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प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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01 जून 2023
Book
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     “मैं समझता हूं, यह एक ऐसी विधि थी, जिसके माध्यम से एक ही संस्कार कर व्रात्यों को ऋषियों के समाज में सम्मिलित कर लिया जाता था। और ऐसे संस्कारों का आयोजन प्रायः किया जाता था। इस प्रकार झुंड के झुंड खानाबदोश आर्यों को बसाया गया। शुद्ध किए गए व्रात्यों को गृहस्थ बन जाने पर अपने व्रात्य जीवन की संपत्ति अपने साथ रखने की अनुमति नहीं दी जाती थी। उन्हें अपनी संपत्ति उन व्रात्यों के लिए छोड़ देनी पड़ती थी, जो उस समय भी व्रात्य बने रहते थे, अथवा वह मगध देश के तथाकथित ब्राह्मणों को दे दी जाती थी। इस क्षेत्र के बार में मैंने एक अन्य स्थान पर कहा है कि यहां अधिकांश वे लोग रहते थे जिन्हें ऋषिगण नीच समझते थे। "

Shudra Aur Pratikranti Dr Babasaheb Ambedkar

     “किंतु जब व्रात्यों को स्थाई जीवन में स्वीकार कर लिया जाता था, तब उन्हें समान अधिकार प्राप्त हो जाते थे। ऋषि उनके हाथ का बना भोजन करते थे। उन्हें ऋग् यजुर साम, तीनों विद्याओं की शिक्षा दी जाती थी, उन्हें वेदों का अध्ययन करने और उनका अध्ययन कराने, अपने तथा दूसरों के लिए यज्ञ करने की अनुमति दे दी जाती थी, अर्थात् वे पूर्ण रूप से समान समझे जाते थे। वे समान ही नहीं माने जाते थे, बल्कि उन्होंने ऋषि जैसी उच्चतम प्रवीणता भी अर्जित की। उन्हें सामवेद का और ऋग्वेद का रहस्य भी ज्ञापित किया गया। इनमें से कौशितकी नाम एक शुद्धीकृत व्रात्य को ऋग्वेद के ब्राह्मणों को संकलित करने की अनुमति दी गई थी। यह संकल्प आज भी उसके नाम से जाना जाता है। "

     आर्य न केवल अपने ढंग से इच्छुक अनार्यों को अपनी जीवन पद्धति में परिवर्तित कर रहे थे, बल्कि वे अनिच्छुक असुरों को भी परिवर्तित कर रहे थे, जो आर्यों, उनकी यज्ञ-संस्कृति और चातुर्वर्ण्य सिद्धांत और यहां तक कि वे उनके वेदों तक के विरोधी थे, जिनका एक पौराणिक कथा के अनुसार असुरों ने आर्यों से हरण कर लिया था। इस संबंध में विष्णु द्वारा हिरण्यकश्यप नामक असुर का वध कर उसके पुत्र प्रह्लाद की इस कारण रक्षा करना कि प्रह्लाद आर्य संस्कृति में दीक्षित होना चाहता था, जबकि हिरण्यकश्यप इसके विरुद्ध था, एक उल्लेखनीय उदाहरण है। अनायों को आर्य संस्कृति में परिवर्तित करने और उन्हें अधिकार प्रदान करने के और भी कई उदाहरण हैं। शूद्रों के विरुद्ध विरोधी दृष्टिकोण क्यों अपनाया गया ? शूद्र को आर्य संस्कृति में पूर्णत: क्यों सम्मिलित किया गया और पूर्ण अधिकार दिया गया और क्योंकर बहिष्कृत और अधिकार वंचित किया गया? इस पहेली का, निषादों के साथ जो व्यवहार किया गया, उससे कुछ हल निकलता है। प्राचीन संस्कृत साहित्य में पांच जनजातियों का उल्लेख हुआ है। उनका विभिन्न शीर्षकों में वर्णन है, जैसे पंच कृष्ट्यः, पंच क्षित्यः मनुष्यः, पंच चार्ष्णेयः, पंच जन:, पंचजन्म जैसे पंचभूम, पंच जात।

     इस बात पर मतभेद है कि इन शब्दों का क्या अर्थ है? ऋग्वेद के भाष्यकार सायणाचार्य का कथन है कि ये चार वर्णों और निषादों के द्योतक हैं। विष्णु पुराण में निषादों की उत्पत्ति के विषय में निम्न कथा आती है.—

     '7. सुनीता नामक कन्या का विवाह अंग के साथ हुआ, जो मृत्यु की पहली पुत्री थी और उससे वेन का जन्म हुआ ।

     8. मृत्यु का यह पुत्र जो अपने नाना को मिले शाप से ग्रस्त था, जन्म से ही दुष्ट था, जैसे वह उसकी प्रकृति हो ।

     9. जब श्रेष्ठ ऋषियों द्वारा वेन राज पद पर प्रतिष्ठित किया गया तब उसने पृथ्वी पर यह घोषणा करवाई कि कोई भी यज्ञ न करे, न दान दे और न नैवेद्य अर्पित करे । मेरे अतिरिक्त कोई भी यज्ञ की आहुति लेने योग्य नहीं है? 'मैं सर्वदा के लिए यज्ञ का स्वामी हूं।'

     10. तब सभी ऋषि आदरपूर्वक राजा के पास गए और उन्होंने उससे विनम्रतापूर्वक समझाते हुए कहा-

