( आजादी की लड़ाई बनाम आंदोलन का अधिकार! )
डॉ. महेंद्र धावडे, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी
भारतीय संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत विपक्षी सांसदों या किसी भी नागरिक को शांतिपूर्ण आंदोलन और विरोध प्रदर्शन करने का पूरा अधिकार है।
भारत में लोकतंत्र के अंतर्गत राजनीतिक दलों और सांसदों को अपनी मांगें उठाने और प्रदर्शन करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। अक्टूबर 2026 में ही कांग्रेस और INDIA गठबंधन के लगभग 300 सांसदों ने मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों (SIR विवाद) को लेकर संसद से चुनाव आयोग मुख्यालय तक मार्च निकाला था लेकिन पुलिस द्वारा सभी विपक्ष के सांसद को हिरासत मे ले लिया गया ।

विपक्ष का यह आंदोलन किसी सामान्य राजनीतिक मुद्दे पर नहीं, बल्कि मतदाता सूची में कथित हेरफेर (SIR विवाद) को लेकर है। इस वजह से सामान्य जनता के बुनियादी अधिकारों पर सीधा प्रभाव पड़ता है।विपक्ष का आरोप है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान देश भर में 13 करोड़ से अधिक नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। इसमें आम नागरिक सबसे अधिक प्रभावित होता है, क्योंकि कई बार मतदान के दिन पोलिंग बूथ पहुंचने पर जनता को पता चलता है कि उनका नाम लिस्ट से गायब है।
जब देश के शीर्ष नेता और सांसद चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्था के प्रमुख (ज्ञानेश कुमार) के इस्तीफे की मांग करते हुए सड़कों पर धरने पर बैठते हैं, तो इससे निष्पक्ष चुनाव कराने वाली प्रणाली को लेकर आम नागरिकों के मन में संदेह पैदा होता है।
यदि विपक्ष के सांसदों के साथ पुलिस ज्यादती हो रही है, तो आम नागरिकों की सुरक्षा की स्थिति क्या होगी—यह हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में एक गंभीर बहस का विषय बना हुआ है।
घटनाक्रम और विपक्ष के आरोप
हाल ही में, मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर INDIA गठबंधन के सांसदों ने संसद से चुनाव आयोग तक मार्च निकाला था, जिसके दौरान दिल्ली पुलिस और विपक्षी नेताओं के बीच काफी तनाव देखा गया।
हिरासत और बल प्रयोग
कांग्रेस सांसद राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, अखिलेश यादव और अभिषेक बनर्जी समेत कई विपक्षी नेताओं को पुलिस ने हिरासत में ले लिया।
सांसदों के बयान: तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद सागरिका घोष ने पुलिस बस के अंदर से वीडियो शेयर करते हुए दावा किया कि उन्हें और अन्य सांसदों को जबरदस्ती बसों में धकेला गया और उन्हें ऐसी जगह ले जाया जा रहा था जिसके बारे में बस ड्राइवर को भी जानकारी नहीं थी।
चोटें लगने के आरोप
कांग्रेस ने दावा किया है कि पुलिस ने लाठीचार्ज किया जिससे विपक्ष के कई नेता घायल हो गए, हालांकि पुलिस ने इसका खंडन करते हुए अपने अधिकारियों पर हमले के वीडियो साझा किए हैं।
विपक्ष और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं का तर्क है कि यदि संसद में चुने हुए प्रतिनिधियों (सांसदों) के साथ पुलिस का व्यवहार इतना सख्त हो सकता है, तो आम नागरिकों के लिए सुरक्षा की गुंजाइश और कम हो जाती है।
संसदीय विशेषाधिकार वे विशेष अधिकार और उन्मुक्तियाँ हैं जो संसद, उसके सदस्यों और समितियों को स्वतंत्र तथा प्रभावी ढंग से कार्य करने के लिए प्राप्त हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है—संसद के भीतर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
संवैधानिक आधार
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 105 संसद और सांसदों के विशेषाधिकारों से संबंधित है।
संसद में वाक् या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है।सांसद संसद या उसकी समिति में कही गई बात या दिए गए मत के लिए किसी न्यायालय में कार्यवाही के लिए उत्तरदायी नहीं होते।संसद के अधिकार से प्रकाशित रिपोर्ट, कार्यवाही, मत या दस्तावेज के प्रकाशन को भी संरक्षण मिलता है।
राज्य विधानसभाओं के प्रावधान अनुच्छेद 194 में है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ
सांसद संसद में:
सरकार की आलोचना कर सकते हैं।
सार्वजनिक महत्व के विषय उठा सकते हैं।विधेयकों पर खुलकर बहस कर सकते हैं।मंत्रियों से प्रश्न पूछ सकते हैं।
अपनी पार्टी या सरकार की नीतियों पर भी असहमति व्यक्त कर सकते हैं।
मतदान के माध्यम से अपना निर्णय प्रकट कर सकते हैं।
यदि कोई सांसद संसद में कोई वक्तव्य देता है या किसी प्रस्ताव पर मतदान करता है, तो सामान्यतः उसके विरुद्ध उसी आधार पर न्यायालय में दीवानी या आपराधिक कार्यवाही नहीं की जा सकती।
संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूर्ण और निरंकुश नहीं है। यह निम्न सीमाओं के अधीन है:
संविधान के प्रावधान।संसद के प्रक्रिया और कार्य-संचालन नियम।सभापति या अध्यक्ष के निर्देश।असंसदीय शब्दों और अशोभनीय आचरण से संबंधित नियम।
सदन की गरिमा, अनुशासन और विशेषाधिकार।
न्यायपालिका के संबंध में संविधान द्वारा लगाए गए प्रतिबंध।
इसलिए सांसद को सदन में बोलने का व्यापक अधिकार है, लेकिन वह नियमों का उल्लंघन करने पर अध्यक्ष द्वारा वक्तव्य का हिस्सा रिकॉर्ड से हटाए जाने, चेतावनी, निलंबन या विशेषाधिकार समिति की कार्यवाही का सामना कर सकता है।
अनुच्छेद 19 से अंतर
सामान्य नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत आती है और उस पर अनुच्छेद 19(2) के तहत युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, जैसे राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, मानहानि और न्यायालय की अवमानना।
संसद में सांसदों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनुच्छेद 105 के अंतर्गत प्राप्त विशेष संसदीय संरक्षण है। यह सामान्य नागरिक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से अलग है और सदन के नियमों तथा संसदीय अनुशासन के अधीन रहती है।
पुलिस अधिकारों में विस्तार
पिछले एक दशक में मोदी सरकार ने कई कानूनों में बदलाव किए हैं। एक महत्वपूर्ण बदलाव पुलिस हिरासत की समय सीमा को लेकर किया गया है, जिसे अपराध की गंभीरता के आधार पर 15 दिनों से बढ़ाकर 60 और 90 दिन तक कर दिया गया है।
संसद में बहस का मुद्दा
विपक्ष ने संसद के मानसून सत्र में भी छात्रों और प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की कथित ‘बर्बरता’ को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से जवाबदेही की मांग की थी, जिसे ‘गंभीर राष्ट्रीय महत्व’ का मुद्दा बताया गया।
पुलिस का पक्ष
दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस का कहना है कि विरोध प्रदर्शन के दौरान कई महिला पुलिसकर्मियों और कॉन्स्टेबल के साथ मारपीट की गई है।
एक घटना में DCP स्तर के अधिकारी ने भी घायल जवान को गले लगाकर अपनी गाड़ी से अस्पताल भिजवाया था, जहां जवान को विरोध प्रदर्शन के दौरान काटने और नाखून लगने से चोटें आई थीं।
यह स्थिति लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन के अधिकार और कानून व्यवस्था बनाए रखने के बीच के संतुलन पर एक गंभीर सवाल खड़ा करती है।
लोकतंत्र में चुनाव आयोग को एक 'निष्पक्ष अंपायर' की भूमिका निभानी चाहिए। आलोचकों का मानना है कि जब सत्ताधारी दल के नेता हर विवाद में अंपायर का पक्ष लेने लगते हैं, तो विपक्ष और जनता की नजरों में उस संस्था की निष्पक्षता संदिग्ध हो जाती है।
कानूनन, मतदाता सूची को बिना किसी त्रुटि के तैयार करना सीधे चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है। यदि विपक्ष कोई गंभीर विसंगति (जैसे 'वोट चोरी' या लिस्ट में हेरफेर) उजागर करता है, तो सरकार को आयोग का बचाव करने के बजाय उन शंकाओं को दूर करने की मांग करनी चाहिए, क्योंकि पारदर्शिता ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।
कानूनी रूप से, राजनीतिक दलों को अपनी बात रखने और सरकार या आयोग को उनके फैसलों का समर्थन या विरोध करने की पूरी आजादी है। लेकिन एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं न केवल निष्पक्ष रूप से काम करें, बल्कि वे हर दल के लिए निष्पक्ष दिखाई भी दें, ताकि देश के हर नागरिक का चुनावी नतीजों पर भरोसा कायम रहे।
सामान्य जनता वास्तविक रूप से SIR से “बेहाल” हुई है कारण राजनीतिक सबसे बड़ा अधिकार “one vote one value” छिनने डर लगा हुवा है ।