Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar - भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर - Page 46 मुख्य मजकूराकडे जा

भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 46 of 132
16 जून 2023
Book
12,14,5,7,1,,

तीसरा भाग : धम्म क्या हैं ?

१. जीवन की पवित्रता बनाये रखना धम्म है

(क)

१. “तीन तरह की जीवन की पवित्रताएँ हैं.... शारीरिक पवित्रता किसे कहते हैं?"

२. “एक आदमी जीव-हिंसा से विरत होता है, चोरी से विरत होता है, काम मिथ्याचार से विरत होता है । इसे शारीरिक पवित्रता कहते हैं ।"

३. "वाणी की पवित्रता किसे कहते हैं ?"

What is Dhamma - Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

४. “एक आदमी झूठ बोलने से विरत रहता हैं ।”

५. " मानसिक पवित्रता किसे कहते हैं?"

६. “एक भिक्षु, जब काम-छन्द से ग्रस्त रहता है तो वह जानता है कि मुझमें काम- छन्द है । यदि वह काम छन्द से ग्रसा नहीं रहता, तो वह जानता है कि मुझ में काम छन्द नही है । वह यह भी जानता है कि अनुत्पन्न काम छन्द की किस तरह उत्पत्ति होती है? वह यह भी जानता है कि उत्पन्न काम छन्द का कैसे उच्छेद होता है और वह यह भी जानता है कि किस तरह भविष्य में काम- छन्द उत्पन्न नही होता ।"

७. “यदि उसमें व्यापाद होता है तो वह जानता है कि मुझ में व्यापाद (द्वेष ) है । वह इसकी उत्पत्ति, विनाश को भी जानता है और यह भी जानता है कि भविष्य में किस प्रकार इसकी उत्पत्ति नहीं होती ।”

८. “यदि उसमें स्त्यान-मृद्ध (आलस्य तन्द्रा) की उत्पत्ति हुई रहती है तो वह जानता है कि स्त्यान-मृद्ध उत्पन्न है ......उद्धतपन..... यदि उसमें कुछ विचिकित्सा उत्पन्न रहती है तो वह जानता है की विचिकित्सा उत्पन्न है । वह यह भी जानता है कि किस प्रकार इसका विनाश होता है और किस प्रकार भविष्य में इसकी उत्पत्ति नहीं होती । यही मानसिक पवित्रता कहलाती है ।"

९. “जो शरीर, वाणी और मन से पवित्र है
निष्पाप, स्वच्छ और पवित्रता से युक्त है।
उसे लोग 'निष्कलंक' नाम से पुकारते हैं ।”

(ख)

१. पवित्रता तीन तरह की है..... शरीर की पवित्रता, वाणी की पवित्रता तथा मन की पवित्रता । "

२. “ शरीर की पवित्रता किसे कहते हैं?"

३. “एक आदमी जीव-हिंसा से विरत रहता है, चोरी से विरत रहता है, काम मिथ्याचार से विरत रहता है। यह 'शरीर की पवित्रता' है।"

४. “वाणी की पवित्रता किसे कहते हैं?"

५. "एक आदमी झूठ बोलने से विरत रहता है ..... व्यर्थ की बातचीत से विरत रहता है। यह 'वाणी की पवित्रता' कहलाती हैं ।”

६. "मन की पवित्रता किसे कहते हैं?"

७. “एक आदमी ईर्ष्यालु नहीं होता, और सम्यक दृष्टि रखता है। यह मन की पवित्रता है। ये तीन तरह की पवित्रताएँ हैं ।”

(ग)

१. ये पांच तरह की दुर्बलताएँ हैं, जिनसे साधना में बाधा पहुंचती है । कौन सी पाँच ?

२. जीव-हिंसा, चोरी, काम-मिथ्याचार, झुठ और नशा पैदा करने वाली शराब आदि नशीली चीजों का ग्रहण करना ।

३. ये पाँच तरह की दुर्बलताएँ है जिनसे साधना में बाधा पड़ती हैं ।

४. जब साधना की ये पाँचों बाधाएँ दूर हो जाती है तो चार स्मृति उपस्थानों की उत्पत्ति होनी चाहिये ।

५. एक भिक्षु काया के प्रति कायानुपश्ना करता हुआ विहार करता है, प्रयत्नशील, ज्ञानवान, स्मृतिमान और लोक में विद्यमान लोभ तथा दौर्मनस्य को काबू में किये हुए ।

६. वह वेदनाओं के प्रति वेदनानुपश्यी हो विहार करता हैं ।

७. वह चित्त के प्रति चित्तानुपश्यी हो विहार करता है .....

८. वह चित्त में उत्पन्न होनेवाले विचारों (-धम्मो) के प्रति धम्मानुपश्यी हो विहार करता है, प्रयत्नशील, ज्ञानवान स्मृतिमान और लोक में विद्यमान लोभ तथा दौर्मनस्य को काबू में किये हुए ।

९. जब साधना की ये पाँच बाधाऐं दूर हो जाती हैं तो चार स्मृति उपस्थानों की उत्पत्ती होनी चाहिए ।

(घ)

१. ये तीन घात है; शील- घात, चित्त- घात और दृष्टि - घात ।

२. शील-घात क्या है? एक आदमी प्राणी-हिंसा करता हैं, चोरी करता हैं, काम-भोग सम्बन्धी मिथ्याचार करता है, झूठ बोलता है, चुगली खाता है, कठोर बोलता है तथा व्यर्थ बोलता है। यह शील-घात कहलाता हैं।

३. चित्त - घात किसे कहते हैं?

४. एक आदमी लोभी होता है, दौर्मनस्य युक्त होता है । यह चित्त का घात हैं ।

५. दृष्टि- घात क्या है?

