जातिप्रथा और उन्मूलन
jati Pratha aur Unmulan Answer given to Mahatma Gandhi dr bhimrao ambedkar
लाहौर जातपांत तोड़क मंडल १९३६ के वार्षिक सम्मेलन के लिए डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा तैयार किया गया भाषण
2
भारत में समाज सुधार का मार्ग स्वर्ग के मार्ग के समान है और इस कार्य में अनेक कठिनाइयां है। भारत में समाज सुधार कार्य में सहायक मित्र कम और आलोचक अधिक हैं। आलोचकों के दो स्पष्ट वर्ग हैं। एक वर्ग में राजनीतिक सुधारक हैं और दूसरे में समाजवादी ।
एक समय था, जब यह माना जाता था कि सामाजिक कुशलता के बिना अन्य कार्य क्षेत्रों में प्रगति असंभव है। कुप्रथाओं से फैली बुराइयों के कारण हिन्दू समाज की कार्य- कुशलता समाप्त हो चुकी थी। अब इन बुराइयों को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए अथक प्रयास करने होंगे। इस तथ्य को समझ कर ही राष्ट्रीय कांग्रेस के जन्म के साथ ही सामाजिक सम्मेलन की भी स्थापना हुई थी। जहां कांग्रेस का संबंध देश के राजनीतिक संगठन में कमजोर तथ्यों को परिभाषित करना था, वहां सामाजिक सम्मेलन हिन्दू समाज के सामाजिक संगठन में कमजोर बातों को दूर करने में लगा हुआ था। कुछ समय तक कांग्रेस और सम्मेलन ने एक सामान्य क्रियाकलाप के दो अंगों के रूप में कार्य किया और उनके वार्षिक अधिवेशन भी एक ही पंडाल में होते थे। किन्तु शीघ्र ही ये दो अंग दो दलों में बदल गए - एक राजनीतिक सुधार दल और दूसरा सामाजिक सुधार दल । इनके बीच उग्र विवाद उठ खड़े हुए। राजनीतिक सुधार दल, राष्ट्रीय कांग्रेस का समर्थन करता था और सामाजिक सुधार दल सामाजिक सम्मेलन का । इस प्रकार दो संस्थाएं दो विरोधी कैम्प बन गए। मुद्दा यह था कि क्या सामाजिक सुधार राजनीतिक सुधारों से पहले होने चाहिएं। एक दशक तक दोनों शक्तियों का संतुलन समान रूप से बना रहा और उनमें किसी भी पक्ष की विजय के बिना लड़ाई चलती रही। किन्तु यह स्पष्ट था कि सामाजिक सम्मेलन का भाग्य तेजी से अस्त हो रहा था। जिन सज्जनों ने सामाजिक सम्मेलन के अधिवेशनों की अध्यक्षता की थी, वे इस बात से दुखी थे कि बहुसंख्यक शिक्षित हिन्दू राजनीतिक उत्थान के पक्षधर हैं और सामाजिक सुधारों के प्रति उदासीन हैं। कांग्रेस में उपस्थित होने वाले लोगों की संख्या बहुत बड़ी थी जो लोग उसमें उपस्थित नहीं हुए, उनकी सहानुभूति इसके साथ थी तथा उनकी संख्या और भी बड़ी थी। जो लोग सामाजिक सम्मेलन में उपस्थित हुए, उनकी संख्या बहत कम थी। इस उदासीनता और कार्यकर्ताओं में हुई कमी के शीघ्र बाद राजनीतिज्ञों की ओर से इसका सक्रिय विरोध आरंभ हो गया। कांग्रेस ने शिष्टता के नाते सामाजिक सम्मेलन को अपने पंडाल का प्रयोग करने की जो अनुमति दे रखी थी, स्वर्गीय श्री तिलक के नेतृत्व में उसे वापस ले लिया गया और शत्रुता की भावना इतनी गहरी हो गई कि जब सामाजिक सम्मेलन ने अपना पंडाल खड़ा करने की इच्छा की तो इसके विरोधियों ने पंडाल को जला डालने की धमकी दी। इस प्रकार समय के साथ-साथ राजनीतिक सुधार के पक्ष वाले दल की जीत हुई और सामाजिक सम्मेलन गायब हो गया और लोग उसे भूल गए। इलाहाबाद में हुए कांग्रेस के आठवें अधिवेशन के अध्यक्ष के रूप में श्री डब्ल्यू. सी. बनर्जी ने जो भाषण दिया था, वह सामाजिक सम्मेलन की मृत्यु पर पढ़े गए शोक संदेश जैसा लगता है। वह कांग्रेस की प्रवृत्ति का इतना द्योतक है कि मैं उससे यहां एक उद्धरण दे रहा हूं। श्री बनर्जी ने कहा था :

