शिवराजी आँसू

( आलेख : बादल सरोज )

     दिखावटी आँसूओं के मामले में कहावत में वैसे तो मगरमच्छ और घड़ियालों की कुख्याति हैं, मगर जिनमें सीखने की ललक होती है, वे किसी से भी सीखने को तत्पर और उत्सुक विद्यार्थी बने रहते हैं। शास्त्रों में भी कहा गया है “काक: चेष्टा, बको ध्यानं, श्वान निद्रा तथैव च। अल्पाहारी, गृहत्यागी, विद्यार्थी पंचलक्षणम् ।।”  मोदी मंत्रिमंडल में कृषि विभाग के मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी इसी निष्ठा का परिचय दिया और अचानक से आदिवासियों के लिए भाव-विगलित होकर, रुंधे गले से अश्रु बहाते नजर आये। अपनी पार्टी की सरकार के ही खिलाफ धरने पर बैठे और जिन्हें कठोर कहा जा सकता है, ऐसे शब्दों में वन विभाग के अधिकारियों की लानत-मलामत की। शिवराज सिंह चौहान मध्यप्रदेश के ही भूतपूर्व मुख्यमंत्री हैं, उनके आगे पूर्व लिखे हुए काफी अरसा गुजर चुका है, किन्तु अपने भूतत्व को उनका मन अभी तक स्वीकार नहीं कर पाया है। उनके अश्रु-पर्व को कई लोगों ने इससे भी जोड़कर देखा : ऐसा हो भी सकता है – नहीं भी हो सकता। इस हुए-अनहुए के भेद में पड़ने की बजाय यह जो प्रहसन हुआ है, उसे उसकी पूरी संलग्नता के साथ देखना ज्यादा उपयोगी होगा।

     हुआ यह कि मध्य प्रदेश सरकार के वन विकास निगम के अमले ने सीहोर जिले के बुदनी इलाके के गाँव कोसमी में जाकर तोड़फोड़ कर दी। करीब 12 आदिवासी परिवारों के मकान तोड़ दिए गए, उनकी फसलें नष्ट कर दी गयीं। मकानों पर बुलडोजर चला दिए गए। देखने वाले बताते हैं कि घरों को गिराने के साथ-साथ आदिवासियों की खड़ी फसलें -- मक्का और तुअर – पर भी रोलर चला दिया गया। बात यहीं तक नहीं रोकी। वन विभाग के अमले ने आदिवासियों के कुओं को मिट्टी से पाट दिया। यह सब तब हुआ, जबकि पीड़ित परिवार दावा करते रहे कि वे वर्ष 2004 – यूपीए प्रथम के कार्यकाल में बने आदिवासी वनाधिकार क़ानून में तय समयावधि से एक साल पहले -- से उस भूमि पर निवास कर रहे हैं। गोदी मीडिया के अनुसार, वन अधिकारियों के हवाले से इस कार्यवाही को अवैध अतिक्रमण हटाने की सामान्य कार्यवाही बताया गया है।

Sehore Mein Magarmachh Ke Aansu Shivraj Singh Chouhan Aur Chuninda Dard Ki Rajniti

     जो हुआ वह यकीनन बहुत पीड़ादायी है। बसे-बसाए घरों और बोई हुई फसल पर बुलडोजर चलाये जाने का दर्द असहनीय होता है। एक घर अचानक से खानाबदोश और शरणार्थी में बदल जाता है : फिर यहाँ तो पूरे दर्जन भर परिवार थे। इस लिहाज से तो शिवराज सिंह की पीड़ा स्वागतयोग्य होनी चाहिए? बिलकुल होनी चाहिए। मगर क्या पीड़ाओं और संवेदनाओं को इतना सेलेक्टिव – चुनिन्दा --  होना चाहिए कि सीहोर की दिमनी में आँखें आंसूओं से भर जाएँ, बाकी प्रदेश में उससे कहीं ज्यादा बड़े पैमाने पर हो रही इसी तरह की, कई जगह इससे भी अधिक निर्मम कार्यवाहियों पर धृतराष्ट्र बन जाएँ? समस्या ठीक यहीं से शुरू होती है। सीहोर की कोसमी में जो हुआ, वह गलत है तो, सीधी और शहडोल और अनूपपुर की कुसमी या अन्य नामधारी गाँवों के आदिवासियों के साथ जो हुआ, वह भी गलत है। शिवराज सिंह जैसे कद के नेता को इसी साल हुए सीधी, सिंगरौली, देवास, बुरहानपुर, बड़वानी, पन्ना और छतरपुर जिलों में आदिवासियों को ज़मीन से बेदखल किए जाने और गैर-आदिवासियों को ज़मीन बेचे जाने के मामलों पर भी उसी शिद्दत के साथ आवाज उठाना चाहिए। खुद अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में की गयी जबरिया बेदखलियों के लिए भी खेद जताना चाहिए। ऐसा न करने की वजह बुदनी में धरना स्थल पर बोले गए उनके एक कथन से साफ़ समझ आ जाती है। आदिवासियों की बेदखली का विरोध – सही विरोध – करते हुए उन्होंने बताया कि इन आदिवासियों ने विधानसभा हो या लोकसभा, हर चुनाव में भाजपा को वोट दिया है। यह हमारे लोग हैं। यह तर्क बहुत बोदा है। इससे यह अर्थ निकलता है कि जिन्होंने किसी कारण की वजह से भाजपा को वोट नहीं दिया, वे उजाड़े जा सकते हैं!! क्या इसीलिए शिवराज सिंह बालाघाट के बैगा आदिवासियों के 44 ब्च्चों की अकाल मौतों के बारे में एक शब्द नहीं बोले, क्योंकि उनके क्षेत्र से भाजपा चुनाव नहीं जीती। अगर ऐसा है, तो सचमुच बहुत आपत्तिजनक है।

