( आलेख : बादल सरोज )
वैसे तो ऊंचाईयों की नीचाईयाँ इतनी इफरात में हैं कि जहां जहां भी नजर डालिए, वहां-वहां वे गावतकिया लगाए विराजमान नजर आती हैं। मगर मौजूदा मोदी निजाम में जितनी ज्यादा वाट विदेश नीति और कूटनीति – डिप्लोमेसी -- की लगी है, वह कुछ अलग ही और बेशुमार है। ज्यादा गहराई में जायेंगे, तो समय और शब्द दोनों अधिक होने का खतरा है। मगर तब भी जो खोया है, उसका अंदाज लगाने के लिए थोड़े में यह दर्ज करना ही होगा कि आजादी के ठीक बाद की सरकारों ने दुनिया के बारे में अपना जो नजरिया बनाया था, उसकी धुरी युद्ध के विरुद्ध शान्ति, ताकतवर के आधिपत्य के विरुद्ध कमजोर देशों की संप्रभुता, नए-नए आजाद हुए देशों के बीच समन्वय और अधिकतम संभव पारस्परिक पूरकता थी। इसी समझ और विचार का आकार रूप था गुट निरपेक्ष आन्दोलन, जिसने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से पिछली सदी के अंतिम दशक की शुरुआत तक कमोबेश अपनी भूमिका निबाही। भेड़ियों की छुट्टा मटरगश्ती को काफी हद तक थामकर रखा। एक अविकसित से विकासशील होते देश, भारत की, उसकी आर्थिक-सामरिक हैसियत से कई गुना नैतिक और राजनैतिक साख दुनिया भर में कायम की। कहने की जरूरत नहीं कि यह वैश्विक समझदारी कोई 200 साल की औपनिवेशिक गुलामी के खिलाफ भारत की जनता के महासमर – स्वतंत्रता संग्राम – की भट्टी में तपकर निकली थी। अफ़सोस इस बात का है कि मोदी राज में यह उतनी ही तेजी के साथ रसातल में गयी है। सिर्फ अक्टूबर के ही घटना विकास पर नजर डालने से साफ़ नजर आता है कि बड़बोले जुमलेबाजों ने देश को कितने शर्मनाक और हास्यास्पद मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है।

इधर 56 इंची जुबान से देश के युवाओं और विपक्ष को धमकियां और गालियाँ सुना कर भर्त्सना की जा रही थी, उधर अमरीका के आगे साष्टांग ढोक देकर उसकी अभ्यर्थना की जा रही थी। पहली बार ऐसा हुआ, जब किसी देश का एक वरिष्ठ मंत्री, बिना देश के राजनीतिक नेतृत्व को तवज्जोह दिए सीधे मुम्बई उतरा, कुछ बड़े कोर्पोरेट्स से सौदों की बात की और गुजरात के जामनगर के लिए उड़ गया। वहां अपने धंधे की बात की – कंटीले घेरों में घिरे जंगली जानवरों को निहारा और वापस निकल गया। इतना ही नहीं – डेढ़ सौ करोड़ की आबादी वाले देश के विदेश मंत्री को भी इस तरह मुम्बई बुलाया, जैसे कोई अपने अधीनस्थ को बुलाता है। उन्हें क्या बताया, क्या सुनाया, यह तो अपने नाम में लगे एस को यस में बदल देने वाले जयशंकर ही जानते होंगे, या शायद न भी जानते हो। मगर सिर्फ देश ही नहीं, दुनिया जानती है कि अमरीका में जिसे दूसरे नंबर शक्तिशाली और ट्रम्प का शार्पशूटर माना जाता है, वह विदेश मंत्री मार्क रुबियो दिल्ली में बैठे सरकार के शीर्ष नेतृत्व से मिले बिना, सारी कूटनीतिक मर्यादाओं, राजनीतिक प्रोटोकॉल, सामान्य शिष्टाचार और एक लोकतांत्रिक गणराज्य की संप्रभुता को तार-तार करते हुए अपनी मर्जी से आया, अपना मनचाहा किया और अपने हिसाब से लौट गया। यह बर्ताव उस देश संयुक्त राज्य अमरीका ने किया, जिसने भारतीय माल के आवागमन पर इकतरफा तरीके से टैरिफ की झड़ी लगाई हुई है, जो मनमाने तरीके से सार्वजनिक रूप से भारत की व्यापार नीतियों को निर्धारित कर रहा है, रूस से तेल खरीदने पर प्रतिबन्ध लगा रहा है, अपनी शर्तों का व्यापार समझौता थोपने की तैयारी कर रहा है। विदेश नीति के मामले में इतना केंचुआपन छोटे-छोटे देश भी नहीं दिखाते। लगता है, एलन मस्क ने मुकेश अम्बानी को असली प्रधानमंत्री बताने की जो बात ताने और उलाहने के रूप में कही थी, सरकार उसे सच साबित करना चाहती है। प्रधानमंत्री सचमुच बदल गया है और मोदी दिखावटी सजावट के प्रधानमंत्री बनकर रह गए हैं।