मैं ऐसे लोगों की बात सुनने को बिल्कुल तैयार नहीं हूं जो यह कहते हैं कि हम अपनी सामाजिक प्रणाली में सुधार नहीं करेंगे, जब तक हम राजनीतिक सुधारों के योग्य नहीं हो सकेंगे। मुझे दोनों के बीच कोई संबंध नहीं दिखाई देता ।........क्या हम ( राजनीतिक सधार के लिए) इसलिए उपयुक्त नहीं है, क्योंकि हमारी विधवाएं अविवाहित रह जाती हैं और हमारी लड़कियां अन्य देशों की तुलना में बहुत पहले ही विवाह सूत्र में बांध दी जाती हैं। क्योंकि पत्नी और पुत्रियां हमारे मित्रों से मिलने जाने के लिए हमारे साथ कारों में नहीं चलतीं? क्योंकि हम अपनी पुत्रियों को ऑक्सफोर्ड और केम्ब्रिज नहीं भेजते?
मैंने जैसा कि श्री बनर्जी ने प्रस्तुत किया था, राजनीतिक सुधार का मामला आपके सामने रखा है। अनेक लोग ऐसे थे, जो यह जानकार प्रसन्न थे कि कांग्रेस की जीत हुई। किन्तु जो लोग समाज सुधार के महत्व में विश्वास रखते हैं वे पूछ सकते हैं कि क्या श्री बनर्जी की दलील अंतिम है? क्या इससे यह सिद्ध होता है कि जीत उन्हीं की हुई, जो न्याय संगत थे? क्या निष्कर्ष रूप में इससे यह सिद्ध होता है कि समाज सुधार का राजनीतिक सुधार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता ? यदि मैं मामले के दूसरे पहलू पर विचार करूं तो इससे मामले को समझने में सहायता मिलेगी। मैं अपने तथ्यों के लिए अछूतों के साथ व्यवहार का उल्लेख करूंगा।
मराठा राज्य में पेशवाओं के शासन में यदि कोई हिन्दू सड़क पर आ रहा होता था तो किसी अछूत को इसलिए उस सड़क पर चलने की अनुमति नहीं थी कि उसकी परछाई से वह हिन्दू अपवित्र हो जाएगा। अछूत के लिए यह आवश्यक था कि वह अपनी कलाई या गर्दन में निशानी के तौर पर एक काला धागा बांधे, जिससे कि हिन्दू गलती से उससे छूकर अपवित्र हो जाने से बच जाए। पेशवाओं की राजधानी पूना में किसी भी अछूत के लिए अपनी कमर में झाडू बांधकर चलना आवश्यक था, जिससे कि उसके चलने से पीछे की धूल साफ होती रहे और ऐसा न हो कि कहीं उस रास्ते से चलने वाला कोई हिन्दू उससे अपवित्र हो जाए। पूना में अछूतों के लिए यह आवश्यक था कि जहां कहीं भी वे जाएं, अपने थूकने के लिए मिट्टी का एक बर्तन अपनी गर्दन में लटका कर चलें, क्योंकि ऐसा न हो कि कहीं जमीन पर पड़ने वाले उसके थूक से अनजाने में वहां से गुजरने वाला कोई हिन्दू अपवित्र हो जाए। मैं हाल ही के कुछ और तथ्यों का भी यहां उल्लेख करना चाहता हूं। मध्य भारत की बलाई नाम की एक अछूत जाति पर हिन्दुओं द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों का जिक्र करना काफी होगा। चार जनवरी, 1928 के 'टाइम्स ऑफ इंडिया' की एक रिपोर्ट आप देखें 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के संवाददाता ने समाचार दिया है। कि कनरिया, बिचोली -हाफसी, बिचोली- मर्दाना गांवों तथा इंदौर जिले ( इंदौर रियासत के ) के 15 अन्य गांवों की ऊंची जाति के हिन्दुओं ने, अर्थात् कालोटो, राजपूतों और ब्राह्मणों, जिनमें पटेल और पटवारी भी शामिल हैं, अपने-अपने गांवों के बलाइयों को सूचित किया है कि यदि वे उनमें रहना चाहते हैं तो उन्हें नियमों का अवश्य पालन करना होगा :
