डॉ. महेंद्र धावडे, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी
भारत एक कृषि प्रधान देश है, लेकिन आज किसान और बेरोजगार युवा दोनों ही हाशिये पर खड़े महसूस कर रहे हैं। देश की आत्मा कहे जाने वाले अन्नदाता और भविष्य कहे जाने वाले युवा, दोनों ही इस समय गंभीर आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता था अब वो भी पहचान हमारी सरकार भुलने की कगार पर खडी है।किसान की आय दुगना करने के वादे से अच्छे दिन तक का सफर आज गारंटी मे फस चुका है ।
आज अगर एक चीज़ चुननी हो तो युवाओं की रोज़गार-शिक्षा समस्या को सबसे गहरी संरचनात्मक चुनौती माना जा सकता है, क्योंकि इसका सीधा असर परिवारों, आय, कौशल और सामाजिक असंतोष पर पड़ता है। विशेषज्ञों का तर्क है कि गैर-कृषि नौकरियाँ और वास्तविक मजदूरी पर्याप्त नहीं बढ़ रहीं, जबकि शिक्षा व्यवस्था रोज़गार-योग्य कौशल पर्याप्त नहीं दे पा रही।

लेकिन तात्कालिक खबर दिल्ली के प्रदर्शन और मतदाता सूची विवाद से जुड़ी है; यह अभी राजनीतिक रूप से सबसे अधिक चर्चित मुद्दा है।
महँगाई और तेल कीमतें परिवार के बजट को दबाती हैं; कम रोज़गार युवाओं की नाराजगी बढ़ाता है; और चुनावी संस्थाओं पर विवाद इस असंतोष को सड़क पर लाता है। इसलिए “भारत की सबसे बड़ी समस्या” किसी एक घटना से नहीं, बल्कि आर्थिक अवसर, महँगाई और लोकतांत्रिक भरोसे—इन तीनों के दबाव से बनी है।
भारत में युवाओं के लिए रोजगार की स्थिति और किसानों की हालत दोनों एक-दूसरे से गहरे जुड़े हैं।ग्रामीण युवाओं को पर्याप्त गैर-कृषि रोजगार नहीं मिल पाता, जबकि कृषि में अधिक लोग काम करते हैं पर आय अक्सर कम और अनिश्चित रहती है। कृषि लगभग 46.1% कार्यबल को आजीविका देती है, लेकिन देश के कुल मूल्य संवर्धन में इसका योगदान बहुत कम है।
युवाओं की रोजगार स्थिति
भारत के बेरोजगार कार्यबल में लगभग 83% युवा हैं; यानी बेरोजगारी का सबसे बड़ा दबाव युवा वर्ग पर है।
शिक्षित युवाओं की समस्या विशेष रूप से गंभीर है—2022 में कुल बेरोजगारों में माध्यमिक या उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं की हिस्सेदारी 65.7% थी, जो 2000 में 35.2% थी।
शहरी क्षेत्रों में 18–29 वर्ष के युवाओं की बेरोजगारी दर 12% से अधिक दर्ज की गई थी, जबकि समग्र शहरी बेरोजगारी लगभग 7% के आसपास थी।
कई युवा सरकारी नौकरी की लंबी प्रतीक्षा में रहते हैं या अपनी योग्यता से कम वेतन वाले, अस्थायी कामों में कार्यरत होते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में “कम बेरोजगारी” का एक बड़ा कारण यह है कि विकल्प न होने पर युवा कृषि या पारिवारिक खेती में काम करने लगते हैं; यह पूर्ण रोजगार नहीं, बल्कि अर्ध-रोजगार या प्रछन्न बेरोजगारी का संकेत हो सकता है।
हाशिये पर अन्नदाता
खाद, बीज, कीटनाशक और डीजल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन उस अनुपात में फसलों की उचित कीमत (MSP) नहीं मिल पाती।जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण कभी सूखा तो कभी बेमौसम बारिश और बाढ़ से फसलें बर्बाद हो जाती हैं, जिससे किसान कर्ज के जाल में फंस जाता है।बिचौलियों (आढ़तियों) के वर्चस्व और कोल्ड स्टोरेज की कमी के कारण किसानों को अपनी उपज औने-पौने दामों पर बेचनी पड़ती है।
बेरोजगारों का भविष्य अधर में
हर साल लाखों युवा कॉलेज से डिग्री लेकर निकल रहे हैं, लेकिन उद्योगों की मांग के अनुसार उनके पास तकनीकी या व्यावहारिक कौशल नहीं होता।सरकारी पदों पर भर्तियां सीमित हो चुकी हैं, और जो परीक्षाएं होती भी हैं, वे अक्सर पेपर लीक या अदालती मुकदमों के कारण सालों-साल लटकी रहती हैं।संगठित क्षेत्र (Corporate Sector) में पर्याप्त नौकरियां न होने के कारण युवाओं को कम वेतन और बिना किसी सुरक्षा के गिग इकॉनमी (जैसे डिलीवरी बॉय, कैब ड्राइवर) या अस्थायी कामों पर निर्भर होना पड़ रहा है।
जब खेती घाटे का सौदा बन जाती है, तो ग्रामीण युवा खेती छोड़कर शहरों की ओर पलायन करते हैं। शहरों में पहले से ही रोजगार की कमी होने के कारण बेरोजगारों की संख्या और बढ़ जाती है। इससे ग्रामीण और शहरी दोनों अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ता है।
अन्नदाता का सन्मान
अन्नदाता (किसान) का सच्चा सम्मान केवल नारों या कागजों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह उनके जीवन स्तर में सुधार, आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा से तय होता है। देश के पेट भरने वाले किसान को समाज और सरकार में उनका हक दिलाना ही उनका असली सम्मान है।
अन्नदाता का सबसे बड़ा सम्मान यह है कि उन्हें उनकी फसलों का लाभकारी और गारंटीड मूल्य मिले। जब किसान को अपनी उपज की सही कीमत मिलेगी, तो उसे कर्ज के लिए किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा।मंडियों में फसल बेचने के बाद किसानों के बैंक खातों में तुरंत (Direct Benefit Transfer - DBT) भुगतान होना चाहिए, ताकि वे अगली फसल की तैयारी बिना किसी तनाव के कर सकें।बीज, खाद, कीटनाशक, बिजली और डीजल जैसी बुनियादी कृषि इनपुट पर सब्सिडी देकर खेती की लागत को कम करना बेहद जरूरी है।
किसान क्रांती
जैसा कि हमने पहले चर्चा की, फसल खराब होने पर किसानों को बिना किसी दफ्तर के चक्कर काटे, 72 घंटों के भीतर उनके नुकसान का क्लेम मिलना चाहिए।60 वर्ष की आयु पार कर चुके बुजुर्ग किसानों के लिए एक सम्मानजनक और सुनिश्चित मासिक पेंशन (जैसे पीएम किसान मानधन योजना) का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि बुढ़ापे में वे किसी पर निर्भर न रहें।
सम्मान
किसी भी सरकारी दफ्तर, बैंक या मंडी में जाने पर किसान को अग्रिम पंक्ति (Front Row) का सम्मान मिलना चाहिए। समाज को यह समझना होगा कि एक डॉक्टर, इंजीनियर या उद्योगपति के बिना कुछ दिन काम चल सकता है, लेकिन अन्नदाता के बिना एक दिन भी जीवित रहना असंभव है।अन्नदाता का सच्चा सम्मान तब होगा जब ग्रामीण युवा खेती को मजबूरी नहीं, बल्कि एक गर्व और मुनाफे का व्यवसाय (Proud & Profitable Profession) मानने लगेंगे।