इसका जवाब बैरिकेड्स नहीं हैं जनाब !

( आलेख : एम.ए. बेबी, अनुवाद : संजय पराते )

     रक्षा मंत्री श्री रा-जनाथ सिंह ने हाल ही में टाइम्स ऑफ़ इंडिया में एक लेख लिखा है, जिसकी शुरुआत इस पंक्ति से हुई है कि युद्ध में पहली बलि सत्य की चढ़ती है। सिंह का मुख्य तर्क, जैसा कि मैं समझ पाया, यह है कि चुनाव आयोग की आलोचना मनगढ़ंत है, कि उच्चतम न्यायालय ने आयोग के आचरण पर अपनी मुहर लगा दी है, और इसके खिलाफ सड़कों पर किया जाने वाला विरोध अराजकता की तरफ एक कदम है। उनके लेख “पोस्ट ट्रुथ पॉलिटिक्स (उत्तर-सत्य राजनीति)” में उस एकमात्र दस्तावेज़ का उल्लेख तक नहीं है, जिसने भारत निर्वाचन आयोग के भीतर हो रही घटनाओं के लिए 'उत्तर-सत्य' शब्द को ही अपर्याप्त बना दिया है। 23 सितंबर को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रितिका चोपड़ा की छानबीन, अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 तक के लिखित नोट्स और पत्राचार पर आधारित है। तीन चुनाव आयुक्तों में से दो, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने, दस महीनों में चौदह बार (एक ही दिन में चार बार शामिल) कई फैसलों पर ऑन रिकॉर्ड अपनी आपत्ति जताई है, जो उनकी जानकारी के बिना लिए गए थे। इनमें मतदाता का नाम जोड़ने, नाम हटाने और मतदाता सूची की लॉग पहुंच पर नियंत्रण रखने के फैसले शामिल हैं, लेकिन यह यहीं तक सीमित नहीं है। इनमें से कुछ कदमों को उन्होंने “अनधिकृत, गैर-कानूनी” भी कहा है। मैं राजनाथ सिंह की एक बात मानूंगा कि असहमति तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए। वह बिल्कुल सही कह रहे हैं। आइए, तथ्यों पर एक नज़र डालते हैं।

Barricades Voter Deletion Aur Sarkar Ki Khamoshi Barricade vs Ballot Loktantra Ki Asli Ladai Barricades of Democracy

     काम करने के उसके तरीकों से वर्तमान में जो प्रतीत होता है, उसके विपरीत, निर्वाचन आयोग एक-व्यक्ति निकाय नहीं है। अनुच्छेद 324 चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार निर्वाचन आयोग में निहित करता है, न कि व्यक्तिगत रूप से मुख्य निर्वाचन आयुक्त में। यदि मुख्य चुनाव आयुक्त यह मानते हैं या ऐसा व्यवहार करते हैं, जैसे अन्य आयुक्त केवल नाममात्र के हैं, तो यह संवैधानिक उल्लंघन का कृत्य है। अनुच्छेद 324(5) के तहत, मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) को केवल सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह हटाया जा सकता है, लेकिन अन्य आयुक्तों को केवल सीईसी की सिफारिश पर ही हटाया जा सकता है। इसलिए जिन दो सदस्यों ने असहमति व्यक्त की है, वे ठीक वही दो सदस्य हैं, जिन्हें उस व्यक्ति द्वारा हटाया जा सकता है, जिसके विरुद्ध वे असहमति जता रहे हैं। चुनाव आयोग की इंडियन एक्सप्रेस के निष्कर्षों पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया यह थी कि सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे। यह दावा मुख्य चुनाव आयुक्त को प्राप्त चौदह लिखित आपत्तियों के विपरीत प्रतीत होता है। ये आपत्तियाँ विपक्ष द्वारा नहीं गढ़ी गई थीं, बल्कि खुद आयुक्तों द्वारा लिखी गई थीं।

     यदि आपत्तियां वास्तव में निराधार हैं, तो इसका एक सरल समाधान है। भारत निर्वाचन आयोग को फाइल की टिप्पणियां प्रकाशित करनी चाहिए, सॉफ्टवेयर एक्सेस लॉग खोलने चाहिए और रिकॉर्ड को यह दर्शाने देना चाहिए कि राज्य के अधिकारियों की उपेक्षा करते हुए, दिल्ली में मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण के लिए किसने अनुमति दी थी? चुनाव आयोग एकतरफ़ा और बिना शर्त, भरोसे की उम्मीद कर रहा है, और यदि कोई संस्थान रिकॉर्ड पेश किए बिना विश्वास की मांग करता है, तो वह केवल आज्ञाकारिता चाह रहा है।

