प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
मनु के विपरीत कौटिल्य के युग में नारी अपने पति के साथ परस्पर वैर और घृणा होने के कारण विवाह विच्छेद कर सकती थी ।
'जो नारी अपने पति से घृणा करती है, वह उस पति की इच्छा के विरुद्ध अपना विवाह संबंध नहीं तोड़ सकती। वह पति भी अपनी इच्छा से अपनी स्त्री की इच्छा के बिना उसका परित्याग नहीं कर सकता । परंतु परस्पर वैर होने पर विवाह विच्छेद होता है। यदि एक पुरुष अपनी पत्नी से खतरा अनुभव करता है और उससे विवाह विच्छेद करना चाहता है तो वह उसे वह संपत्ति देगा, जो उसे नारी के विवाह के अवसर पर प्राप्त हुई थी। यदि कोई नारी अपने पति से खतरा अनुभव करती है और उससे विवाह विच्छेद करना चाहती है तो उसका अपनी संपत्ति पर कोई अधिकार शेष नहीं रहेगा। प्रत्येक पत्नी अपना विवाह-विच्छेद कर सकती है, यदि उसका पति दुश्चरित्र है। '
'जिस नारी को अनिश्चित काल तक भरण-पोषण मिलने का अधिकार है, उसे उसकी आवश्यकतानुसार या उसकी आय के अनुपात में अधिक आवश्यकतानुसार अन्न और वस्त्र उपलब्ध कराए जाएं। यदि यह अवधि जिसमें ये वस्तुएं और इसके अलावा धन- राशि का 1/10 भाग भी दिया जाना सीमित है, तो धन का एक निश्चित भाग जो भर्ता की आय के अनुपात में निश्चित किया गया हो, वह उस नारी को दिया जाए, बशर्ते उसे शुल्क (जो उसे उसके पति को पुनर्विवाह की अनुमति के कारण देय है) स्त्री धन और क्षतिपूर्ति की राशि नहीं दी गई हो। यदि वह अपने श्वसुर - कुल के किसी व्यक्ति के संरक्षण में रहना चाहती है, अथवा वह स्वतंत्र रहना आरंभ कर देती है, तब उसके भरण-पोषण के लिए उसके पति पर दावा नहीं किया जा सकता। इस प्रकार भरण-पोषण का निर्धारण होता है। '
कौटिल्य के समय में किसी नारी अथवा विधवा के पुनर्विवाह पर कोई प्रतिबंध नहीं था।
'यदि कोई नारी अपने पति की मृत्यु के बाद धर्मपरायण जीवनयापन करना चाहती है, तो वह तुरंत न केवल अपनी स्थाई निधि और स्त्री धन को प्राप्त करेगी, बल्कि देय शुल्क बकाया भी प्राप्त करेगी। यदि इन दोनों को प्राप्त करने के बाद वह पुनर्विवाह कर लेती है, तो उस नारी को इन दोनों को (उनके मूल्य पर ) ब्याज सहित लौटाना होगा। यदि वह दूसरा विवाह करना चाहती है, तो उसको पुनर्विवाह के समय वह सब दिया जाएगा, जो उसे उसके श्वसुर या उसके पति अथवा दोनों ने दिया था। नारियां कब पुनर्विवाह कर सकती हैं, यह अपने-अपने पतियों के साथ बिताए गए दीर्घ समय के बारे में स्पष्ट किया जाएगा।
'यदि कोई विधवा अपने श्वसुर द्वारा चुने गए पुरुष के बजाए किसी अन्य पुरुष के साथ विवाह करती है, तो वह उस संपत्ति से वंचित हो जाएगी, जो उसे अपने श्वसुर अथवा मृत पति से प्राप्त हुई होगी।'
