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भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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16 जून 2023
Book
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३. ब्राम्हण-ग्रन्थ


१. वेदों के बाद उस धार्मिक साहित्य का नम्बर आता है जो ब्राह्मण-ग्रन्थो के नाम से प्रसिद्ध है। दोनों ही पवित्र ग्रन्थ माने जाते थे । वास्तव में ब्राह्मण भी वेदों का एक भाग ही है । दोनों साथ-साथ है और दोनों का एक सम्मिलित नाम 'श्रुति' है ।

२. ब्राह्मणो के दर्शन के चार स्तम्भ हैं ।

३. सब से पहला स्तम्भ है कि वेद न केवल पवित्र है, बल्कि अपौरूषेय है? उनके किसी एक भी शब्द पर प्रश्न चिन्ह नहीं लग सकता ।

४. ब्राह्मणी-दर्शन का दूसरा स्तम्भ वा दूसरी आधार शिला थी कि आत्मा की मुक्ति जन्म-मरण के संबंध से वा संसरण से मुक्ति वैदिक यज्ञों तथा दूसरी धार्मिक क्रियाओं के उचित ढंग से पूरा करने और ब्राह्मणों को दान देने से ही हो सकती हैं ।

bhagwan buddha aur unka dhamma - book written by Dr Babasaheb Ambedkar

५. 'ब्राह्मणों' के पास न केवल एक आदर्श-धर्म की ही कल्पना थी, बल्कि उन्होंने अपनी एक 'आदर्श समाज की कल्पना भी गढ़ रखी थी।

६. इस ‘आदर्श-समाज' के ढांचे का उनका अपना नाम था चातुवर्ण । यहा वेदों में जड़ा हुआ है, और क्योंकि वेद तर्कातील हैं और क्योंकि वेदों के किसी भी शब्द पर प्रश्न चिन्ह लग ही नहीं सकता, इसलिए एक आदर्श समाज के नमूने के रूप में चातुर्वर्ण भी तर्कातीत है और उस पर भी अंगुली नहीं उठाई जा सकती ।

७. समाज के इस के 'कुछ आधारभूत नियम हैं।

८. पहला नियम था समाज चार भागों में विभक्त होना चाहिए । (१) ब्राह्मण; (२) क्षत्रिय, (३) वैश्य, और (४) शूद्र ।

९. दूसरा नियम था कि इन चारों वर्गो मे सामाजिक समानता नहीं हो सकती । इन सबको क्रमिक असमानता के नियम से परस्पर बंधा रहना होगा ।

१०. ब्राह्मण सर्वोपरि । ब्राह्मणों के नीचे क्षत्रिय, किन्तु वैश्यों से ऊपर । क्षत्रियों के नीचे वैश्य किन्तु शूद्रो से ऊपर । सब के नीचे शूद्र ।

११. यह चारों वर्ग अधिकार और विशेष सुविधाओं के मामले में एक दूसरे से समानता का दावा नहीं कर सकते थे । अधिकारों और विशेष सुविधाओं का उपयोग क्रमिक असमानता के नियम के अनुसार ही हो सकता था ।

१२. ब्राह्मण को वह सभी अधिकार और विशेष सुविधाएँ प्राप्त थीं जिन की वह इच्छा कर सकता था । लेकिन एक क्षत्रिया उन्हीं अधिकारों और विशेष सुविधाओं की मांग नहीं कर सकता था जो एक ब्राह्मण को प्राप्त थी । एक वैश्य की अपेक्षा उसे अधिक अधिकार और विशेष-सुविधायें प्राप्त थीं । वैश्य को एक शूद्र की अपेक्षा अधिक अधिकार और सुविधायें प्राप्त थीं । लेकिन वह उन्ही अधिकारों और विशेष-सुविधाओं की मांग नहीं कर सकता था जो एक क्षत्रिय को प्राप्त थीं । और जहाँ तक शूद्र की बात है, उसे किसी विशेष सुविधा का तो कहना ही क्या कोई अधिकार ही नहीं प्राप्त था । उसके लिए यही बहुत था कि वह ऊपर के तीनों वर्गों को बिना रूष्ट किये किसी न किसी तरह जीता रहा सके ।