     विशेष सघन पुनरीक्षण वह जगह है, जहाँ यह गैर-जवाबदेही मतदाता तक पहुँचती है। राजनाथ सिंह कहते हैं कि उच्चतम न्यायालय ने एसआईआर को बरकरार रखा। अदालत ने बिहार की प्रक्रिया पर रोक लगाने से इंकार कर दिया था, लेकिन उसे इस प्रक्रिया में आयोग को सुधारना भी पड़ा। उसने व्यक्तिगत कारणों से बहिष्कृत लगभग 65 लाख मतदाताओं के नाम प्रकाशित करने का निर्देश दिया था, क्योंकि “लोगों को जानने का अधिकार है”। उसने यह निर्देश भी दिया कि नाम जुड़वाने के इच्छुक लोगों के पहचान के प्रमाण के रूप में आधार को स्वीकार किया जाए, क्योंकि दस्तावेजों का दायरा सीमित रखने से वैध मतदाता वंचित हो रहे थे। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि यह प्रक्रिया कानूनी रूप से विवादित रही है और न्यायिक रूप से इसमें सुधार किया गया है। इसलिए यह सिंह द्वारा बताए गए सीधे-सादे अर्थ में किसी भी तरह से "कानूनी रूप से सही और प्रशासनिक रूप से न्यायसंगत" नहीं है।

     फिर वह सवाल भी है, जिससे सरकार बचती आ रही है। एसआईआर को जनता के सामने “अयोग्य लोगों” को बाहर करने के रूप में पेश किया गया था, जो मूल रूप से एक ऐसा कल्पित शब्द था, जिसे हर कोई समझता था। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि चुनाव आयोग नागरिकता का फैसला नहीं कर सकता और उसने निर्देश दिया कि ऐसे मामलों को नागरिकता अधिनियम के तहत सक्षम प्राधिकारी को भेजा जाए। बहरहाल, आरटीआई के तहत गृह मंत्रालय को दिए गए एक आवेदन से मिली जानकारी से यह पता चला है कि यह मंत्रालय खुद यह नहीं जानता कि इन मामलों की सुनवाई के लिए कौन-सा प्राधिकारी सक्षम है। अदालत के निर्देश का पालन करने के लिए कुछ भी किया गया है, ऐसा प्रतीत नहीं होता। यदि हम इस प्रक्रिया को घोषित उद्देश्य से परे देखें, तो केवल नामों का विलोपन ही शेष बचता है। गरीबों, प्रवासियों, अशिक्षितों और हाल ही में विवाहित महिलाओं, जिनके नाम अभी तक उनके पति के परिवार की मतदाता सूची में शामिल नहीं हुए हैं, के नाम हटाए जा रहे हैं। राजनाथ सिंह इस मुद्दे को संबोधित करना आवश्यक नहीं समझते। वह हर आलोचना को ईवीएम पर बहस में समेट देने को पसंद करते हैं, जहाँ उच्चतम न्यायालय ने ईवीएम के विरुद्ध दर्ज आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया है। इसके बावजूद, ईवीएम के संबंध में कई प्रासंगिक प्रश्न लोगों के मन में बने हुए हैं, इसलिए ईवीएम से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों की पुनर्परीक्षा एक वैध चिंता है, जिसका यथाशीघ्र समाधान किया जाना चाहिए। हम अपनी इस मांग को फिर से दोहराते हैं कि सौ प्रतिशत वीवीपीएटी का प्रावधान होना चाहिए। इस साधारण मांग को स्वीकार न करना, पूरी प्रक्रिया के सही होने पर गंभीर संदेह पैदा करता है, जिसमें मशीनें भी सम्मिलित हैं। हमारी मुख्य आपत्ति अब भी एक ऐसी प्रक्रिया द्वारा मतदाता सूची से लोगों के नाम हटाए जाने को लेकर है, जो हर चरण में पारदर्शिता का जबरदस्त तरीके से विरोध करती है। इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

     सिंह के लेख का मुख्य बिंदु यह दावा करता है कि सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को संस्थागत बना दिया है। बहरहाल, इतिहास इससे इत्तेफाक नहीं रखता। मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल करते हुए एक चयन समिति का एक पैनल गठित करने का निर्देश दिया था। कुछ ही महीनों में, और विपक्षी सांसदों के निलंबन के बीच, संसद  ने मुख्य न्यायाधीश को हटाकर उसकी जगह संघ के एक केंद्रीय मंत्री को शामिल करके कानून बना दिया। असरदार पैनल को दो-एक का निर्णायक बहुमत मिलता है। विपक्ष का नेता असहमति जता सकता है, और असहमति को मतदान से हरा दिया जाएगा। किसी भी संस्थागतकरण से कोसों दूर, यह केवल एक वैधानिक लेप के साथ प्रक्रिया को हड़पना था। सिंह का कहना है कि उनकी सरकार ने एनजेएसी को रद्द करने वाले फैसले का सम्मान किया। वह जिस बात को चतुराई से टाल रहे हैं, वह यह है कि उनकी सरकार ने कुछ ही महीनों के भीतर चयन पैनल पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को भी दरकिनार कर दिया था।

