(आलेख : सवेरा, अनुवादक : संजय पराते)
खोजी शोधकर्ताओं के एक समूह की नई रिपोर्ट से पता चला है कि आरएसएस के दो बड़े मोर्चा संगठन कैसे अमेरिका से भारत में उसे फंड भेजते हैं, और गैर-लाभकारी संस्थाओं को नियंत्रित करने वाले अमेरिकी कानूनों के एक कानूनी प्रावधान के ज़रिए दान का स्रोत छिपाते हैं। जांच में ह्यूस्टन, टेक्सास-आधारित एकल विद्यालय फाउंडेशन ऑफ़ यूएसए इंक (एकल यूएसए) और सेवा इंटरनेशनल इंक (सेवा यूएसए) की 2020 से 2024 तक की कर-दाखिलों का अध्ययन किया गया है।

इस अवधि में, एकल यूएसए ने अमेरिका के अंदर दानदाताओं से योगदान और अनुदान के रूप में 4.84 करोड़ डॉलर (380 करोड़ रुपये) से अधिक प्राप्त करने की सूचना दी है। [वर्ष 2020-2024 की अवधि के लिए औसत अमेरिकी डॉलर-भारतीय रूपया विनिमय दर 1 डॉलर = 78.58 रूपया का उपयोग किया गया है।] एकल यूएसए के प्रपत्र 990 के अनुसार, जैसा कि अध्ययन और जांच द्वारा पाया गया है, इसने भारत में एकल विद्यालय को 3.37 करोड़ डॉलर (265 करोड़ रुपये) हस्तांतरित किए हैं, जिसने कथित तौर पर भारत में स्कूलों के निर्माण के लिए इस धन का उपयोग किया है। जांच रिपोर्ट के अनुसार, सेवा यूएसए को इसके प्रपत्र 990 के अनुसार वर्ष 2020 से 2024 के बीच योगदान और अनुदान के रूप में लगभग 6.94 करोड़ डॉलर (545 करोड़ रुपये) प्राप्त हुए हैं। इसके व्यय विवरण से पता चलता है कि सेवा यूएसए ने भारत और दक्षिण एशिया को 2.97 करोड़ डॉलर (233 करोड़ रूपये) हस्तांतरित किए हैं, जबकि लगभग 6,22,613 डॉलर (5 करोड़ रूपये) अमेरिका में रहने वाले लोगों को दिए गए हैं। हालांकि प्रपत्र में यह नहीं बताया गया है कि भारत/दक्षिण एशिया में हस्तांतरित किया गया फंड आरएसएस से जुड़े भारतीय धर्मार्थ संगठन, सेवा भारती को गया है या नहीं, लेकिन ऐसा हो सकता है।

यह जांच-पड़ताल बेलिंगकैट के शोधकर्ताओं ने की हैं। बेलिंगकैट अमेरिका और नीदरलैंड्स में मौजूद ओपन-सोर्स रिसर्चर्स और सिटिज़न जर्नलिस्ट्स का एक स्वतंत्र समूह है। यह वैश्विक खोजी पत्रकारिता नेटवर्क का एक हिस्सा है।
इस जांच-पड़ताल से आरएसएस से जुड़े 2500 से ज़्यादा संगठनों के छाया-नेटवर्क के बारे में और जानकारी मिलती है, जिनमें से 260 संगठन 39 विदेशी राष्ट्रों में काम कर रहे हैं। अमेरिका में ही ऐसे 107 संगठन हैं। जैसा कि अध्ययन में बताया गया है, अमेरिका में आरएसएस से जुड़े कई संगठन या मोर्चे, जैसे इंडिया डेवलपमेंट एंड रिलीफ फंड (आईडीआरएफ), जो अमेरिका के मैरीलैंड में स्थित एक कर-मुक्त, गैर-लाभकारी संगठन है, भारत में आरएसएस से जुड़े कई संगठनों के लिए फंडिंग का स्रोत है। आईडीआरएफ कम से कम 200 संगठनों से जुड़ा है, जिनमें सेवा भारती, एबीवीपी, वनवासी कल्याण आश्रम जैसे बड़े संगठन शामिल हैं, लेकिन देश भर में फैले कई छोटे गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) भी हैं। सपोर्ट ए चाइल्ड यूएसए भी इसी तरह विश्व हिंदू परिषद, यूएसए से जुड़ा है। एक और संगठन है, जो शायद भारत में आरएसएस से जुड़े संगठनों को वित्त-पोषित कर रहा है।
