भारत में वायु प्रदूषण से महासंहार !

डॉ. महेंद्र धावड़े, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी 

     भारत में वायु प्रदूषण से होने वाली असामयिक मौतों की संख्या अब कई महायुद्धों में हुई कुल मौतों से भी अधिक हो गई है, जो इसे आधुनिक काल का एक “अदृश्य महासंहार” बना देती है।

     आंकड़े: वायु प्रदूषण बनाम महायुद्ध

वायु प्रदूषण से मौतें

१)2019 में लगभग 23 लाख+ असामयिक मौतें (लैंसेट कमीशन)।

२)2009–2019 के दशक में 38 लाख मौतें (कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट)।

Bharat Mein Vayu Pradushan Se Mahasanhar

३)2000 से 2020 के बीच शहरी PM2.5 प्रदूषण से मौतें 6.7 लाख से बढ़कर 8.7 लाख (लगभग 30% वृद्धि)।

४)40 वर्षों में वैश्विक स्तर पर 135 मिलियन मौतों में से भारत का हिस्सा ~26.1 मिलियन।

महायुद्धों में अनुमानित मौतें

१)प्रथम विश्व युद्ध (1914–18): ~1.6–2 करोड़ (सैनिक + नागरिक)।

२)द्वितीय विश्व युद्ध (1939–45): ~7–8.5 करोड़।

३)केवल भारत में एक दशक (2009–19) में प्रदूषण से हुई मौतें (38 लाख) कई क्षेत्रीय युद्धों या संघर्षों की कुल मौतों से अधिक हैं, और वैश्विक स्तर पर वायु प्रदूषण से वार्षिक मौतें (~67–81 लाख) कई युद्धों के वार्षिक औसत से कहीं अधिक हैं।

     भारत में वायु प्रदूषण एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुका है, और कई रिपोर्टों व विशेषज्ञों के अनुसार सरकारें इससे निपटने में नीतिगत और कार्यान्वयन स्तर पर विफल रही हैं।

राजधानी

१)दिल्ली जैसे शहरों में सर्दियों के महीनों में PM2.5 (2.5 माइक्रोन से छोटे कण) का स्तर अक्सर 250–400 µg/m³ या उससे अधिक पहुंच जाता है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का सुरक्षित मानक केवल 5 µg/m³ है और भारत का अपना मानक भी 40 µg/m³ है।

२)लैंसेट जैसे चिकित्सा जर्नल के अध्ययनों के मुताबिक, 2010 की तुलना में 2022 में भारत में PM2.5 कणों की मात्रा लगभग 38% बढ़ी है और इससे हर साल 17 लाख से अधिक लोग असमय मर रहे हैं।

३)दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में अक्सर 10–12 भारतीय शहर शामिल होते हैं; प्रदूषण से होने वाली मौतें मलेरिया, एड्स और टीबी जैसी बीमारियों से कहीं अधिक हैं।

सरकार की “विफलता” के मुख्य आयाम

विशेषज्ञ, मीडिया संपादकीय और नागरिक संगठन जो कह रहे हैं, उसे संक्षेप में ऐसे देखा जा सकता है:

१)नीतिगत डिजाइन और समन्वय की कमी।केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा अस्पष्ट है; दिल्ली-एनसीआर जैसे क्षेत्र में कई राज्य शामिल होने के बावजूद क्षेत्रीय समन्वय कमजोर रहा है।

२)राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) और ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) जैसे उपाय मौजूद हैं, लेकिन इन्हें अक्सर “आपातकालीन प्रतिक्रिया” तक सीमित रखा गया, न कि दीर्घकालिक, निवारक वायु-गुणवत्ता शासन में बदला गया।

३)प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड संसाधनों, कर्मियों और तकनीकी क्षमता की कमी से जूझ रहे हैं; निगरानी तंत्र कमजोर है और उद्योगों, निर्माण स्थलों, वाहनों आदि पर कार्रवाई नगण्य या देर से होती है।