     शिवराज सिंह को बुदनी जाना चाहिए था – वह दशकों तक उनका विधानसभा और लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र रहा है। मगर वे 16 साल 8 महीने इस प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं। उन्हें बालाघाट की बैगा बच्चों की मौतों पर भी बोलना चाहिए और थोड़ी-बहुत इसकी जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी चाहिए। ये मौतें इतनी चिंताजनक थीं कि अन्यथा अलग तरह की भूमिका निबाहने वाले भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ को मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी करने के साथ इसे "बेहद दुर्भाग्यपूर्ण" बताना पड़ा। शिवराज जानते हैं कि इस तरह की मौतें, मृत्यु नहीं कही जाती। ऐसी मौतें जिन्हें टाला जा सकता है, उन्हें सांस्थानिक हत्या कहा जाता है। अनुसूचित जनजाति आयोग के अलावा, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की नेशनल ज्वाइंट आउटब्रेक रिस्पांस टीम ने भी यह पाया था कि सुदूर आदिवासी गांवों में स्वास्थ्य देखभाल, बीमारी की निगरानी और पोषण सेवाओं में बेहद गंभीर खामियां थीं। शिवराज सिंह यदि वास्तव में आदिवासियों के लिए द्रवित हैं, तो उन्हें बालाघाट जाना चाहिए था। जाना तो उन्हें  सागर भी चाहिए था, जहां ज़हरीली शराब कांड हुआ, जाना तो छतरपुर भी चाहिए था, जहां केन बेतवा से विस्थापित जल समाधि लिए बैठे हैं और उनकी पार्टी की सरकार सुन भी नहीं रही है।  

     इन सब जगहों पर जाना तो दूर की बात है, उन्होंने, जिस प्रदेश के वे बरसों बरस मुख्यमंत्री रहे, उस प्रदेश में घटी इन घटनाओं पर शोक संवेदना तक नहीं जताई। ऐसी स्थिति में यह कहना गलत नहीं होगा कि प्रदेश की राजनीति में अपनी ही पार्टी में चल रही गुटबाजी में अपनी गोटी लाल करने के लिए वे आदिवासियों का मोहरे की तरह की इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी के साथ जिस राजनीतिक पार्टी की सरकार है, उस राजनीतिक पार्टी के जुल्म और विफलताओं पर उभरने वाले जायज आक्रोश को इधर उधर भटकाने के प्रयत्न भी कर रहे हैं। सारी भद्रा अधिकारियों पर उतार कर असली गुनहगारो यानि सरकार में बैठे मुख्यमंत्री, मंत्रियों और उनकी राज्नीतिक पार्टी को बचा रहे हैं। 

     शिवराज ऐसी अदा दिखाने में पारंगत है। अपनी ही सरकार द्वारा 6 जून 2017 के मंदसौर गोलीकांड में 6 किसानों को भून देने के बाद वे दो दिन की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल का प्रहसन कर चुके हैं। मगर काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती – दिखावटी बयानबाजी से भाजपा सरकार के पापों की जिम्मेदारी से वे खुद को अलग नहीं कर सकते। लोगों को हमेशा झांसे में नहीं रखा जा सकता।    

( लेखक लोकजतन के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716 )