गुमनाम दानदाता
बेलिंगकैट रिपोर्ट ने एक खास बात यह पाई है कि इस फंडिंग का एक हिस्सा अनजान स्रोतों से आ रहा है। जांचकर्ताओं ने पाया कि एकल फाउंडेशन, यूएसए द्वारा जुटाई गई कुल राशि में से कम से कम 83 लाख डॉलर (65 करोड़ रूपये) डोनर एडवाइज्ड फंड (डीएएफ) अनुदान से थे। सेवा यूएसए को अनुदान पाने वाले के रूप में सूचीबद्ध करने वाले दाखिलों से पता चलता है कि कम से कम 1.6 करोड़ डॉलर (126 करोड़ रूपये) ऐसे डीएएफ से ही थे। डीएएफ के बारे में दिलचस्प बात यह है कि जो संगठन डीएएफ-रूट का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें दान का स्रोत बताने की ज़रूरत नहीं होती है, और दानदाता गुमनाम रहना पसंद कर सकते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, डीएएफ अमेरिका में उन लोगों के लिए सामान्य जरिया हैं, जो कर-राहत या लाभ प्राप्त करते हुए धर्मार्थ कारणों के लिए दान करना चाहते हैं। दानकर्ता एक बार दान करने के बाद धन को नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन यह सलाह दे सकते हैं कि धन आखिरकार किस धर्मार्थ संगठन को जाएगा। इन फंडों को कानूनन गैर-लाभकारी प्रायोजक संगठनों द्वारा बनाए, रखा और संचालित किया जाता है। डीएएफ-प्रायोजक संगठन प्रपत्र 990 में अपने दानदाताओं की ओर से सार्वजनिक दान के रूप में दिए जाने वाले अनुदानों की मात्रा और प्राप्तकर्ताओं का विवरण देते हैं।
रिपोर्ट में उन विशेषज्ञों का ज़िक्र है, जिन्होंने शोधकर्ताओं को बताया कि “डीएएफ अनुदानों की दूसरे धर्मार्थ दानों की तुलना में नियामक जांच कम होती है और डीएएफ-प्रायोजक संगठनों के पास यह चुनने का अधिकार होता है कि वे कुछ खास लोगों को दान देने पर रोक लगाएं या उन्हें इजाज़त दें।”
रिपोर्ट में लोयोला यूनिवर्सिटी शिकागो में विधि के प्रोफेसर सैमुअल ब्रंसन के हवाले से कहा गया है, “डोनर-एडवाइज्ड फंड्स (डीएएफ) पर असल में अमेरिका के अंदरूनी राजस्व सेवा (आईआरएस) की निगरानी कम होती है, क्योंकि डीएएफ को निजी न्यास के बजाय सार्वजनिक धर्मार्थ माना जाता है।”
“अगर कोई निजी संस्था भारत के संगठनों को पैसे दे रहा होता, तो यह थोड़ा मुश्किल होता। लेकिन अगर यह एक सार्वजनिक धर्मार्थ है... तो उस पर ज़्यादा निगरानी नहीं होती, जब तक कि अमेरिकी कर-मुक्त संगठन जो पैसा दे रहा है, वह उसके धर्मार्थ मकसद को पूरा करता हो।”
नॉट्रे डेम विश्वविद्यालय में विधि के प्रोफेसर लॉयड हितोशी मेयर, जो गैर-लाभकारी संस्थाओं के विशेषज्ञ हैं, ने बेलिंगकैट को बताया कि यह “निश्चित रूप से माना जाता है” कि गैर-लाभकारी 501 (सी) (3) कर स्थिति वाले अमेरिकी संगठनों को दिए गए धन का इस्तेमाल अच्छे धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए किया जा रहा था।