(क) बलाई, सुनहरी गोटेदार किनारी की पगड़ियां नहीं बांधेंगे।
(ख) वे रंगीन या फँसी किनारी की धोतियां नहीं पहनेंगे।
(ग) वे किसी हिन्दू की मृत्यु पर मृतक के संबंधियों को चाहे वे कितनी भी दूर क्यों न रहते हों, मरने की सूचना देंगे।
(घ) सभी हिन्दुओं के विवाहों में बलाई लोग बारात के आगे और विवाह के दौरान बाजा बजाएंगे।
(ड.) बलाई स्त्रियों सोने या चांदी के आभूषण नहीं पहनेंगी। वे फैंसी गाउन या जाकेट भी नहीं पहनेंगी।
(च) बलाई स्त्रियों को हिन्दू स्त्रियों के प्रसव के सभी मामलों में देखभाल करनी होगी।
(छ) बलाई लोगों को बिना कोई पारिश्रमिक मांगे सेवा करनी होगी और हिन्दू उन्हें जो कुछ खुश होकर देंगे, लेना होगा।
(ज) अगर बलाई लोग इन शर्तों का पालन करना स्वीकार नहीं करते हैं तो उन्हें गांव को छोड़ना होगा।
बलाई लोगों ने उन्हें मानने से इंकार कर दिया और हिन्दुओं ने उनके विरुद्ध कार्रवाई की। बलाइयों को गांवों के कुओं से पानी नहीं भरने दिया गया। उन्हें अपने पशुओं को चराने के लिए नहीं ले जाने दिया गया । बलाई लोगों को हिन्दुओं की भूमि से गुजरने की मनाही कर दी, ताकि यदि किसी बलाई का खेत हिन्दुओं के खेतों से घिरा हो तो बलाई अपने ही खेत तक न पहुंच सकें। हिन्दुओं ने अपने पशुओं को भी बलाइयों के खेतों में चरने के लिए छोड़ दिया। बलाइयों ने इन अत्याचारों के विरुद्ध दरबार में याचिकाएं दायर कीं, किन्तु चूंकि उन्हें समय पर कोई राहत नहीं मिली और अत्याचार जारी रहा तो सैकड़ों बलाई लोग अपने बाल-बच्चों सहित अपने घरों को जहां वे पीढ़ियों से रहते आ रहे थे, छोड़कर समीपवर्ती रियासतों, अर्थात् धार, देवास, बागली, भोपाल, ग्वालियर तथा अन्य रियासतों के गांवों में जाकर बसने के लिए मजबूर हो गए। अपने नए घरों में उनकी क्या स्थिति रही, उस पर फिलहाल हम विचार नहीं करेंगे। गुजरात में कविता की घटना तो पिछले ही वर्ष घटी है। कविठा के हिन्दुओं ने अछूतों को आदेश दिया कि वे अपने बच्चों को सरकार द्वारा चलाए जा रहे गांव के आम स्कूल में न भेजें। हिन्दुओं की इच्छाओं के विरुद्ध नागरिक अधिकार का प्रयोग करने का साहस करने के लिए कविठा के अछूतों को कितने कष्टों का सामना करना पड़ा सभी जानते हैं, इसे विस्तार से बताने की आवश्यकता नहीं है। एक अन्य घटना गुजरात में अहमदाबाद जिले के जानू गांव में हुई। नवम्बर 1935 में सम्पन्न परिवारों की कुछ अछूत महिलाओं ने धातु के बर्तनों में पानी लाना आरंभ कर दिया। हिन्दुओं ने अछूतों द्वारा धातु के बर्तनों के प्रयोग को अपने सम्मान के विरुद्ध समझा और अछूत महिलाओं पर इस गुस्ताखी के लिए हमला