     11. हे राजन्! हम जो कहते हैं, उसे सुनिए ।

     12. हम दीर्घ सत्र नामक यज्ञ कर हरि की पूजा करेंगे, जो देवताओं के अधिपति हैं और जो सभी यज्ञों के स्वामी हैं, इस यज्ञ से आपके साम्राज्य को आपको और आपकी प्रजा को उच्चतम लाभ होगा। आप सुख से रहें। आपको इस यज्ञ में भाग लेना होगा।

     13. विष्णु जो यज्ञों के स्वामी हैं, इस पूजा से हमारे द्वारा संतुष्ट किए जाने पर आपको आपकी इच्छानुसार सभी फल प्रदान करेंगे। जिन राजाओं के राज्य में हरि, जो यज्ञों के स्वामी हैं, का पूजन कर आदर किया जाता है, उनको सभी वस्तुएं जो वे चाहते हैं, प्रदान करते हैं, 'वेन ने उत्तर दिया मुझसे अधिक श्रेष्ठ कौन है? मेरे अतिरिक्त कौन हैं, जिसकी आराधना की जाए? हरि नाम का यह व्यक्ति कौन है जिसे आप यज्ञ का स्वामी कहते हैं? ब्रह्मा, जनार्दन, रुद्र, इंद्र, वायु, यम, रवि, अग्नि, वरुण, धात्रि, पूषण, पृथ्वी, चन्द्रमा - सभी और अन्य देवता जो शाप देते और आशीर्वाद देते हैं, राजा में विद्यमान हैं क्योंकि वह सभी देवताओं से मिलकर बना है। आप इसे जानते हुए मेरे आदेश के अनुसार कार्य कीजिए । ब्राह्मणों, आप न तो कोई दान दें, न पूरा करें और न बलि दें।

     14. जिस प्रकार पत्नियों का परम कर्तव्य अपने-अपने पतियों की आज्ञा का पालन करना है, उसी प्रकार आपको मेरी आज्ञा का पालन करना चाहिए। ऋषियों ने उत्तर दिया, 'हे महाराज, हमें अनुमति दीजिए, धर्म की हत्या न होने दीजिए, यह सारा संसार पूजा-अर्चना का परिष्कृत रूप है। '

     15. जब धर्म का नाश होता है, तब उसके साथ सारे संसार का नाश हो जाता है। जब वेन ने इस प्रकार ऋषियों द्वारा प्रताड़ित और संबोधित किए जाने पर भी अपनी अनुमति नहीं दी, तब सभी मुनि असंतुष्ट होकर क्रुद्ध हो चिल्लाने लगे, 'मार डालो, इस पापी को मार डालो। '

     16. यह नीच कर्म करने वाला व्यक्ति जो ईश्वर की, जो आदि और अनंत परमेश्वर की निंदा करता है, पृथ्वी पर राज्य करने योग्य नहीं है। इस प्रकार कहकर मुनियों ने इस राजा को अपने हाथों में कुश लेकर शाप दिया, जो ईश्वर की निंदा करने और अन्य पाप कर्मों के लिए पहले से ही शाप - ग्रस्त था। इसके बाद मुनियों ने अपने चारों ओर धूल उड़ती देखी और जो लोग उनके पास खड़े थे, उनसे वे जो कुछ हुआ, उसके बारे में बोले।

     17. उन्हें बताया गया कि इस राज्य में जहां कोई राजा नहीं है, लोग त्रस्त होने के कारण डाकू बन गए हैं और दूसरों की संपत्ति छीनने लगे हैं।

     18. यह धूल उन डाकुओं के कारण उड़ रही हैं, जो आवेश में आकर भाग रहे हैं और दूसरे व्यक्तियों की संपत्ति लूट रहे हैं। तब सभी मुनियों ने एक-दूसरे से परामर्श कर राजा की जांघ को रगड़ा जो निःसंतान था, जिससे एक पुत्र का जन्म हुआ जो लकड़ी के जले हुए कुंदे के समान था, जिसकी मुखाकृति चपटी थी और जो कद में बहुत ही छोटा था।

     19. यह व्यक्ति व्यथित होकर ब्राह्मणों से बोला, 'मेरे लिए क्या आज्ञा है ।' उन्होंने उससे कहा, बैठ जाओ (निषीथ) और इससे वह निषाद बन गया।

     20. इससे निषादों का जन्म हुआ, जो विन्ध्यपर्वत पर रहते हैं और अपने क्रूर कर्मों के लिए कुख्यात हैं।

     21. इस प्रकार राजा का पाप उसके शरीर को त्याग कर बाहर आया और इस प्रकार निषादों की उत्पत्ति हुई, जो वेन की क्रूरता की संतान है। '

     निषादों की उत्पत्ति के बारे में यह एक पौराणिक उल्लेख है, किंतु यह ऐतिहासिक तथ्य भी है। इससे यह प्रमाणित होता है कि निषाद निम्न वर्गीय और आदिम जातियां थीं, जो विन्ध्य पर्वत पर जंगलों में रहती थीं। ये क्रूर तथा दुष्ट लोग थे, अर्थात् जो आर्य संस्कृति के विद्वान थे। उन्होंने अपनी उत्पत्ति के संबंध में एक पौराणिक आख्यान गढ़ लिया और अपने आपको आर्य संप्रदाय से जोड़ दिया। यह सब कुछ इसलिए किया गया कि निषादों को आर्यों के दल से, न कि आर्यों के समाज से जोड़ लेने के लिए प्रमाण मिल सकें। अब कहीं भी निषादों को नीच, असंस्कृत और विदेशी जनजाति कहकर कोई रोक नहीं लगाई जाती। प्रश्न यह है कि शूद्रों पर सारी रोक क्यों लगाई जाती है। जो सुसंस्कृत थे और आर्य थे?