     फिर उन्मुक्ति का सवाल आता है। 2023 के अधिनियम की धारा 16 स्पष्ट रूप से कहती है कि “कोई भी न्यायालय किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जो मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त है या था, उसके द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन में कार्य करते समय या कार्य करने का तात्पर्य रखते हुए किए गए, या बोले गए किसी कार्य, बात या शब्द के लिए, कोई सिविल या आपराधिक कार्यवाही नहीं करेगा या जारी नहीं रखेगा।” यह संरक्षण केवल उसके कार्यकाल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उस अधिकारी को सेवानिवृत्ति के बाद भी प्राप्त रहता है। यहाँ तक कि अनुच्छेद 361 के तहत भारत के राष्ट्रपति की उन्मुक्ति भी केवल कार्यकाल के दौरान ही प्रभावी होती है! इसका अर्थ यह है कि अब एक चुनाव आयुक्त के पास राज्य के मुखिया की तुलना में अधिक टिकाऊ कानूनी कवच है। किसी भी सरकार को किसी ईमानदार निष्पक्ष व्यक्ति को आजीवन सुरक्षा देने की आवश्यकता नहीं है। वह इसे ऐसे व्यक्ति को देती है, जिसके इस्तेमाल की उसे उम्मीद होती है। यदि चुनाव आयोग वास्तव में इतना साफ-सुथरा है, तो यह उन्मुक्ति किसकी रक्षा कर रही है?

     चुनिंदा संवैधानिक इतिहास का प्रदर्शन करते हुए, राजनाथ सिंह ने पहले संशोधन और आपातकाल का हवाला दिया है। तब भी, कम्युनिस्ट आंदोलन ने, ए.के. गोपालन व अन्य के माध्यम से, संसद में पहले संशोधन का विरोध किया था, और सीपीआई (एम) ने आपातकाल के दौर के संशोधनों का संसद और सड़कों, दोनों जगहों पर विरोध किया था। आपातकाल के दौरान सीपीआई (एम) के हज़ारों कार्यकर्ता और नेता जेल गए थे, हमें उसको याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है। फिर भी, कांग्रेस के इतिहास को सामने रखकर, वर्तमान के सबसे प्रासंगिक सवाल का जवाब नहीं दिया जा सकता है।

     कृषि कानूनों के संबंध में उनका कहना है कि सरकार ने बात सुनी और उन्हें वापस ले लिया। ये कानून सितंबर 2020 में राज्यसभा में विभाजन की मांग को दरकिनार करते हुए ध्वनि मत से पारित किए गए थे, उस समय आठ सदस्यों को निलंबित कर दिया गया था। लेकिन वह यह बताना भूल गए कि यह कानून एक साल तक सड़कों पर संघर्ष करने, 700 से ज़्यादा किसानों की मौत, हरियाणा की सीमा पर कांटेदार तार, खाइयों और आंसू गैस के बाद रद्द किया गया था। सरकार को तब भी उसी तरह की असहमति के दबाव में पीछे हटना पड़ा था, जिसे सिंह अब अराजकता बता रहे हैं।

     2 अक्तूबर 2026 को नई दिल्ली ज़िले में बीएनएसएस की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू की गई। मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए। विपक्षी नेताओं और पत्रकारों समेत हज़ारों लोगों को हिरासत में लिया गया। सर्वोच्च न्यायालय को यह निर्देश देने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को अवैध रूप से हिरासत में नहीं लिया जा सकता, मेट्रो का संचालन सामान्य रहना चाहिए, और निषेधाज्ञा वाले क्षेत्र को लोगों को पकड़ने की छूट न समझा जाए। बहरहाल, 10 अक्टूबर को हम सभी ने सभा करने पर एक राजनीतिक प्रतिबंध देखा, जिसे कानून-व्यवस्था के उपाय के रूप में पेश किया गया था, और यह सुप्रीम कोर्ट के पिछले दिन के दिशा-निर्देशों का स्पष्ट उल्लंघन भी था।

     सरकार द्वारा कानून और व्यवस्था का जो डर फैलाया जा रहा था, उसके विपरीत दोनों में से किसी भी दिन प्रदर्शनकारियों द्वारा हिंसा की कोई सूचना नहीं मिली। जो एकमात्र हिंसा देखने को मिली, वह लोगों को हिरासत में लेने की कार्रवाई में थी। जनता की मांग मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की थी, जिन पर उनके ही सहयोगियों ने असंवैधानिक रूप से काम करने का आरोप लगाया था। इस संवैधानिक मांग पर सरकार की प्रतिक्रिया बैरिकेड्स लगाना थी।

