डॉ. महेंद्र धावड़े, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी
कानून की सर्वोच्चता (Primacy of Law)
भारतीय न्यायिक व्यवस्था में ‘विधि का शासन’ (Rule of Law) सर्वोपरि सिद्धांत है।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस जे. बी. पारडीवाला ने स्पष्ट रूप से कहा है कि “न्यायिक फैसले लोकप्रिय जनमत के प्रभाव का प्रतिबिंब नहीं हो सकते।”
उन्होंने जोर देकर कहा कि बहुसंख्यक जनता की इच्छा और मांग को संतुलित करना एक कठिन कार्य है, लेकिन “विधि का शासन बना रहे और जनमत उसके अधीन रहे,” यह अनिवार्य है।
न्यायाधीशों को केवल ‘विधि के शासन’ (rule of law) को ध्यान में रखकर विवादों का निर्णय करना होता है।

लोकप्रिय राय का सीमित प्रभाव
हालाँकि न्यायिक निर्णय कानून पर आधारित होते हैं, लेकिन लोकप्रिय राय का अप्रत्यक्ष प्रभाव देखा जा सकता है।
न्यायपालिका को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए समय के साथ बदलती जनमत को समझना पड़ता है, अन्यथा अदालतें अपनी प्रासंगिकता खो सकती हैं।
अमेरिका में हुए शोध बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले अक्सर जनमत के अनुरूप होते हैं, लेकिन इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि अदालतें व्यवस्थित रूप से जनता की इच्छा का पालन करती हैं।
कानूनी जगत में ‘निर्णय’ (judgments) ही बाध्यकारी कानून बनते हैं, न कि न्यायाधीशों द्वारा लिखी गई ‘राय’ (opinions)। जनमत की अदालत में भी केवल फैसले मायने रखते हैं, न कि तर्क।
कानून और लोकप्रिय राय में अंतर
सर्वोच्च न्यायालय और चुनाव आयोग के बारे में जनता की परीक्षा/जनमत” से है। इसका सरल अर्थ है कि लोकतंत्र में इन संस्थाओं की निष्पक्षता और विश्वसनीयता का आकलन जनता, मतदाताओं और नागरिक समाज द्वारा किया जाता है।
जनता की भूमिका
चुनाव आयोग के संबंध में
जनता चुनाव आयोग से अपेक्षा करती है कि वह:-
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराए ।मतदाता सूची सही और पारदर्शी रखे।सभी राजनीतिक दलों के साथ समान व्यवहार करे।चुनाव आचार-संहिता का निष्पक्ष पालन कराए।मतदान और मतगणना की प्रक्रिया पर लोगों का विश्वास बनाए रखे।शिकायतों और चुनावी अनियमितताओं पर समय पर कार्रवाई करे।
निर्वाचन आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण प्राप्त है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की आधारभूत आवश्यकता माने जाते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के संबंध में
जनता सर्वोच्च न्यायालय से अपेक्षा करती है कि वह:-
संविधान और मौलिक अधिकारों की रक्षा करे।सरकार और चुनाव आयोग के कार्यों की संवैधानिक समीक्षा करे।
चुनावी विवादों पर निष्पक्ष निर्णय दे।
नागरिकों को न्याय और समानता प्रदान करे।सत्ता के दुरुपयोग पर रोक लगाए।
सर्वोच्च न्यायालय के पास न्यायिक समीक्षा की शक्ति है, जबकि चुनाव आयोग कानूनों को असंवैधानिक घोषित नहीं कर सकता।
जनमत का संकेत
सर्वोच्च न्यायालय और चुनाव आयोग—दोनों पर जनता का भरोसा महत्त्वपूर्ण लेकिन शर्तों के साथ बना हुआ है। लोग इन संस्थाओं को लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए आवश्यक मानते हैं, पर उनकी निष्पक्षता, पारदर्शिता और राजनीतिक दबाव से स्वतंत्रता को लेकर सवाल भी बढ़े हैं।
चुनाव आयोग पर राय
CSDS–लोकनीति के 2024 सर्वेक्षण के अनुसार, भारत के चुनाव आयोग पर भरोसा 2019 के 51% से घटकर 2024 में 28% रह गया। सर्वेक्षण ने EVM, VVPAT और चुनावी प्रक्रिया को लेकर जनता की बढ़ती चिंता भी दर्ज की।
जनता की प्रमुख अपेक्षाएँ हैं:-
मतदाता सूची और वोटों की गिनती में पूर्ण पारदर्शिता।EVM–VVPAT की स्वतंत्र और विश्वसनीय जाँच।आदर्श आचार संहिता का सभी दलों पर समान रूप से लागू होना।चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में सरकार के साथ विपक्ष और न्यायपालिका की भी भूमिका।आयोग के निर्णयों और आंतरिक कामकाज की स्पष्ट जानकारी।
सितंबर 2026 में SIR प्रक्रिया और आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर विवाद ने इस चिंता को और तीखा किया है। रिपोर्टों के अनुसार, दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों और निर्णय-प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस हुई।
सर्वोच्च न्यायालय पर राय
सर्वोच्च न्यायालय को आम तौर पर नागरिक अधिकारों, संविधान और सरकार पर नियंत्रण के अंतिम संस्थान के रूप में देखा जाता है। जब न्यायालय मौलिक अधिकारों, चुनावी पारदर्शिता या सत्ता के दुरुपयोग के मामलों में हस्तक्षेप करता है, तब जनता का विश्वास मजबूत होता है।
आलोचनाएँ भी हैं
निर्णयों में देरी और लंबित मुकदमों की समस्या।महत्वपूर्ण मामलों में आदेशों की असंगत गति।न्यायपालिका की जवाबदेही और नियुक्ति-प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी।कुछ फैसलों को राजनीतिक प्रभाव या चयनात्मक हस्तक्षेप के नजरिए से देखना।
2023 में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका के साथ प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति की भूमिका होनी चाहिए; बाद में संसद ने इस व्यवस्था में बदलाव किया। इस मुद्दे ने न्यायपालिका और चुनाव आयोग—दोनों की संस्थागत स्वतंत्रता पर बहस बढ़ाई।
अब भारत की दोनों वरिष्ठ संस्था जनता के संदेह और अविश्वास के दायरे को लेकर कितनी मुखर और संवेदनशील बनकर उभरती है यह बात भारत के संविधान के अनुच्छेद के तहत एक जवाबदेही है और जनभावना का सम्मान करने की शक्ति का प्रदर्शन करती है ।देखना यह है की इन दोनों संस्था पर नई पीढ़ी भरोसा कैसे करेंगी और संस्था अपनी ज़िम्मेदारी कैसी निभाती हैं ?