सिर्फ भारत के ही नहीं, दुनिया के इतिहास में भी ऐसी मिसालें बहुत कम मिलती हैं। तीन-चार शताब्दी पहले यह काम अंग्रेजों ने भारत में और डच, पुर्तगालियों तथा फ्रांसीसियों ने दूसरे देशों में ईस्ट इंडिया कंपनियों के नाम पर, उनके जरिये किया था। व्यापार के बहाने घुसे थे और सदियों तक चलने वाला राज कायम कर लिया था। मगर उन्होंने भी तब की राजनीतिक हुकूमतों, राजाओं-बादशाहों को भले दिखावे के लिए ही सही, थोड़ी बहुत तवज्जोह दी थी। इस बार तो यह दिखावा भी नहीं किया गया। रुबियो का ‘उसने देखा, वह आया और उसने फतह कर लिया’ यह सीजेरियन कारनामा सिर्फ रूप में ही नहीं, सार में भी बहुत शर्मनाक है और भारत की अब तक की घोषित वैश्विक नीति के प्रतिकूल है। रुबियो जामनगर न तो तफरीह के लिए गया था, न जामनगर की विशाल रिफाइनरी की तेलशोधक क्षमता की टेक्नोलॉजी को देखने गया था। वह गया था, ताकि एक संप्रभु देश और भारत के मित्र वेनेजुएला पर कब्जा करने के बाद लूटे गए उसके तेल के शोधन के लिए अम्बानी से करार कर सके। ध्यान रहे कि वेनेजुएला में पाया जाने वाला अपरिष्कृत तेल – क्रूड आयल – अमरीका और बाकी ज्यादातर जगह निकलने वाले तेल की तुलना में गाढ़ा और भारी होता है। उसे रिफाइन करने के लिए जिस विशेष तकनीक की जरूरत होती है, वह अम्बानी की जामनगर रिफाइनरी के पास है। मतलब यह कि एक जमाने में गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का सर्वमान्य नेता रहा भारत अब अपने जैसे देशों की लूट के सामान को बाजार में बेचे जाने योग्य बनाने, कसाई के छीछड़ों की सफाई का खिदमतगार बनने के अंतर्राष्ट्रीय अपराध में सीधी हिस्सेदारी निबाहने की स्थिति में पहुंचा दिया गया है।
पूँजी देश की जगह नहीं ले सकती। चंद सिक्कों की खनक सुनने की हवस की कीमत संप्रभुता के रूप में नहीं चुकाई जाती। गिरे हुए पैसे तो खुद्दार जरूरतमंद भी नहीं उठाते। मगर मोदी है तो, जो सोचा भी नहीं जा सकता हो, ऐसा नामुमकिन भी मुमकिन है। अमरीकी घुड़की से डरकर ईरान भेजी जाने वाली दवाइयों को रोकना इसकी दूसरी मिसाल है। करीब 40 हजार ईरानी नागरिक हर वर्ष भारत आते हैं, जिनमें से अधिकाँश अपना इलाज कराने के लिए आते हैं। ईरान के लिए दवाओं का एक बड़ा सप्लायर भारत है। हर वर्ष करोड़ों डॉलर की दवायें, जिनमे जीवन रक्षक दवाएं भी शामिल हैं, और चिकित्सा उपकरण ईरान भेजे जाते हैं। अमरीका के दबाब में आकर मोदी सरकार ने इन दोनों पर ही रोक लगा दी है। ईरान के लिए जाने वाला वायुमार्ग बंद है, हवाई उड़ान प्रतिबंधित हैं। ईरान एयर ने भारत सरकार के सामने प्रस्ताव रखा था कि वे मुंबई रूट पर यात्री उड़ानों के जरिए दवाइयां और मरीजों को ला सकते हैं, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से भारत ने इन सीधी उड़ानों को कार्गो या लैंडिंग परमिट देने से इनकार कर दिया। जिस देश से हमारा न कोई झगड़ा था, न है, जो भारत का परम्परागत दोस्त है, उस ईरान की सप्लाई चेन अवरुद्ध कर दी गयी है, क्योंकि ट्रम्प के अमरीका का ऐसा ही हुक्म हुआ है। यही वजह थी कि अभी 26 और 27 अक्टूबर को नई दिल्ली में हुई ब्रिक्स की बैठक में ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकर ग़ालिबफ़ नहीं आये।
