मिन्सी सहित दर्जनों गांवों में जनजागरण अभियान जोरों पर
भंडारा : देश की राजनीति में ओबीसी यानी अन्य पिछड़ा वर्ग समाज को हमेशा से एक निर्णायक और प्रभावशाली मतदाता वर्ग के रूप में देखा जाता रहा है। केंद्र से लेकर राज्य स्तर तक की राजनीति में ओबीसी समाज के वोटों की अहमियत किसी से छिपी नहीं है। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भी बड़ी तादाद में ओबीसी समाज के प्रतिनिधि सांसद और विधायक के रूप में चुने जाते हैं। लेकिन इसके बावजूद एक कड़वा सच यह है कि आरक्षण, शिक्षा, रोजगार और स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में उचित प्रतिनिधित्व जैसे बुनियादी और संवैधानिक मुद्दों के लिए आज भी ओबीसी समाज को सड़कों पर उतरकर आंदोलन करना पड़ रहा है। यह एक गंभीर और विचारणीय प्रश्न है जिसे ओबीसी क्रांति मोर्चा ने पूरी दृढ़ता के साथ उठाया है और जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर कड़ी नाराजगी जताई है।
वोट लो, फिर मुंह फेर लो — यही है असली दर्द

ओबीसी क्रांति मोर्चा के पदाधिकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे की ओर समाज का ध्यान आकर्षित किया है। उनका कहना है कि चुनाव के समय हर राजनीतिक दल और उनके प्रत्याशी ओबीसी समाज के दरवाजे पर वोट मांगने जरूर आते हैं। ओबीसी समाज के हित में बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लंबे-चौड़े वायदों के साथ घोषणापत्र जारी किए जाते हैं और भावनात्मक अपील के साथ वोट बटोरे जाते हैं। लेकिन जैसे ही चुनाव जीत लिया जाता है और कुर्सी मिल जाती है, वैसे ही इन्हीं जनप्रतिनिधियों का रवैया बदल जाता है।
ओबीसी आरक्षण की मजबूती, जातिवार जनगणना, शैक्षणिक सुविधाओं का विस्तार, रोजगार के बेहतर अवसर और स्थानीय निकायों में ओबीसी का उचित प्रतिनिधित्व — इन सभी अत्यंत महत्वपूर्ण विषयों पर न तो कोई ठोस पहल दिखाई देती है और न ही किसी प्रकार का प्रभावी कदम उठाया जाता है। जनप्रतिनिधि इन मुद्दों पर या तो चुप्पी साध लेते हैं या फिर टालमटोल की नीति अपनाते हैं।
तीखा सवाल — अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं या सिर्फ अपनी जेब भर रहे हैं?
संगठन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक और महत्वपूर्ण और साहसिक सवाल उठाया है। उनका प्रश्न है कि आखिरकार समाज के वोटों से चुनकर गए सांसद और विधायक वास्तव में ओबीसी समाज के संवैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं या केवल अपने व्यक्तिगत राजनीतिक करियर और आर्थिक हितों को साधने में व्यस्त हैं?
इसी सवाल को और अधिक धारदार बनाते हुए संगठन ने एक महत्वपूर्ण मांग भी रखी है। मोर्चे का कहना है कि चुनाव के दौरान जनप्रतिनिधियों द्वारा घोषित की गई संपत्ति और उनके पांच वर्षों के कार्यकाल के दौरान हुई संपत्ति की वृद्धि की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होनी चाहिए। यह जांच यह स्पष्ट करेगी कि जनप्रतिनिधि जनसेवा कर रहे हैं या केवल स्वयं की सेवा।
गांव-गांव पहुंच रहा है जनजागरण — मिन्सी से हुई शुरुआत
इसी पृष्ठभूमि में ओबीसी क्रांति मोर्चा ने मिन्सी गांव से शुरुआत करते हुए भंडारा जिले के विभिन्न गांवों में एक व्यापक जनजागरण अभियान की शुरुआत की है। संगठन के कार्यकर्ता गांव-गांव, घर-घर जाकर आम नागरिकों को उनके संवैधानिक अधिकारों के प्रति सचेत कर रहे हैं। आरक्षण का महत्व, सामाजिक न्याय की अवधारणा और ओबीसी समाज के लंबित मुद्दों पर लोगों को जानकारी दी जा रही है।
इस अभियान का उद्देश्य समाज के हर वर्ग को जागरूक करना और उन्हें यह बताना है कि उनके संवैधानिक अधिकार क्या हैं और उन्हें पाने के लिए एकजुट होकर आवाज उठाना क्यों जरूरी है।
चेतावनी — अनसुना किया तो आंदोलन और बड़ा होगा
ओबीसी क्रांति मोर्चा ने सरकार और जनप्रतिनिधियों को स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि ओबीसी समाज से जुड़े लंबे समय से लंबित मुद्दों पर शीघ्र और गंभीरतापूर्वक ध्यान नहीं दिया गया, तो यह आंदोलन केवल भंडारा जिले तक सीमित नहीं रहेगा। इसे राज्यव्यापी और यदि आवश्यकता पड़ी तो राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक व्यापक तथा शक्तिशाली रूप दिया जाएगा।
समाज की एकता और संगठन की दृढ़ इच्छाशक्ति यह स्पष्ट संदेश देती है कि ओबीसी समाज अब और अधिक उपेक्षा सहने को तैयार नहीं है।