१३. चातुर्वर्ण्य के तीसरे नियम का सम्बन्ध पेशों वा जीविका के साधनों से था । ब्राह्मण का पेशा था पढ़ना, पढ़ाना और धार्मिक- संस्कार कराना । क्षत्रिय का पेशा था लड़ना, मरना- मारना । वैश्य का पेशा था व्यापार । शूद्र का पेशा था ऊपर के तीनों वर्गों की सेवा करना । इन चारों वर्गों का यह विभाजन ऐसा न था कि एक वर्ग किसी दूसरे का पेशा कर सके । हर वर्ग केवल अपना अपना ही पेशा कर सकता था । कोई भी एक वर्ग किसी दूसरे के पेशे मे दखल न दे सकता था

१४. चातुर्वर्ण्य का चौथा नियम शिक्षा के अधिकार से सम्बन्धित था । चातुर्वर्ण्य के नमूने के अनुसार केवल पहले तीन वर्ग - ब्राह्मण, क्षत्रिय और
वैश्य -- ही शिक्षा के अधिकारी थे । शूद्रों के लिये शिक्षित होना निशिद्ध था । इस चातुर्वर्ण्य के नियम के केवल शूद्रो के ही शिक्षित होने को वर्जित नहीं किया था. बल्कि सभी स्त्रियों के शिक्षित होने को वर्जित किया था, जिनमें ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रों की भी स्त्रियाँ शामिल थीं ।

१५. एक पांचवां नियम भी था । इसके अनुसार आदमी के जीवन के चार हिस्से किये गये थे । पहली अवस्था ब्रह्मचर्याश्रम थी, दूसरी अवस्था गृहस्थाश्रम कहलाती थी, तीसरी वानप्रस्थाश्रम और चौथी संन्यासाश्रम ।

१६. प्रथम आश्रम का उद्देश्य था अध्ययन और शिक्षा । दूसरे आश्रम का उद्देश्य था वैवाहिक जीवन व्यतीत करना । तीसरे आश्रम का उद्देश्य था आदमी को वन- वासी जीवन से परिचित कराना -- बिना गृह त्याग किये पारिवारिक बन्धनों से मुक्त हो जाना । चौथे आश्रम का उद्देश्य था ईश्वर की खोज और उससे मिलने का प्रयास ।

१७. इन आश्रमों से तीनों ऊँचे वर्गों के पुरुष मात्र लाभान्वित हो सकते थे । शूद्रो और स्त्रियों के लिये पहला आश्रम वर्जित था । इसी प्रकार शूद्रों और स्त्रियों के लिए अन्तिम आश्रम भी वर्जित था ।

१८. ऐसा था यह दिव्य 'आदर्श समाज' का नमूना जिसे चातुर्वर्ण्य का नाम दिया गया था । ब्राह्मणों ने इस नियम को ऊंचे आदर्श वाद में परिणाम कर दिया था और इस बात की पूरी सावधानी रखी थी कि इसमें कही कोई कोर-कसर न बाकी रह जाय । १९. ब्राह्मणी-दर्शन का एक चौथा स्तम्भ था 'कर्म' का सिद्धान्त । यह आत्मा के संसरण के सिद्धान्त का एक भाग था । ब्राह्मणों का 'कर्म-वाद' इस एक प्रश्न का उनकी ओर से दिया गया उत्तर था- "जन्मान्तर होने पर नये शरीर को लेकर आत्मा कहीं नया जन्म ग्रहण करती है?” ब्राह्मणी-दर्शन का उत्तर था कि "यह उसके पिछले जन्म के कर्मों पर निर्भर करता है ।” दूसरे शब्दों में इसका यही मतलब है कि यह उसके कर्मो का परिणाम है ।

२०. ब्राह्मणी-धर्म के प्रथम सिद्धान्त के बुद्ध कड़े विरोधी थे । उन्होंने ब्राह्मणों के इस सिद्धान्त का खण्डन किया कि वेद अपौरूषेय हैं और उन पर प्रश्न चिन्ह नहीं लग सकता ।

२१. उनकी सम्मति में कोई बात ऐसी हो ही नहीं सकती जो गलत होने की सम्भावना से परे हो । किसी भी विषय में कोई बात अन्तिम हो ही नहीं सकती । यथावश्यकता समय-समय पर हर बात का परीक्षण हो सकना चाहिये ।