यहाँ सवाल सिर्फ आर्थिक नहीं है : सवाल मानवीय है। ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि सभ्यता पूर्व के मानव समूह भी बीमारी और इलाज के मामले में इतने असभ्य और बर्बर नहीं थे, इतने डरपोक तो बिलकुल भी नहीं थे कि किसी गुंडे के कहने भर से इंसानियत भूल जाएँ। यह कूटनीतिक दिवालियेपन का ही नहीं, रीढ़ के पूरी तरह लुंजपुंज हो जाने का भी एक उदाहरण है। दुनिया भर में भारत की रही-सही प्रतिष्ठा को भी नीचे लाने वाला है। शर्म की बात तो यह है खुद सरकार इसे स्वीकार करते हुए सड़क मार्ग या आर्मीनिया जैसे छोटे से देश के जरिये दवायें भेजने की बात कहकर अपनी अमरीका अधीनता की स्थिति का एलान भी कर रहा है।
हुकुम जब बिना नानुकुर किये माने जाने लगते हैं, तो वे फिर असीमित होते जाते हैं। वे अर्थनीति, विदेश नीति, कूटनीति, राजनीति भर तक नहीं रुकते, आतंरिक मामलों में भी आदेश-निर्देश देने तक आ जाते हैं। अमेरिकी नागरिक मैथ्यू आरोन वैनडाइक और छह यूक्रेनी नागरिकों को ज़मानत देने और इस दौरान अपने देश जाने की अनुमति देने के बाद अब दिल्ली की एक अदालत द्वारा सातों को विदेश में रहने तक की अनुमति देने का 23 अक्टूबर का फैसला अमरीकी दबाब में बिछ जाने का एक और उदाहरण है। वैनडाइक और उसके साथ छह यूक्रेनी नागरिकों को 13 मार्च को गिरफ्तार किया गया था। उन पर गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत आरोप लगाए गए थे। एफआईआर में कहा गया था कि ये लोग म्यांमार के आतंकवादी समूहों के साथ-साथ भारत के पूर्वोत्तर में सक्रिय भारत के प्रतिबंधित उग्रवादी संगठनों को हथियार और अन्य आतंकवादी गतिविधियों में इस्तेमाल होने वाले उपकरण मुहैया कराने के साथ-साथ उन्हें सैन्य प्रशिक्षण भी दे रहे थे, जिससे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और हित प्रभावित होते हैं। द वायर ने यह भी बताया था कि वैनडाइक ‘सन्स ऑफ लिबर्टी इंटरनेशनल (एसओएलआई)' का संस्थापक है। यह वह संगठन है, जो उन सेनाओं -- पढ़ें और आतंकियों -- को सैन्य प्रशिक्षण और विद्रोहियों को सामान उपलब्ध कराता है, जो उसके अनुसार, “तानाशाह सरकारों के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं।“ गिरफ्तारी के समय तक वैनडाइक 2022 से यूक्रेन में काम कर रहा था और यूक्रेनी फ़ौज का हिस्सा भी रह चुका था। इस संगठन ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर एक पोस्ट में वैनडाइक की हिरासत की जानकारी होने की बात कही थी और लिखा था कि ‘हम अमेरिकी विदेश विभाग के संपर्क में हैं। विदेश विभाग को मैथ्यू की हिरासत की जानकारी है और वह भारत में स्थानीय अधिकारियों के संपर्क में है।’ यह “संपर्क” काम आया और, जाहिर है कि अमरीकी दबाब में मामले को निबटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गयी। इसके लिए सीधे गृह मंत्री अमित शाह की देखरेख वाली राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को जांच सौंपी गई। एनआईए ने इन गिरफ्तारियों से संबंधित आरोप पत्र ही उलट दिया और सभी सात लोगों के खिलाफ म्यांमार में कथित तौर पर हथियारों का प्रशिक्षण देने से जुड़े यूएपीए के आरोप हटा दिए गए। उन्हें सिर्फ आवश्यक अनुमति के बिना मिजोरम में दाखिल होने का आरोपी बताया गया। यह ऐसे आरोप थे, जिन्हें क्षेत्रीय विदेशी पंजीकरण कार्यालय (एफआरआरओ) में जुर्माना भरकर मामला खत्म किया जा सकता था।