किया। एक बहुत ही नई घटना की सूचना जयपुर रियासत में चकवारा से मिली है। समाचार-पत्रों में छपी सूचना से पता चलता है कि चकवारा के एक अछूत ने जो तीर्थ यात्रा के बाद घर लौटा था, अपने धार्मिक अनुष्ठान को पूरा करने के लिए गांव के अपने अछूत भाइयों को भोज देने की व्यवसायी की थी। मेजबान की इच्छा थी कि मेहमानों को बहुमूल्य भोजन खिलाया जाए और उसमें घी से युक्त व्यंजन भी परोसे जाएं। किन्तु जिस समय अछूत लोग भोजन कर रहे थे तो सैकड़ों की संख्या में हिन्दू लाठियां लेकर वहां दौड़े और भोजन को खराब कर दिया तथा अछूतों को बुरी तरह पीटा। परोसे गए भोजन को छोड़, मेहमान अपनी जान बचाने के लिए भाग गए। निःसहाय अछूतों पर ऐसा प्राणघातक आक्रमण क्यों किया गया? इसका जो कारण बताया गया है, वह यह था कि अछूत मेजबान इतना धृष्ट था कि उसने घी का प्रयोग किया और उसके अछूत मेहमान इतने मुर्ख थे कि वे उसे खो रहे थे। घी निःसंदेह अमीरों के लिए एक विलास की वस्तु है । किन्तु कोई भी यह नहीं सोचेगा कि घी ऊंचे सामाजिक स्तर का प्रतीक है। चकवारा के हिन्दुओं ने इसका दूसरा अर्थ लिया और उन अछूतों द्वारा उनके साथ की गई गलती के लिए हिन्दुओं के धार्मिक • क्रोध में उनसे बदला लिया, जिन्होंने अपने भोजन में घी परोसकर उनका अपमान किया था। उन्हें यह जानना चाहिए था कि वे हिन्दुओं के सम्मान की बराबरी नहीं कर सकते। इसका यह अर्थ है कि किसी अछूत को घी का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ऐसा करना हिन्दुओं के प्रति उद्दंडता है। यह घटना पहली अप्रैल, 1936 या उसके आसपास की है।
इन तथ्यों को बताने के बाद अब मैं सामाजिक सुधार के बारे में बात करूंगा। ऐसा करने में मैं जहां तक हो सकता है, श्री बैनजी का अनुसरण करूंगा। मैं राजनीतिक प्रवृत्ति मैं के हिन्दुओं से पूछता हूं "जब आप अपने ही देश के अछूतों जैसे एक बहुत बड़े वर्ग को सार्वजनिक स्कूल का प्रयोग नहीं करने देते तो क्या आप राजनीतिक सत्ता के योग्य हैं? जब आप उन्हें सार्वजनिक कुओं का प्रयोग नहीं करने दते तो क्या आप राजनीतिक सत्ता के योग्य हैं? जब आप उन्हें आम सड़कों का प्रयोग नहीं करने देते तो क्या आप राजनीतिक सत्ता के योग्य हैं? जब आप उन्हें अपनी पसंद के आभूषण और वेशभूषा धारण नहीं करने देते तो क्या आप राजनीतिक सत्ता के योग्य हैं? जब आप उन्हें उनकी पसंद का भोजन नहीं करने देते तो क्या आप राजनीतिक सत्ता के योग्य हैं?" मैं इस प्रकार के अनेक प्रश्न पूछ सकता हूं, किन्तु ये ही प्रश्न काफी होंगे। मैं व्यग्र हूं यह जानने के लिए कि श्री बैनर्जी क्या उत्तर देते। मुझे यकीन है कि कोई भी समझदार व्यत्ति इसका 'हां' में उत्तर देने का साहस नहीं करेगा। प्रत्येक कांग्रेसी को, जो श्री मिल के इस सिद्धांत को मानता है कि एक देश दूसरे देश पर शासन करने योग्य नहीं है, यह बात स्वीकार करनी चाहिए कि एक वर्ग दूसरे वर्ग पर भी शासन करने के योग्य नहीं है।