२२. आदमी को सत्य और यथार्थ सत्य जानना चाहिये । बुद्ध के लिए विचार स्वातंत्र सर्वाधिक महत्व की बात थी । और उन्हें इ बात का निश्चय था कि विचार - स्वातन्त्र ही सत्य को प्राप्त करने का एकमात्र साधन है ।

२३. वेदों की अपौरूषेयता को मान लेने का मतलब था विचार स्वातन्त्र को सर्वधा अस्वीकार कर देना ।

२४. इन्ही कारणों से ब्राह्मणी दर्शन की उक्त स्थापना उन्हे सर्वाधिक अप्रिय थी ।

२५. बुद्ध को ब्राह्मणी-दर्शन की दूसरी स्थापना भी उतनी ही अप्रिय थी । बुद्ध ने यह तो स्वीकार किया कि 'यज्ञ' करना भी उचित है, किन्तु उन्होंने ‘सच्चे यज्ञ' और 'झुठे यज्ञ' करना भी उचित है, किन्तु उन्होंने 'सच्चे यज्ञ' और 'झूठे यज्ञ' में विभाजक रेखा खींच दी ।

२६. दूसरों के कल्याण के लिये 'आत्म-परित्याग को ही बुद्ध ने 'सच्चा यज्ञ' माना । आत्म-स्वार्थ के लिये किसी देवता को प्रसन्न करने के उद्देश्य से किसी पशु की बलि देना बुद्ध ने 'झूठा यज्ञ' बताया ।

२७. आधिकांश ब्राह्मणी "यज्ञ" देवताओं को प्रसन्न करने के लिये दी जाने वाली पशुओं की बलियाँ ही थीं । बुद्ध ने इन्हें 'झूठे यज्ञ' कहकर इनकी निन्दा की । यज्ञ यदि 'आत्मा' के 'मोक्ष' लाभ के लिए ही किये जायें तो भी बुद्ध उसके करने के पक्ष में न  थे ।

२८. यज्ञ-विरोधी लोग यह कहकर ब्राह्मणों का उपहास किया करते थे, “यदि कोई एक पशु की बलि देने से 'स्वर्ग' जा सकता है, तो फिर शीघ्रतर स्वर्ग जाने के लिये अपने पिता का ही बलिदान क्यों नहीं किया जाता ?"
२९. बुद्ध इस मत से सर्वथा सहमत थे ।

३०. “यज्ञ” का सिद्धान्त बुद्ध को जितना बुरा लगता था उतनी ही बुरी बुद्ध को यह चातुर्वर्ण्य की स्थापना लगती थी ।

३१. ब्राह्मणवाद ने चातुर्वर्ण्य के नाम पर जिस प्रकार के समाज संगठन की कल्पना की, वह बुद्ध को सर्वथा अप्राकृतिक लगता था । इसका वर्गाश्रित स्वरूप अनिवार्य था और मनमाना था । यह किसी के हुक्म से रच दिये गये समाज के समान था । बुद्ध खुले और एक स्वतंत्र समाज के पक्षपाती थे ।

३२. ब्राह्मणवाद का चातुर्वर्ण्य एक जड समाज रचना थी, अपरिवर्तनशील । एक बार ब्राह्मण के घर में जन्म ले लिया हमेशा के लिये ब्राह्मण । एक बार क्षत्रिय के घर में जन्म ले लिया, हमेशा के लिए क्षत्रिय । एक बार वैश्य के घर में जन्म ले लिया, हमेशा के लिए वैश्य । और एक बार शूद्र के घर में जन्म ले लिया, हमेशा के लिये शूद्र । समाज रचना का आधार व्यक्ति का वह पद था, वह दर्जा था जो उसे गृह-विशेष में जन्म ग्रहण कर लेने मात्र से प्राप्त था । कोई बड़े से बड़ा "पाप-कर्म" भी उसे उसके दर्जे से गिरा न सकता था, इसी प्रकार कोई बड़े से बड़ा “पुण्य कर्म" भी किसी को ऊपर न उठा सकता था । न गुण की ही कहीं पूजा थी और न विकास की ही कहीं गुंजाईश थी ।

