त्रुटियों को आधार बना जातिगत जनगणना से इन्कार उचित नहीं

केंद्र के रुख पर नीतीश की दो टूक सर्वदलीय बैठक में तय होगी आगे की रणनीति

     पटना : जातिगत जनगणना से केंद्र सरकार के परहेज के वाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सोमवार को दो ट्रक लहजे में कहा कि सामाजिक-आर्थिक जनगणना की त्रुटि को आधार बनाकर जातिगत जनगणना से इन्कार को वह कतई सही नहीं मानते। जातिगत जनगणना का सामाजिक-आर्थिक जनगणना की त्रुटि से कोई संबंध नहीं है। जातिगत जनगणना पर निर्णय के संबंध में मुख्यमंत्री ने कहा कि वह इस मसले पर बिहार के राजनीतिक दलों के साथ दोबारा बैठक कर विचार-विमर्श करेंगे और आगे की रणनीति तय करेंगे। नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक के सिलसिले में मुख्यमंत्री दिल्ली में हैं। बैठक से लौटने के क्रम में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने यह बात कही।

Nitish_Kumar_speaking_on_OBC_Caste_census_2021      मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिख इस बारे में पूरी स्थिति को बताया था। बिहार से सभी दस दलों के प्रतिनिधिमंडल ने इस संबंध में प्रधानमंत्री से मिलकर अपनी बात कही है। बिहार में विधानसभा और विधान परिषद से इसके समर्थन में पूर्व से प्रस्ताव पारित है। मुख्यमंत्री ने कहा कि हमने सार्वजनिक रूप से कहा है कि जातिगत जनगणना पर हम लोगों के क्या विचार हैं। यह देश के हित में है और देश के विकास में इससे काफी मदद मिलेगी। ऐसा नहीं है कि केवल बिहार के सभी राजनीतिक दल इसके पक्ष में हैं। दूसरे राज्यों में भी इसका समर्थन है। मुख्यमंत्री से जब पूछा गया कि क्या वह इस मुद्दे पर देश भर का दौरा करेंगे, तो उन्होंने कहा कि यह एक अलग विषय है ।

प्रशिक्षण के बाद नहीं होगी जनगणना में परेशानी

      मुख्यमंत्री ने कहा कि जातिगत जनगणना के लिए प्रशिक्षण होने के बाद कोई परेशानी नहीं है। जनगणना के क्रम में आप हर घर में जाति की जानकारी लेंगे तो लोग उपजाति के बारे में भी बता देते हैं। सभी लोग उपजाति के बारे में नहीं बताएंगे। ऐसी कोई जाति नहीं, जिसमें कोई उपजाति नहीं है। जाति के बारे में पछने पर कोई उपजाति की जानकारी दे देता है। पड़ोस वाले को बगल में रहने वाले की जाति के बारे में जानकारी होती है। इसलिए यह काम ठीक ढंग से हो सकता है। जातिगत जनगणना अगर होगी तो वह ठीक से होगी।

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने दाखिल किया था हलफनामा

     2011 में हुई सामाजिक - आर्थिक और जाति आधारित जनगणना के आंकड़े गलतियों और अवास्तविक सूचनाओं से भरे हुए थे। जातिगत जनगणना का कार्य प्रशासनिक दृष्टि से जटिलताओं से भरा हुआ है। आजादी से पहले भी जब इस तरह की जनगणनाओं के प्रयास हुए तब भी पूर्ण और वास्तविक आंकडे नही मिले ।

     भारत का रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय कई वजहों से जातियों से संबंधित अन्य जानकारियां सार्वजनिक नहीं करता है। लेकिन जब 2011 में हुई जनगणना के आंकड़ों का अध्ययन किया गया तो पाया गया कि उन आंकड़ों में तकनीक आधारित खामियां है। ये खामीपूर्ण आंकड़े किसी मतलब के नहीं और अनुपयोगी हैं।