विश्लेषण से पता चलता है कि एकल यूएसए और सेवा यूएसए को डीएएफ का प्रबंधन करने वाले 34 संगठनों से कम से कम 2.44 करोड़ अमेरिकी डॉलर (192 करोड़ रूपये) मिले हैं। यह इस अवधि के दौरान उन्हें कुल 11.78 करोड़ डॉलर (926 करोड़ रूपये) मिले हैं, जो कुल राशि का पांचवां हिस्सा (20.7 प्रतिशत) से ज़्यादा है।
जांच रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गई है कि डीएएफ से वास्तविक राशि अधिक हो सकती है, क्योंकि उन्होंने अध्ययन के लिए केवल पूर्ण कैलेंडर वर्ष शामिल किए थे और "इस अवधि के बाहर आंशिक वर्षों को कवर करने वाली दाखिलों को छोड़ दिया था -- उदाहरण के लिए, जून 2019 से जून 2020"।
अमेरिकी मोर्चों और भारत में आरएसएस से जुड़े संगठनों के बीच सीधे संबंध
बेलिंगकैट रिपोर्ट ने यह स्थापित करने के लिए बहुत श्रमसाध्य काम किया है कि एक तरफ़ एकल यूएसए और सेवा यूएसए, और दूसरी तरफ़ भारत में आरएसएस के बीच निस्संदेह साफ़-साफ़ संबंध है। भारतीय पाठकों को यह कोशिश अतिशयोक्ति लग सकती है, लेकिन यह याद रखना चाहिए कि शोधकर्ता अमेरिकी पाठकों को ध्यान में रखकर काम कर रहे हैं, जिन्हें शायद आरएसएस और उसके विशाल नेटवर्क, या भारत में उसकी गतिविधियों के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है।
एकल यूएसए को उसकी अपनी वेबसाइट के अनुसार, 2001 में "वैश्विक प्रवासियों तक पहुंचने" के प्रयासों के हिस्से के रूप में स्थापित किया गया था, ताकि "100,000 गांवों तक एकल की पहुंच का विस्तार करने" के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके। एकल यूएसए की शुरुआत 1990 के दशक के अंत में विश्व हिंदू परिषद ऑफ अमेरिका (वीएचपीए), या वर्ल्ड हिंदू कौंसिल ऑफ अमेरिका के एक कार्यक्रम के रूप में हुई थी, ऐसा वीएचपीए के प्रवक्ता श्याम तिवारी ने एक ईमेल के जवाब में बेलिंगकैट को बताया है। उन्होंने बताया कि इसे वर्ष 2000 के शुरुआत में एक स्वतंत्र संगठन के रूप में स्थापित किया गया था। रिपोर्ट बताती है कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भारत में कई एकल विद्यालय कार्यक्रमों में वर्षों से इस पहल को बढ़ावा देते दिखाई दिए हैं, यहां तक कि 2014 से लेकर इस वर्ष मई में भी। यह कहने की जरूरत नहीं है कि वीएचपीए, विश्व हिंदू परिषद की अमेरिकी शाखा है, जो आरएसएस का एकआनुषंगिक संगठन है। आरएसएस की वेबसाइट के अनुसार, विहिप को हिंदुओं को संगठित करने और “उन सभी लोगों का पुन: धर्मांतरित कराने के लिए शुरू किया गया था, जिन्हें जानबूझकर या अनजाने में विदेशी धर्मों में धर्मांतरित कर दिया गया था और जो अब हिंदू धर्म में वापस आने के इच्छुक हैं”।