३३. कोई भी समाज ऐसा नहीं है जिसमें असमानता न हो। लेकिन ब्राह्मणवाद की बात ही दूसरी है । ब्राह्मण-वाद द्वारा जिस असमानता के सिद्धान्त का प्रचार किया गया है, वह उसका धार्मिक मान्य सिद्धान्त है । यह असमानता अपने आप यूंही प्रतिष्ठ नहीं हो गई है । ब्राह्मण-वाद समानता को मानता ही नहीं रहा । वास्तव में यह समानता के सिद्धान्त का शत्रु है । ३४. ब्राह्मण-वाद केवल असमानता से ही सन्तुष्ट नहीं रहा । ब्राह्मण-वाद का प्राण क्रमिक-असमानता में ही बसा था । ३५. समन्वय तथा मेल- जोल की भावना की बजाय, बुद्ध ने सोचा कि यह क्रमिक असमानता एक तो नीचे, उसके ऊपर, उसके और ऊपर, सब के ऊपर के वर्गों में क्रमिक घृणा की भावना पैदा कर देगी, दूसरी और उसी तरह सब के ऊपर, उसके नीचे, उससे और नीचे तथा सब के नीचे के वर्ग में क्रमिक जुगुप्सा की भावना पैदा कर देगी और इससे समाज में स्थायी संघर्ष बना रह सकता हैं ।

३६. चारों वर्गों के पेशे भी निश्चित थे । चुनाव की स्वतन्त्रता नहीं थी । इतना ही नहीं, यह पेशे कमोवेश सामर्थ्य या हुनर के हिसाब से निश्चित नहीं किय गये थे, बल्कि जन्म के हिसाब से ।

३७. चातुर्वर्ण्य के नियमों को ध्यानपूर्वक समझने-बूझने से बुद्ध इस परिणाम पर पहुंचे कि ब्राह्मण - वाद की सामाजिक व्यवस्था का दार्शनिक आधार यदि स्वार्थाश्रित नहीं था, तो गलत अवश्य था ।

३८. बुद्ध को स्पष्ट हो गया था कि इस व्यवस्था से सब के कल्याण की तो आशा की ही नहीं जा सकती, सब की स्वार्थपूर्ति भी नहीं हो सकती । निश्चय से जान बूझकर इसकी कल्पना ही इस ढंग की की गई है कि बहुत से लोग चन्द लोगों के स्वार्थों की पूर्ति में निरत रहे । इस व्यवस्था मे आदमी को स्वयं अपने आप मानव प्रवर (भू-सुर) बने हुए मानवों की सेवा में झोंक दिया गया था ।

३९. इसका उद्देश्य कमजोरों को दबाना और उनका शोषण था और उनको सर्वथा गुलाम बनाये रखना ।

४०. बुद्ध ने सोचा कि जिस “कर्म-वाद" की ब्राह्मण-वाद में रचना की है वह भी विद्रोह की भावना को सर्वथा सीख जाने के लिए ही है । अपने दुःख के लिए स्वयं आदमी ही जिम्मेवार है । विद्रोह करने से भी कष्ट दूर नहीं किया जा सकता । क्योंकि उसके पूर्वजन्म कर्म में यह पहले ही निश्चय कर दिया है कि वह इस जन्म में दुखी रहेगा !

४१. शूद्र और स्त्रियाँ -- जिनकी मानवता को ब्राह्मण-वाद ने बुरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया था - सर्वथा शक्तिहीन थीं । वह इस पद्धति के विरुद्ध जरा सिर न उठा सकती थीं ।

४२. उन्हे ज्ञान-प्राप्त करने तक का अधिकार न था । इस जबर्दस्ती के अज्ञान का ही यह दुष्परिणाम था कि वे यह कभी जान ही न सकते थे कि किसने उन्हें इस दुरवस्था तक पहुंचाया है ? वे यह जान नहीं सकते थे कि ब्राह्मणवाद ने उनका सारा जीवन-रस सीख लिया है । ब्राह्मणवाद के विरूद्ध विद्रोह कर उठने की बजायें वे ब्राम्हणवाद के भक्त और समर्थक बन गये ।

४३. स्वतन्त्रता-प्राप्ति के निमित्त शस्त्र उठाने का अधिकार आदमी का अन्तिम अधिकार है । लेकिन शूद्रो से शस्त्र धारण करने का अधिकार भी छीन लिया गया था ।