इस तरह, इधर कनाट प्लेस पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लहराने के ‘आरोप’ में युवाओं को गैर-जमानती धाराओं में गिरफ्तार कर जेल भेजा जा रहा था, उधर वही सरकार घोषित रूप से उग्रवादी दस्तों को सैन्य प्रशिक्षण देने और हथियार मुहैया कराने वाले अमरीकी सरगना वैनडाइक और उसके गुर्गों को जमानत देकर अपने अपने देश वापस जाने की इजाजत दे रही थी। सच कहा गया है कि गिरने की कोई सीमा नहीं होती : झुकने के कोई नियम नहीं होते। मोदी है तो मुमकिन है। यह अभी सिर्फ बानगी है। अभी तो मश्के सितम कर रहे हैं अहले सितम। अभी तो कुख्यात व्यापार समझौता आना बाकी है। कहते हैं कि 20 महीनों से तय हो रही शर्तें अब कुछेक दिनों में ही ट्रेड डील के रूप में हस्ताक्षरों से सुशोभित होने वाली है। उसके हुए बिना ही अमरीकी कॉर्पोरेट्स के हित में जो बदलाव किये जा चुके हैं, उनके झटके भारत के कपास और तिलहन उत्पादक किसान झेल रहे हैं। सोयाबीन की हरियाली मुरझाने लगी है। गेंहू और धान के किसान ही नहीं, समूचे खाद्यान्न का उत्पादन, यहाँ तक कि करोड़ों भारतीयों की खाद्य सुरक्षा तपिश महसूस कर रही है। झिलमिलाहट सिर्फ कृषि क्षेत्र में नहीं है, मैन्युफैक्चरिंग से लेकर सर्विस सेक्टर तक, आई टी से लेकर ऑटोमोबाइल तक सबके वोल्टेज लुपलुपा रहे हैं।
इतने सबके बाद भी अमरीका से इतना डर किसलिए है? यह डर उस विचारधारा के डी एन ए में है, जिसका प्रतिनिधित्व आज के हुक्मरान करते हैं। इन स्वयंभू अपने मुंह मियाँ मिट्ठू राष्ट्रवादियों का कथित राष्ट्रवाद ऐसा ही है : इसमें नदियाँ हैं, पहाड़ हैं, जंगल हैं, मंदिर हैं, मस्जिदों के नीचे कथित रूप से दबे शंकर हैं, अम्बानी का मुनाफा है, अडानी का डाका है, नहीं है, तो बस देश, उसकी संप्रभुता और उसमे रहने वाली मनुष्यता नहीं है। यही कथित राष्ट्रवाद था, जो अंग्रेजों की गुलामी के वक्त मुंह सिल कर बैठा रहा और अब अमरीकी साम्राज्यवाद का पंखा झल रहा है। विद्वान् सही कह गए हैं कि साम्राज्यवाद विरोध के बिना राष्ट्रवाद असल में अपने ही देश और उसकी जनता के बड़े हिस्से के खिलाफ दमन के औजार के सिवाय कुछ नहीं है। अक्टूबर में भारत ने यही अपनी नंगी आँखों से देखा है। कुछ ज्यादा ही तेजी के साथ घटित होते हुए देखा है।
खैरियत की बात बस इतनी है कि इतिहास अगर आशंकाओं के अंधड़ के आगमन के आसार समझने की सलाहियत देता है, तो उनसे जूझने और निबटने के तरीके और जरिये भी सुझाता है। जिस तरह दर्द जब हद से गुजरता है, तो दवा हो जाता है, उसी तरह कई बार जो समाधान कभी न खुलने वाले तालों में बंद नजर आते हैं, वे उतनी ही तेजी के साथ खुल भी जाते हैं। ऐसा अनायास नहीं होता – इनके लिए सायास प्रयासों को तेज करने की दरकार होती है। अगर अक्टूबर चौतरफा सरेंडर पर मौन नरेंदर का था, तो यही अक्टूबर दिल्ली सहित देश भर में सडकों पर उतरे जनता के समंदर का भी था। जनता का यह समंदर उरूज पर पहुंचेगा – यहीं रुकेगा नहीं, आगे तक जाएगा।
( लेखक 'लोकजतन' के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716 )