‘जब कोई नारी किसी जाति ( नातेदार ) से पुनर्विवाह करती है, तब उस पति के जाति (नातेदार) उसके पुराने श्वसुर को वह सब संपत्ति लौटा देंगे जो उस नारी की अपनी होती थी। जो किसी नारी को न्यायतः अपने संरक्षण में लेता है, वह उसकी संपत्ति का भी संरक्षण करेगा। जो नारी पुनर्विवाह करती है, वह अपने मृत पति की संपत्ति पर अधिकार करने में सफल नहीं होगी। धर्मपरायण जीवन व्यतीत करती है, तो उसे ऐसा अधिकार होगा। कोई भी नारी पुत्र या पुत्रों सहित (पुनर्विवाह करने के बाद) अपनी संपत्ति ( स्त्री धन) का स्वेच्छापूर्वक उपयोग करने में स्वतंत्र नहीं है, क्योंकि उसकी संपत्ति उसके पुत्रों को प्राप्त होगी । '
‘यदि कोई नारी पुनर्विवाह के पश्चात् इस तर्क पर अपनी संपत्ति लेना चाहे कि उसे अपने पुत्रों का भरण-पोषण करना है जो उसने अपने पूर्व पति से जन्मे थे, तो उसे वह संपत्ति उनके नाम करनी होगी। यदि किसी नारी के कई पुत्र हों और वे कई पतियों से उत्पन्न हुए हों, तो वह अपनी संपत्ति पर वैसे ही अधिकार कर सकती है, जैसे कि वह उसे अपने पतियों से प्राप्त हुई हो। जो नारी पुनः विवाह करती है, वह उस संपत्ति को भी अपने पुत्रों के नाम करेगी, जो उसे पूर्ण अधिकार सहित प्राप्त हुई है। '
‘जो बांझ विधवा अपने मृत पति में आस्था रखती है, वह अपने गुरु के संरक्षण में रहकर आजीवन अपनी संपत्ति का उपभोग कर सकती है, जिससे उसे उन आपदाओं का सामना न करना पड़े, जो नारियों को संपत्ति के संबंध में झेलनी पड़ती हैं। उसकी मृत्यु पर उसकी संपत्ति, उसके दायदा को प्राप्त होगी। यदि उसका पति जीवित है और पत्नी की मृत्यु हो गई है, तो उस नारी के पुत्र और पुत्रियां आपस में संपत्ति का विभाजन करेंगे। यदि पुत्र नहीं है तो वह संपत्ति उसकी पुत्रियों को मिलेगी। यदि पुत्री भी न हो, तो उसका पति वह संपत्ति (शुल्क) प्राप्त करेगा जो उसने अपनी पत्नी को दिया हो और उसके संबंधी उस सामग्री को प्राप्त करेंगे जो उन्होंने दान अथवा दहेज के रूप में उसे दी थी। इस प्रकार नारी की संपत्ति के निर्धारण की व्यवस्था की गई है।
'शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण वर्ण की जो पत्नियां हैं और जिनके संतान उत्पन्न नहीं हुई हैं वे क्रमशः एक, दो, तीन और चार वर्ष तक प्रतीक्षा करें क्योंकि उनके पति अल्प समय के लिए परेदश गए हुए हैं और जिन्होंने बच्चों को जन्म दिया हो, वे अपने अनुपस्थित पति की एक वर्ष से अधिक समय तक प्रतीक्षा करें। यदि उन्हें भरण-पोषण की राशि दी गई हो तो उन्हें उक्त अवधि से दुगने समय तक प्रतीक्षा करनी चाहिए यदि उन्हें भरण-पोषण की व्यवस्था नहीं की गई है, तो उनके संपन्न जाति ( नातेदारों) को उनका भरण-पोषण चार से आठ वर्ष तक करना चाहिए। तब परिजन को चाहिए कि वह उनसे उस संपत्ति को वापस लेकर विवाह के लिए मुक्त कर दें, जो उन्हें विवाह के अवसर पर प्रदान की गई थी। यदि पति ब्राह्मण है और वह परदेश में अध्ययन कर रहा है, तो उसकी पत्नी को जिसके कोई बच्चा नहीं है, उसकी प्रतीक्षा दस वर्ष तक करनी चाहिए। किंतु यदि उसके बच्चे हैं, तो बारह वर्ष तक प्रतीक्षा करे। यदि कोई पति राजा का कर्मचारी है तो उसकी पत्नी, उसकी आजीवन प्रतीक्षा करे और यदि उसने