसका संबंध उन उपदेशों पर निर्णय लेने के लिए सूक्ष्म विवेक-बुद्धि का उपयोग करने से होता है, तब धर्म का दर्शन एक नियमबद्ध शास्त्र बनता है। इससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि हिंदु धर्म के दर्शन के अध्ययन से मेरा संबंध किन बातों से है। स्पष्टत: मैं हिंदू धर्म का विश्लेषण जीवन शैली के रूप में उसमें छिपे महत्व को निर्धारित करने के रूप में करूंगा।