     पिछले कुछ वर्षों में विरोध प्रदर्शन के लिए उपलब्ध स्थान सिकुड़ते गए हैं। 1993 से बोट क्लब को बंद कर दिया गया और प्रदर्शन जंतर-मंतर पर स्थानांतरित कर दिए गए। कोविड में लॉकडाउन तक, विरोध मार्च का पारंपरिक मार्ग मंडी हाउस से संसद मार्ग तक था। उस समय से, अनुमति मिलना बेहद कठिन हो गया है। ऐसा लगता है कि अब दस दिन पहले आवेदन करना अनिवार्य नियम बन गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 के मजदूर किसान शक्ति संगठन प्रकरण में शांतिपूर्ण प्रदर्शन को एक मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया है और 2012 के रामलीला मैदान प्रकरण में भी इस सिद्धांत की पुष्टि की है। लेकिन क्या यह वाक़ई कोई अधिकार है, जिसके लिए सरकार की अनुमति दस दिन पहले लेनी पड़े, वह भी ऐसी जगह पर, जिसे सरकार जब चाहे तब बंद कर दे? जगह तक पहुँच के बिना सभा करने की स्वतंत्रता केवल एक अर्थहीन प्रावधान है, वर्तमान शासन द्वारा फैलाए जाने वाले अन्य जुमलों की तरह ही एक जुमला!

     अपने लेख में, सिंह ने अंबेडकर को भी याद भी किया है। अंबेडकर को याद करने से पहले, सिंह को उनका पूरा भाषण पढ़ना चाहिए था। असंवैधानिक तरीकों के खिलाफ अंबेडकर की चेतावनी यह मानती थी कि संवैधानिक रास्ते उपलब्ध हैं। लोगों की पहुँच ऐसी निष्पक्ष अदालतों तक है, जो सुनती हैं और उनकी पहुंच  उस सड़क तक है, जहाँ लोग एकत्र हो सकते हैं।

     परन्तु जब न्यायकर्ता को कार्यपालिका द्वारा चुना जाता है, उसे मुकदमों से संरक्षण दिया जाता है, और सड़कों पर बैरिकेड्स लगाकर उसे अवरुद्ध किया जाता है, तो यह पूर्वधारणा पहले ही विफल हो जाती है। अंबेडकर ने संविधान सभा से यह भी कहा था कि हम विरोधाभासों के जीवन में प्रवेश कर रहे हैं, जहाँ राजनीतिक समानता के साथ सामाजिक और आर्थिक असमानता विद्यमान है।

     जो मतदाता सूची गरीबों, प्रवासियों और नवविवाहिताओं को हटा देती है, वह इसी विरोधाभास का जीता-जागता उदाहरण है। भाजपा-आरएसएस भले ही गला फाड़कर कितना भी शोर मचा लें, इससे यह सच्चाई नहीं बदल जाएगी कि इस्तीफे की मांग अराजकता का आह्वान नहीं, बल्कि केवल संवैधानिक सरकार की मांग है।

     मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा दे देना चाहिए या अदालत की देखरेख में जांच के साथ उन्हें हटाने की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए। 2023 के अधिनियम में संशोधन किया जाना चाहिए, ताकि एक ऐसी चयन समिति बहाल हो सके, जो संरचनात्मक रूप से कार्यपालिका के पक्ष में झुकी न हो और धारा 16 को हटाया जा सके। एसआईआर विलोपन का डेटा प्रकाशित किया जाना चाहिए, और किसी भी नाम को हटाने से पहले सुचारू रूप से काम करने वाली एक न्याय-निर्णय प्रणाली होनी चाहिए।

     जंतर-मंतर और संसद मार्ग का रास्ता दोबारा खोला जाना चाहिए और धारा 163 के व्यापक आदेश समाप्त होने चाहिए। ये एक ऐसे चुनाव के लिए न्यूनतम शर्तें हैं, जिसमें पराजित पक्ष भी परिणाम स्वीकार कर सके। यदि सरकार इन्हें पूरा करने में असमर्थ है, तो उसे उत्तर-सत्य (पोस्ट-ट्रुथ) पर लेख लिखने के बजाय स्पष्ट रूप से यह बात कहनी चाहिए, जबकि उसकी चुनावी मशीनरी उन फाइल नोटों को तैयार कर रही है, जो इस वाक्यांश को सार्थक बनाती हैं।

( लेखक माकपा के महासचिव और पूर्व सांसद हैं। वे केरल के शिक्षा मंत्री भी रह चुके हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650 )