Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar - भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर - Page 43 मुख्य मजकूराकडे जा

भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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16 जून 2023
Book
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प्रथम भाग : 'धम्म' मे भगवान बुद्ध का अपना स्थान

१. भगवान बुद्ध ने अपने धम्म में, अपने लिये कुछ भी विशेष स्थान नहीं रखा ।

१. ईसा ने ईसाइयत का पैगम्बर होने का दावा किया ।

२. इससे आगे उसने यह भी दावा किया कि वह खुदा का बेटा है।

Lord Buddhas own place in Dhamma - bhagwan buddha aur unka dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

३. ईसा ने यह भी कहा कि जब तक कोई आदमी यह न स्वीकार करे कि ईसा खुदा का बेटा है, तब तक उसकी मुक्ति हो ही नहीं सकती ।

४. इस प्रकार ईसा ने किसी भी ईसाई की मुक्ति के लिये अपने आपको ईश्वर का पैगम्बर और बेटा मानने की अनिवार्य शर्त रख कर, ईसाइयत में अपने लिये एक खास स्थान सुरक्षित कर लिया ।

५. इस्लाम के पैगम्बर मुहम्मद साहब का दावा था कि वह खुदा द्वारा भेजे गये इस्लाम के पैगाम-बर थे ।

६. उनका यह भी दावा था कि कोई आदमी निजात (मुक्ति) लाभ नहीं कर सकता जब तक वह ये दो बातें और न स्वीकार करे ।

७. जो इस्लाम में रह कर मुक्ति-लाभ करना चाहता हो, उसे यह स्वीकार करना होगा कि मुहम्मद साहब खुदा के पैगम्बर हैं ।

८. जो इस्लाम मे रह कर मुक्ति-लाभ करना चाहता हो, उसे आगे यह भी स्वीकार करना होगा कि मुहम्मद साहब खुदा के आखिरी पैगम्बर थे ।

९. इस प्रकार इस्लाम में मुक्ति केवल उन्ही के लिये सम्भव है जो ऊपर की दो बातें स्वीकार करें ।

१०. इस तरह मुहम्मद साहब ने किसी भी मुसलमान की मुक्ति अपने को खुदा का पैगम्बर मानने की अनिवार्य शर्त पर निर्भर करके अपने लिये इस्लाम मे एक खास स्थान सुरक्षित कर लिया ।

११. भगवान् बुद्ध ने कभी कोई ऐसी शर्त नहीं रखी ।

१२. उन्होने शुद्धोदन और महामाया का प्राकृतिक पुत्र होने के अतिरिक्त कभी कोई दूसरा दावा नहीं किया ।

१३. उन्होंने ईसा मसीह या मुहम्मद साहब की तरह की शर्ते लगा कर अपने धम्म- शासन में अपने लिये कोई खास स्थान सुरक्षित नहीं रखा।

१४. यही कारण है कि इतना वाङमय रहते हुए भी हमें बुद्ध के व्यक्तिगत जीवन के बारे में इतनी कम जानकारी हैं ।

१५. जैसा ज्ञात ही है कि भगवान् बुद्ध के महापरिनिर्वाण के अनन्तर राजगृह में प्रथम संगीति (कान्फ्रेंस) हुई थी ।

१६. उस संगीति में महाकाश्यप अध्यक्ष थे । आनन्द, उपालि और अन्य दूसरे लोग, जो कपिलवस्तु के ही थे, जो जहां-जहां वे गये प्राय: हर जगह उनके साथ थे, घूमे और मृत्यु पर्यन्त साथ रहे, वहां उपस्थित थे ।

१७. लेकिन अध्यक्ष महाकाश्यप ने क्या किया ?

१८. उन्होंने आनन्द को “धम्म" का संगायन करने के लिये कहा और तब 'संगीति कारकों से पूछा कि “क्या यह ठीक है?” उन्होंने "हां" में उत्तर दिया । महाकाश्यप ने तब प्रश्न को समाप्त कर दिया ।

१९. तब महाकाश्यप ने उपालि को "विनय" का संगायन करने के लिये कहा और संगीति कारकों से पूछा कि "क्या यह ठीक है?" उन्होंने “हाँ” में उत्तर दिया । महाकाश्यप ने तब प्रश्न समाप्त कर दिया ।

२०. तब महाकाश्यप को चाहिये था कि वह किसी तीसरे को जो संगीति में उपस्थित था, आज्ञा देते कि वह भगवान् बुद्ध के जीवन की मुख्य-मुख्य घटनाओं का संगायन करे ।

२१. लेकिन महाकाश्यप ने ऐसा नहीं किया । उन्होने सोचा कि “धम्म" और "विनय" - यही दो विषय ऐसे है जिनसे संघ का
सरोकार है ।

२२. यदि महाकाश्यप ने भगवान् बुद्ध के जीवन की घटनाओं का एक ब्योरा तैयार करा लिया होता, तो आज हमारे पास भगवान् बुद्ध का एक पूरा जीवन चरित्र होता ।

२३. भगवान् बुद्ध के जीवन की मुख्य-मुख्य घटनाओं का एक ब्योरा तैयार करा लेने की बात महाकाश्यप को क्यों नहीं सूझी ?

२४. इसका कारण उपेक्षा नहीं हो सकती । इसका केवल एक ही उत्तर है कि भगवान बुद्ध ने अपने ये 'धम्म-शासन' में अपने लिये कोई विशेष स्थान सुरक्षित नहीं रखा था ।

२५. भगवान् बुद्ध अपने धम्म से सर्वथा पृथक थे । उनका अपना स्थान था, धम्म का अपना ।

२६. भगवान् बुद्ध ने किसी को अपना उत्तराधिकारी बनाने से इनकार किया, यह भी इस बात का उदाहरण या प्रमाण है कि वह अपने 'धम्म-शासन' में अपने लिये कोई स्थान सुरक्षित रखना नहीं चाहते थे ।

२७. दो तीन बार भगवान् बुद्ध के अनुयायियों ने उनसे प्रार्थना की कि वे किसी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दें ।

२८. हर बार भगवान् बुद्ध ने अस्वीकार किया ।

२९. उनका उत्तर था, “धम्म ही धम्म का उत्तरधिकारी हैं ।"

३०. “धम्म को अपने ही तेज से जीवित रहना चाहिये, किसी मानवीय अधिकार के बल से नहीं ।"

३१. "यदि धम्म को मानवीय अधिकार पर निर्भर रहने की आवश्यकता है, तो वह धम्म नहीं ।"

३२. “यदि धम्म की प्रतिष्ठा के लिये हर बार इसके संस्थापक का नाम रटते रहने की आवश्यकता है, तो वह धम्म नहीं ।"

३३. अपने धम्म को लेकर स्वयं अपने बारे में भगवान् बुद्ध का यही दृष्टिकोण था ।