६. यहाँ कोई आदमी इस प्रकार की गलत धारणा मिथ्या-दृष्टि रखता है कि दान देने में, त्याग करने में, परित्याग करने में कोई पुण्य नहीं; भले-बुरे कर्म का कुछ फल नहीं होता; न यह लोक है और न पर-लोक है; न माता है, न पिता है और न स्वोत्पन्न प्राणी है; लोक में कोई ऐसे श्रमण-ब्राह्मण नहीं है जो शिखर तक जा पहुंचे हों, जिन्होंने पूर्णता लाभ की हो, जिन्होंने अपनी ही अभिज्ञा से परलोक का साक्षात्कार किया हो और जो उसकी घोषणा कर सकते हों । भिक्षुओ, यह दृष्टिघात है ।

७. भिक्षुओं, यह शील-घात, चित्त- घात के और दृष्टि - -घात के ही कारण ऐसा होता है कि मरने के अनन्तर प्राणी दुर्गती को प्राप्त होते हैं। ये तीन दृष्टि घात हैं ।

८. भिक्षुओं! ये तीन लाभ हैं। कौन से तीन ? शील- लाभ, चित्त-लाभ तथा दृष्टि-लाभ ।

९. शील- लाभ क्या है ?

१० एक आदमी प्राणी-हिंसा से विरत रहता है ..... कठोर बोलने से विरत रहता है और व्यर्थ बोलने से विरत रहता है। यह शील- लाभ हैं।

११. चित्त लाभ क्या है?

१२. एक आदमी न लोभी होता है और न दौर्मनस्य युक्त होता है । यह चित्त लाभ हैं।

१३. और दृष्टि - लाभ क्या है?

१४. यहां कोई आदमी इस प्रकार की गलत धारणा, मिथ्या धारणा नहीं रखता है कि दान देने में, त्याग करने में, परित्याग करने में कोई पुण्य नहीं, भले-बुरे कर्म का कुछ फल नहीं होता, न यह लोक है और न पर-लोक है; न माता है, न पिता है और न स्वोत्पन्न प्राणी हैं, लोक में कोई ऐसे श्रमण-ब्राह्मण नहीं हैं जो शिखर तक जा पहुँचे हों, जिन्होंने पूर्णता लाभ की हो, जिन्होंने अपनी ही अभिज्ञा से परलोक का साक्षात्कार किया हो और जो उसकी घोषणा कर सकते हों । भिक्षुओ यह दृष्टि-लाभ है ।

१५. भिक्षुओं, इन्ही तीन लाभों के कारण शरीर का नाश होने पर मरने के अनन्तर प्राणी सुगति को प्राप्त होते हैं । भिक्षुओ, ये तीन लाभ है।


२. जीवन में पूर्णता प्राप्त करना धम्म है

१. ये तीन पूर्णताये हैं ।

२. शरीर की पूर्णता, वाणी की पूर्णता तथा मन की पूर्णता ।

३. मन की पूर्णता कैसी होती है ?

४. आस्त्रवों अथवा चित्त मलों का पूरा क्षय हो गया होने से, इसी जीवन में सम्पुर्ण चित्त - विमुक्ति का अनुभव करने से प्रज्ञा विमुक्ति  जो कि आस्त्रवों से विमुक्ति हैं - उसे प्राप्त कर, उसी में विहार करता हैं । यही मन की पूर्णता कहलाती है । ये तीन पूर्णताएँ हैं ।

५. और दूसरी भी पारमिताएँ हैं। भगवान बुद्ध ने उन्हे सुभूति को समझाया था ।

६. सुभूति- “बोधिसत्व की दान-पारमिता क्या है?”

७. तथागत- “बोधिसत्व चित्त की सभी अवस्थाओं का ज्ञान रखकर दान देता हैं, अपनी भीतरी वा बाह्य, और उन्हें सर्वसाधारण के लिये परित्याग कर 'बोधि' को समर्पित करता है । वह दूसरों को भी ऐसा ही करने की प्रेरणा देता है । किसी भी वस्तु में उसकी आसक्ति नहीं ।"

८. सुभूति - "एक बोधिसत्व की शील- पारमिता क्या है?"

९. तथागत- “वह स्वयं दस कुशल-पंथों में विचरता है और दूसरों को भी ऐसा ही करने की प्रेरणा करता है ।”

१०. सुभूति - "बोधिसत्व की शान्ति- पारमिता क्या है?"

११. तथागत- “वह स्वयं क्षमा-शील हो जाता है तथा दूसरों को भी क्षमा शील रहने की प्रेरणा करता है ।”

१२. सुभूति - "बोधिसत्व की वीर्य्य- पारमिता क्या है?"

१३. तथागत- “वह सतत पांचों पारमिताओं की पूर्ति में संलग्न रहता है, तथा दुसरों को भी ऐसा ही करने की प्रेरणा करता है ।” १४. सुभूति- “बोधिसत्व की समाधि की पारमिता क्या है?”

१५. तथागत- “वह अपने कौशल से ध्यानों का लाभ करता हैं, किन्तु तत्सम्बन्धिन रूप-लोकों में उसका जन्म नहीं होता । वह  दूसरों को भी ऐसा ही करने की प्रेरणा करता हैं ।”

१६. सुभूति- “बोधिसत्व की प्रज्ञापारमिता क्या है?”

१७. तथागत- “वह किसी भी धर्म (भौतिक वा अभौतिक वस्तु) में नहीं फसता, वह सभी धर्मो के स्वभाव पर विचार करता है । वह दुसरों को भी सभी धर्मो के स्वभाव पर विचार करने की प्रेरणा देता है ।”

१८. इन पारमिताओ का विकास करना धम्म है ।