४)GRAP लागू होने के बावजूद दिल्ली-एनसीआर में कई महीनों तक AQI 400+ (“अत्यंत गंभीर”) बना रहता है, जो क्रियान्वयन और निगरानी में चूक की ओर इशारा करता है।[amarujala]

राजनीतिक तुष्टिकरण बनाम विज्ञान-आधारित नीति

१)नागरिक संगठनों (जैसे NACEJ) का आरोप है कि स्पष्ट वैज्ञानिक सलाह और जनस्वास्थ्य हितों की अनदेखी करते हुए तुष्टिकरण-आधारित फैसले लिए गए, जैसे दीपावली पर “ग्रीन पटाखों” की अनुमति देना, जबकि प्रदूषण पहले से ही रिकॉर्ड स्तर पर था।

२)कई बार नीतियां और आदेश आते हैं, पर उनमें स्थायित्व और गंभीरता की कमी रहती है; प्रदूषण सीजन आने पर ही हड़बड़ी में कदम उठाए जाते हैं।

३)डेटा, पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव।सरकारी विज्ञप्तियों में कुछ शहरों में PM स्तर में 25–27% की गिरावट की बात कही गई है (2019–2024), लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई बड़े शहर अभी भी खतरनाक स्तर पर हैं और आम नागरिक को रोजमर्रा की हवा जहरीली लगती है।

४)नागरिकों को यह स्पष्ट नहीं होता कि कौन सा विभाग किस उल्लंघन के लिए जिम्मेदार है, और सजा या जुर्माना कितना लगा और क्यों, जिससे जवाबदेही धुंधली हो जाती है।

सरकार की विफलता

१)समस्या दशकों से जानी-पहचानी है, वैज्ञानिक डेटा उपलब्ध है, अदालतें भी हस्तक्षेप कर चुकी हैं, फिर भी हर साल स्थिति लगभग वही या बदतर होती दिखती है।

२)कांग्रेस जैसे विपक्षी दल और कई संपादकीय इसे सीधे “नीतिगत विफलता” और “शासन की नाकामी” कहते हैं, क्योंकि योजनाएं तो बनती हैं पर उनका असर जनस्वास्थ्य पर नगण्य रहता है।

३)नागरिक संगठनों का तर्क है कि प्रदूषण के मुख्य स्रोतों (वाहन, उद्योग, निर्माण, कृषि अवशेष जलाना आदि) के खिलाफ संस्थागत कार्रवाई के बजाय नागरिकों पर दमन या सीमांत उपाय थोपे जाते हैं।

     भारत में वायु प्रदूषण की समस्या राज्यवार अलग-अलग गंभीरता के साथ मौजूद है, जहाँ उत्तर भारत के राज्य सबसे अधिक प्रभावित हैं।  हालिया रिपोर्टों के अनुसार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में अधिकांश शहर राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों (NAAQS) से अधिक प्रदूषित हैं।

राज्यवार सबसे प्रदूषित शहरों की स्थिति

१)उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक शहर (13-20 में से) राष्ट्रीय मानकों से अधिक प्रदूषित हैं।  प्रमुख प्रदूषित शहरों में शामिल हैं।

२)गाजियाबाद - 2025-26 की सर्दियों में भारत का सबसे प्रदूषित शहर रहा

३)नोएडा/ग्रेटर नोएडा - दूसरे स्थान पर है ।(४)लखनऊ(५)बुलंदशहर(६)लोनी(७) मथुरा(८)बहराइच, (९)सीतापुर 

उच्च AQI वाले शहर

१) हरियाणा में 24 में से सभी शहर प्रदूषण मानकों से अधिक हैं।  प्रमुख शहर।

२)गुरुग्राम - मार्च 2026 में देश का सबसे प्रदूषित शहर (३)फरीदाबाद

(४)पानीपत - उच्च AQI (288)

(५)रोहतक, हिसार, करनाल - शीर्ष 10 में चार शहर हरियाणा से है ।

१) राजस्थान में 34 में से 33 शहर प्रदूषण मानकों से अधिक हैं।  प्रमुख शहर है ।

(२)भीवाड़ी(३)बीकानेर - उच्च AQI (145)(३)गंगानगर(४)जयपुर, (५)जोधपुर, (६)कोटा - प्रमुख शहर प्रभावित है ।