तब यह कैसे हुआ कि सामाजिक सुधार दल लड़ाई हार गया। इसे सही-सही रूप में समझने के लिए इस बात पर ध्यान देना जरूरी है कि समाज सुधारक किस प्रकार के समाज सुधार के लिए आंदोलन कर रहे हैं। इस संबंध में यह आवश्यक है कि हिन्दू परिवार के सुधार के अर्थ में समाज सुधार और हिन्दू समाज के पुनर्गठन तथा पुनर्निर्माण के अर्थ में समाज सुधार, इन दोनों में अंतर किया जाए। पहले प्रकार के समाज सुधार का संबंध विधवा विवाह, बाल विवाह, आदि से है, जब कि दूसरे प्रकार के समाज सुधार का संबंध जातिप्रथा के उन्मूलन से है। सामाजिक सम्मेलन एक ऐसी संस्था थी, जिसका संबंध मुख्य रूप से ऊंची जाति के प्रबुद्ध हिन्दुओं से था जो जातिप्रथा के उन्मूलन के लिए आंदोलन करना आवश्यक नहीं समझते थे, या उनमें इसके लिए आंदोलन करने का साहस नहीं था। उन्होंने जबरन विधवापन, बाल विवाह जैसी बुराइयों को जो उनमें फैली हुई थीं और जिन्हें वे खुद महसूस करते थे, दूर करने की भारी आवश्यकता को महसूस किया। वे हिन्दू समाज में सुधार करने के लिए खड़े नहीं हुए थे। वह जो लड़ाई लड़ रहे थे, वह परिवार के सधार के प्रश्न पर ही केंद्रित थी। इसका संबंध जातिप्रथा को तोड़ने के अर्थ में समाज सुधार से नहीं था। समाज सुधारकों ने इस मुद्दे को कभी नहीं उठाया । यही कारण है कि सामाजिक सुधार दल समाप्त हो गया।
मैं जानता हूं कि यह दलील इस तथ्य को नहीं बदल सकती कि राजनीतिक सुधार को वास्तव में सामाजिक सुधार से वरीयता मिली। किन्तु तर्क का अगर अधिक नहीं तो इतना मूल्य तो है ही। इससे स्पष्ट होता है कि समाज सुधारक क्यों सफल नहीं हुए। इससे हमें यह भी समझने में सहायता मिलती है कि राजनीतिक सुधार दल ने सामाजिक सुधार दल के ऊपर जो विजय प्राप्त की, वह कितनी सीमित थी और यह विचार कि सामाजिक सुधार के राजनीतिक सुधार से पहले होने की आवश्यकता नहीं है, ऐसा विचार केवल तभी उत्पन्न होता है जब कि समाज सुधार का अर्थ परिवार का सुधार हो। यह तथ्य कि राजनीतिक सुधार समाज के पुनर्गठन के अर्थ में सामाजिक सुधार के ऊपर वरीयता प्राप्त नहीं कर सकता, एक ऐसा शोध-प्रबंध है जिस पर मैं समझता हूं मतभेद नहीं हो सकता। राजनीतिक संविधानों के निर्माताओं को सामाजिक शक्तियों को ध्यान में रखना चाहिए । इस तथ्य को फर्डिनेंड लेजले जैसे महान व्यक्ति ने स्वीकार किया है कि कार्ल मार्क्स का मित्र और सहकर्मी था। 1862 में प्रशिया की एक सभा में लेजले ने कहा था :
"संवैधानिक प्रश्न सर्वप्रथम अधिकार के प्रश्न नहीं, बल्कि शक्ति के प्रश्न होते हैं। किसी देश के वास्तविक संविधान का अस्तित्व उस देश में विद्यमान शक्ति की वास्तविक स्थिति में ही होता है। अतः राजनीतिक संविधानों का मूल्य और स्थायित्व केवल तभी होता है, जब कि वे शक्ति की उन शर्तों को सही-सही ढंग से प्रकट करते हैं जो किसी समाज में विद्यमान होती हैं।"