किसी सवर्ण (अर्थात् दूसरा पति जो उसी गोत्र का है जिसका पूर्व पति था) से संतान को जन्म दिया है, जिससे उसका (नारी का) वंश समाप्त होने से बच जाए, तो वह नारी ऐसा करने से निंदा की पात्र नहीं होगी। यदि अनुपस्थित पति की पत्नी के पास भरण-पोषण नहीं है और उसके संपन्न जाति ( नातेदारों) ने उसकी उपेक्षा कर दी है तो उस पुरुष के साथ अपना पुनर्विवाह कर सकती है, जिसे वह पसंद करती है तथा जो उसका भरण-पोषण कर सकता हो, उसे कष्टों से मुक्ति दिला सकता हो ।'
यहां मनु के विपरीत विवाहिता नारी को आर्थिक स्वाधीनता सुनिश्चित की गई थी। वह कौटिल्य के अर्थशास्त्र में पत्नी की स्थाई निधि और उसके भरण-पोषण के संबंध में दी गई व्यवस्था से स्पष्ट है, जो इस प्रकार है:
'जिसे नारी की संपत्ति कहा जाता है, उसमें जीविका के साधन (वृत्ति) या आभूषण (अवघ्य) शामिल है। जीविका के जिन साधनों का मूल्य दो हजार से अधिक है, वह (उसके नाम) स्थाई निधि हैं। आभूषणों की कोई सीमा नहीं है। यदि कोई पत्नी संपत्ति का उपयोग अपने पुत्र, अपनी पुत्र वधू और स्वयं पर करती है और जबकि पति ने उसके भरण-पोषण का कोई प्रबंध न किया हो, तब वह किसी अपराध की भागी नहीं होगी। प्राकृतिक आपदा, व्याधि और अकाल के समय खतरों से बचने के लिए और दान-दक्षिणा के लिए पति भी उस संपत्ति का उपयोग कर सकता है। जिस दंपति के जुड़वां बच्चे हुए हों, वह यदि परस्पर सहमति से इस संपत्ति का उपयोग करें, तो इनमें से किसी के विरुद्ध कोई शिकायत नहीं होगी। तब भी किसी शिकायत को स्वीकार नहीं किया जाएगा, जब इस संपत्ति का उपयोग तीन वर्ष तक उन लोगों ने किया हो, जिनका विवाह पहली चार पद्धतियों के अनुसार हुआ हो, किंतु गंधर्व विवाह और असुर विवाह होने पर यह संपत्ति ब्याज सहित लौटानी होगी। राक्षस और पिशाच विवाह के संदर्भ में वह संपत्ति चोरी की संपत्ति समझी जाएगी। '
'जिस नारी को अनिश्चित काल तक भरण-पोषण मिलने का अधिकार है, उसे उसकी आवश्यकता के अनुसार अन्न और वस्त्र या भर्ता की आयु के अनुपात में हो तो अधिक आवश्यकतानुसार उपलब्ध कराए जाएं। यदि वह अवधि, जिसमें वस्तुएं और इसके अलावा धनराशि का 1/10 भाग भी दिया जाना है) सीमित है तब धन का एक निश्चित भाग जो भर्ता की आय के अनुसार निश्चित किया गया हो, तो वह उस नारी को दिया जाए, बशर्ते उसे शुल्क जो उसे उसके पति की अनुमति के अनुसार देना है स्त्री धन क्षतिपूर्ति की राशि नहीं दी गई है। यदि वह अपने श्वसुर कुल के किसी व्यक्ति के संरक्षण में रहना चाहती है अथवा वह स्वतंत्र रहना आरंभ कर देती है, उसके भरण-पोषण के लिए उसके पति पर दावा नहीं किया जा सकता। इस प्रकार भरण-पोषण का निर्धारण होता है। '
क्या यह आश्चर्यजनक नहीं लगता कि कौटिल्य के समय में कोई पत्नी अपने पति के विरुद्ध प्रताड़ना और मानहानि होने पर अदालत में जा सकती थी।
संक्षेप में, मनु से पहले नारी स्वतंत्र थी और पुरुष की समान भागीदार थी। मनु ने उसे पदावनत क्यों किया ?