४४. ब्राह्मण-वाद के अधीन बेचारे शूद्र स्वार्थी ब्राह्मणों, शक्तिशाली क्षत्रियों और धनी वैश्यों के एक भयानक षडयन्त्र के शिकार- मात्र बन कर रहे गये ।

४५. क्या उसमें सुधार हो सकता था ? बुद्ध जानते थे कि यह 'भगवान की बनाई हुई' सामाजिक व्यवस्था बताई जाती है, इसलिये इसमें सुधार नहीं हो सकता है । इसे केवल समाप्त ही किया जा सकता है ।

४६. इन्हीं कारणों से बुद्ध ने ब्राह्मणवाद को सद्धम्म का --जीवन के सच्चे धम्म का -- परम विरोधी मान कर अस्वीकार कर दिया ।

 

४. उपनिषद् तथा उनकी शिक्षा


१. उपनिषद् भी वैदिक- वाङ्ग्मय का एक हिस्सा माने जाते हैं । यह वेद का हिस्सा नहीं है । यह श्रुति-बाह्य से हैं ।

२. यह सब होने पर भी यह धार्मिक वाङमय का एक हिस्सा हैं ।

३. उपनिषदों की संख्या काफी बड़ी है। कुछ महत्व के कुछ यूँ ही ।

४. कुछ में वैदिक सिद्धान्तियों का -- ब्राह्मण-पुरोहितों का काफी विरोध है ।

५. सभी एक बात में सहमत थे कि वैदिक अध्ययन 'अविद्या' का ही अध्ययन हैं ।

६. वेदों और वैदिक विज्ञान को सभी अपरा (नीचे दर्जे की) विद्या ही मानते थे ।

७. वे सभी वेद को अपौरूषेय न मानने के समर्थक थे ।

८. ब्राह्मणी-दर्शन की ऐसी प्रधान स्थापनाओं जैसे यज्ञ और उनके फल, श्राद्ध, और ब्राह्मण-पुरोहितों को दिये जाने वाले दोनों के माहात्म्य -- को अस्वीकार करने में सभी एकमत थे ।

९. किन्तु यह कोई उपनिषदों का मुख्य विषय न था । उनकी चर्चे का मुख्य विषय है ब्रह्म और आत्मा ।

१०. ब्रह्म ही वह सर्वव्यापक तत्व है जो विश्व को बांधे हुए है और आदमी की मुक्ति भी इसी बात में है कि उसके आत्मा को इस बात का बोध हो जाय कि वह भी 'ब्रह्म' है ।

११. उपनिषदों की मुख्य स्थापना यही थी कि 'ब्रह्म' ही सत्य है, तथा 'आत्मा' और 'ब्रह्म' एक ही है । उपाधि-ग्रस्त होने के कारण ही 'आत्मा' को इस बात का बोध नहीं होता कि वह 'ब्रह्म' है ।

१२. प्रश्न पैदा हुआ: क्या 'ब्रह्म' एक वास्तविकता है? उपनिषदों की सारी स्थापना इसी एक प्रश्न के उत्तर पर निर्भर करती है ।

१३. बुद्ध को 'ब्रह्म' की वास्तविकता का कोई प्रमाण नहीं मिला । इसलिए उन्होंने उपनिषदों की स्थापना को अस्वीकार कर दिया ।

१४. ऐसा नहीं है कि स्वंय उपनिषदों के रचयिताओं से इस बारे में प्रश्न न पूछे गये हों । वे पूछे गये थे ।

१५. इस तरह के प्रश्न याज्ञवल्क्य जैसे महान् ऋषि से भी पूछे गये थे, जिसका वृहदारण्यक उपनिषद् में उतना महत्वपूर्ण स्थान है ।

१६. उससे पूछा गया था “ब्रह्म क्या है? आत्मा क्या है?" याज्ञवल्क्य इतना ही उत्तर दे सका था- “मै नहीं जानता, मैं नहीं जानता -- नेति नेति ।"

१७. बुद्ध को शंका थी कि जिसके विषय में कोई कुछ जानता ही नहीं, वह 'वास्तविकता' कैसे हो सकती है? इसलिए उन्होंने उपनिषदों की स्थापना को भी शुद्ध कल्पना समझ अस्वीकार कर दिया ।