एकल विद्यालय आंदोलन असहिष्णुता, अल्पसंख्यकों के प्रति शत्रुता, ब्राह्मणवादी पदानुक्रम का समर्थन और अति-राष्ट्रवाद के साथ आरएसएस-ब्रांड हिंदुत्व का प्रचार करने का एक साधन है। रिपोर्ट में बताया गया है कि एकल विद्यालय की "उन रिपोर्टों को लेकर आलोचना की गई है, जिनमें आरोप लगाया गया है कि इन स्कूलों का उपयोग भारत के लाखों सबसे गरीब और सबसे कमजोर बच्चों और महिलाओं को हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रेरित करने के लिए किया जाता है, जिसमें यह भी शामिल है कि मुसलमान और ईसाई "हिंदू धर्म के दुश्मन हैं"। भारत में एकल विद्यालय ने शोधकर्ताओं द्वारा भेजी गई टिप्पणी के लिए कई अनुरोधों का जवाब नहीं दिया।
सेवा यूएसए
जांच रिपोर्ट के अनुसार, ह्यूस्टन में स्थित सेवा यूएसए खुद को “हिंदू धर्म पर आधारित, मानवीय, गैर-लाभकारी सेवा संगठन” बताता है और भारत स्थित धर्मार्थ समूह सेवा इंटरनेशनल की वेबसाइट पर “सेवा आंदोलन” शीर्षक के तहत सूचीबद्ध है।
आरएसएस से दूरी बनाने का अपना तरीका अपनाते हुए, सेवा यूएसए की सार्वजनिक मामलों की उपाध्यक्ष राखी इसरानी ने बेलिंगकैट को ईमेल पर बताया कि यह संगठन “आरएसएस की शाखा या उससे जुड़े संगठन के रूप में काम नहीं करता” और न ही राजनैतिक गतिविधियों में हिस्सा लेता है।
यह सेवा भारती से घनिष्ठ रूप से से जुड़ा हुआ है, जो आरएसएस का एक जाना-पहचाना मोर्चा है। आरएसएस की वेबसाइट अपने मुख्य नेविगेशन बार पर "सेवा" नामक टैब के माध्यम से सेवा भारती की मुख्य वेबसाइट से सीधे जुड़ती है और सेवा भारती का उल्लेख आरएसएस की वार्षिक रिपोर्टों में किया जाता है।
आरएसएस/भाजपा की ध्यान भटकाऊ रणनीति
भारत में मोदी सरकार और मोदी के गुरु आरएसएस को आज देश की नाराज और बेचैन जनता घेरे हुए है। यह असंतोष वर्षों की आर्थिक बदहाली, बेरोजगारी, अति-धनिकों और शेष आबादी के बीच बढ़ती खाई, मोदी सरकार द्वारा जोश-खरोश के साथ जहरीली नफरत फैलाने वाले आरएसएस-संचालित एजेंडे पर चलने, लोकतंत्र को कुचलने और संविधान को खत्म करने के कारण पैदा हो रहा है। इस असंतोष में हाल ही में बड़े पैमाने पर बढ़ोतरी देखी गई है, जैसा कि दिल्ली और अन्य स्थानों पर विरोध प्रदर्शनों में देखा गया है। आरएसएस-भाजपा जिन तरीकों से इससे ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है, उनमें से एक है 'विदेशी शक्तियों' को दोषी ठहराना, जो कथित तौर पर देश में 'अराजकता फैलाने' के लिए विपक्षी दलों और अन्य प्रदर्शनकारियों को फंडिंग कर रही हैं। भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन और भाजपा के कई रॉटवीलर (यह जर्मन-नस्ल के एक कुत्ते का नाम है) हाल ही में ये निराधार आरोप लगा रहे हैं। बेलिंगकैट रिपोर्ट एक वास्तविक जांच को पेश करती है -- यह आरएसएस, भाजपा और उसके सहयोगी संगठन ही हैं, जो वास्तव में विदेशों से धन प्राप्त कर रहे हैं। हालाँकि यह रिपोर्ट आरएसएस द्वारा गुप्त रूप से चलाए जा रहे नेटवर्क के केवल एक हिस्से से संबंधित है, लेकिन इस समय यह आरएसएस/भाजपा की चालाकी की झलक दिखाती है।
( लेखक शोध अध्येता हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650 )