डॉ. महेंद्र धावड़े, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी
लोकतांत्रिक व्यवस्था और भारतीय संविधान के अनुसार, समाज में शांति बनाए रखना और अराजकता पर काबू पाना मुख्य रूप से चुनी हुई सरकार और उसकी कार्यपालिका (Executive) की ज़िम्मेदारी होती है।
राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी
१)भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची (संवैधानिक प्रावधान) के अनुसार, 'लोक व्यवस्था' (Public Order) और 'पुलिस' पूर्णतः राज्य सूची (State List) के विषय हैं। इसका मतलब है कि किसी भी राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखना और अराजकता को रोकना सीधे तौर पर वहाँ की राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है।
२)ज़िला स्तर पर शांति बनाए रखने और अराजकता तत्वों पर नियंत्रण रखने की मुख्य ज़िम्मेदारी ज़िला मजिस्ट्रेट (DM / कलेक्टर) और पुलिस अधीक्षक (SP) की होती है।

केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी
यदि अराजकता आंतरिक अशांति, उग्रवाद या बड़े पैमाने पर दंगों का रूप ले लेती है और राज्य सरकार उसे संभालने में असमर्थ होती है, तो केंद्र सरकार केंद्रीय सुरक्षा बलों (जैसे CRPF, BSF) की मदद भेजती है।
कानूनी विश्लेषकों और आलोचकों का स्पष्ट तर्क होता है कि सत्ता में बैठे दल के पास पुलिस, खुफिया तंत्र और प्रशासनिक शक्तियां होती हैं। इसलिए, यदि समाज में असुरक्षा या अराजकता का माहौल बनता है, तो इसकी संपूर्ण नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी सरकार की होती है। उनका मानना है कि सरकार अपनी विफलताओं का दोष दूसरों पर नहीं मढ़ सकती और गृह मंत्रालय व शासन को इसके लिए सीधे तौर पर जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।
न्यायपालिका का दायित्व
यदि प्रशासनिक तंत्र अराजकता पर काबू पाने में विफल रहता है या पक्षपात करता है, तो देश की अदालतें (हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट) दखल देकर सरकार को कानून का राज स्थापित करने का आदेश देती हैं।
किसानों और आम जनता के कल्याण के प्रति समर्पित सरकार , इसलिए एक आदर्श है जो भारत में जनमानस के दिल और दिमाग में रेखांकित हुवा है जिसका नाम है बलीराजा । इसलिये “बलीराजा की सरकार” या किसी भी कल्याणकारी शासन का यह प्राथमिक दायित्व होता है कि वह समाज के हर वर्ग को सुरक्षा दे, अराजकता फैलाने वाले तत्वों पर सख्त कानूनी कार्रवाई करे और न्यायपूर्ण माहौल सुनिश्चित करे ।
सत्तारूढ़ दल के नेताओं या गृहमंत्री द्वारा मोर्चा निकालने अथवा प्रदर्शन करने के विषय पर भारतीय राजनीति में अलग-अलग दृष्टिकोण और राजनीतिक व्याख्याएं देखने को मिलती हैं।
विपक्षी दलों और विश्लेषकों का तर्क है कि जब देश या किसी राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की प्राथमिक जिम्मेदारी गृह मंत्रालय और सरकार की होती है, तो ऐसे में गृहमंत्री का स्वयं सड़कों पर उतरकर मोर्चा निकालना विरोधाभासी है। आलोचकों का मानना है कि सत्ता में रहते हुए विरोध प्रदर्शन करना प्रशासनिक विफलता को स्वीकार करने जैसा है, क्योंकि अराजकता पर नियंत्रण पाने के लिए प्रशासनिक और कानूनी शक्तियों का उपयोग किया जाना चाहिए, न कि राजनीतिक आंदोलनों का।
राजनीति विज्ञान के अनुसार, आधुनिक लोकतंत्रों में राजनीतिक दल सत्ता में आने के बाद भी अपनी 'आंदोलनकारी छवि' (Movement Identity) को जीवित रखना चाहते हैं। गृहमंत्री या शीर्ष मंत्रियों द्वारा मोर्चा निकालने को आलोचक भले ही शासन की लाचारी या विफलता कहें, लेकिन राजनीतिक रणनीतिकार इसे जनता से सीधे जुड़ने, अपनी बात आक्रामक रूप से रखने और आगामी चुनावों के लिए अपने कैडर (कार्यकर्ताओं) को सक्रिय रखने का एक आजमाया हुआ माध्यम मानते हैं।
मणिपुर मामला अराजकता का सबूत
मणिपुर का संकट समकालीन भारतीय राजनीति और प्रशासनिक जवाबदेही की चर्चा में सबसे संवेदनशील और जटिल उदाहरणों में से एक है। आपकी पिछली कानून-व्यवस्था और सरकारी उत्तरदायित्व वाली बात मणिपुर की परिस्थितियों पर पूरी तरह लागू होती है, जहाँ कानून-व्यवस्था का ढांचा चरमराने और केंद्र व राज्य सरकार की भूमिका को लेकर देश भर में गहरा विमर्श चल रहा है।
मणिपुर में मई 2023 से शुरू हुई जातीय हिंसा के बाद से अब तक 300 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। हाल के महीनों में, विशेष रूप से फरवरी 2026 से, हिंसा के नए मोर्चे खुल गए हैं जिसमें पहले से अछूते रहे कुकी-ज़ो और नागा समुदायों के बीच भी झड़पें देखी गई हैं।
राजनीतिक और कानूनी विश्लेषक मणिपुर की स्थिति का संदर्भ देकर यह स्पष्ट करते हैं कि जब किसी भी राज्य में नागरिक महीनों तक बुनियादी सुरक्षा के लिए तरसते हैं और हजारों लोग विस्थापित होते हैं, तो लोकतांत्रिक सिद्धांतों के तहत इसकी जवाबदेही सीधे तौर पर गृह मंत्रालय और सरकार के शीर्ष नेतृत्व पर ही आती है। शासन की मशीनरी होने के बावजूद सुरक्षा न दे पाना प्रशासनिक अक्षमता का सबसे बड़ा सूचक माना जाता है।
ऐसे कई उदाहरण हैं जो भाजपा प्रणीत सत्तारूढ़ सरकार की नाकामी का जिता जागता सबूत हैं ।जनता देख रही है की जुमले पर चलने वाली सरकार से जनता ऊब चुकी है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत सत्तारूढ़ सरकार को गिराने की तैयारी हो चुकी हैं ।