किन्तु प्रशिया जाने की जरूरत नहीं है। घर में ही उसके प्रमाण हैं। उस सांप्रदायिक अधिनिर्णय का क्या महत्व है, जिसमें विविध जातियों और समुदायों के परिभाषित अनुपातों में राजनीतिक सत्ता का आवंटन हो ? मेरे विचार से इसका महत्व इस बात में है कि राजनीतिक संवधान को सामाजिक संगठन को ध्यान में रखना चाहिए। इससे प्रकट होता है कि ऐसे राजनीतिज्ञ जिन्होंने यह नहीं माना कि भारत की सामाजिक समस्या का राजनीतिक समस्या पर भी कोई प्रभाव है, वे संविधान तैयार करने में सामाजिक समस्या को मनाने के लिए बाध्य हुए। कहने का तात्पर्य यह है कि सांप्रदायिक अधिनिर्णय सामाजिक सुधार की उपेक्षा से उत्पन्न प्रतिशोध है । यह सामाजिक सुधार दल के लिए विजय है जो यह दिखाता है कि चाहे वे हार गए, किन्तु उनका सामाजिक सुधार के महत्व पर बल देना ठीक था। मैं जानता हूं कि बहुत से लोग इस तथ्य को स्वीकार नहीं करेंगे। इस प्रकार का विचार अभी मौजूद है और इस बात पर विश्वास करना अच्छा लगता है कि सांप्रदायिक अधिनिर्णय अस्वाभाविक है और यह नौकरशाही तथा अल्पसंख्यकों के बीच अपवित्र गठबंधन का परिणाम है। अगर यह कहा जाए कि सांप्रदायिक अधिनिर्णय एक अच्छा साक्ष्य नहीं है तो मैं अपने मत के समर्थन में इस पर एक साक्ष्य के रूप में भरोसा नहीं करना चाहता। आयरलैंड को लीजिए। आयरिश होम रूल का इतिहास क्या बताता है? सब जानते हैं कि अल्स्टर और दक्षिणी आयरलैंड के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत के दौरान दक्षिणी आयरलैंड के प्रतिनिधि श्री रेडमंड ने अल्स्टर को समस्त, आयरलैंड के लिए समान होम रूल संविधान के अंतर्गत लाने के लिए अल्स्टर के प्रतिनिधियों से कहा था, "आप जिस राजनीतिक सुरक्षा को पसंद करते हैं, उसकी मांग करें, आपको वह मिलेगी।" पता है, अल्स्टर के लोगों ने क्या जबाव दिया? उनका उत्तर था, "धिक्कार है, आपकी सुरक्षा को हम किसी भी शर्त पर अपने ऊपर आपका शासन नहीं चाहते।" जो लोग भारत में अल्पसंख्यकों पर दोषारोपण करते हैं, उन्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि यदि अल्पसंख्यक वह रवैया अपना लेते, जो अल्स्टर ने अपनाया था तो बहुसंख्यकों की राजनीतिक आकांक्षाओं का क्या होता? आयरिश होम रूल के प्रति अल्स्टर के रवैए को देखते हुए क्या यह कुछ भी नहीं है कि अल्पसंख्यक उस बहुसंख्यक के शासन में रहने को सहमत हो गए, जिसने राजनीतिज्ञता की कोई अधिक भावना नहीं दिखाई और क्यों उनके लिए कुछ सुरक्षात्मक उपायों की व्यवस्था की ? किन्तु यह केवल आकस्मिक है। मुख्य प्रश्न यह है कि अल्स्टर ने ऐसा रवैया क्यों अपनाया? मैं इसका केवल एक उत्तर दे सकता हूं कि अल्स्टर और दक्षिणी आयरलैंड के बीच एक सामाजिक समस्या थी। कैथोलिकों और प्रोटेस्टेंटों के बीच एक समस्या निश्चय ही जाति की समस्या थी । आयरलैंड में होम रूल एक प्रकार से रोम का शासन रूल होगा। अल्स्टरवासियों ने इसी रूप में अपना उत्तर तैयार किया था । किन्तु इस बात को बताने का यही एक अन्य तरीका है कि कैथोलिकों और प्रोटेस्टेंटों के बीच जाति की सामाजिक समस्या थी, जिसने वहां राजनीतिक समस्या का हल नहीं होने दिया। इस साक्ष्य को फिर से चुनौती दिया जाना निश्चित है। यहां भी साम्राज्यवादी हाथ काम कर रहा था । किन्तु मेरे साधन समाप्त नहीं हुए हैं। मैं रोम के इतिहास से साक्ष्य दूंगा। यहां कोई भी यह नहीं कह सकता है कि कोई दुष्ट आत्मा काम कर रही थी। जिस किसी