१) बिहार  में 24 में से 23 शहर प्रदूषण मानकों से अधिक हैं।  

(२)पटना(३)मुजफ्फरपुर, (४)गया, (५)भागलपुर - प्रमुख शहर प्रभावित है ।

१) मध्य प्रदेश में 13 में से 11 शहर प्रदूषण मानकों से अधिक हैं।  

(२)उज्जैन - AQI 168 (अस्वस्थ)

(३)इंदौर - AQI 132 (खराब)

(४)भोपाल, (५)ग्वालियर - प्रमुख शहर प्रभावित है ।

१) पंजाब में 7 में से 6 शहर प्रदूषण मानकों से अधिक हैं।  

२)होशियारपुर(३)लुधियाना, (४)जालंधर, (५)अमृतसर - प्रमुख शहर प्रभावित है ।

१) पश्चिम बंगाल में 7 में से 6 शहर प्रदूषण मानकों से अधिक हैं।  प्रमुख शहर है ।

(२)खड़गपुर - AQI 154 (अस्वस्थ)

(३)दुर्गापुर - AQI 133 (खराब)

(४)कोलकाता, (५)हावड़ा - प्रमुख शहर प्रभावित है ।

१) ओडिशा में 15 में से 11-13 शहर प्रदूषण मानकों से अधिक हैं।  

(२)कटक - AQI 157

(३)भुवनेश्वर - AQI 156 (अस्वस्थ)

(४)राउरकेला, (५)तालचेर - औद्योगिक शहर प्रभावित है ।

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र में 31 में से 30 शहर प्रदूषण मानकों से अधिक हैं।  

मुंबई, पुणे, नागपुर, औरंगाबाद - प्रमुख शहर प्रभावित है ।

गुजरात

गुजरात में 6 में से 4 शहर प्रदूषण मानकों से अधिक हैं।  

अहमदाबाद, सूरत, वडोदरा - प्रमुख शहर प्रभावित है ।

अन्य राज्य

झारखंड: धनबाद (AQI 134)

आंध्र प्रदेश: 9 शहर मानकों से अधिक, तिरुपति (AQI 347), गुम्मदीपूंडी (AQI 174) 

असम: 6 में से 4 शहर प्रदूषित

तमिलनाडु: चेन्नई और अन्य शहर प्रभावित है ।

दिल्ली: NCT दिल्ली - PM10 सांद्रता 197 µg/m³, सबसे प्रदूषित है ।

सबसे अधिक प्रदूषित राज्य

     उत्तर प्रदेश (416 नॉन-अटेनमेंट सिटीज), राजस्थान (158), गुजरात (152), मध्य प्रदेश (143)

     सर्वाधिक प्रदूषित शहर हरियाणा (24/24), आंध्र प्रदेश (9/9), पंजाब (8/8)

     शीर्ष 50 प्रदूषित शहरों में उत्तर प्रदेश (10 शहर), राजस्थान (9), बिहार (7), ओडिशा (5), मध्य प्रदेश (4) है ।

     बलिराजा पार्टी इस गंभीर समस्या को सुलझाने के लिए सरकार के साथ मिलकर काम करेगी ताकि सक्ती से कार्य करने के लिये बाबूगिरी पर कठोर कार्यवाही करके उचित मुआवज़ा के लिये संबधित आस्थापना पर कार्यवाही सुनिश्चित करे ।तस्वीर यह है कि भारत में वायु प्रदूषण अब सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि एक बड़ा जनस्वास्थ्य और शासन-प्रशासन का संकट है।  नीतियां मौजूद हैं, लेकिन उनका डिजाइन, समन्वय, क्रियान्वयन और जवाबदेही इतनी कमजोर रही है कि हवा की गुणवत्ता में स्थायी सुधार नहीं हो पा रहा, और इसलिए इसे व्यापक रूप से “सरकार की विफलता” के रूप में देखा जाता है।