ने भी रोम के इतिहास का अध्ययन किया है, उसे पता होगा कि रोम के गणतंत्रवादी संविधान में सांप्रदायिक अधिनिर्णय से बहुत अधिक मिलते-जुलते तत्व थे। जब रोम में राजशाही का उन्मूलन हुआ तो राजसी सत्ता या परसत्ता (इम्पीरियम) कांसुलों और पोंटिफेक्स मेक्सिमस के बीच विभक्त हो गई थी। कांसुलों में राजा का धर्मनिरपेक्ष प्राधिकार निहित था, जब कि पोंटिफेक्स मेक्सिमस ने राजा का धार्मिक प्राधिकार ग्रहण किया था । इस गणतंत्रवादी संविधान ने दो कांसुलों का प्रावधान किया था। एक था पेट्रिशियन और दूसरा था प्लेबियन । उसी संविधान में पोंटिफेक्स मेक्सिमस के अधीन पादरियों की भी व्यवस्था थी, जिनमें से आधे प्लेबियन और आधे पेट्रिशियन होते थे। इसका क्या कारण है कि रोम के गणतंत्रवादी संविधान में ये प्रावधान थे जो कि, जैसा कि मैंने बताया था, सांप्रदायिक अधिनिर्णय के प्रावधानों से इतने अधिक मिलते हैं? इसका एक ही उत्तर मिल सकता है कि रोम गणतंत्र के संविधान को पेट्रिशियनों तथा प्लेबियनों के बीच सामाजिक विभाजन को ध्यान में रखना पड़ा था। पेट्रिशियन और प्लेबियन, ये दो स्पष्ट जातियां थीं। सार रूप में हम कह सकते हैं कि राजनीतिक सुधारकों को जिस दिशा में वे जाना चाहें, जाने दें। इससे उन्हें पता चलेगा कि संविधान तैयार करने में वे प्रचलित सामाजिक व्यवस्था से उत्पन्न समस्या की उपेक्षा नहीं कर सकते।
इस प्रस्ताव के समर्थन में कि सामाजिक और धार्मिक समस्याओं का राजनीतिक संविधानों पर प्रभाव पड़ता है, मैंने जिन उदाहरणों को प्रस्तुत किया है, वे अधिक विस्तृत प्रतीत होते हैं। मैं समझता हूं कि ऐसा ही है। किन्तु यह नहीं मानना चाहिए एक का दूसरे पर पड़ने वाला प्रभाव सीमित होता है। दूसरी ओर, यह कहा जा सकता है कि इतिहास सामान्यतः इस प्रस्ताव को बदल देता है कि राजनीतिक क्रांतियां हमेशा सामाजिक और धार्मिक क्रांतियों के बाद हुई हैं। लूथर द्वारा आरंभ किया गया धार्मिक सुधार यूरोप के लोगों की राजनीतिक मुक्ति का अग्रदूत था । इंग्लैंड में प्यूरिटनवाद के कारण राजनीतिक स्वतंत्रता की स्थापना हुई। प्यूरिटनवाद ने नए विश्व की स्थापना की ।
प्यूरिटनवाद ही ने अमरीकी स्वतंत्रता संग्राम को जीता। प्यूरिटनवाद एक धार्मिक आंदोलन था। यही बात मुस्लिम साम्राज्य के संबंध में सत्य है। अरबों के राजनीतिक सत्ता बनने से पहले वे पैगम्बर मुहम्मद साहब द्वारा आरंभ संपूर्ण धार्मिक क्रांति से गुजरे थे। यहां तक कि भारतीय इतिहास भी उसी निष्कर्ष का समर्थन करता है। चन्द्रगुप्त द्वारा संचालित राजनीतिक क्रांति से पहले भगवान बुद्ध की धार्मिक और सामाजिक क्रांति हुई थी। शिवाजी ने नेतृत्व में राजनीतिक क्रांति भी महाराष्ट्र के संतों द्वारा किए गए धार्मिक और सामाजिक सुधारों के बाद हुई थी । सिखों की राजनीतिक क्रांति से पहले गुरु नानक द्वारा की गई धार्मिक और सामाजिक क्रांति हुई थी। यहां और अधिक दृष्टांत देना अनावश्यक है। इन दृष्टांतों से यह बात प्रकट हो जाएगी कि मन और आत्मा की मुक्ति जनता के राजनीतिक विस्तार के लिए पहली आवश्यकता है।